अनारकली के बहाने मर्दवादी सोच पर प्रहार

FB_IMG_1487581626043

महज संजोग है कि मार्च महीने के अंतिम हफ्ते में जब विश्व महिला सशक्तिकरण का जोश और जश्न उतार पर होगा तब मर्दवादी सोच के खिलाफ एक स्त्री के उठ खड़े होने की हुंकार बड़े पर्दे पर सुनाई देगी. 24 मार्च को रिलीज होनेवाली ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ ऐसी फिल्म है जिसमें एक नारी का आत्मसम्मान ध्वनित है. फ़िल्म के केंद्र में नायिका हैं और निशाने पर है मर्दवादी सोच. एक स्त्री के संघर्ष और सम्मान की लड़ाई को बेबाकी के साथ इसमें दर्शाया गया है. ‘अनारकली ऑफ आरा’ छोटे शहरों की उन महिलाओं की कहानी है जो गाने-बजाने के धंधे में हैं और लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं ये इस फिल्म का पीक पाइंट है. अनारकली अपना घर चलाने के लिए गाने-नाचने का काम करती है. एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में सब बुरा होने लग जाता है,  जब कहानी में एक पावरफुल व्यक्ति की एंट्री होती है. VC (संजय मिश्रा) अनारकली से छेड़छाड़ करता है, जो अनारकली को नागवार लगता है. अनारकली VC बने संजय मिश्रा के गाल पर तमाचा जड़ देती है. यह तमाचा ही उसके लिए मुसीबत का सबब बन जाता है, उसे बदनाम कर दिया जाता है. फिर वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई लड़ती है और न्याय पाने के लिए भर दम कोशिश करती है. यह तमाचा प्रतीकात्मक भी है. खलनायक के बहाने यह तमाचा मर्दवादी सोच और समाज के गाल पर जड़ने की कोशिश है.

‘अनारकली ऑफ़ आरा’ मर्दवादी समाज पर गहरी चोट करती है. फ़िल्म में बड़े सहज तरीके से दिखाया गया है कि गा-नाच कर अपनी आजीविका चलनेवालों को किस तरह समाज की संकुचित सोच का सामना करना पड़ता है. आज भी नाचने-गाने वालों के चरित्र को संदिग्ध नज़र से देखा जाता है. ऐसी स्त्रियों के चरित्र हनन से लेकर उनका मनोबल तोड़ने तक की भरपूर कोशिशें की जाती हैं. पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता, राजनीतिक ताकत के नशे में चूर और शर्म होती संस्कृति इन घटनाओं की वजहों में शामिल हैं. अनारकली देसी गायिकाओं के जीवन की कठिनाइयों को दिखाती है. थियेटर, नौटंकी और नाचने-गाने के पेशे से जुड़ी अधिकतर स्त्रियाँ गरीब और निचले तबके से आती हैं. अधिकांशतः अनारकलियां छोटे-छोटे मंचों पर परफॉर्म करती हैं, लेकिन उनके नाम पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटती है. उनको काफी शोहरत हासिल होती है. हर उम्र के लोग इनके गानों पर दीवानों की तरह झूमते हैं. उनके पास भले ही बॉलीवुड जैसी शोहरत नहीं है, लेकिन लाखों दीवाने हैं. इनके गानों में जो दोहरा अर्थ होता है,  इनके हाव-भाव में जो शरारत भरी अदायें होतीं हैं, उस पर लोग फिदा होते हैं. जब भी ये शो करती हैं तो मंच से लेकर पंडाल के चारों तरफ लोग झूमते नज़र आते हैं, उनपर पैसे लुटाते हैं. पर इस चमक-धमक के पीछे की हकीकत बहुत भयावह और शर्मनाक है.

अनारकली जैसी स्त्रियां रोज अपमानित होती हैं. उनके गानों पर थिरकने वाला समाज उनको शक भरी नजरों से देखता है. लोग उन्हें भले कुछ भी कहते हों, किन्तु वे खुद को कलाकार मानती हैं. नाच-गाना उनका शौक है और पेट भरने का आधार भी,  लेकिन लोग उनकी जिंदगी को समझ नहीं पाते और स्थितियां विपरीत हो जाती हैं. भीड़ के बीच नाच- गाकर जीवनयापन करनेवाली इन अनारकलियों से छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं, लेकिन इनमें से चंद ही इन ज्यादतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं जिसकी कहानी इस फिल्‍म में दिखायी गयी है. अनारकली बेशक द्विअर्थी गाना गाती है लेकिन वह रसूखदारों के लिए उपलब्ध नहीं होती.  अनारकली के हाथों अपमानित हो कर फ़िल्म का खलनायक उसे देह व्यापार के झूठे इल्जाम में फंसा देता है. नेताओं के इशारे पर नाचनेवाली पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है. स्थानीय मीडिया भी उसे वेश्या बना देती है. पर अनारकली हार नहीं मानती, हिम्मत नही हारती, हताश नहीं होती. वह कहती है- सबको लगता है हम गानेवाले लोग हैं तो कोईओ आसानी से बजा भी देगा, पर अब ऐसा नहीं होगा. फिर वह आर-पार की की लड़ाई का फैसला करती है और कहती है कि आज आर-पार होगा या हम आरा की अनारकली नहीं, समझे.

उदारीकरण के बाद दुनिया एक बाज़ार में बदल गई और धीरे-धीरे परम्पराओं और सामाजिक मूल्यों का भी बाज़ारीकरण हो गया. जब दुनिया बदली तो गीत- संगीत उससे कैसे अछूता रह सकता था. लोक गीतों एवं नृत्यों पर अश्लील- द्विअर्थी गीत-नृत्य हावी हो गए हैं. जब लोग यही सुनना और देखना चाहते हैं तो छोटे कलाकार करें भी तो क्या करें, उन्हें भी तो अपना घर-परिवार चलाना होता है. सामाजिक रूप से नाचने गाने को सदा हेय दृष्टि से देखा गया है. यह बात महिला-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू थी. वक़्त के साथ समाज का नजरिया बदला पर महिला कलाकारों के प्रति लोगों की सोच में कुछ खास बदलाव नहीं आया. देश में लैंगिक असमानता समाप्त करने की तमाम कोशिशें मर्दवादी समाज में आकर दम तोड़ देती हैं. स्त्री को नसीहतें देने वाले लोग असल में मर्दवादी सोच से ग्रस्त होते हैं. उन्हें लगता है कि समाज की सभी मर्यादाएं उनके हिसाब से ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसी मानसिकता वाले लोग हर वक़्त महिला हिंसा की एक नई कहानी लिखते हैं. किसी महिला के साथ अभद्रता से पेश आकर खुद के मर्द होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं. इस मानसिकता को अनारकली ऑफ़ आरा के एक दृश्य में खूबसूरती से फिल्माया गया है जिसमे खलनायक बने संजय मिश्रा निर्देश दे रहे हैं कि कांड बनाओ पर कमांड रखो.

अनारकली फ़िल्म नहीं एक गहन सामयिक विचार है जो मर्दवादी समाज में एक स्त्री के संघर्ष को नये मायने देता है. कोई स्त्री आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ ज़िन्दगी जीना चाहती है तो इसमें क्या गलत है. आदर्श, संस्कार, मूल्य, नैतिकता और सारी मर्यादाएँ महिलाओं के जिम्मे ही क्यों आती हैं, ऐसे कई सवाल हैं जो आज भी अनुतरित हैं, यह फ़िल्म वास्तव में बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देगी. पत्रकार से निर्देशक बने अविनाश की पैनी नज़र और स्वरा भास्कर, संजय मिश्रा और पंकज त्रिपाठी जैसे उम्‍दा कलाकारों का दमदार अभिनय अनारकली ऑफ आरा में अद्भुत संवेदनशीलता भर देता हैं. अविनाश ने फिल्म के हर डिपार्टमेंट को चुस्त रखा है. उन्होंने इस फिल्म की कहानी, संवाद और दो गाने भी लिखे हैं. फ़िल्म के गाने और संगीत लाज़वाब हैं. संगीत रोहित शर्मा का है. रोहित ने बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम और शिप ऑफ थीसियस में भी संगीत दिया था. प्रोमो देखकर कहीं से यह नहीं लगता कि यह उनकी पहली फ़िल्म है. अगर आप गंभीर फ़िल्मों के शौकीन हैं तो ये फ़िल्म जरूर देखें, आपको बहुत पसंद आएगी.

हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

इस जीत के मायने

यूपी और उतराखंड के चुनाव नतीजे से यह साफelection हो गया कि 2019 में भाजपा की वापसी तय है. मोदी की लोकप्रियता घटने की बजाए बढ़ी है. नतीजों से भाजपा खुदअचंभित है वहीं विपक्षियों में अब भय दिखने लगा है. गोवा में कम सीटें मिलने के बाद भी भाजपा की सरकार बन गई और मणिपुर में पार्टी को सरकार बनाने का न्योता मिला है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बहुमत तक पहुंचते-पहुंचते रह गयी थी. जाहिर है यहां सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का खेल करना था. इस खेल में भी भाजपा बाजी मार गई और कांग्रेस जीत कर भी हार गई. भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन होती जा रही है. यह स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन इस वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है. विपक्ष कमजोर हो तो सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है. मोदी को रोकने के लिए विपक्ष को गोलबंद होना पड़ेगा, पर उसके पहले प्रभावी मुद्दों और प्रभावी नेतृत्व को तलाशना होगा.

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बने पौने तीन साल हो गए हैं. इन सालों में विपक्षी दल एकता की कोई धुरी नहीं खोज पाए हैं. विपक्ष में एकजुटता की बजाय बिखराव आया है. विपक्ष का बिखराव मोदी को ताकत दे रहा है. लोकसभा चुनावों में अब करीब दो साल बचे हैं. कांग्रेस की वापसी के कोई संकेत नहीं हैं. उल्टे वो देशभर में अपनी बची-खुची जमीन भी खोती जा रही है. नतीजों ने राहुल के नेतृत्व की राजनीतिक परिपक्वता और पार्टी से बाहर स्वीकार्यता, दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है. हालाँकि कांग्रेस को पंजाब में जीत हासिल हुई, लेकिन इस जीत का सारा श्रेय कैप्टन अमरेंदर सिंह की लोकप्रियता और मेहनत को जाता है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता अरुण जेटली को तब हराया था जब पूरा देश नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार था. यूपी-उतराखंड जितने,  गोवा में सरकार बनाने और कम सीटों के बावजूद मणिपुर में सरकार बनाने का न्योता  मिलने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों का 15 राज्यों में शासन हो जाएगा. गोवा विधानसभा चुनावों के नतीजों में कांग्रेस के 17 विधायक हैं जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 13 है. गोवा में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा है. नतीजो के बाद जो स्कोर 3-2 से 4-1  का हो गया है.

कांग्रेस के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा होता जा रहा है. कांग्रेस की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. संगठन का अभाव और नेतृत्व की कमजोरी कांग्रेस संगठन को खोखला कर रहा है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ के उनके निर्णय पर कांग्रेस संगठन के भीतर विचार-विमर्श तक नहीं किया गया था. पार्टी में विचारधारा की कोई लड़ाई लड़ने की क्षमता तो बहुत पहले खत्म हो गई थी, अब नेतृत्व का संकट भी पैदा हो गया है. राहुल गांधी का नेतृत्व कोई उम्मीद या उत्साह नहीं जगा पा रहा है. राहुल गांधी वोट दिला सकते हैं,  इसका भरोसा उनकी पार्टी के ही लोगों को नहीं है तो दूसरे दलों को कैसे होगा?  कांग्रेस ने गांधी परिवार से खुद को इस तरह बांध रखा है कि वह नेता के लिए उससे आगे नहीं देख पाती. कांग्रेस को राहुल गांधी की क्षमताओं, उनकी संभावनाओं और सीमाओं पर वस्तुपरक ढंग से विचार करना चाहिए. कांग्रेस को नए सिरे से गढ़ना जरूरी है. कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है, तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा. कोई नये नेता को नेतृत्व सौंपना होगा. जमीनी स्तर पर काम करना होगा.

ये चुनाव नोटबंदी के बाद हुए. कांग्रेस ने नोटबंदी से लोगों को हुई मुश्किलों को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी, मगर असफल रही. बेशक नोटबंदी ऐसा फैसला था, जिससे लगभग हर शख्स प्रभावित हुआ. इसके बावजूद जनादेश भाजपा के पक्ष में गया. नोटबंदी से भले लोगों को तकलीफ थी लेकिन नाराज़गी नहीं थी. गौरतलब है कि महाराष्ट्र निकाय चुनाव और ओड़िशा में पंचायत चुनाव, दोनों नोटबंदी के बाद हुए. भाजपा को  इन दोनों  चुनावों में भी सफलता मिली थी. नोटबंदी के रूप में विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला था, जिसे उसने एकजुटता और मत भिन्नता के आभाव में गंवा दिया.

हर चुनाव अपने-आप में खास होता है, मगर इन पांच राज्यों पर इसलिए नजर थी, क्योंकि साल 2019 के लोकसभा चुनाव का रास्ता यहीं से आकार लेगा, खासकर उत्तर प्रदेश से. इस सूबे में सभी पार्टियों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ था. पार्टियों की साख के साथ-साथ यहां छवि की लड़ाई भी लड़ी गई थी. उत्तर प्रदेश का महत्व सिर्फ इसीलिए नहीं है कि यह देश का सबसे बड़ी आबादी वाला सूबा है या यहां सबसे ज्यादा 403 विधानसभा सीटें हैं. केंद्रीय राजनीति की दशा-दिशा का रुख यहीं से तय होता रहा है. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर बाकी के चार राज्यों के मुकाबले यहां के नतीजों का असर केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा पड़ेगा. इस जीत का सबसे पहला असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा. साथ ही राज्यसभा में भाजपा मजबूत होगी.

पांच राज्यों के चुनाव भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी के लिए काफी मायने रखता है. उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड या फिर गोवा भाजपा मोदी के नाम से ही चुनाव में उतरी थी. इन राज्यों में पार्टी ने कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दिया था. यूपी में मोदी ने पार्टी के कोर वोट में बड़ा बदलाव किया है. भाजपा अपने साथ सवर्णों और व्यापारी वर्ग की पार्टी के साथ पिछड़ी जाति और दलित जोड़े हैं. तीन तलाक के मुद्दे से मुस्लिम महिलाओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ. श्मशान-कब्रिस्तान और कसाब के जरिये भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण की बयार बहाने की कोशिश की और अपनी कोशिशों में कामयाब भी हुई. मणिपुर के नतीजों की बात करें तो यहाँ भाजपा के मत में 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि गोवा में बहुमत नहीं मिलना भाजपा के लिए झटका है.

2014 लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं चेतीं और यूपी उनके हाथ से निकल गया. नतीजों ने समाजवादियों का, पिछड़ी और दलित राजनीति का एक साथ ही सफाया कर दिया. समाजवादी और बहुजन समाजवादी दोनों ही खास जातियों के पक्षधर रहे हैं. समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा. जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं प्रो.रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए. मुलायम सिंह के नाम पर समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा था. अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष तो बन गये लेकिन पिछड़े और गरीब तबके का भरोसा जितने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा.  यूपी में मायावती का वोट बैंक भी खिसका है. वह दलितों और ब्राह्मणों को साधने में विफल रहीं.  बसपा की मुखिया मायावती को नये तरीके से खुद को तैयार करना होगा तथा दलित और मुसलमान मतदाताओं के गठजोड़ पर अपने फोकस के बारे में पुनर्विचार करना होगा. 27 साल सूबे की सत्ता से बाहर रहने के बावजूद मात्र सात सीटें ही हासिल कर पाई. कांग्रेस का यह अब तक सबसे खराब प्रदर्शन है. लोकसभा चुनाव में मोदी और बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में असफल रहे. कांग्रेस द्वारा उठाया गया गरीब-अमीर का मुद्दा भी नहीं चला. राहुल यह बात उठाते रहे कि मोदी गरीबों के नहीं पूंजीपतियों के समर्थक है, लेकिन लोगो ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. वहीं भाजपा ने गांव-गरीब, किसान और विकास को मुद्दा बना कर मतदाताओं को आकर्षित किया. साथ ही साम्प्रदायिकता को हवा देकर वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही.

