144 साल के इतिहास का गवाह संत पॉल चर्च

st paul churchरांची के बहू बाजार स्थित 144 वर्ष पुराना संत पॉल कैथेड्रल चर्च आज भी अपने इतिहास की गौरवगाथा बयां करता है. स्थापत्य कला के लिहाज से जितना अद्भुत यह चर्च है, इसका इतिहास भी उतना ही अद्भुत है. पहले यहां एक झोपड़ी थी, जिसमें आराधना होती थी. फरवरी 1870 में पक्का आराधनालय बनाने का निर्णय लिया गया. जनरल रॉलेट के द्वारा चर्च की रूपरेखा तैयार की गयी थी. चर्च की नींव छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर आयुक्त ईटी डॉलटन द्वारा 1 सितंबर 1870 ई में रखी गयी. तीन साल में चर्च बन कर तैयार हुआ. शनिवार, 9 मार्च 1873 को नवनिर्मित महागिरजाघर का विधिवत संस्कार एवं उद्घाटन हुआ.  इस कैथेड्रल चर्च का नामकरण संत पॉल के नाम पर किया गया है. हर रविवार को यहां हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा में प्रार्थना होती है. विश्वासियों को यहाँ आकर एक सुकून की अनुभूति होती है.

रांची के लोगों ने दिए थे 4 हजार रूपये : चर्च का निर्माण 26 हजार रुपए में हुआ था. आर्थर हेजोर्ग ने इस कैथेड्रल चर्च के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. रांची के लोगों ने चर्च के लिए 4 हजार रूपये दिए थे. जनरल एडवर्ड टी डॉल्टन, बिशप रॉबर्ट मीलमैन और भारत सरकार की ओर से भी आर्थिक सहयोग मिला था. डॉलटन ने 3000 और मीलमैन ने 2000 रूपये दिए थे. चर्च के निर्माण की तिथि, कुल अनुमानित लागत तथा दानदाताओं की एक सूची बोतल में बंद कर चर्च के नींव में डाल दी गई थी. 10 मार्च , 1873 ई. को बिशप मीलमैन के द्वारा पांच भारतीय पुरोहितों की नियुक्ति की गयी. मीलमैन कोलकाता के बिशप तथा भारत, श्रीलंका और वर्मा के एंग्लीकन मेट्रोपोलिटन थे. छोटानागपुर को डायसिस के रूप में संगठित करने में उनका अहम योगदान था. चर्च के प्रथम बिशप जेसी हिटली और प्रथम भारतीय पुरोहित रेव्ह. विलियम लूथर डेविड सिंह थे. 1980 तक छोटानागपुर में भारतीय पुरोहितों के साथ इस चर्च की सदस्यता लगभग 10600 लोगों की हो गयी.

ख़ूबसूरत स्थापत्य : यह ऐतिहासिक चर्च स्थापत्य कला का एक ख़ूबसूरत नमूना है जो पतले सीधे खड़े खम्भे, मेहराब और सम्भार के सहारे सुसज्जित है. इसकी ऊँचाई 120 फीट है. शीर्ष पर 10 फीट ऊँचा, 2 फीट मोटा पत्थर का स्तम्भ बैठाया गया है. शीर्ष पर ही एक 5 फीट की छड़ है, जिसपर तीन फीट का तीर है जो क्रूस के रूप में वायु की दिशा के अनुरूप घूमता रहता है. छत लकड़ी की है, खिड़कियाँ कांच की हैं. प्रवेश द्वार से अंदर आने पर दाहिने ओर बपतिस्मा कुंड संगमरमर पत्थर से निर्मित है. बच्चों का बपतिस्मा चर्च के अन्दर ही होता है. चर्च में एक सभागृह और संगमरमर पत्थर से बनी वेदी है. वेदी के ऊपरी भाग को आर्क का आकार दिया गया है. वेदी में स्थापित कैथेड्रल चर्च की विशेषता का प्रतीक है. कैथेड्रल लैटिन शब्द कैथेड्रा से निकला है, जिसका अर्थ है बिशप का सिंहासन. यह छोटानागपुर का मुख्य ड़ायसिस है. बिशप इनका प्रमुख होता है. वेदी से नीचे पुरहोहितों के लिए कुर्सियां रखी गईं हैं. चर्च के अंदरूनी हिस्से में यूरोपीय शैली की पेंटिंग्स लगी हैं, जिसमें ईसा मसीह के जीवन की झलकियों के सजीव चित्र उकेरे गये हैं. चर्च के अंदर एक घेरा बना है, जहां विश्वासी वेदी के सामने घुटना टेकते हैं. पहले यह पीतल का था. 1980 में पीतल का घेरा चोरी होने के बाद उस स्थान पर स्टील का घेरा लगा दिया गया. चर्च परिसर में लोहे की एक खूबसूरत नाव बनी हुई है. यह उन मिशनरियों की याद में बनाया गया है, जो 18 वीं सदी में भारत आए थे. चर्च की इमारत के अंदर बिशप दिलवर हंस और बिशप जेड जे तेरोम की कब्रें हैं. चूंकि बिशप का जीवन मानवता की सेवा के साथ प्रभु की आराधना में गुजरता है, इसलिए उनका पार्थिव शरीर का दफन संस्कार कैथेड्रल में करने की परंपरा है.

