सुपरिचित सभ्यता और सांस्कृतिक प्रवाह में स्नात होकर जीवन जीने की प्रतीतिपूर्ण पद्धति को परंपरा कहते हैं। किसी भी समाज की प्राकृतिक और भौगोलिक सीमा में, जहाँ एक जातीय मूल के लोग रहते हैं और लगभग एक ही है भाषा बोलते हैं, जिनकी सभ्यता, संस्कृति एक ही है, परंपरा का आरंभ उसी मूल से होता है। हमारे यहां वैदिक संस्कृति का वह क्षेत्र जो हिमालय से कन्याकुमारी और बंगाल से कच्छ की खाड़ी तक फैला है जहां के लोगों का संस्कार भाषा, देवी-देवता और धार्मिकता अंकुरित होती है और पल्लवित होती है, परंपरा उसी कोख से उत्पन्न होती है। परंपरा एक सुचिंतित और सतत प्रवाहशील संस्कारिक चेतना है, जिसमें समाज की उच्चतम निष्ठा बनी रहती है। परंपरा में एक सृजनात्मकता का, एक राष्ट्रीयता का भी भाव अनुस्युत रहता है। इसलिए, जो राष्ट्र की परिभाषा होती है वही परंपरा की परिभाषा बन जाती है। सुप्रसिद्ध चिंतक गार्नर का कहना है कि राष्ट्र समाज का वह भाग है जो प्राकृतिक, भौगोलिक सीमा द्वारा अन्य राष्ट्रों से पृथक होता है, जहां के लोग एक भाषा बोलते हैं, जहां सबका जातीय मूल एक है और जिनकी परंपराएं समान हैं। गार्नर की इस परिभाषा के आधार पर हम कह सकते हैं कि परंपरा की चेतना ही राष्ट्र की चेतना है और संस्कृति परंपरा की कुशल गायिका के समान होती है।
परंपरा की स्रोतस्विनी वैदिक सूक्तों के गरिमामय उद्गम से लेकर लोकगीतों के भाव सागर तक अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होती आयी है और अपनी भाव धारा में सबको आपादमस्तक स्नात कराती रही है। परंपरा ही रस साधना की उदात्त भूमि की सर्जना भी करती है और अपनी सत्ता के प्रति जागृत भी करती है। परंपरा व्यक्ति और समाज को अमरता से नहीं जोड़ती है प्रत्युत व्यक्तित्व से जोड़ती है और व्यक्ति वह होता है जिसकी जीवन-चर्या निजता के घेरे में घूमती है। उसके परे वह नहीं जा सकती। व्यक्तित्व वह होता है जो सबसे पहले अपने लोक के लिए अपने लोक की समग्रता में समा जाने के लिए अपनी निजता के घेरे को सृजन के पौरुष से तोड़ता है, उसके स्पंदन युग के स्पंदन बन जाते हैं और ऐसे व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर अमृत महोत्सव बन जाता है, जिस महोत्सव में सम्मिलित होकर लगता है कि रचाव की किसी गंगा में हम आपादमस्तक डूब लिए, हमारा अमृत स्नान हो गया। परंपरा अतीत की गहराइयों से निकलकर वर्तमान को मापते हुए भविष्य की ओर उन्मुख होती है। इस प्रकार एक संवाद, जो निरंतर परंपरा और वर्तमान के बीच चलता रहता है, वही आधुनिकता को जन्म देता है।
सृजन की अपरिमेयता साहित्य का रूप लेती है और अनेक विचार तटों को काटती अपने प्रवाह से अपनी भँवरियों से अनेक कोणों का निर्माण करती हुई सागर तक की यात्रा पूरी करती है। एक नदी की सागर तक पहुंचने की बेचैन आकांक्षा ही साहित्य के उन्मेष का रूप ले लेती है। वह उन्मेष अनेक विचार सरणियों, अनेक शिल्प शैलियां के मोड़ों से होकर बढ़ती जाती है। इसी क्रम में साहित्यिक उन्मेष ही अनेक वादों को जन्म देता है। विश्व साहित्य में अध्यात्म (बाइबिल, कुरान, जेन अवेस्ता) ही प्रथम वाद रहा है जिसमें अनेक तरह से आत्मा और परमात्मा की सत्ता का विश्लेषण किया गया है। भारतीय और हिंदी साहित्य की शुरुआत भी अध्यात्म (वेद, उपनिषद) से ही होती है जिसमें स्व-पर-भिन्न सत्ता (नियामक) का विस्तार से विचार किया गया है। यही से साहित्य आरंभ होता है।