भारतीय राजनीति एक व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमट गयी है.  मोदी का जलवा बरकरार है. यूपी में मोदी मैजिक और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग विपक्षी दलों पर हावी दिखी. यहाँ पार्टी की प्रचंड और ऐतिहासिक जीत से मोदी की छवि और मजबूत होकर उभरी है. मोदी ने यहाँ दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की थी. किसी विधानसभा चुनाव में किसी प्रधानमंत्री ने शायद ही इतनी रैलियां की हों. उत्तर प्रदेश के बरक्स बाकी के चार राज्यों के नतीजे का केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़नेवाला. पंजाब में भाजपा वैसे भी दूसरे दर्जे की पार्टी  थी, यहाँ उसके खोने के लिए कुछ था भी नहीं. अगर आम आदमी पार्टी यहां कुछ कर पाती तो अरविंद केजरीवाल मोदी-विरोध की राजनीति के एक मजबूत विकल्प बन कर उभरते.

इस समय कांग्रेस सहित लगभग सभी दल हाशिए पर आए हुए हैं, भाजपा का मजबूत विकल्प बनने के लिए विपक्षी एकता की  पहल जरूरी है. भाजपा की लगातार जीत का सीधा संदेश है गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति का अंत. विपक्ष को जिंदा रहना है तो उसको बेहतर गठबंधन बनाने होंगे. लोगों के मुद्दे उठाने होंगे. अगले सात आठ महीनों में मोदी के राज्य गुजरात और हिमाचल में चुनाव होना है. विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक इस नई राजनीतिक ताकत का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

पुरातात्विक धरोहरों को पहचानने और बचाने की पहल

 

झारखण्ड की छवि नकारात्मक प्रदेश की रही है जबकि यह आश्चर्यों से भरा प्रदेश है, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है. एक ओर यहाँ सुरम्य घाटियां, झरने, नदियाँ  और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएँ हैं. रत्नगर्भा धरती है, वहीं दूसरी ओर प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियाँ  हैं. हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है. भारतीय भूभाग में मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में हुआ. पूरे झारखंड में इस तरहimg-20170110-wa0089 बिखरे ऐतिहासिक अवशेषों, सांस्कृतिक साक्ष्यों और स्थापत्य कला की दृष्टि से उल्लेखनीय कृतियों से यहाँ के अतीत और लोकजीवन के विविध पक्षों को जाना जा सकता है. पुरातात्विक दृष्टि से झारखंड अत्यंत समृद्ध है. समय-समय पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा यहाँ जो अन्वेषण कार्य हुए उसमें पूर्व, मध्य एवं उत्तर पाषाण कालीन एवं नव पाषाण कालीन प्रस्तर के औजार काफी बड़ी संख्या में मिले हैं. यहाँ पत्थर और अन्य उपकरण, सभ्यताओं के प्रारंभिक वर्षों से 3000 से अधिक वर्ष पहले के हैं. प्राच्य पाषाण कालीन प्रस्तर आयुध इस तथ्य को प्रगट करते कि आदि मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे. प्राचीन सभ्यता में हड़प्पा की मौजूदगी का भी प्रमाण है. प्रदेश में अनेक छोटे-बड़े प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक पुरातात्विक अवशेष हैं जो यहाँ की स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रागैतिहासिक गुफाओं में मिले भित्ति चित्र जनजातियों के चित्रकलाओं से मिलती-जुलती हैं. भारत के सबसे पुराने गुफा चित्रों को बनानेवाले को झारखंड के शबर जनजाति के रूप में जाना जाता है.

हजारीबाग से लगभग 42 किलोमीटर दूर इस्को के पास पहाड़ी गुफाओं में प्राचीनतम शैल चित्र पाये गये हैं जो बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बनाये गये हैं. स्थानीय लोग इस्को के इस गुफा को राजा-रानी के कोहबर के रूप में जानते हैं. सिन्धु घाटी के समय के बर्तनों पर जिस तरह की आकृतियां बनी हैं उनसे मिलती-जुलती आकृतियां चाय-चंपा के शिल्पों में पायी गई हैं. संतालों के मौलिक इतिहास के संकेत करम विनती में मिलते हैं. इसमें चाय-चंपा के किले और उसमें बने शैलचित्रों की सुन्दरता का जिक्र है. सिन्धु लिपि, हजारों वर्षों से संताल परगना के आदिवासी समाज के बीच अज्ञातवास कर रही हैं. स्वयं संतालों को भी इसकी जानकारी नहीं है. सिंधुलिपि के भित्ति चित्रों, मुहरों में अंकित संकेत तथा शिलाओं पर उकेरे चित्रादि संताल आदिवासी समाज के पूजानुष्ठानों में भूमि पर खींची जानेवाली आकृतियों से मिलती-जुलती हैं. बिहार प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी निर्मल कुमार वर्मा ने दो दशक पूर्व सिन्धु लिपि पढ़ लिए जाने की बात सार्वजनिक कर हलचल मचा दी थी. 1992 में श्री वर्मा के असमय निधन के कारण इतिहास के गर्भ में छिपा यह रहस्य, रहस्य बनकर ही रह गया. यदि श्री वर्मा आज जीवित होते तो निश्चिय ही दुनिया के इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन आ जाता. शायद इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता. विडंबना है कि श्री वर्मा के शोध की गंभीरता पर राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी ध्यान नहीं दिया. अगाध पुरातात्विक संभावनाओं वाले झारखंड राज्य के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए व्यापक व गहन सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन जरूरी है. अब तक जो हुआ है, उससे झारखंड के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास क्रम को जान पाना संभव नहीं है. इतिहास के काल की कई कड़ियां अभी भी गुम हैं.

भारतीय पुरातत्व में असुर शब्द का प्रयोग झारखंड के रांची, गुमला और लोहरदगा  जिलों के कई स्थलों की ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रयुक्त होता है. आज भी लोहरदगा, चैनपुर, आदि इलाकों में असुर नामक जनजाति रहती है. वह लोहा गलानेवाली और लोहे के सामान तैयार करने वाली जाति के रूप में मशहूर है. उस जाति के पुरखे यहाँ बसते थे, उन स्थानों से ईंट से निर्मित प्राचीन भवन, अस्थि कलश, प्राचीन पोखर आदि प्राप्त हुए हैं. के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं. झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. असुर असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी.

प्रारम्भिक पत्थरों के औजारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में सम्भवतः अर्धमानवों का निवास था. वे गुफाओं में रहते थे; उस काल के देवघर, बोकारो, राँची आदि क्षेत्र में पुरापाषाण कालीन औजारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि पुरापाषाणकालीन संस्कृति का आश्रय इस झारखण्ड में भी था. इसके बाद की झारखण्ड सम्बन्धी ऐतिहासिक जानकारी संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों और मध्यकालीन फारसी के इतिहास ग्रंथों में मिलती है. इन सब सूत्रों से झारखण्ड के इतिहास की जानकारी विस्तार से अथवा संक्षिप्त तौर पर मिलती है. देवघर के बैद्यनाथ धाम और तपोवन, दुमका के वासुकी नाथ और राजमहल के राजेश्वरीनाथ जैसे शिवतीर्थों का वर्णन पुराणों में मिलता है. वास्तव में झारखण्ड का इतिहास पुराण युग से बहुत पुराना है. महाभारत के ‘दिग्विजय पर्व’ में इस क्षेत्र को ‘पुंडरीक देश’ कहा गया है. इसी ग्रंथ में इसे ‘पशुभूमि’ भी कहा गया है. अबुल फजल कृत अकबरनामा में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘झारखण्ड’ कहा गया. शम्स-ए-शिराज अफीफ, सल्लिमुल्ला तथा गुलाम हुसैन आदि लेखकों ने अपने ग्रंथ में ‘झारखण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है. कबीरदास के एक पद में झारखण्ड का जिक्र हैः

कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी कासी!

झारखण्ड में आय विराजे वृंदावन की वासी!!