रानी पाइप ऑर्गन : इस गिरिजाघर में दो हजार साल पहले का यूनानी वाद्य यंत्र भी है, जिसे 1860 में लाया गया था. इसे रानी पाइप ऑर्गन कहा जाता है. ऑर्गन में लगी पाइप बांसुरी की तरह ही है. 56-56 की संख्या में की-बोर्ड हैं. इससे 11 तरह की धुनें निकलती हैं. इसे बजाने में हाथ-पैर दोनों का उपयोग होता है. पाइप आर्गन चर्च की शान है, पहचान है. इसे उपासना वेदी के दाहिने ओर रखा गया है. चर्च में दो घंटियाँ हैं. एक बड़ी है, दूसरी छोटी. इन्हें क्रमशः अनुष्ठान से आधे घण्टे पूर्व और अनुष्ठान के शुरू होने पर बजाया जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि जब जनसंख्या कम थी, इतने मकान नहीं थे तो इस पाइप ऑर्गन की मधुर धुन और चर्च की घंटी आसपास के इलाकों में सुनी जा सकती थी.

✍ हिमकर श्याम

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गोथिक शैली में बना है झारखण्ड का पहला चर्च

रांची के मुख्य मार्गGEL Church पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है. स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है. गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर की भव्य इमारत देखने लायक़ है.  इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है. इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे. इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ. 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की. ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है. ईसाई धर्मावलंबियों को  यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है.

चर्च शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है ‘प्रभु का’.  चर्च के अतिरिक्त कीलिसिया शब्द भी चलता है. यह यूनानी बाइबिल के एक्लेसिया शब्द का विकृत रूप है, बाइबिल में इसका अर्थ है किसी स्थान विशेष अथवा विश्व भर के ईसाईयों का समुदाय. बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा. ईसाई मिशनरियों का झारखंड  पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है. ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं. भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च. गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जमर्नी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था. इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनायी थी. उन्होंने पैस्टर और उनके मिशनरी साथियों ऐमिलो स्कॉच, अगस्त ब्रॉट और थियोडर जैक को वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था. लेकिन तत्कालीन कारणों से चारों मिशनरी यहाँ आ गये. इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था.  रांची के गोस्सनर कंपाउंड में कैंप करने के बाद चारों मिशनरियों ने धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया. छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी.

वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च. 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ. इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया. जीईएल चर्च छोटानागपुर असम के पूर्वज विश्वासियों ने 10 जुलाई 1919 को ऑटोनोमी के नाम पर जीईएल चर्च और मसीही समाज की जिम्मेवारी ली. पूर्वजों ने यह घोषणा तब की, जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया. तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया.

जेईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही  अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है. चर्च द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं. घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है. झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है. ‘घरबंधु’  पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही. पाक्षिक ‘घरबंधु’, अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है. घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं. जेइएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है. इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे.

जीइएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है. यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है. इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है. मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ. वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया. बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है. धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई. अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है.  जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है. देश के 12 राज्यों में जीइएल चर्च की 1896 शाखायें है. जीइएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है.

जीइएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल)  व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार  1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी. 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी. संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे. 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे. छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही.

ईसाई  मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ. यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था. लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे. यहां के आदिवासियों की अज्ञानता और गरीबी दूर करने की कोशिश की. इसके लिए उनकी भाषा, संस्कृत और परंपरा को अपनाया. रांची शहर के चारों ओर इनके सेवा कार्य क्षेत्रों का विस्तार होता गया. मिशनरियों ने प्राथमिकता के साथ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प लिया. शिक्षा और स्वास्थ्य की समर्पित सेवा लोगों के बीच दी. तब आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी. जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था. बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे. आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे.  आदिवासियों को मिशनरियों में शोषण से मुक्ति का मार्ग नजर आने लगा़. इससे आदिवासी समुदाय का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा ईसाईयत की ओर आकृष्ट हुआ.

ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस चर्च ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के  समय इस चर्च पर भी हमला हुआ था. इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से गोले दागे गए थे, किन्तु कोई विशेष क्षति नहीं हुई.  हमले के निशान आज भी चर्च भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं. क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था. विषम परिस्थिति से बचने के लिए चर्च के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी. उस वक़्त चर्च के हारेलोहर साहब ने अपनी  बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था.

 

✍ हिमकर श्याम

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आफ़त की बाढ़

इन दिनों देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति गंभीर है, जिससे लाखों लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. बाढ़ ने बुरी तरह से कहर ढाया है. दिनोदिन इसके और भयावह होने की आशंका है. बाढ़ ने हमारे आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल खोलकर रख दी है. नेपाल और पड़ोसी floodsराज्यों से  आने वाले पानी से प्रतिवर्ष तबाही होती है. साल बदलते जाते हैं, लेकिन बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम जैसे राज्यों में बाढ़ से तबाही की कहानी नहीं बदलती.  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान यह स्वीकार करता है कि विनाशकारी बाढ़ के मुख्य कारण भारी वर्षा, जलग्रहण की दयनीय दशा, अपर्याप्त जल निकासी एवं बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाये गये बांधों का टूटना है. विडंबना है कि इस संकट का स्थायी और सार्थक समाधान अब तक नहीं निकल पाया है. खबरों के अनुसार सिर्फ़ बिहार के 18 जिलों  में बाढ़ से 440 लोगों की मौत हो चुकी है. एक करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है.