भारतीय साहित्य में सर्वोत्तम काव्य के रूप में हमने इस सृष्टि को ही समझा। वेद के अनुसार ‘पश्यं देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यती’ यानी तुम सृष्टि के सौंदर्य को, जो मूर्तरूप में परमात्मा का काव्य है, जो न जीर्ण होता है और न मरता है, देखो और प्रसन्नता प्राप्त करो। काव्य की अमरता और शाश्वतता की चिंतन की परंपरा भारतीय साहित्य में यही से पड़ी है। पीछे हमलोगों ने देखा कि परंपरा की गतिशीलता ही उन्मेष का रूप लेती है। उदाहरणार्थ हम वैदिक साहित्य को ही ले तो वेदों से लेकर पुराणों तक परंपराजन्य उन्मेष का पदचाप सुनाई पड़ता है। वेद को देव का अमर काव्य कहा गया है। वेदों में अनेक स्थानों पर कवि शब्द का प्रयोग किया गया है। इसलिए वेद स्वयं काव्यरूप है और उसमें काव्य का सम्पूर्ण सौन्दर्य पाया जाता है। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते हैं। ऋग्वेद के सप्तम मण्डल में अलंकारों के लिए ‘अरंकृत’, ‘अरंकृति’ शब्द का प्रयोग मिलता है। ‘वायवाया हि दर्शत्तेमे सोभा अरंकृता:’ [ऋग्वेद 1.2.1]। काव्यशास्त्र में काव्य सौन्दर्य के आधेय जिन गुण, रीति, अलंकार, ध्वनि आदि तत्त्वों का विवेचन किया गया है वे सभी तत्त्व का प्रायोगिक अथवा व्यावहारिक रूप से वेद में पाये जाते है। डॉ. काणे का मत है कि ऋग्वैदिक कवियों ने उपमा, अतिशयोक्ति, रूपक आदि अलंकारों का केवल प्रयोग नहीं किया वरन् काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों का भी उन्हें कुछ ज्ञान था।
ईस्वी सन् से शताब्दियों पूर्व उत्तम प्रकार की काव्य रचना हुई इसके पर्याप्त प्रमाण है। रामायण और महाभारत इन दोनों महाकाव्यों में उत्तम प्रकार की काव्य रचना मिलती है। महाभारत काव्य की अपेक्षा धर्मशास्त्र है फिर भी यह अनेक कवियों का उपजीव्य रहा है। रामायण अपने उद्देश्य, स्वरूप, विषय की दृष्टि से वास्तव में काव्य है। जहां तक काव्य रचना और काव्य समीक्षा के सामान्य सिद्धान्तों के विकास का प्रश्न है वाल्मीकीय रामायण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसे आदि काव्य और इसके रचयिता को आदि कवि होने का सम्मान प्राप्त है। उदात्त शैली के ऐसे महान काव्यात्मक प्रयास के साथ काव्य विवेचन के सिद्धान्तों के निर्माण का प्रयास स्वाभाविक है। रामायण तथा महाभारत के रूप में काव्यत्व का समृद्ध रूप सामने होने पर काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों की स्थापना का मार्ग बड़ी स्पष्टता के साथ प्रशस्त हुआ होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। यद्यपि तत्समय संस्कृत काव्यशास्त्र की स्वतन्त्र रचना नहीं हुई फिर भी कुछ साक्ष्य उपलब्ध होते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस काल में भी पर्याप्त काव्य रचना हुई थी। महाकाव्य का स्वरूप निरूपण ‘वाल्मीकि रामायण’ के आधार पर किया गया। रूद्रट के टीकाकार नामिसाधु ने पाणिनि के नाम से ‘पाताल विजय’ नामक महाकाव्य का उल्लेख किया है जबकि राजशेखर उन्हीं नाम से ‘जाम्बवती विजय’ काव्य को उद्धृत करते है। ‘सुवृत्ततिलक’ में क्षेमेन्द्र ने विभिन्न छंदों के व्यवहार के विधान पर विस्तार से विचार किया है।