झारखण्ड राज्य वनों से आच्छादित है तथा इस राज्य में अपेक्षाकृत अनुसूचित जनजाति के लोगों का निवास अधिक है. इन लोगों की परंपरा, संस्कृति, कला, लोकगीत, बर्तन, विवाह गीत को भी सहेजने की जरूरत है. झारखंड की धरोहर, इसकी संस्कृति को जानना-समझना बेहद जरूरी है. झारखंड की विरासत को जनमानस के मध्य जागरूकता बनाये रखने के लिए पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद व युवा कार्य विभाग, इंडियन आर्कियोलॉजी सोसाइटी और हेरिटेज झारखण्ड संस्था के संयुक्त तत्वावधान में छह से आठ जनवरी तक रांची में राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के पुरातत्वविदों के अलावा अमेरिका, इंगलैंड और इरान से भी पुरातत्व विशेषज्ञ भी शामिल हुए.

संगोष्ठी समारोह में पर्यटन, कला-संस्कृति, खेद-कूद एवं युवा विभाग मंत्री अमर कुमार बाउरी ने कहा कि झारखंड में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ के बारे में लोगों को मालूम नहीं. उन पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानना उनकी खोज करना आवश्यक है. इतिहास को जानकर ही हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं. झारखंड में ऐसे भी ऐतिहासिक स्थल पाये गये जो कि रामायण, महाभारत एवं मुगलकाल के इतिहास की कहानी कहते हैं. उस काल के स्थल आज भी विद्यमान हैं. इस मौके पर हेरीटेज झारखंड संस्था के अध्यक्ष एच एस पांडेय ने कहा कि पुरातत्व हमारे लिये एक दर्पण की तरह है. झारखंड में अंग, बंग, शुंग सबकी संस्कृति के तत्व बिखरे पड़े हैं उन पर समग्र अध्ययन होनी चाहिये. पुरातत्व वह माध्यम है जो उन तत्वों एवं तथ्यों का संग्रह करता है और हमारे इतिहास को सुरक्षित करता है. अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश पांडेय ने कहा कि विवि में पुरातत्व विभाग नियमित होगा और इस दिशा में ठोस काम किया जाएगा. उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही कला संकाय भी खुलेगा. वहीं हेरिटेज झारखंड के सचिव डॉ एचपी सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य ही था कि लोगों को पता चले कि पुरातत्व भी एक विषय है. इसे मुख्यधारा में लाया जाए. हम अपनी धरोहरों को जाने-पहचाने और संरक्षित करने की दिशा में काम करें. उन्होंने कहा कि हेरिटेज झारखंड के माध्यम से पुरातत्व के प्रति लोगों में अलख जगाते रहेंगे और नए लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा.

मौके पर दो पुस्तकों पुरातत्व एवं एब्सटैक्ट का विमोचन भी किया गया. संगोष्ठी में इण्डियन ऑर्कियोलोजिकल सोसायटी के अध्यक्ष केएन दीक्षित, सोसायटी फॉर प्री-हिस्ट्री एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज के प्रतिनिधि डॉ पीपी जोगलेकर, इण्डियन हिस्ट्री एण्ड कल्चर सोसायटी के प्रतिनिधि प्रो डीपी तिवारी ने भी  अपने विचार रखे. तीन दिनी राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी में देश-विदेश के करीब 150 पुराविदों ने शिरकत की.

पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों में इतिहास की कड़ियाँ झारखंड से जुड़ती रही हैं. यहाँ का समृद्ध, सभ्य अस्तित्व, मानव समाज और उनके सांस्कृतिक तरीके, गुफाओं में जीवित रहने के तरीके, स्मारक, चट्टानी कला में आश्रयों (पेट्रोग्राफ) के रहस्य जानना जरूरी है. पुरातात्विक महत्व के स्थलों व वस्तुओं को सहेजने और उसे सुरक्षित रखने में आम लोगों की सहभागिता भी आवश्यक है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ जितनी भी कवायद कर लें, बिना आमजन के सहयोग से यह कार्य संभव नहीं है. हमें भविष्य को संवारने के लिए अतीत को याद रखना होगा.

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

 

पानी : समाज, सरकार और संकल्प

आज नये साल का पहला दिन है,  कोई संकल्प लेने का दिन है। क्यों न इस साल की शुरुआत हम पानी पर  चिन्तimg-20161226-wa0082न के साथ करें और इसे बचाने का संकल्प लें। साथ ही नदी-तालाबों को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प भी लें। जल संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सभ्यता काल से ही जल प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जल जीवन का पर्याय है, जल के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिकी विज्ञान लेखक,लोरान आइजली ने कहा था कि ‘हमारी पृथ्वी पर अगर कोई जादू है,तो वह जल है।’ नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं लेकिन हम नदियों को इसके बदले कुछ लौटाते नहीं हैं। तमाम जल समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है और हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है, जिससे प्रदूषण और जल-संकट की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है, परंतु दुर्भाग्य से इसका अल्पांश ही पीने लायक है। पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के एकजुट होकर प्रयास किया जाये।

आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। 2030 तक पूरी दुनिया में जरूरत के अनुपात में 40 प्रतिशत पानी कम हो जायेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत में जल भण्डार वाले इलाकों समेत कई राज्यों में भूजल का स्तर बहुत नीचे पहुँच चुका है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान समेत कुछ अन्य राज्यों में भूजल का सर्वाधिक दोहन हो रहा है। उत्तर-पश्चिमी , पश्चिमी और प्रायद्विपीय इलाकों की स्थिति भयावह होती जा रही है। 54 फीसदी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है। शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित ढेरों समस्याओं को जानने-समझने  के बावजूद हम जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हैं । नदियाँ, तालाबें एवं झीलें अमूल्य धरोहरें हैं।  इन्हें बचा कर रखना हमारा दायित्व भी है। पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर विशेष ध्यान देना होगा।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र रफ्तार,बढ़ता प्रदूषण तथा जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। नदियों के किनारों पर व्यवसायिक गतिविधियाँ बढ़ जाने से नदियों के जीवतंत्र को क्षति पहुँची है। गंगा के किनारे हज़ारों फैक्ट्रियां हैं जो न केवल इसके जल के अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं, बल्कि उसमें भारी मात्रा में प्रदूषित कचरा भी छोड़तीं हैं।  गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना अरबों लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है जो गंगा में बहा दिया जाता है। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से इस पतित पावनी नदी के अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा किनारे 118 शहर बसे हैं, जिनसे रोज करीब 364 करोड़ लीटर घरेलू मैला और 764 उद्योगों से होने वाला प्रदूषण गंगा में मिलता है। सैकड़ों टन पूजा सामग्री गंगा में फेंकी जाती है। यमुना, दामोदर, गोमती और महानन्दा का हाल भी इससे अलग नहीं है। नदियों की अपनी पारंपरिक गति और दिशा को इस तरह प्रभावित किया जायेगा, तो जाहिर है कि इससे जल-संकट की स्थिति बढ़ती ही जायेगी। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,एवं जल के अन्य स्रोत सूखते होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है।

भारतीय उपमहाद्वीप में बहने वाली प्रमुख नदियों में से लगभग 15 प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, महानदी, तुंगभद्रा इत्यादि न जाने कितने वर्षों से भारत की पावन भूमि को सिंचित करती चली आ रही हैं। ये नदियाँ वाकई भारत एवं भारतीय लोगों की जीवन-रेखा सदृश्य हैं। इनमें गंगा मात्र नदी नहीं हैं, वह संस्कार और संस्कृति भी है। गंगा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गंगा को जीवन देना आसान काम नहीं है। जल की बर्बादी रोकने के लिए रिवर और सिवर को अलग-अलग करना होगा।  कूड़े-कचरे के कारण किसी समय स्वच्छ जल से भरी नदियों की स्थिति दयनीय हो गई है। इस संबंध में सरकार भी गंभीर नहीं है। सरकार को इस दिशा में विशेष योजना बनाकर कार्य करना होगा। जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है।