पश्चिम बंगाल के 14 जिले बाढ़ ग्रस्त है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के दर्जन भर जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, असम के 32 में से 25 जिले बाढ़ग्रस्त हैं. तटबंध के टूटने से गांव के गांव जलमग्न हो गये हैं. हज़ारों लोग विस्थापित हो गये हैं. लाखों एकड़ खेत पानी में डूब गए हैं और फसलें बर्बाद हो गई हैं. जगह-जगह सड़कें तालाब में बदल गई हैं. यातायात रुक गया है. न जाने कितने मवेशी बाढ़ में बह गये हैं. बाढ़ से होने वाली बर्बादी को रोकने के लिए सरकारें तटबंधों को अंतिम हल मान लेती हैं. लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे तटबंधों का विस्तार हुआ है, धारा बाधित होने से नदियां बेलगाम हुर्इं और इसी के साथ बाढ़ की समस्या भी बढ़ती गई है. जल प्रबंधन में लगातार हो रही चूक से बाढ़ का संकट बढ़ा है.

उत्तर बिहार में बहने वाली लगभग सभी नदियाँ जैसे-घाघरा, गंडक, बागमती, कमला, कोसी, महानंदा आदि नेपाल के विभिन्न भागों से आती हैं और खड़ी ढाल होने के कारण अपने बहाव के साथ अत्यधिक मात्रा में गाद लाती हैं, वह मिट्टी-गाद फरक्का जाते-जाते रुक जाता है, क्योंकि नदी का स्वाभाविक प्रवाह वहाँ रुक जाता है. फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से इसमें गाद जमा होने की दर कई गुना बढ़ गई है. गाद और मिट्टी बैराज के पास जमा होता है. यही गाद बिहार में बाढ़ का कारण बनता है. बैराज बनने के बाद कभी भी यहाँ से गाद नहीं निकाला गया. आजादी के बाद जब इस बैराज पर चर्चा हुई तब पश्चिम बंगाल सरकार के लिए काम कर रहे अभियंता प्रमुख कपिल भट्टाचार्य ने इसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट दी थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि फरक्का बैराज के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर, पटना, बरौनी, उत्तरी मुंगेर जैसे इलाके बाढ़ के पानी में डूब जाएंगे. वहीं, बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) मे सूखे की स्थिति पैदा होगी. लेकिन, तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने उनकी बात को नज़रअंदाज कर दिया.

बिहार का लगभग 73 प्रतिशत भू-भाग बाढ़ के खतरे वाला इलाका है. पूरे उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ के प्रकोप की आशंका बनी रहती है. बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष बिहार बर्बादी, अनैच्छिक विस्थापन और बड़े पैमाने पर जान-माल, पशु, फ़सल एवं इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान झेलता है. फरक्का बैराज बनने का हश्र यह हुआ कि उत्तर बिहार में गंगा किनारे दियारा इलाके में बाढ़ स्थायी हो गयी. जब यह बैराज नहीं था तो हर साल बरसात के तेज पानी की धारा के कारण 150 से 200 फीट गहराई तक प्राकृतिक  रूप से गंगा नदी की उड़ाही हो जाती थी. जब से फरक्का बैराज बना सिल्ट(गाद) की उड़ाही की यह प्रक्रिया रुक गई और नदी का तल ऊपर उठता गया. सहायक नदियाँ भी बुरी तरह प्रभावित हुईं हैं. जब नदी की गहराई कम होती है तो पानी फैलता है और कटाव तथा बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता को बढ़ाता जाता है.  नदियों पर बने बांध-बराजों के कारण नदी में गाद जमा होने, मिट्टी के टीले बनने, तटबंधों और कगारों के टूटने जैसी समस्याओं का समाधान जरूरी हो गया है. फरक्का बैराज, गंगा जल मार्ग और कोसी हाइ डैम जैसी परियोजनाओं को रोक कर नदी कि अविरल धारा को पुनः स्थापित करना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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शिखर की ओर अग्रसर हिंदी ग़ज़ल

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पुस्तक चर्चा

पुस्तक का नाम : बाद-ए-सबा (साझा ग़ज़ल संग्रह)

प्रकाशन वर्ष : 2017,  पृष्ठ  : 158
प्रकाशक  : मंगलम प्रकाशन,इलाहबाद  

 मूल्य  : 150.   संपादक : निर्मल नदीम

हाल ही में “बाद-ए-सबा”,साझा ग़ज़ल संग्रह, पढ़ने का शरफ़ मुझे हासिल हुआ। इस किताब की प्रति मुझे बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब के ज़रिये प्राप्त हुई। इस पुस्तक में 15 शायरों की 10-10 ग़ज़लें हैं। मंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित यह पुस्तक जनाब निर्मल नदीम साहब के संपादन में छपी है। निर्मल नदीम साहब सम्पादक होने के साथ साथ खुद एक अच्छे शायर और प्रकाशक भी हैं।
इसमें जहाँ रिवायती लबो-लहज़े में डूबी हुई शानदार ग़ज़लें नज़र आयीं वहीँ जदीद शायरी से लबरेज़ ग़ज़लें भी पढ़ने को मिलीं। ग़ज़लों का चयन अच्छा है मगर टाइपिंग मिस्टेक इतनी ज़ियादा है की बयान करना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि प्रूफ ठीक से चेक नहीं हुआ बल्कि यूँ कहें कि शायद चेक ही नहीं हुआ।

किताब खोलते ही बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब की ग़ज़ल से दिल खुश हो गया। मिसाल के तौर पर मतला और एक शेर आप भी देखिये :-
जिस्म से जान को रिहा कर दे।
या मुहब्बत मुझे अता कर दे।
आ गया हूँ तेरे निशाने पर ,
तीर नज़रों के अब रिहा कर दे। …….. पृष्ठ-1
अब्बास साहब को पहली बार हज़ल का निम्न शेर कहते देखा मैंने, हालाँकि शेर उम्दा हुआ है :-
मुसीबत को जब से संभाला है मैंने,
ससुर जी के चेहरे पे आयी ख़ुशी है। …. पृष्ठ-3