कात्यायन के ‘वार्तिक’ में आख्यायिका शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है कि आख्यायिका नामक काव्यांग कात्यायन से पूर्व प्रचलित हो चुका था। महाभाष्य में ‘वारुरुचं काव्यम्’ का उल्लेख आता है। साथ ही ‘वासवदत्ता’, ‘सुमनोत्तरा’ तथा ‘भैमरथी’ नामक आख्यायिकाओं का भी उल्लेख है। पतंजलि ने ‘कंसवध’ तथा ‘बलिबन्धन’ की कथाओं पर दो कृतियों तथा उसके नाटकीय प्रदर्शन की चर्चा की है। इन तथ्यों से यह ज्ञात होता है कि पतंजलि से पूर्व पर्याप्त मात्रा में काव्य-आख्यायिका तथा नाटकों का निर्माण हुआ था। संस्कृत की सर्वाधिक प्रसिद्ध हिन्दू् कृतियां वेद, उपनिषद और मनुस्मृति हैं। दूसरा लोकप्रिय साहित्य है तमिल साहित्य, जिसकी दो हजार वर्ष पुरानी साहित्य परंपरा बहुत ही समृद्ध है। यह साहित्य महाकाव्यों के रूप में अपने काव्यात्मक स्वरूप और दार्शनिक तथा लौकिक रचनाओं के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। अन्य महान साहित्यिक रचनाएं जिनसे भारतीय साहित्य के स्वर्ण युग का निर्माण हुआ, कालीदास की ‘अभिज्ञान शकुन्तलम’ और ‘मेघदूत’, शुद्रक की ‘मृच्छाकटिकम’ भास की ‘स्वप्न वासवदत्ता’ और श्री हर्ष की ‘रत्नावली’, बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ है। अन्य प्रसिद्ध कृतियां चाणक्य द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ और वात्सायन का ‘कामसूत्र’ है। जातक कथाओं को विश्व की प्राचीनतम लिखित कहानियों में गिना जाता है जिसमे लगभग छः सौ कहानियाँ संग्रह की गयी है। इन कथाओं मे मनोरंजन के माध्यम से नीति और धर्म को समझाने का प्रयास किया गया है। पालि भाषा में उपलब्ध जातक कथाएं भी बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक का भाग हैं।
उत्तरी भारत के कृष्ण और राम के अनुयायियों द्वारा स्थानीय बोलियों में रचित साहित्य भारतीय साहित्य की अति प्रसिद्ध कृतियां है। इसमें बारहवीं शताब्दी के दौरान रचित जयदेव की कविताएं जो ‘गीत गोविन्द’ के नाम से प्रसिद्ध है और मैथिली (बिहार की पूर्वी हिंदी) में लिखी गई आध्यात्मिक प्रेम की कविताएं भी शामिल हैं। हिंदी साहित्य का प्रारंभ मध्यकाल में अवधी और ब्रज भाषाओं में धार्मिक और दार्शनिक काव्य रचनाओं से हुआ। इस काल के प्रसिद्ध कवियों में कबीर, सूरदास और तुलसीदास विख्यात हैं। आधुनिक युग में खड़ी बोली ज्यादा लोकप्रिय हो गई और संस्कृत में नानाविध साहित्य की रचना हुई। हिंदी साहित्य का भक्ति काल वह काल है जो वैचारिक समृद्धता और कला वैभव के लिये विख्यात रहा है। इस काल मे हिंदी काव्य मे किसी एक दृष्टि से नही अपितु अनेक दृष्टियो से उत्कृष्टता पायी जाती है। इसी कारण विद्वानों ने भक्ति काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा है। इस काल की सबसे उल्लेखनीय कृति तुलसीदास की अवधी भाषा में लिखी ‘रामचरितमानस’ और सूरदास की ब्रजभाषा में लिखी ‘सूरसागर’ है। हिंदी मे भक्ति साहित्य परंपरा का शुभारम्भ महाराष्ट्र के संत नामदेव की रचनाओ से माना जा सकता है। सोलहवीं शताब्दी में राजस्थान की राजकुमारी और कवियत्री मीरा बाई ने कृष्ण का गुणगान करते हुए भक्ति गीतों की रचना की है और गुजराती कवि नरसिंह मेहता की गीत रचना भी इसी प्रकार है। सिक्ख धर्म के गुरुओं और संस्थापकों विशेष रूप से नानक और गुरु अर्जुन देव ने ईश्वर का गुणगान करते हुए भजनों की रचना की।