जल पुरुष राजेंद्र सिंह के अनुसार केंद्र की नई सरकार ने गंगा नदी के पुनर्जीवन की योजना बनाई है, लेकिन हमारी समझ है कि इसके पूर्व गंगा एक्शन प्लान इसलिए सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसमें आम लोगों की भागीदारी नहीं थी। लोगों को लगा कि की यह तो सरकार का काम है, जबकि 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग, प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियां साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं। लोग, नदियों को इस स्थिति में रखने को प्राथमिक जिम्मेदारी मानते थे। गंगा तो मां मानी जाती है। लोगों में फिर से यही सोच विकसित करनी होगी। नदियों के किनारे बसे गांव का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर उतर आए, तो नदियों भविष्य बेहतर हो सकता है। राजेंद्र सिंह रविवार को पटना में ख्यात पर्यावरणविद गांधीवादी अनुपम मिश्र को समर्पित अक्षधा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘पानी : समाज और सरकार’ विषयक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस संगोष्ठी में सिर्फ एक ही बात की गूंज थी कि कैसे स्कूलों सामुदायिक संगठनों व आम नागरिकों के बीच जल साक्षरता बढाकर इन्हें जागरूक किया जाय। राजेंद्र सिंह ने केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा से कहा कि अगर वाकई आगे की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है, तो देश में जल साक्षरता शुरू करानी होगी। बच्चों को बचपन से ही स्कूलों में पानी की महत्ता, इसके संरक्षण के बारे में पूरा-पूरा बताना होगा। चूंकि अब इस मोर्चे पर दूसरा उपाय बच नहीं गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने इससे पूरी सहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने भारतीय जीवन, संस्कृति में नदियों की अहमियत को बताया। उन्होंने कहा कि नदियों के बारे में समाज को भी अपनी ड्यूटी समझना जरूरी है।

अनुपम मिश्र जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद थे। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर  में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ है। इसी तरह  उतराखंड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। पानी पर एक अरसे से काम कर रहे मेरे पत्रकार मित्र पंकज मालवीय का मानना है कि नदियों को उसके मूल नैसर्गिक रूप में वापस लाया जाना बेहद जरूरी है।  बिना जन-भागीदारी के गंगा और दूसरी नदियों को गंदा होने से नहीं रोका जा सकता। गंगा समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए जरूरी है कि बाँधों, गादों और प्रदूषण से इन्हें मुक्त कराना होगा।

गंगा की सफाई के अब तक सारे प्रयास असफ़ल हुए हैं। कानून और नियम तो बनाये गए , लेकिन उनको लागू करने में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। नमामि गंगे योजना के नाम से गंगा जी को स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाई गई योजना कोई पहली योजना नहीं है। गंगा प्राधिकरण की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि गंगा नदी को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाया जा सके। परंतु केवल इस पावन उद्देश्य हेतु सैकड़ों करोड़ का बजट आबंटित कर देने से  कुछ भी हासिल होने वाला नहीं।  गंगा की स्वच्छता का कोई भी अभियान इसके किनारे रहने वाले लोगों को उससे जोड़े बिना मुमकिन नहीं है। जब तक इस विषय पर लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

तेजी से शहरों का विकास हो रहा है। अंधाधुंध विकास. पेड़ों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। तालाबों को पाटकर शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं। शहर का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है। नदी तटों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता दोनों का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। पानी के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव है। इसमें विशेष तौर से निर्धनतम समुदाय, उनमें भी महिलाओं में जागरूकता की अत्यधिक कमी देखने को मिलती है। यह अभियान तभी सफल होगा, जब जन-भागीदारी हो। हम सभी का योगदान हो, इसके लिए पहले पानी के संकट की भयावहता को समझना होगा। पानी पर बात करने को सभी तैयार रहते हैं, किन्तु पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का संरक्षण संभव नहीं है। किनारों पर अवस्थित गाँवों में रहने वाले लोग संकल्प लेना होगा कि वे नदियों के जल को प्रदूषित नहीं करेंगे।  जल प्रकृति का एक अनिवार्य घटक है। जल से ही जीवन है। इस अनमोल प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु सभी को संगठित होकर अपना अमूल्य योगदान देना चाहिए। आधुनिक शिक्षा पद्धति में पानी के सन्दर्भ में जितनी अल्प जानकारी  उपलब्ध है वह यहां की नई पीढ़ी की पानी के प्रति समझ बनाने के लिए अपर्याप्त है। आइए इस वर्ष हम एक-एक बूंद पानी बचाने का हम संकल्प लें।

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

कतार में देश

पूरा देश कतार में है। कब तक कतार में रहेगा यह किसी को मालूम नहीं। किसी की धड़कनें कतार देख रुक रही हैं तो कोई कतार में ही दम तोड़img-20161117-wa0089 दे रहा है। अगले कई दिनों तक ऐसे ही हालात बने रहने की संभावना है। कई बार कतार इतनी लंबी हो जा रही है कि लोग अगले दिन के इंतिज़ार में कतार में ही रात बिताने को मजबूर हैं। यह स्थिति पाँच सौ और हजार के नोट रातों रात चलन से बाहर हो जाने से उत्पन्न हुई है।मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले का अर्थव्यवस्था पर, काले धन पर, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जाली नोटों के धंधे पर क्या असर पड़ेगा और कब तक पड़ेगा, यह देखना अभी बाक़ी है। फिलहाल यह दिख रहा है कि इतने बड़े फैसले से देश की आम जनता का क्या हाल होगा, इस पर न तो विचार किया गया और न ही उससे निपटने की मुक्कमल तैयारी की गई थी । नोटबंदी से समाज के एक बड़े वर्ग को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भूखे, प्यासे घन्टो कतार में खड़े होने के बाद भी खुद का पैसा नहीं मिल पा रहा है। नोटबंदी के 10वें दिन भी देश में हालात जस के तस हैं। नोट बदलवाने के लिए बैंकों और एटीएम के आगे लंबी कतारें हैं। नकदी की किल्लत का असर रोजमर्रा के लेन-देन और खरीद-बिक्री पर पड़ रहा है। अनुमानतः देश की 54 फीसदी जनता नकदी से काम चलाती है। ऐसे में आम आदमी घर में जमा थोड़े-बहुत छोटे नोटों पर ही निर्भर रह गया। जिनके पास छोटे नोट नहीं हैं उन्हें तो और भी परेशानी है।

जीवन सामान्य रूप से चला पाना निहायत मुश्किल हो गया है। दूध, ब्रेड से लेकर फल-सब्जी की खरीद, स्कूल की फीस और इलाज, हर जगह मुश्किलें पेश आ रही हैं। रोज कमाकर खाने बाले मजदूरों के परिवारों में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।  ग्रामीण इलाकों में किसान और मजदूर का जीवन दुश्वार हो गया है। किसानों की जुताई -बुआई प्रभावित हो रही है। मज़दूरों की रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है। लाखों शादियां सिर्फ इसलिए फीकी पड़ने जा रही हैं कि वहां न्यूनतम जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है। लोग बैंकों में पैसे रखने के बावजूद अपने सामान की खरीदारी करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। बैंक से अधिक राशि का भुगतान नहीं हो रहा है। दुकानदार चेक पेमेंट या बक़ाया पर सामान देने को तैयार नहीं हैं। हालाँकि इस बीच किसानों, शादी वाले परिवारों के सामने आ रही मुश्किलों को देखते हुए सरकार ने कुछ राहत भरी घोषणाएं की हैं। शादी वाले परिवार अब बैंकों में केवाईसी देकर 2.5 लाख रुपये निकाल सकते हैं। वहीं, खेतीबाड़ी और बुआई आदि को लेकर किसानों की सुविधा के लिए सरकार ने रुपये निकासी के नए नियम बनाए हैं। नए नियम के तहत किसान अब बैंकों से एक हफ्ते में 25000 रुपये निकाल सकते हैं।

कारोबार जगत पर नोटबंदी का नकारात्मक असर दिख रहा है। कारोबार चाहे किसी तरह का हो या प्रत्येक में मंदी का आलम छाया हुआ है। छोटे कारखाने और फैक्‍ट्रियों पर ताले लटक गए हैं। नोटबंदी का असर बाजार में इस कदर हावी है कि कारोबारियों का धंधा चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। कामगारों को मेहनताना नहीं मिल और वे काम नहीं कर रहे। लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। लेकिन पीएम कह रहे  हैं कि लोग दुश्वारियाँ सह कर भी सरकार के फैसले खुश हैं, सरकार की तारीफ कर रहे हैं। देशवासी देश के व्यापक हित में सारा कष्ट झेलने को तैयार हैं।  वहीं एफएम को रोज सफाई देनी पड़ रही है कि बस, कुछ दिन और सह लीजिए। अरुण जेटली के अनुसार देशभर में करीब दो लाख एटीएम मशीनों को सुचारू रूप से संचालित होने में तीन हफ्तों का समय लग सकता है।