सादगी और सलासत से लबरेज़ जनाब अभिषेक कुमार सिंह के अशआर भी क़ाबिले-ज़िक्र है,मसलन :-
मर्ज़ का ही नहीं जब पता दोस्तो।
कोई कैसे करे तब दवा दोस्तो। …. पृष्ठ -13

निर्मल नदीम साहब की ग़ज़ल में तग़ज़्ज़ुल देखते ही बनता है,जैसे :-
फ़क़ीरी में जो अपनी ज़िन्दगी शाहाना रखते हैं।
जहाँ वाले उन्हीं का नाम तो दीवाना रखते हैं। … पृष्ठ-99

नितिन नायाब के मतले का निम्न शेर बड़ी खूबी से से तस्दीक़ करता है कि मुहब्बत में खुदा बसता है :-
नमाज़ियों को है मालूम मस्जिदों का पता।
बस एक इश्क़ है सबकी इबादतों का पता। पृष्ठ-101

आशावादी दृष्टिकोण रखता हुआ प्रमोद तिवारी हंस का ये शेर भी क़ाबिले-एहतराम है:-
हौसला पास गर नहीं होता।
चूमता मैं शिखर नहीं होता। …. पृष्ट-121

गिरधारी सिंह गहलोत जी का ये शेर भी खूब हुआ है हालाँकि इसमें ऐबे-तनाफ़ुर है ;-
किसी पत्थर से सर टकरा रहा हूँ।
क़सम देकर किसे समझा रहा हूँ। …. पृष्ठ-36

हिमकर श्याम जी का शेर भी क़ाबिले-ग़ौर है और अपने आप में निराला है :-
उँगलियाँ जो उठाता है सब की तरफ ,
रूबरू उसके भी आइना कीजिये। …. पृष्ठ-47

जनाब मोहसिन असर अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि:-
बहुत ही नाज़ तेरी रहमतों पे है मौला,
नहीं है कोई भी शिकवा हमें मुक़द्दर से। …. पृष्ठ-75

अच्छे दिनों का इंतज़ार करते हुए थक कर चूर हो चुके सिवा संदीप अपनी पीड़ा कुछ यूँ बयान करते हैं ;-
छलोगे और अब सरकार कितना,
फ़क़त अच्छे दिनों की बात कब तक। …. पृष्ठ-143

इनके अतिरिक्त नितिन नायाब, मनोज राठौर मनुज, निर्मला कपिला,प्रदीप कुमार,संजीव क़ुरालीया, संजय मौर्य आदि की भी खूबसूरत ग़ज़लें इस संकलन में हैं। पुस्तक का मुख पृष्ठ खूबसूरत है। हिंदी की ग़ज़ल आहिस्ता आहिस्ता शिखर की ओर तेज़ी से जा रही है, यह कहना फख्र की बात है। सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई।

575274_365024393552716_689915819_n ✍   कुँवर कुसुमेश

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ताज़गी बिखेरती ‘बाद-ए-सबा’

17098431_10208288221030005_4268078898485174789_nमंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित साझा ग़ज़ल संग्रह बाद-ए-सबा सामूहिक रचनाकर्म और सामूहिक प्रकाशन के रूप में एक और नया प्रयोग है.  इस संग्रह में 15 रचनाकारों की ग़ज़लें शामिल हैं. नये-पुराने ग़ज़लकारों ने मिलकर ज़िंदगी के अनेक रंगों को अपनी ग़ज़लों में पिरोया है, जो पठनीय होने के साथ-साथ शिल्प के लिहाज से मुकम्मल हैं. उम्मीद के साथ कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा की ग़ज़लें पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होंगी. प्रस्तुत है डॉ मकीन कोंचवी का तब्सिरा :-

बाद-ए-सबा यूँ तो मुकम्मल शुमारा है मगर अगर इसके हर पहलू पर नज़रे सानी न की गयी तो ये बड़ी नाइंसाफी होगी इस सफर में जहाँ एक तरफ दिलख़ुश तारीफ भी आएगी तो वही सच बयानी के कुछ कड़वे फल भी होंगे जिन्हें माज़रत के साथ पेश करने की जसारत करने की कोशिश है. बाद-ए-सबा का सबसे नायाब कारनामा मेरी नज़र में ये है कि इसके सफर में जहाँ सिबा संदीप सिवा, प्रदीप कुमार, अभिषेक सिंह,  मनोज मनुज, बाबा बेनाम जैसे ताज़ा खिले हुए फूलो से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है, वही अब्बास सुल्तानपुरी, नितिन नायाब, संजीव कुरालिया जैसे मझे हुए फनकार भी ग़ज़ल की राहों में अपनी खुशबु बिखेरते नज़र आते है. पाठक ग़ज़ल की तपती ज़मीन पर जैसे ही गामज़न होते है तो उसे अमरीक अदब, निर्मल नदीम, गिरधारी सिंह गहलोत, निर्मला कपिला जी के साथ-साथ हिमकर श्याम और प्रमोद हंस जैसे ग़ज़ल के कद्दावर दरख्तों की खुशनुमा छाँव अपनी आगोश में समेटने लगती है और बाद-ए-सबा का कारवां अपने जाहो जलाल के साथ जलवाग़र होकर कामयाबी की मंज़िलो की तरफ गामज़न होता रहता है.  उम्मीद करता हूँ ग़ज़ल का ये तिफ्ल एक रोज़ अज़ीमुश्शान शाहकार बनकर सायकीनो के दिलो पर राज़ करेगा.

