कतार में देश

पूरा देश कतार में है। कब तक कतार में रहेगा यह किसी को मालूम नहीं। किसी की धड़कनें कतार देख रुक रही हैं तो कोई कतार में ही दम तोड़img-20161117-wa0089 दे रहा है। अगले कई दिनों तक ऐसे ही हालात बने रहने की संभावना है। कई बार कतार इतनी लंबी हो जा रही है कि लोग अगले दिन के इंतिज़ार में कतार में ही रात बिताने को मजबूर हैं। यह स्थिति पाँच सौ और हजार के नोट रातों रात चलन से बाहर हो जाने से उत्पन्न हुई है।मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले का अर्थव्यवस्था पर, काले धन पर, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जाली नोटों के धंधे पर क्या असर पड़ेगा और कब तक पड़ेगा, यह देखना अभी बाक़ी है। फिलहाल यह दिख रहा है कि इतने बड़े फैसले से देश की आम जनता का क्या हाल होगा, इस पर न तो विचार किया गया और न ही उससे निपटने की मुक्कमल तैयारी की गई थी । नोटबंदी से समाज के एक बड़े वर्ग को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भूखे, प्यासे घन्टो कतार में खड़े होने के बाद भी खुद का पैसा नहीं मिल पा रहा है। नोटबंदी के 10वें दिन भी देश में हालात जस के तस हैं। नोट बदलवाने के लिए बैंकों और एटीएम के आगे लंबी कतारें हैं। नकदी की किल्लत का असर रोजमर्रा के लेन-देन और खरीद-बिक्री पर पड़ रहा है। अनुमानतः देश की 54 फीसदी जनता नकदी से काम चलाती है। ऐसे में आम आदमी घर में जमा थोड़े-बहुत छोटे नोटों पर ही निर्भर रह गया। जिनके पास छोटे नोट नहीं हैं उन्हें तो और भी परेशानी है।

जीवन सामान्य रूप से चला पाना निहायत मुश्किल हो गया है। दूध, ब्रेड से लेकर फल-सब्जी की खरीद, स्कूल की फीस और इलाज, हर जगह मुश्किलें पेश आ रही हैं। रोज कमाकर खाने बाले मजदूरों के परिवारों में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।  ग्रामीण इलाकों में किसान और मजदूर का जीवन दुश्वार हो गया है। किसानों की जुताई -बुआई प्रभावित हो रही है। मज़दूरों की रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है। लाखों शादियां सिर्फ इसलिए फीकी पड़ने जा रही हैं कि वहां न्यूनतम जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है। लोग बैंकों में पैसे रखने के बावजूद अपने सामान की खरीदारी करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। बैंक से अधिक राशि का भुगतान नहीं हो रहा है। दुकानदार चेक पेमेंट या बक़ाया पर सामान देने को तैयार नहीं हैं। हालाँकि इस बीच किसानों, शादी वाले परिवारों के सामने आ रही मुश्किलों को देखते हुए सरकार ने कुछ राहत भरी घोषणाएं की हैं। शादी वाले परिवार अब बैंकों में केवाईसी देकर 2.5 लाख रुपये निकाल सकते हैं। वहीं, खेतीबाड़ी और बुआई आदि को लेकर किसानों की सुविधा के लिए सरकार ने रुपये निकासी के नए नियम बनाए हैं। नए नियम के तहत किसान अब बैंकों से एक हफ्ते में 25000 रुपये निकाल सकते हैं।

कारोबार जगत पर नोटबंदी का नकारात्मक असर दिख रहा है। कारोबार चाहे किसी तरह का हो या प्रत्येक में मंदी का आलम छाया हुआ है। छोटे कारखाने और फैक्‍ट्रियों पर ताले लटक गए हैं। नोटबंदी का असर बाजार में इस कदर हावी है कि कारोबारियों का धंधा चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। कामगारों को मेहनताना नहीं मिल और वे काम नहीं कर रहे। लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। लेकिन पीएम कह रहे  हैं कि लोग दुश्वारियाँ सह कर भी सरकार के फैसले खुश हैं, सरकार की तारीफ कर रहे हैं। देशवासी देश के व्यापक हित में सारा कष्ट झेलने को तैयार हैं।  वहीं एफएम को रोज सफाई देनी पड़ रही है कि बस, कुछ दिन और सह लीजिए। अरुण जेटली के अनुसार देशभर में करीब दो लाख एटीएम मशीनों को सुचारू रूप से संचालित होने में तीन हफ्तों का समय लग सकता है।

बैंकों पर भी बहुत दबाव है। शाखाओं से लेकर एटीएम पर लगातार भीड़ बनी हुई है। नोट बदलने और निकासी के काम में बैंक कर्मचारी धैर्य और मुस्तैदी से डटे हुए हैं, लेकिन अधिकांश बैंकों के पास कैश खत्म हो जा रहा है। ग्रामीण शाखाओं में समस्या ज्यादा गम्भीर है, क्योंकि 93 फीसदी ग्रामीण इलाकों में बैंक ही नहीं हैं। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा बार-बार पर्याप्त नकदी की उपलब्धता का भरोसा दिये जाने के बावजूद शहरों से लेकर गांवों तक वक़्त पर करेंसी नहीं पहुंच पा रही है। लोग पैसा तो जमा कर रहे हैं लेकिन छोटी नोट उपलब्ध न होने से उन्हें पैसा नहीं मिल पा रहा है।

उधर नोटबंदी को लेकर कलकत्ता (कोलकाता) हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है। नोटबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी को लेकर सरकार रोज नए फैसले ले रही है और अगले दिन उसे बदल दे रही है। फैसलों को ऐसे रोज बदलना ठीक नहीं है। बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतार से लोग परेशान हो रहे हैं। कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि नोटबंदी के फैसले को लागू करते वक्त केंद्र सरकार ने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल नहीं किया। हर दिन वो नियम बदल रही है। नोटबंदी के बाद पहले सरकार ने कहा था कि बैंक से रोजाना 4000 रुपये तक के पुराने नोट बदले जा सकेंगे, बाद में इसे बढ़ाकर 4500 कर दिया गया. वहीं, एटीएम से रोजाना 2000 कैश निकाले जा सकते थे, जिसकी लिमिट बाद में बढ़ाकर 2500 कर दी गई थी। वहीं  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी से लोगों को दिक्कतें हो रही हैं, और इस सच्चाई से केंद्र सरकार इंकार नहीं कर सकती. चीफ जस्टिस ने कहा, स्थिति गंभीर हो रही है, और ऐसे हालात में गलियों में दंगे भी हो सकते हैं।

अगर सरकार की मानें तो काले धन और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए देश हित में उठाया गया कदम है। सरकार का कहना है कि काले धन और नकली नोटों पर ये सर्जिकल स्ट्राइक जैसा काम करेगा। कानून की नजरें बैंक और एटीएम की कतार में खड़े हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देख रही है। नोटबंदी का फैसला निस्संदेह अप्रत्याशित, कठोर और चौकनेवाला क़दम था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कालेधन की समस्या से निपटने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं। परंतु, इतने बड़े फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए जैसी तैयारी होनी चाहिए थी, वह नहीं थी। गरीब और मध्यवर्गीय आबादी खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की परेशानियों को ध्यान में नहीं रखा गया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र साभार आनंद टून )

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