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सिमट रही नदियों की धारा

Harmuदुनियाभर की सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। रांची भी स्वर्णरेखा, हरमू, करम, जुमार, पोटपोटो समेत अन्य नदियों के किनारे बसी। यहाँ की पहाड़ियों में गाती, बलखाती,  इठलाती नदियों का प्रवाह कभी देखने लायक होता था। छोटे-छोटे पहाड़ों और घुमावदार रास्तों में इनका सौंदर्य बढ़ जाता था। ये नदियां हमारी जीवनशैली का अहम हिस्सा थीं। समाज का इन नदियों से रागात्मक रिश्ता था। नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ कृषि, सिंचाई  एवं अन्य कार्यों की जल आपूर्ति हेतु भी विशेष महत्व था। धीरे-धीरे नदी के प्रति श्रद्धा भावना का लोप हुआ और इसके उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ती चली गयी। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा सबसे ज्यादा नदियों को ही भुगतना पड़ा है। रांची शहर के इतिहास को अपने हृदय में समेटे नदियों का अस्तित्व खतरे में है। नदियां सिकुड़ रही हैं, इनका प्रवाह मर रहा है। दशकों से चल रहे सफाई अभियान को देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। नदियों की व्यथा पर शहर मौन है।

बढ़ते शहरीकरण और लोगों की उदासीनता के कारण पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान रांची और आसपास के क्षेत्रों में बहने वाली दर्जनों छोटी नदियां सूख गईं और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। इन नदियों में प्रदूषण का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। प्राकृतिक रचना और जलवायु की भिन्नता के कारण रांची समेत झारखंड की नदियों का स्वरूप उत्तर की मैदानी नदियों से भिन्न है। यहां की नदियों की एक विशेषता है कि कठोर चट्टान वाले प्रदेश से गुजरने के कारण वे गहरी घाटी और जलप्रपात का निर्माण करती हैं। यहाँ की अधिकांश नदियां बरसाती हैं।

स्वर्णरेखा : रांची के नगड़ी गांव से निकलकर स्वर्णरेखा पिस्का गांव की उत्तरी सीमा तथा टिकराटोली की दक्षिणी सीमा बनाती हुई दक्षिण-पूर्व की ओर अपनी यात्रा आरम्भ करती है। फिर यह कुदलुम, बालालौंग और नचियातु गांवों की दक्षिणी सीमा बनाती हुई रातू को छोड़ कर नामकुम प्रखंड पार कर रांची और हजारीबाग की सीमा बनाती है तथा दक्षिणी ओर मुड़कर सिल्ली, सोनहातू की सीमा बंगाल से अलग करती हुई पूर्वी सिंहभूम जिले में प्रवेश करती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले में घाटशिला के बाद इसकी घाटी काफी चौड़ी एवं निम्न हो जाती है। यहां के बाद यह समुद्रतल से मात्र 100 से 75 मीटर ऊंची रह जाती है। सिंहभूम में बहती हुई यह उत्तर पश्चिम से मिदनापुर जिले में प्रविष्ट होती है। इस जिले के पश्चिमी भूभाग के जंगलों में बहती हुई बालेश्वर जिले में पहुँचती है और फिर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी की कुल लंबाई 474 किलोमीटर है और लगभग 28928 वर्ग किलोमीटर का जल निकास इसके द्वारा होता है। इस नदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में मिलने तक किसी की सहायक नदी नहीं बनती। पठारी भाग की चट्टानों वाले प्रदेश से प्रवाहित होने के कारण स्वर्णरेखा नदी तथा इसकी सहायक नदियाँ गहरी घाटियों तथा जल प्रपात का निर्माण करती हैं। स्वर्णरेखा हुंडरू जलप्रपात का निर्माण करती है, जबकि इसकी सहायक राढ़ू नदी में जोन्हा और कांची नदी में दशम जलप्रपात का निर्माण होता है। ये सभी जलप्रपात एक ही भ्रंश रेखा पर स्थित है। राढू होरहाप से निकल कर सिल्ली से दक्षिण तोरांग रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में मिलती है। स्वर्ण रेखा और उसकी सहायक नदी करकरी की रेत में सोने के कण पाये  जाते हैं। किन्तु इसकी मात्रा अधिक न होने के कारण व्यवसायी उपयोग नहीं किया जाता है। करकरी एक छोटी नदी है जिसकी लंबाई केवल 37 किमी है। वर्तमान में यह नाले का रूप ले चुकी है।

स्वर्णरेखा अपने उद्गम शहर में ही अतिक्रमण और गंदगी की मार झेल रही है। कचरा, नालों के पानी से नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। तुपुदाना औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और मिलों के गंदा पानी गिरने से नदी का पानी काला हो गया है। नामकुम के पास स्थित स्वर्णरेखा घाट तो और भी बदतर है। स्वर्णरेखा नदी की चौड़ाई सरकारी दस्तावेज में 24.46मीटर है, लेकिन यह नदी हटिया और नामकुम में पांच मीटर से भी कम रह गयी है।