अगर इस शुमारे की मुकम्मल बात की जाये तो बेसाख्ता कहना होगा कि ये रिसाला चंद छोटी- मोटी खामियों के बाबजूद अपनी छाप आवाम के जहनो पे अक्स करने में कामयाब होगा ऐसा मेरा मानना है . अपने तफसीरी सफर के आखरी हिस्से में इंशालल्लाह इन्ही कमियों और खामियों की तरफ निशानदेही करने की कोशिश करूंगा ताकि बाद-ए-सबा के आनेवाले शुमारो में इनसे बचा जा सके और ये मजमुई तौर पर और भी रौनक आमेज़ होकर मन्ज़रे आम पर आये उम्मीद करता हूँ की मेरे इस काम को सम्पादक निर्मल नदीम भी तस्लीम करते हुए  मेरा साथ देंगे.

यक़ीनन ये शुमारा लोगो के दिलो पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होगा मग़र इसके साथ ही अगर इसकी खामियों की जानिब नज़रे सानी न की गयी तो तफ्सरी हक़ से ना इंसाफ होगी. बेशक़ निर्मल साहब न अपने काम को बखूबी अंजाम देने की ईमानदार कोशिश की है जिस के लिए मै उन्हें दिल से मुबारकबाद बाद पेश करता हूँ मग़र जाने अनजाने कुछ खामियाँ भी रह गयी है जिनकी जानिब निशानदेही करना वाजिब जान पड़ता है. अगर इस शुमारे में किसी बड़े शायर का मकाला शामिल होता तो इसमें चार चाँद लग जाते इसकी अदबी एहमियत में इज़ाफ़ा होता जो की नही है. इसी तरह किसी भी शुमारे में शायर का तार्रुफ़ उसके क़लाम से पहले होना चाहिए ताकि पढ़नेवाला उससे रू-ब-रू हो कर एक रिश्ता कायम करके पढे शुमारे का आखिर में सबका तार्रुफ़ एक साथ देने की कोई तुक समझ से परे है बाद में इसे पढना शायद ही किसी को गवारा हो.

जहाँ तक शेरी ऐतवार से देखने का सवाल है तो कुछ खामियां यहां भी नज़र आती है जिन पर ध्यान दिया जा सकता था मिसाल के तौर पर एक ही शेर दो ग़ज़लों मे उला ओर सानी बदल कर आ गया है,

आ गया हूँ तेरे निशाने पर, तीर नज़रो के अब रिहा कर दे

ये शेर ग़ज़ल संख्या एक  और दो में है. इससे बचा जा सकता था. इसी तरह खुद नदीम साहब की 9 वीं ग़ज़ल का सानी 2 बार आ गया है जिससे ग़ज़ल 11 मिसरों की बन गयी इससे बचा जा सकता था एक बड़े शायर की एक ग़ज़ल के मकते का सानी दुरुस्त नही है. अगर प्रिंटिंग मिस्टेक की खामियों की बात है तो ये कही कही पर ही है जिन्हें बर्दाश्त किया जा सकता है. आखिर में इस शुमारे के ताल्लुक से ये कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा के लोग अपनी पहली कोशिश में न सिर्फ कामयाब बल्कि पूरी आब-ताब से रोशन हुए है. ये शुमारा अपने मकसद में मुकम्मल तौर पर सफल है और लोगों के ज़हन में जगह बनाने की सलाहियत रखता है उम्मीद है तमाम लोगों के क़लाम से लुफ़्न्दोज़ होने का मौका मिलेगा. एक शेर से अपनी बात खत्म करता हूँ :

इत्तिहादी पल सभी टूटे पड़े, अब नया कोई बनाता भी नही

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✍ डॉ मकीन कोंचवी

 

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अनारकली के बहाने मर्दवादी सोच पर प्रहार

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महज संजोग है कि मार्च महीने के अंतिम हफ्ते में जब विश्व महिला सशक्तिकरण का जोश और जश्न उतार पर होगा तब मर्दवादी सोच के खिलाफ एक स्त्री के उठ खड़े होने की हुंकार बड़े पर्दे पर सुनाई देगी. 24 मार्च को रिलीज होनेवाली ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ ऐसी फिल्म है जिसमें एक नारी का आत्मसम्मान ध्वनित है. फ़िल्म के केंद्र में नायिका हैं और निशाने पर है मर्दवादी सोच. एक स्त्री के संघर्ष और सम्मान की लड़ाई को बेबाकी के साथ इसमें दर्शाया गया है. ‘अनारकली ऑफ आरा’ छोटे शहरों की उन महिलाओं की कहानी है जो गाने-बजाने के धंधे में हैं और लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं ये इस फिल्म का पीक पाइंट है. अनारकली अपना घर चलाने के लिए गाने-नाचने का काम करती है. एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में सब बुरा होने लग जाता है,  जब कहानी में एक पावरफुल व्यक्ति की एंट्री होती है. VC (संजय मिश्रा) अनारकली से छेड़छाड़ करता है, जो अनारकली को नागवार लगता है. अनारकली VC बने संजय मिश्रा के गाल पर तमाचा जड़ देती है. यह तमाचा ही उसके लिए मुसीबत का सबब बन जाता है, उसे बदनाम कर दिया जाता है. फिर वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई लड़ती है और न्याय पाने के लिए भर दम कोशिश करती है. यह तमाचा प्रतीकात्मक भी है. खलनायक के बहाने यह तमाचा मर्दवादी सोच और समाज के गाल पर जड़ने की कोशिश है.