बैंकों पर भी बहुत दबाव है। शाखाओं से लेकर एटीएम पर लगातार भीड़ बनी हुई है। नोट बदलने और निकासी के काम में बैंक कर्मचारी धैर्य और मुस्तैदी से डटे हुए हैं, लेकिन अधिकांश बैंकों के पास कैश खत्म हो जा रहा है। ग्रामीण शाखाओं में समस्या ज्यादा गम्भीर है, क्योंकि 93 फीसदी ग्रामीण इलाकों में बैंक ही नहीं हैं। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा बार-बार पर्याप्त नकदी की उपलब्धता का भरोसा दिये जाने के बावजूद शहरों से लेकर गांवों तक वक़्त पर करेंसी नहीं पहुंच पा रही है। लोग पैसा तो जमा कर रहे हैं लेकिन छोटी नोट उपलब्ध न होने से उन्हें पैसा नहीं मिल पा रहा है।

उधर नोटबंदी को लेकर कलकत्ता (कोलकाता) हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है। नोटबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी को लेकर सरकार रोज नए फैसले ले रही है और अगले दिन उसे बदल दे रही है। फैसलों को ऐसे रोज बदलना ठीक नहीं है। बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतार से लोग परेशान हो रहे हैं। कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि नोटबंदी के फैसले को लागू करते वक्त केंद्र सरकार ने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल नहीं किया। हर दिन वो नियम बदल रही है। नोटबंदी के बाद पहले सरकार ने कहा था कि बैंक से रोजाना 4000 रुपये तक के पुराने नोट बदले जा सकेंगे, बाद में इसे बढ़ाकर 4500 कर दिया गया. वहीं, एटीएम से रोजाना 2000 कैश निकाले जा सकते थे, जिसकी लिमिट बाद में बढ़ाकर 2500 कर दी गई थी। वहीं  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी से लोगों को दिक्कतें हो रही हैं, और इस सच्चाई से केंद्र सरकार इंकार नहीं कर सकती. चीफ जस्टिस ने कहा, स्थिति गंभीर हो रही है, और ऐसे हालात में गलियों में दंगे भी हो सकते हैं।

अगर सरकार की मानें तो काले धन और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए देश हित में उठाया गया कदम है। सरकार का कहना है कि काले धन और नकली नोटों पर ये सर्जिकल स्ट्राइक जैसा काम करेगा। कानून की नजरें बैंक और एटीएम की कतार में खड़े हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देख रही है। नोटबंदी का फैसला निस्संदेह अप्रत्याशित, कठोर और चौकनेवाला क़दम था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कालेधन की समस्या से निपटने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं। परंतु, इतने बड़े फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए जैसी तैयारी होनी चाहिए थी, वह नहीं थी। गरीब और मध्यवर्गीय आबादी खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की परेशानियों को ध्यान में नहीं रखा गया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र साभार आनंद टून )

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

उम्र से परे एक सितारा

लीजेंड के amitabh-bachchanमायने क्या हैं? यह समझना हो तो अमिताभ की शख्सियत को समझिए. व्यक्तित्व की खूबियां ही किसी साधारण इंसान को लीजेंड बना देती हैं. अमिताभ बेमिसाल हैं. उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी खूबियां हैं जो उनको औरों से अलग करती है. अनुशासन, धैर्य, ऊर्जा और अदम्य उत्साह उनकी खूबियां हैं. सादगी, सहजता और संवेदनशीलता जैसे गुण उनको महान बनाते हैं.अमिताभ का जीवन उनके नाम की सार्थकता सिद्ध करता है. जो आभामंडल अमिताभ का है वह शायद ही किसी और अभिनेता का हो. समय और दौर के अनुरूप  अमिताभ खुद को ढालते रहे हैं. वह आज भी उतने ही ऊर्जावान हैं जितना पहले हुआ करते थे. उनका जादू आज भी बरकरार है. अमिताभ उम्र से परे हैं. 74 की उम्र में भी वह सबके चहेते हैं. उनके जलवे आज भी बरकरार हैं.  हालिया फिल्मों में ‘पीकू’ और ‘पिंक’ ने क्रिटिक्स के साथ-साथ दर्शकों की भी खूब तारीफें बटोरीं.

 मुंबई के जूहू बीच से कुछ दूरी पर ही अमिताभ का बंगला जलसा स्थित है. घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा रहता है और मौका मिलते ही अमिताभ घर से निकल कर अपने फैंस का अभिवादन करते हैं. मुंबई घूमने आए पर्यटकों के लिए बिग बी का घर देखना अनिवार्य है. 47 वर्षों से हिंदी फ़िल्म जगत में सक्रिय अमिताभ कई हिट और यादगार फ़िल्में दे चुके हैं. इस दौरान उन्होने कई दौर देखे जो चुनौतीपूर्ण थे. उनकी सफलता को तो सब देखते हैं, लेकिन इस सफलता के पीछे छिपा हुआ संघर्ष नजर नहीं आता. फिल्मों में आने के पहले भी अमिताभ ने संघर्ष किया और फिल्मों में आने के बाद भी. उन्होंने जो फिल्में की वे बुरी तरह फ्लॉप हो गईं. वॉयस नैरेटर के तौर पर पहली फिल्म ‘भुवन शोम’ थी लेकिन अभिनेता के तौर पर उनके करियर की शुरुआत फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से हुई. ‘जंजीर’ के हिट होने के पहले तक उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. जंजीर’ उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. इसके बाद उन्होंने लगातार हिट फिल्मों की झड़ी तो लगाई ही, इसके साथ ही साथ वे हर दर्शक वर्ग में लोकप्रिय हो गए और फिल्म इंडस्ट्री के शहंशाह बन गए.

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर उन्हें 3 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है. इसके अलावा 14 बार उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल चुका है. फिल्मों के साथ साथ वे गायक, निर्माता और टीवी प्रस्तोता भी रहे है. जिस अमिताभ बच्‍चन के आवाज की पूरी दुनिया कायल है, एक समय था जब उनकी आवाज उनके करियर में रोड़ा बन रही थी और उन्‍हें नकार दिया गया था लेकिन बाद में उनकी आवाज ही उनकी ताकत बनी. करियर के इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी वो बेहद विनम्र और शान्त हैं. यही खास बात है जो उनकी शख्सियत को और भी निखार देता है.

1982 में फिल्म कुली के सेट पर अमिताभ को पेट में गंभीर चोट लगी थी. डॉक्टरों ने बिग बी की सर्जरी की, मगर सेहत में सुधार नहीं हुआ, और वो मरणासन्न स्थिति में पहुंच गए. इलाज के दौरान बिग बी को खून की सख्त ज़रूरत पड़ी. उन्हें खून देने के लिए उनके चाहने वालों का तांता लग गया. 200 लोगों ने खून दिया. 60 बोतल खून चढ़ा. उस समय देशभर में अमिताभ की सेहत के लिए मंदिरों में दुआएं मांगी जाती रहीं. अस्पताल के बाहर फैंस की लंबी-लंबी लाइन लगी रहती थी. उनके फैंस ने हवन, पूजा जैसे तमाम उपाय किए. ऑपरेशन सफल रहा. वह स्वस्थ भी हुए और पुनः काम पर भी लौटे. यह सब फैंस की दुआओं और उनके हौसले और हिम्मत की बदौलत सम्भव हो पाया.