स्वर्णरेखा उद्गम स्थल : रांची से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नगड़ी में एक जलकुंड है, जिसे  स्वर्ण रेखा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यह स्थल रानीचुआँ के नाम से प्रसिद्ध है। चुआँ पानी के उद्गम स्थल या स्रोत को कहा जाता है। करीब 100 वर्ष पहले तक यह जलकुंड लकड़ी के पीपे से बहता था। इसी पीपे में सोने की एक हथेली थी, जिसमें पांच उंगलियों के निशान थे। इसी से इसका नाम स्वर्णरेखा हुआ। एक किंवदन्ती है कि नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्ण कणों में बदल गये जो आज भी प्रवाहमान है । इस सम्बन्ध में भूवैज्ञानिकों का मानना है कि स्वर्णरेखा तमाम चट्टानों से होकर गुजरती है। इसी दौरान घर्षण की वजह से सोने के कण इसमें घुल जाते हैं।

रानीचुआँ : रानीचुआँ नगड़ी के पाण्डू गांव में है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहां गुजारा था। यह क्षेत्र उस समय घने जंगलों से आच्छादित था, पांडवों को यहां छिपने का उपयुक्त स्थान मिला। अज्ञातवास के दौरान उन्हें जल की आवश्यकता पड़ी तो अर्जुन ने बाण मारकर जमीन से पानी निकाला। कालान्तर में यह चुआँ बना। इस चुआँ से जल प्रवाहित होता गया, जो आगे चल कर स्वर्णरेखा नदी बन गयी। मान्यता है कि इसी चुआँ पर द्रौपदी सूर्य देव को अर्घ्य दिया करती थी। कहा जाता हैं कि महाभारत में जो एकचक्रा नगरी की बात कही गई है वो यही नगड़ी है। अज्ञातवास के क्रम में पांडव नाग राजाओं से मिले थे। नाग राजा उस समय गंधर्वों के आक्रमण से काफी परेशान थे, तब नाग राजाओं ने अर्जुन के समक्ष अपनी प्राण रक्षा की गुहार लगाई थी। अर्जुन ने गंधर्वों को परास्त कर नागवंशियों के साम्राज्य की रक्षा की थी। नाग राजाओं के निवेदन पर नाग राजकुमारी का विवाह अर्जुन से सम्पन्न हुआ, जिससे एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। इसकी चर्चा महाभारत के प्रसंगों में मिलती है। पाण्डवों के नाम पर ही इस बस्ती का नाम पाण्डू गांव रखा गया। एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार पहले यह एक राजा का महल था। उस महल के अंदर ही एक सुरंग थी जिसका निकास इस जलकुंड में था, जिसमें रानी स्नान करती थी। इस कारण इस जगह का नाम रानीचुआँ पड़ा। रानीचुआँ और उसके अगल-बगल का क्षेत्र कोयल और कारो नदी का भी उद्गम स्थल है।

गंगा धारा : पाण्डू गाँव के निकट ही हरही गाँव है, जिसे भीम का ससुराल भी कहा जाता है।  इस गाँव में गंगा धारा है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि यह पतित पावनी गंगा का अंश है। इस जल का श्रोत कहां है, यह कोई नहीं जानता। यह जल धारा तालाब के बगल में स्थित एक प्राचीन शिवलिंग में गिरती है  जहां एक मंदिर का निर्माण कराया गया है।

दक्षिणी कोयल : नगड़ी के उद्गम स्थल से निकलकर रातू और बेड़ो प्रखंड की सीमा बनाती हुई कोयल नदी बेड़ो की बारीडीह, कुंदी, रानी खटंगा गांवों की पूर्वी सीमा से होती हुई मांडर में प्रवेश करती है तथा कुडू होते हुए लोहरदगा में प्रवेश करती है। लोहरदगा से आठ किमी उत्तर-पूर्व में यह दक्षिण दिशा की ओर मुड़ जाती है और लोहरदगा, गुमला जिला होते हुए सिंहभूम में प्रवेश करती है। अंत मे यह उड़ीसा में प्रवेश करती है, जहां से आगे चलकर गंगपुर के पास शंख नदी में मिल जाती है। इसके आगे यह ब्राह्मणी नदी कहलाती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। देव माड़ी, खटतानाला, बड़कीनाला, अनरिया, डोका, शंख, सपही, कड़नू, नंदनी, कंस, हरसा, फुलझरो, कारो, कोयना, टोरपा आदि इसकी सहायक नदियां हैं।