‘अनारकली ऑफ़ आरा’ मर्दवादी समाज पर गहरी चोट करती है. फ़िल्म में बड़े सहज तरीके से दिखाया गया है कि गा-नाच कर अपनी आजीविका चलनेवालों को किस तरह समाज की संकुचित सोच का सामना करना पड़ता है. आज भी नाचने-गाने वालों के चरित्र को संदिग्ध नज़र से देखा जाता है. ऐसी स्त्रियों के चरित्र हनन से लेकर उनका मनोबल तोड़ने तक की भरपूर कोशिशें की जाती हैं. पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता, राजनीतिक ताकत के नशे में चूर और शर्म होती संस्कृति इन घटनाओं की वजहों में शामिल हैं. अनारकली देसी गायिकाओं के जीवन की कठिनाइयों को दिखाती है. थियेटर, नौटंकी और नाचने-गाने के पेशे से जुड़ी अधिकतर स्त्रियाँ गरीब और निचले तबके से आती हैं. अधिकांशतः अनारकलियां छोटे-छोटे मंचों पर परफॉर्म करती हैं, लेकिन उनके नाम पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटती है. उनको काफी शोहरत हासिल होती है. हर उम्र के लोग इनके गानों पर दीवानों की तरह झूमते हैं. उनके पास भले ही बॉलीवुड जैसी शोहरत नहीं है, लेकिन लाखों दीवाने हैं. इनके गानों में जो दोहरा अर्थ होता है,  इनके हाव-भाव में जो शरारत भरी अदायें होतीं हैं, उस पर लोग फिदा होते हैं. जब भी ये शो करती हैं तो मंच से लेकर पंडाल के चारों तरफ लोग झूमते नज़र आते हैं, उनपर पैसे लुटाते हैं. पर इस चमक-धमक के पीछे की हकीकत बहुत भयावह और शर्मनाक है.

अनारकली जैसी स्त्रियां रोज अपमानित होती हैं. उनके गानों पर थिरकने वाला समाज उनको शक भरी नजरों से देखता है. लोग उन्हें भले कुछ भी कहते हों, किन्तु वे खुद को कलाकार मानती हैं. नाच-गाना उनका शौक है और पेट भरने का आधार भी,  लेकिन लोग उनकी जिंदगी को समझ नहीं पाते और स्थितियां विपरीत हो जाती हैं. भीड़ के बीच नाच- गाकर जीवनयापन करनेवाली इन अनारकलियों से छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं, लेकिन इनमें से चंद ही इन ज्यादतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं जिसकी कहानी इस फिल्‍म में दिखायी गयी है. अनारकली बेशक द्विअर्थी गाना गाती है लेकिन वह रसूखदारों के लिए उपलब्ध नहीं होती.  अनारकली के हाथों अपमानित हो कर फ़िल्म का खलनायक उसे देह व्यापार के झूठे इल्जाम में फंसा देता है. नेताओं के इशारे पर नाचनेवाली पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है. स्थानीय मीडिया भी उसे वेश्या बना देती है. पर अनारकली हार नहीं मानती, हिम्मत नही हारती, हताश नहीं होती. वह कहती है- सबको लगता है हम गानेवाले लोग हैं तो कोईओ आसानी से बजा भी देगा, पर अब ऐसा नहीं होगा. फिर वह आर-पार की की लड़ाई का फैसला करती है और कहती है कि आज आर-पार होगा या हम आरा की अनारकली नहीं, समझे.

उदारीकरण के बाद दुनिया एक बाज़ार में बदल गई और धीरे-धीरे परम्पराओं और सामाजिक मूल्यों का भी बाज़ारीकरण हो गया. जब दुनिया बदली तो गीत- संगीत उससे कैसे अछूता रह सकता था. लोक गीतों एवं नृत्यों पर अश्लील- द्विअर्थी गीत-नृत्य हावी हो गए हैं. जब लोग यही सुनना और देखना चाहते हैं तो छोटे कलाकार करें भी तो क्या करें, उन्हें भी तो अपना घर-परिवार चलाना होता है. सामाजिक रूप से नाचने गाने को सदा हेय दृष्टि से देखा गया है. यह बात महिला-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू थी. वक़्त के साथ समाज का नजरिया बदला पर महिला कलाकारों के प्रति लोगों की सोच में कुछ खास बदलाव नहीं आया. देश में लैंगिक असमानता समाप्त करने की तमाम कोशिशें मर्दवादी समाज में आकर दम तोड़ देती हैं. स्त्री को नसीहतें देने वाले लोग असल में मर्दवादी सोच से ग्रस्त होते हैं. उन्हें लगता है कि समाज की सभी मर्यादाएं उनके हिसाब से ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसी मानसिकता वाले लोग हर वक़्त महिला हिंसा की एक नई कहानी लिखते हैं. किसी महिला के साथ अभद्रता से पेश आकर खुद के मर्द होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं. इस मानसिकता को अनारकली ऑफ़ आरा के एक दृश्य में खूबसूरती से फिल्माया गया है जिसमे खलनायक बने संजय मिश्रा निर्देश दे रहे हैं कि कांड बनाओ पर कमांड रखो.