अमिताभ वह ध्रुव तारा है जो सत्तर के दशक से देश के सिनेमा पर चमक रहा है. पहले एंग्री यंग मैन था, अब वाइज ओल्ड मैन. उम्र के मुताबिक अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार बदले, अपना अंदाज बदला. इसीलिए उन्हें सदी का महानायक कहा जाता है. अमिताभ वक़्त के साथ-साथ स्‍वयं को बदलते रहे. मैडम तुसाद संग्रहालय में बनी मोम की मूर्ति बिग बी के लोकप्रियता को देश और विदेश में दर्शाती है. अमिताभ पहले ऐसे एशियाई हैं जिनकी मूर्ति तुसाद संग्रहालय में बनी है. अमिताभ का नाम बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी जानते हैं. अमिताभ के फैंस 70 के दशक से ही चले आ रहे हैं. सोशल मीडिया अब लोकप्रियता मापने का भी बैरोमीटर है. इस पैमाने पर भी वह सर्वश्रेष्ठ हैं. सोशल मीडिया पर भी वह लंबे समय से सक्रिय हैं. बिग अड्डा से शुरू हुआ सफर ट्विटर और टमब्‍लर तक पहुंच चुका है. अमिताभ फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का जमकर इस्‍तेमाल करते हैं और यही कारण है कि दोनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके फैंस की संख्‍या लाखों-करोड़ों में है. वे अपने प्रंशसको को कभी नहीं निराश करते हैं और पल-पल की घटनाओं को वे इन माध्‍यमों के जरिए शेयर करते हैं. अपने प्रशंसकों से दिलचस्प चर्चाएं करते हैं. अपने निजी सुख-दुख की बातें भी शेयर करते हैं. अमिताभ बच्‍चन ऐसे सेलिब्रिटी हैं, जो अपने ट्विट के साथ क्रामांक भी दर्ज करते हैं.

यह उनके व्यक्तित्व का जादू ही है कि वह लोगों को खुद से जोड़ लेते हैं. हर कोई उनका कायल हो जाता है. हर प्रशंसक को यही लगता है कि शोहरतों की ऊंचाईयों पर चमकने वाला यह सितारा उनका अपना है. उनके बीच का है. काम के प्रति उनका समर्पण देखने और सीखने लायक है. अमिताभ ने अपने प्रशंसकों को बहुत कुछ दिया है. हम तो उनके जन्मदिन पर ढेर सारी दुआएँ और शुभकामनाएँ ही दे सकते हैं.

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

 काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

गाँधी की पत्रकारिता

mahatma-gandhiअहिंसा के पथ-प्रदर्शक, सत्यनिष्ठ समाज सुधारक, महात्मा और राष्ट्रपिता के रूप में विश्व विख्यात गाँधी सबसे पहले कुशल पत्रकार थे। गाँधी की  नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रीयता और जनजागरण था। वह जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता में रखने के प्रबल पक्षधर थे। पत्रकारिता उनके लिए व्यवसाय नहीं, बल्कि जनमत को प्रभावित करने का एक लक्ष्योन्मुखी प्रभावी माध्यम था। महात्मा गाँधी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से ही की थी। गाँधी ने पत्रकारिता में स्वतंत्र लेखन के माध्यम से प्रवेश किया था। बाद में साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया। बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर स्वराजपूर्व के गाँधी युग तक पत्रकारिता का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस युग की पत्रकारिता पर गाँधी जी की विशेष छाप रही। गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रम और अस्योग आन्दोलन के प्रचार के लिए देश भर में कई पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ।

महात्मा गाँधी में सहज पत्रकार के गुण थे। पत्रकारिता उनके रग-रग में समाई हुई थी, जिसे उन्होंने मिशन के रूप में अपनाया था। स्वयं गाँधी के शब्दों में ‘मैंने पत्रकारिता को केवल पत्रकारिता के प्रयोग के लिए नहीं बल्कि उसे जीवन में अपना जो मिशन बनाया है उसके साधन के रूप में अपनाया है। सन 1888 में क़ानून की पढ़ाई के लिए जब गाँधी लंदन पहुँचे उस वक़्त उनकी आयु मात्र 19 वर्ष थी। उन्होंने ‘टेलिग्राफ़’ और ‘डेली न्यूज़’ जैसे अख़बारों में लिखना शुरू किया। दक्षिण अफ़्रीका में प्रवास के दौरान उन्होंने भारतीयों के साथ होनेवाले भेदभावों और अत्याचारों के बारे में भारत से प्रकाशित ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ‘हिंदू’, ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’, ‘स्टेट्समैन’ आदि पत्रों के लिए अनेक लेख लिखे व इंटरव्यू भेजे। ये वही दौर था जब अफ़ीका में अश्वेत लोगों के खिलाफ ज़ुल्म की कहानियां पूरी दुनिया सुन रही थी। गाँधी ने ऐसे में अपनी वकालत के ज़रिये उन्हे उनका हक़ दिलाने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया में एक बार, वहां के एक कोर्ट परिसर में गाँधी को पगड़ी पहनने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उन्हे केस की कार्रवाई बिना पगड़ी के करनी होगी। गाँधी ने पगड़ी उतार दी, केस लड़ा लेकिन वो इस मुद्दे को आगे ले जाने का मन बना चुके थे। अगले ही दिन गाँधी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को खत लिखकर इस मामले पर अपना विरोध जताया। विरोध के तौर पर लिखी उनकी चिट्टी को अख़बार में जस का तस प्रकाशित किया गया। यहीं से शुरू हुआ था गाँधी की पत्रकारिता का सफ़र।

विश्व में ऐसे कितने ही लेखक हैं, जिन्होंने यद्यपि किसी पत्र का सम्पादन नहीं किया किंतु लोग उन्हें पत्रकार मान सकते हैं। समाज को समय की कसौटी पर कसनेवाला कोई भी हो, वह पत्रकार कहलाने के योग्य है। गाँधी में जनता की नब्ज़ पहचानने की अद्भुत क्षमता थी और वह उनकी भावनाओं को समझने में देर न लगाते थे। दक्षिण अफ़्रीका के अनुभवों ने और सत्याग्रह के उनके प्रयोगों ने उन्हें ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र के सम्पादन की प्रेरणा दी। 4 जून 1903 को चार भाषाओं में इसका प्रकाशन शुरू किया गया, जिसके एक ही अंक में हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और तमिल भाषा में छह कॉलम प्रकाशित होते थे। अफ़्रीका तथा अन्य देशों में बसे प्रवासी भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करने तथा सामाजिक-राजनैतिक चेतना जागृत करने में यह पत्रिका बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। महात्मा गाँधी दस वर्षों तक इससे जुड़े रहे। ‘इंडियन ओपिनियन’ का उद्देश्य था दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को स्वतंत्र जीवन का महत्व समझाना। इसी के द्वारा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार भी प्रारंभ किया। 1906 में जोहानेसबर्ग की जेल में उन्हें बंद कर दिया गया तो वहीं से उन्होंने अपना संपादन कार्य जारी रखा। महात्मा गाँधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया। ‘इन्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए देशवासियों के हित में आवाज उठायी। यह गाँधी की सत्यनिष्ठ और निर्भीक पत्रकारिता का असर ही था कि अफ्रीका जैसे देश में रंगभेद जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद चार अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस अखबार का प्रकाशन होता रहा। महात्मा गाँधी के अनुसार : मेरा ख़्याल है कि कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अख़बार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती। अगर मैंने अख़बार निकालकर दक्षिण अफ़्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ़्रीका में क्या कुछ हो रहा है, इसे इंडियन ओपिनियन के सहारे अवगत न रखा होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता। इस तरह मुझे भरोसा हो गया कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अख़बार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन हैं।