भारतेंदु को हिंदी साहित्य के आधुनिक युग का कवि माना जाता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के उदय के साथ हिंदी में एक नए युग का आरंभ हुआ, यह मान्यता तो बहुत पहले से प्रचलित रही है, किंतु इस नए युग को ‘नवजागरण’ नाम देने का श्रेय हिंदी में डॉ. रामविलास शर्मा को है। इससे पहले भारत में नवजागरण की चर्चा प्राय: ‘बंगाल नवजागरण’ के रूप में ही होती रही है। नवजागरण से तात्पर्य है भारत में आधुनिकता का प्रवेश, वैज्ञानिक दृषिटकोण का विकसित होना और किसी भी घटना के परिप्रेक्ष्य में तार्किक मीमांसा के लिए तैयार हो जाना अर्थात तर्क-विर्तक की खुली परंपरा का प्रारंभ। नवजागरण का पहला अनुभव बंगाल ने किया, बंगाल से होती हुई आधुनिकता की धारा सारे देश में पहुंची। राजा राममोहन राय समूचे देश के लिए मनस्वी बनकर उभरे, अपने विराट व्यकितत्व से उन्होंने भारतीय नवजागरण को एक दिशा दी और आधुनिक भारत निर्माण के सन्दर्भ में लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा सबसे पहले की।
महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्य आधुनिक हिंदी साहित्येतिहास का आदिकाल है। इसका पहला चरण भारतेंदु -युग है एवं दूसरा चरण द्विवेदी-युग। द्विवेदी के समकालीन रामचन्द्र शुक्ल ने निबंध, हिंदी साहित्य के इतिहास और समालोचना के क्षेत्र में गंभीर लेखन किया। इसलिए गद्य के विकास में रामचन्द्र शुक्ल का विशेष महत्व है। कथा-साहित्य के क्षेत्र में मुंशी प्रेमचंद विशेष स्थान रहा। देवकीनन्द खत्री द्वारा लिखित चन्द्रकान्ता को हिंदी गद्य की प्रथम कृति माना गया है। श्रीधर, गुलाब कवि, अमीर खुसरो, धनपाल. मधुकर कवि, नरोत्तम दास, विद्यापति आदि इस काल के प्रमुख कवि थे।
हिंदी साहित्य में आदिकाव्य से लेकर आधुनिक काल तक तकरीबन चालीस वादों का उन्मेष हुआ। विभिन्न साहित्यिक वादों के उत्थान और पतन के इतिहास से परिचित अध्येता जानते हैं कि हर वाद अपने साहित्य एवं समाज के विशेष परिवेश के अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है और उसके आंदोलन के पीछे एक इतिहास है। अध्यात्मवाद (स्व-पर-भिन्न वाद), सगुण और निर्गुण वाद, बौद्धों के थेरवाद, सौत्रान्त्रिकवाद, शून्यवाद, विज्ञानवाद, जैनियों के अनेकांतवाद, संवर, निर्जरा, मोक्ष आदि का ऐतिहासिक रूप से प्रचलन हुआ और आज भी है। आगे चलकर हिंदी साहित्य में औचित्यवाद, द्वंद्ववाद, अद्वैतवाद विशिष्ट द्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, केवल द्वैतवाद, पुष्टिवाद और चैतन्य महाप्रभु का अचिंत्य भेदाभेद वाद आदि सम्बंधित सामग्रियां उपलब्ध हैं। इसके बाद रीतिवाद और गीत-प्रगीतवाद का दौर रहा। स्वच्छन्दतावाद का जन्म यूरोप में अठारहवीं सदी में अंतिम दशक एवं उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में हुआ। स्वच्छंदतावाद को अंग्रेजी में ‘रोमांटिसिज्म’ कहा जाता है। इसका जन्मदाता रूसो को माना जाता है। स्वछंदतावादी साहित्यकारों ने नियमबद्धता, परंपरानुसारिता एवं आडम्बरप्रियता का डटकर विरोध किया और साहित्य को नियमों और आदर्शों की सीमा से बाहर निकालकर आंतरिक, प्रेरणा से युक्त धरातल पर स्थित किया। इसी के प्रभाव में छायावादी काव्यान्दोलन का प्रारंभ हुआ। मुकुटधर पांडेय छायावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा और उसके बाद पं. माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’. हरिवंश राय ‘बच्चन’ और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ इस काल के प्रसिद्ध कवि थे।