अनारकली फ़िल्म नहीं एक गहन सामयिक विचार है जो मर्दवादी समाज में एक स्त्री के संघर्ष को नये मायने देता है. कोई स्त्री आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ ज़िन्दगी जीना चाहती है तो इसमें क्या गलत है. आदर्श, संस्कार, मूल्य, नैतिकता और सारी मर्यादाएँ महिलाओं के जिम्मे ही क्यों आती हैं, ऐसे कई सवाल हैं जो आज भी अनुतरित हैं, यह फ़िल्म वास्तव में बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देगी. पत्रकार से निर्देशक बने अविनाश की पैनी नज़र और स्वरा भास्कर, संजय मिश्रा और पंकज त्रिपाठी जैसे उम्‍दा कलाकारों का दमदार अभिनय अनारकली ऑफ आरा में अद्भुत संवेदनशीलता भर देता हैं. अविनाश ने फिल्म के हर डिपार्टमेंट को चुस्त रखा है. उन्होंने इस फिल्म की कहानी, संवाद और दो गाने भी लिखे हैं. फ़िल्म के गाने और संगीत लाज़वाब हैं. संगीत रोहित शर्मा का है. रोहित ने बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम और शिप ऑफ थीसियस में भी संगीत दिया था. प्रोमो देखकर कहीं से यह नहीं लगता कि यह उनकी पहली फ़िल्म है. अगर आप गंभीर फ़िल्मों के शौकीन हैं तो ये फ़िल्म जरूर देखें, आपको बहुत पसंद आएगी.

हिमकर श्याम

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इस जीत के मायने

यूपी और उतराखंड के चुनाव नतीजे से यह साफelection हो गया कि 2019 में भाजपा की वापसी तय है. मोदी की लोकप्रियता घटने की बजाए बढ़ी है. नतीजों से भाजपा खुदअचंभित है वहीं विपक्षियों में अब भय दिखने लगा है. गोवा में कम सीटें मिलने के बाद भी भाजपा की सरकार बन गई और मणिपुर में पार्टी को सरकार बनाने का न्योता मिला है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बहुमत तक पहुंचते-पहुंचते रह गयी थी. जाहिर है यहां सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का खेल करना था. इस खेल में भी भाजपा बाजी मार गई और कांग्रेस जीत कर भी हार गई. भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन होती जा रही है. यह स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन इस वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है. विपक्ष कमजोर हो तो सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है. मोदी को रोकने के लिए विपक्ष को गोलबंद होना पड़ेगा, पर उसके पहले प्रभावी मुद्दों और प्रभावी नेतृत्व को तलाशना होगा.

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बने पौने तीन साल हो गए हैं. इन सालों में विपक्षी दल एकता की कोई धुरी नहीं खोज पाए हैं. विपक्ष में एकजुटता की बजाय बिखराव आया है. विपक्ष का बिखराव मोदी को ताकत दे रहा है. लोकसभा चुनावों में अब करीब दो साल बचे हैं. कांग्रेस की वापसी के कोई संकेत नहीं हैं. उल्टे वो देशभर में अपनी बची-खुची जमीन भी खोती जा रही है. नतीजों ने राहुल के नेतृत्व की राजनीतिक परिपक्वता और पार्टी से बाहर स्वीकार्यता, दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है. हालाँकि कांग्रेस को पंजाब में जीत हासिल हुई, लेकिन इस जीत का सारा श्रेय कैप्टन अमरेंदर सिंह की लोकप्रियता और मेहनत को जाता है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता अरुण जेटली को तब हराया था जब पूरा देश नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार था. यूपी-उतराखंड जितने,  गोवा में सरकार बनाने और कम सीटों के बावजूद मणिपुर में सरकार बनाने का न्योता  मिलने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों का 15 राज्यों में शासन हो जाएगा. गोवा विधानसभा चुनावों के नतीजों में कांग्रेस के 17 विधायक हैं जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 13 है. गोवा में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा है. नतीजो के बाद जो स्कोर 3-2 से 4-1  का हो गया है.

कांग्रेस के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा होता जा रहा है. कांग्रेस की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. संगठन का अभाव और नेतृत्व की कमजोरी कांग्रेस संगठन को खोखला कर रहा है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ के उनके निर्णय पर कांग्रेस संगठन के भीतर विचार-विमर्श तक नहीं किया गया था. पार्टी में विचारधारा की कोई लड़ाई लड़ने की क्षमता तो बहुत पहले खत्म हो गई थी, अब नेतृत्व का संकट भी पैदा हो गया है. राहुल गांधी का नेतृत्व कोई उम्मीद या उत्साह नहीं जगा पा रहा है. राहुल गांधी वोट दिला सकते हैं,  इसका भरोसा उनकी पार्टी के ही लोगों को नहीं है तो दूसरे दलों को कैसे होगा?  कांग्रेस ने गांधी परिवार से खुद को इस तरह बांध रखा है कि वह नेता के लिए उससे आगे नहीं देख पाती. कांग्रेस को राहुल गांधी की क्षमताओं, उनकी संभावनाओं और सीमाओं पर वस्तुपरक ढंग से विचार करना चाहिए. कांग्रेस को नए सिरे से गढ़ना जरूरी है. कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है, तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा. कोई नये नेता को नेतृत्व सौंपना होगा. जमीनी स्तर पर काम करना होगा.