दक्षिण अफ़्रीका में जब भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई में सफलता प्राप्त हो गई तो वह भारत लौटे। भारत आने के बाद सन 1914 में पत्र-प्रकाशन की योजना बनाई।  गाँधी जी के समक्ष अनेक पत्रों के सम्पादन भार ग्रहण करने के प्रस्ताव आए, किंतु उन्होंने सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। उस वक़्त के प्रसिद्ध पत्र ‘बाम्बे क्रॉनिकल’ के सम्पादक पद को भी अस्वीकार कर दिया था। 7 अप्रैल 1919 को बम्बई से ‘सत्याग्रही’ नाम से एक पृष्ठ का बुलेटिन निकालना शुरू किया जो मुख्यतः अंग्रेज़ी और हिंदी में निकलता था। इसके पहले ही अंक में उन्होंने रोलेट एक्ट का तीव्र विरोध किया और इसे तब तक प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया जब तक कि रोलेट ऐक्ट वापस नहीं ले लिया जाता। गाँधी जैसा महान पत्रकार एवं सम्पादक कदाचित इस देश में पैदा नहीं हुआ। जन समस्याएँ ढूँढना और उन समस्याओं को सहज सुलझाने की क़ाबिलियत रखते थे। गाँधी के ‘यंग़ इंडिया’,  ‘हरिजन’ और ‘हरिजन सेवक’ में प्रकाशित होनेवाले लेखों ने जन जागरण का काम किया। समस्या और घटना चाहे उड़ीसा की हो या तमिलनाडु की, आंध्र प्रदेश की हो या मलय देश की, उत्तर प्रदेश की हो या मध्यप्रदेश की गाँधी उन समस्याओं और घटनाओं को न सिर्फ़ अपने साप्ताहिक पत्र में उल्लेख थे बल्कि उनपर अपना मत भी देते थे। कई बार उनके मत लोक जीवन के परंपरागत मत से मेल नहीं खाते थे, फिर भी अपने उस मत को व्यक्त करने का ख़तरा उठाते थे।

समाचार पत्र न केवल समय की आवश्यकता है, बल्कि देश की रक्षा पंक्ति का बहुत बड़ा बल है। शांत और अशांत काल में लोकजीवन के आचार-विचार को नियंत्रित करनेवाला क्रांतिदूत है। धारणाओं एवं विश्वासों को सजग, श्रेष्ठ और समर्पणशील बनाये रखने के लिए एक महान दर्शन भी है, जो गाँधी की पंक्ति-पंक्ति में व्यक्त होता था। गांधी एक ओर वाइसराय को चुनौती का पत्र लिखते थे, वही दूसरी ओर धर्म-अधर्म, हिंसा-अहिंसा, हरिजनों उद्धार, खादी ग्रामोद्योग, शिक्षा, भाषा और गोरक्षा आदि के प्रसंगों की भी चर्चा करते थे। गाँधी ने पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना को प्रभावित करने का बड़ा काम किया। गाँधी द्वारा सम्पादित पत्रों में सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिध्द पत्र था हरिजन। 11 फरवरी 1933 को घनश्याम दास बिड़ला की सहायता से हरिजन का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ और गाँधी जो उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन के सिलसिले में पूना में जेल में थे, वहीं से पत्र का संचालन करते थे। महात्मा गाँधी की लगभग 50 वर्षों की पत्रकारिता जो उन्होंने इंडियन ओपिनियन, यंग इंडियन, नवजीवन और हरिजन के माध्यम से की, वह भी राजनैतिक बगावत और सामाजिक बुराइयों पर निरंतर हमला था। गाँधी -युग पत्रकारिता की समृद्धि का युग है। गाँधी युग में जो भी पत्रिकाएँ निकलीं उनमें भाषा, कलेवर, विचार के दृष्टिकोण से कई बदलाव भी आये। देश के लिए हर प्रकार की स्वाधीनता पाना ही इन पत्रों का मुख्य उद्देश्य था। इस युग में स्वतंत्रता का प्रसार हुआ। कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करनेवाले प्रमुख संगठन का रूप ग्रहण कर लिया।

गाँधी ने पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया और अपने सत्याग्रह के आंदोलन को धार देने के लिए उपयोग किया। गाँधी ने लगभग हर विषय पर लिखा और अपना दृष्टिकोण लोगों तक पहुंचाया। गाँधी ने लिखा था, “मैंने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में लिया है उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिनको में जरूरी समझता हूं और जो सत्याग्रह, अहिंसा व सत्य के अन्वेषण पर टिकी हैं।” ‘हरिजन’ द्वारा भी गाँधी ने सामाजिक एकता व बराबरी का संदेश दिया। चूँकि इन समाचार पत्रों व पत्रिकाओं का उद्देश्य स्वतंत्रता संघर्ष भी था, अँगरेजों ने गाँधीजी को बड़ा कष्ट दिया मगर गाँधी ने भी यह सिद्ध कर दिया कि वे इस मैदान में भी किसी से कम नहीं थे। सरकार के प्रेस नियंत्रण का सामना गाँधी जी को भी करना पड़ा। प्रेस की स्वतंत्रता के हिमायती गाँधी  ने सरकारी आदेशों जी अवहेलना की। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार के प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट लिखा : यदि प्रेस सलाहकार को सत्याग्रह संबंधी प्रत्येक सामग्री भेजी जाने लगी तो प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हो जायेगी। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता हमारा परम अधिकार है। अतः हम इस प्रकार के आदेशों को नहीं मान सकते। प्रेस नियंत्रणों के कारण यंग इण्डिया के प्रकाशन को असम्भव देखते हुए सन 1930 में उन्होंने लिखा- मैं पत्रकारों  और प्रकाशकों से अनुरोध करूँगा कि वे जमानत देने से इनकार कर दें और यदि उनसे जमानत मांगी गई तो इच्छानुसार प्रकाशन बंद कर दे अथवा जमानत जब्त करने के विरुद्ध शासन को चुनौती दें।  व्यवसायिक पत्रकारिता से दूर रहते हुए गाँधी ने सदा जनहित एवं मशीनरी भावना से कार्य किया। देश के कोने-कोने में घूमकर संवाददाता एक दो ख़बरे ही लाता है किंतु गाँधी समस्त राष्ट्र का बल अपनी मुठ्ठी में ले आये थे। उनकी समस्त पत्रकारिता में उनकी समस्त अभिव्यक्ति में एक महान दर्शन है।

महात्मा गाँधी की लड़ाई का एक बड़ा साधन पत्रकारिता रहा है। चाहे दक्षिण अफ्रीका में नस्ल भेद के खिलाफ संघर्ष करते वक्त ‘इंडियन ओपेनियन’ का प्रकाशन हो, चाहे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता-आंदोलन में सक्रियता के दौरान ‘यंग इंडिया’ का; या छुआछूत के खिलाफ ‘हरिजन’ का प्रकाशन हो। गाँधी  पत्रकारिता के जरिए समाज के चेतना-निर्माण का कार्य किया। गाँधी ने अपने किसी भी समाचार पत्र में कभी भी विज्ञापन स्वीकार नहीं किये। गाँधी की पत्रकारिता में उनके संघर्ष का बड़ा व्याहारिक दृष्टिकोण नजर आता है। जिस आमजन, हरिजन एवं सामाजिक समानता के प्रति गाँधी का रुझान उनके जीवन संघर्ष में दिखता है, बिल्कुल वैसा ही रुझान उनकी पत्रकारिता में भी देखा जा सकता है। गाँधी के शब्द और कर्म, चेतना और चिंतन के केंद्र में हमेशा ही अंतिम जन रहता था। वे अंतिम जन की आंख से समाज, देश-दुनिया को देखने के लिये प्रेरित भी करते थे।

गाँधी भले ही व्यवसाय से पत्रकार न रहे हों, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी का जिस उत्तरदायित्व के साथ उपयोग किया था और जैसे संयम और अनुशासन का उन्होंने अपने संपादन में उपयोग किया था, वह आज दुर्लभ है। गाँधी शब्द की ताकत को बखूबी पहचानते थे इसलिए बड़ी सावधानी से लिखते थे। अपनी लेखनी से वह लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित करते थे। गाँधी की जैसी सरल भाषा और सहज संप्रेषणीयता पत्रकारिता में आज भी आदर्श है। महात्मा गाँधी पाठक के साथ सीधा संवाद करते थे। वह कहते थे कि पाठक नहीं तैयार करना है, पाठक को तैयार करना है। पाठक ऐसा होना चाहिए, जो केवल खबरों को पढ़ता ही न हो बल्कि बार-बार पढ़ता हो। वह इतनी बार पढ़ता हो कि उसे याद हो जाए। महात्मा गाँधी की पत्रकारिता में आत्मा बसती थी, आज की पत्रकारिता में स्थायी भाव नहीं है। यदि गाँधी राष्ट्रपिता न होते तो शायद इस शताब्दी के महानतम भारतीय पत्रकार एवं संपादक होते।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/