आधुनिक हिंदी साहित्य में छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद चार ही प्रवृत्तियाँ निश्चित रूप से इतिहास-सम्मत हैं जिन्हें ‘वाद’ के रूप में मान्यता प्राप्त है। निःसंदेह इन चारों प्रवृत्तियों के अन्दर आधुनिक युग का हिंदी साहित्य नहीं सिमट जाता, किन्तु यह तथ्य है कि साहित्यिक आन्दोलन के रूप में कुछ दूर तक यही वाद चले। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल तक हालावाद का बोलबाला रहा। नकेनवाद या प्रपद्यवाद कपूर की गंध तरह आया और वायुमंडल में विलीन हो गया। मार्क्सवाद भी अंतिम साँसे ले रहा है। हिंदी की प्रगतिवादी कविता मार्क्सवाद से प्रभावित है। सच पूछा जाये तो मार्क्सवाद का ही साहित्यिक रूप प्रगतिवाद है। साम्यवादी विचार का पोषण करनेवाली रचनाओं को प्रगतिवादी रचनाएं कहा गया है।
हिंदी कविता को नया रूप देने में स्वच्छंदवादी कवि श्रीधर पाठक का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1936 के आस-पास कविता के क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन होता दिखाई पड़ा। युग की मांग के अनुसार सुमित्रा नंदन पंत और सूर्यकांत निराला, सभी ने इस प्रगतिवाद का साथ दिया। दिनकर ने भी अनेक प्रगतिवादी रचनाएं की। प्रगतिवाद के प्रति समर्पित कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन,मुक्तिबोध, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर आदि नाम उल्लेखनीय हैं। इस धारा के अंतर्गत, समाज के शोषित वर्ग, किसान और मजदूरों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई। 1953 में ’नई कविता’ पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इस पत्रिका में नयी कविता को प्रयोगवाद से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित की गई। अपने साहित्य में आधुनिकता को दर्शानेवाले प्रमुख साहित्यकारों में प्रेमचंद्र, अज्ञेय, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, नरेश मेहता, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गोपालदास ‘नीरज’ अरुण कमल, अशोक वाजपेयी, विष्णु नागर, विष्णु खरे, उपेन्द्रनाथ अश्क, फनीश्वरनाथ ‘रेणु’, भगवती चरण वर्मा, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, इलाचंद जोशी, मनोहर श्याम जोशी, रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, ममता कालिया, कृष्णा सोबती आदि शामिल हैं।
कामायनी आधुनिक छायावादी युग का सर्वोत्तम और प्रतिनिधि हिंदी महाकाव्य है। चिंता से प्रारंभ कर आनंद तक पन्द्रह सर्गों के इस महाकाव्य में मानव मन की विविध अंतर्वृत्तियों का क्रमिक उन्मीलन इस कौशल से किया गया है कि मानव सृष्टि के आदि से अब तक के जीवन के मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का इतिहास भी स्पष्ट हो जाता है। जयशंकर प्रसाद का कहना है कि सृष्टि का प्रथम पुरुष मनु है। कामायनी महाकाव्य में मनु के माध्यम से चिंता, आशा,वासना, संघर्ष, आनंद आदि का विवेचन किया गया है। मनु के विचारों और परिवर्तनमय भावनाओं में आधुनिकता दृष्टिगोचर होती है।