ये चुनाव नोटबंदी के बाद हुए. कांग्रेस ने नोटबंदी से लोगों को हुई मुश्किलों को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी, मगर असफल रही. बेशक नोटबंदी ऐसा फैसला था, जिससे लगभग हर शख्स प्रभावित हुआ. इसके बावजूद जनादेश भाजपा के पक्ष में गया. नोटबंदी से भले लोगों को तकलीफ थी लेकिन नाराज़गी नहीं थी. गौरतलब है कि महाराष्ट्र निकाय चुनाव और ओड़िशा में पंचायत चुनाव, दोनों नोटबंदी के बाद हुए. भाजपा को  इन दोनों  चुनावों में भी सफलता मिली थी. नोटबंदी के रूप में विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला था, जिसे उसने एकजुटता और मत भिन्नता के आभाव में गंवा दिया.

हर चुनाव अपने-आप में खास होता है, मगर इन पांच राज्यों पर इसलिए नजर थी, क्योंकि साल 2019 के लोकसभा चुनाव का रास्ता यहीं से आकार लेगा, खासकर उत्तर प्रदेश से. इस सूबे में सभी पार्टियों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ था. पार्टियों की साख के साथ-साथ यहां छवि की लड़ाई भी लड़ी गई थी. उत्तर प्रदेश का महत्व सिर्फ इसीलिए नहीं है कि यह देश का सबसे बड़ी आबादी वाला सूबा है या यहां सबसे ज्यादा 403 विधानसभा सीटें हैं. केंद्रीय राजनीति की दशा-दिशा का रुख यहीं से तय होता रहा है. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर बाकी के चार राज्यों के मुकाबले यहां के नतीजों का असर केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा पड़ेगा. इस जीत का सबसे पहला असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा. साथ ही राज्यसभा में भाजपा मजबूत होगी.

पांच राज्यों के चुनाव भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी के लिए काफी मायने रखता है. उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड या फिर गोवा भाजपा मोदी के नाम से ही चुनाव में उतरी थी. इन राज्यों में पार्टी ने कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दिया था. यूपी में मोदी ने पार्टी के कोर वोट में बड़ा बदलाव किया है. भाजपा अपने साथ सवर्णों और व्यापारी वर्ग की पार्टी के साथ पिछड़ी जाति और दलित जोड़े हैं. तीन तलाक के मुद्दे से मुस्लिम महिलाओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ. श्मशान-कब्रिस्तान और कसाब के जरिये भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण की बयार बहाने की कोशिश की और अपनी कोशिशों में कामयाब भी हुई. मणिपुर के नतीजों की बात करें तो यहाँ भाजपा के मत में 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि गोवा में बहुमत नहीं मिलना भाजपा के लिए झटका है.

2014 लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं चेतीं और यूपी उनके हाथ से निकल गया. नतीजों ने समाजवादियों का, पिछड़ी और दलित राजनीति का एक साथ ही सफाया कर दिया. समाजवादी और बहुजन समाजवादी दोनों ही खास जातियों के पक्षधर रहे हैं. समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा. जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं प्रो.रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए. मुलायम सिंह के नाम पर समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा था. अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष तो बन गये लेकिन पिछड़े और गरीब तबके का भरोसा जितने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा.  यूपी में मायावती का वोट बैंक भी खिसका है. वह दलितों और ब्राह्मणों को साधने में विफल रहीं.  बसपा की मुखिया मायावती को नये तरीके से खुद को तैयार करना होगा तथा दलित और मुसलमान मतदाताओं के गठजोड़ पर अपने फोकस के बारे में पुनर्विचार करना होगा. 27 साल सूबे की सत्ता से बाहर रहने के बावजूद मात्र सात सीटें ही हासिल कर पाई. कांग्रेस का यह अब तक सबसे खराब प्रदर्शन है. लोकसभा चुनाव में मोदी और बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में असफल रहे. कांग्रेस द्वारा उठाया गया गरीब-अमीर का मुद्दा भी नहीं चला. राहुल यह बात उठाते रहे कि मोदी गरीबों के नहीं पूंजीपतियों के समर्थक है, लेकिन लोगो ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. वहीं भाजपा ने गांव-गरीब, किसान और विकास को मुद्दा बना कर मतदाताओं को आकर्षित किया. साथ ही साम्प्रदायिकता को हवा देकर वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही.

भारतीय राजनीति एक व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमट गयी है.  मोदी का जलवा बरकरार है. यूपी में मोदी मैजिक और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग विपक्षी दलों पर हावी दिखी. यहाँ पार्टी की प्रचंड और ऐतिहासिक जीत से मोदी की छवि और मजबूत होकर उभरी है. मोदी ने यहाँ दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की थी. किसी विधानसभा चुनाव में किसी प्रधानमंत्री ने शायद ही इतनी रैलियां की हों. उत्तर प्रदेश के बरक्स बाकी के चार राज्यों के नतीजे का केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़नेवाला. पंजाब में भाजपा वैसे भी दूसरे दर्जे की पार्टी  थी, यहाँ उसके खोने के लिए कुछ था भी नहीं. अगर आम आदमी पार्टी यहां कुछ कर पाती तो अरविंद केजरीवाल मोदी-विरोध की राजनीति के एक मजबूत विकल्प बन कर उभरते.

इस समय कांग्रेस सहित लगभग सभी दल हाशिए पर आए हुए हैं, भाजपा का मजबूत विकल्प बनने के लिए विपक्षी एकता की  पहल जरूरी है. भाजपा की लगातार जीत का सीधा संदेश है गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति का अंत. विपक्ष को जिंदा रहना है तो उसको बेहतर गठबंधन बनाने होंगे. लोगों के मुद्दे उठाने होंगे. अगले सात आठ महीनों में मोदी के राज्य गुजरात और हिमाचल में चुनाव होना है. विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक इस नई राजनीतिक ताकत का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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