साहित्य में आधुनिकता का आंदोलन का एक बड़ा योगदान निश्चय ही अतीत के प्रति एक नया दृष्टिकोण था। टीएस इलियट के अनुसार परंपरा यूँही विरासत में नहीं मिल जाती। यदि आपको उसे पाना है तो उसके लिए गहरा अध्यवसाय आवश्यक है। इस मामले से उनकी रचना और चिंतन बहुत घनिष्ठ रूप से साथ चलते हुए उस इतिहास-बोध की साखी देते हैं। इलियट के उस सूत्र के अनुसार ‘न केवल अतीत के अतीतपन का विवेक निहित है, बल्कि उसकी वर्तमानता का अनुभव भी।‘ छायावाद के चरम उत्कर्ष के पश्चात प्रगतिवाद का आना एक ऐतिहासिक आवश्यकता एवं अनिवार्यता थी। प्रगतिवाद के बाद कोई वाद नहीं आया। कारण यह कि वाद अपने साथ एक गम्भीर चिंतन, एक विचार की पृष्ठभूमि पर आधारित होता है और एक लम्बे कालखंड तक चलता है। ये सारे साहित्यिक विस्तार, गतिशील परंपरा और वेगवान उन्मेष की परिणति हैं। ये साहित्यिक आंदोलन हिंदी साहित्य की अपनी परंपरा के अन्तर्गत क्रिया-प्रतिक्रिया के एक निश्चित अनुक्रम में उत्पन्न और समाप्त हुए इसलिए इसके नाम पर ही नहीं, बल्कि रूप पर भी हिंदी की अपनी छाप है। हो सकता है कि छायावाद और प्रयोगवाद जैसे नाम दूसरे साहित्य के पाठकों के लिए अर्थहीन हों, किन्तु हिंदी में इन नामों का निश्चित ऐतिहासिक अर्थ है, जो इनके सन्दर्भ से प्राप्त हुआ। इसी प्रकार विविध बाह्य प्रभावों के स्पर्श के बावजूद उन सभी साहित्यिक आन्दोलनों में हिंदी का अपना वैशिष्ट्य परिलक्षित होता।
साहित्य हमारी संस्कृति, परंपरा तथा अस्मिता को जीवित रखता है। साहित्य से परंपरा का वही अन्तर्सम्बन्ध है, जो उसका संस्कृति से है। परंपरा कभी रूढ़ नहीं होती। जब वह रूढ़ होने लगती है, तब वह परंपरा नहीं रहती, प्रथा बन जाती है। आधुनिकता की समझ के लिए परंपरा का ज्ञान होना जरूरी है। परिवर्तन की प्रक्रिया परंपरा का ही हिस्सा है जो कि नवीनता को जन्म देती है। परिवर्तन और निरंतरता परंपरा को मांजते हैं, जिससे परंपरा अपनी अर्थवत्ता को बनाए रखती है और अपने वास्तविक संदर्भों में आधुनिकता के गुणों को समाहित कर आगे बढ़ती है। साहित्य के लिए दोनों का अपना महत्त्व है।
नवोन्मेष परिवर्तनशील प्रक्रिया है। सृष्टि का नियम परिवर्तनशील है। व्यक्ति, वस्तु, समाज, सामाजिक नियम और व्यक्ति के आचार-विचार, रहन-सहन आदि परिवर्तनशील हैं। इस प्रकार परिवर्तनशील विचारधारा को अपनाने की जो मानसिकता होती है उसे हम आधुनिकता कहते हैं। नवोन्मेष का सम्बन्ध किसी समय विशेष से नहीं है। जो व्यक्ति आज आधुनिक है, वह कल पुरातन हो जाएगा। जो विचार आज नवोन्मेष है कल परंपरा बन जाएगा। जो मत आज प्राचीन है वह अपने समय में उन्मेष था। उन्मेष का रूप प्रत्येक युग मे बदलता रहता है। इक्कीसवीं सदी के विचार कुछ समय बाद यानी बाइसवीं सदी में पुराने हो जाएंगे।
परंपरा का निकट परिचय उस का अन्धानुकरण नहीं है, बल्कि उसे विकसित करने की तत्परता है। परंपरा वर्तमान के साथ अतीत की सम्बद्धता और तारतम्य का नाम है। प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में परंपरा-बोध एक बुनियादी मूल्य है, फिर चाहे इसे साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखा-परखा जाये अथवा समाज के। दूसरे शब्दों में बिना साहित्यिक परंपरा को समझे न तो प्रगतिशील समाज और साहित्य का सृजन हो सकता है और न ही अपनी ऐतिहासिक परंपरा से अलग रहकर कोई बड़ा सामाजिक बदलाव संभव है। लेकिन परंपरा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाया जा सकता। साहित्यकार में अतीत की चेतना होनी या आनी ही चाहिए। उसका जीवन आज में बद्ध नहीं है।
✍ हिमकर श्याम
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