हरमू नदी : हरमू स्वर्णरेखा की सहायक नदी है। ललगुटवा उद्गम स्थल से चुटिया के आगे 21 महादेव मंदिर के पास स्वर्णरेखा व हरमू नदी का मिलन होता है। हरमू नदी का उद्गम लेटराइट मिट्टी से है। हरमू नदी बहुत बड़े क्षेत्र से होकर बहती थी। इसके चलते उन जगहों का तापमान पहले कम रहता था तथा भूमिगत जल भी रिचार्ज होता रहता था। हरमू मुहल्ले का नाम इसी नदी के नाम पर रखा गया है। इस नदी की सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें बताती हैं कि वर्ष 2004 के पहले यह नदी विस्तृत और चौड़े पाट से होकर बहती थी। 10.40 किलोमीटर की दूरी में बहने वाली इस नदी की चौड़ाई 25 मीटर से घट कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम हो गयी है। हरमू नदी का अतिक्रमण पहले तो किनारे बसे लोगों ने किया, रही सही कसर जमीन दलालों ने पूरी कर दी। महज आधा किलोमीटर क्षेत्र में नदी के सीने पर अनेक मकान बना दिये गये। आबादी बढ़ने के साथ ही नदी के आसपास के मोहल्लों से निकलने वाला गंदा पानी और गंदगी दोनों ही इस नदी में गिराये जाने लगे, जिसकी वजह से यह नदी पूरी तरह दूषित हो गई। रांची नगर-निगम की ओर से हरमू नदी को पुनर्जीवित करने और इसके सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं।

21 शिवलिंगों का अभिषेक  : राँची के स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर स्थित प्राचीन इक्कीसो महादेव का अस्तित्व भी खतरे में है। चट्टानों में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की आकृति नदी के अम्लीय प्रभाव से मिटते जा रहे हैं। 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने अपने महल के करीब 21 चट्टानों में शिवलिंग का निर्माण कराया था। राजपरिवार की दिनचर्या इन 21 शिवलिंगों में जलाभिषेक के साथ ही शुरू होती थी। 21 शिवलिंग एक सांस्कृतिक उन्नत समाज को दर्शाता है। 21 महादेव की खास महत्ता है। हर कार्तिक पूर्णिमा को क्षेत्र के श्रद्धालु स्वर्णरेखा में डुबकी लगाते हैं और 21 शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं।

कहानी हो गई करम नदी : करम नदी सेंट्रल रांची के 2250 वर्गफीट क्षेत्रफल में बहती थी। करम नदी के नाम पर ही करमटोली इलाके का नामकरण हुआ है। टोपोग्राफी के अनुसार करम टोली तालाब से डिस्टिलरी तालाब को जोड़ने वाली करम नदी सबसे निचली जमीनी भू-स्तर है। करम टोली और  मोरहाबादी इलाके का अतिरिक्त पानी करम नदी से होकर डिस्टिलरी तालाब होते हुए स्वर्णरेखा नदी में मिलता था। करम नदी के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी ऊपर था। हरिहर सिंह रोड में जलजमाव की स्थिति करम नदी के अतिक्रमण के कारण हो रही है। सेटेलाइट चित्र से पता चलता है कि कुछ वर्ष पहले तक इस नदी का अस्तित्व था। करम नदी का उल्लेख 1961 में लिखी गई कल्चरल कन्फिग्रेशन ऑफ रांची में नामक पुस्तक में भी है। यह पुस्तक एचईसी की स्थापना के बाद रांची में हुए सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद लिखी गई थी। इसी पुस्तक में पोटपोटो नदी का भी जिक्र है।

पोटपोटो : पोटपोटो नदी सेंट्रल रांची में बहती हुई बोड़ेया में जुमार नदी में मिलती है। यहाँ से इसका पानी रूक्का डैम में मिल जाता है। अतिक्रमण की वजह से पोटपोटो नदी एक संकरी नाली के रूप में बदल गई है। नदी तट को प्रेमनगर, चैड़ी बस्ती, चूड़ी टोला, अरसंडे से लेकर बोड़ेया तक अतिक्रमित किया जा चुका है। पोटपोटो नदी की चौड़ाई 32 से 37 मीटर के बीच थी, लेकिन अब भी यह 7.5 मीटर में सिकुड़ कर रह गयी है।

जुमार नदी : स्वर्णरेखा की सहायक इस नदी पर भी अस्तित्व और पहचान का संकट मंडरा रहा है। यह नदी 15 किमी शहरी और 15 किमी ग्रामीण इलाकों का सफर तय करती है। जुमार नदी रांची और आसपास के क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक करीब 30 मीटर चौड़ाई में बहती थी। अब यह नदी एनएच-33 के किनारे सिर्फ दस मीटर चौड़ाई में सिमट गयी है। जिस नदी में सालों भर पानी रहता था, वह अब बरसाती नदी मात्र बन कर रह गयी है। भुसूर पंचायत, चिरौंदी होते हुए यह नदी स्वर्णरेखा में मिलती है। रांची- रामगढ़ रोड स्थित जुमार पुल के पास दोनों ओर नदी का अतिक्रमण हो चुका है।

सतीगड़हा : करटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स, लालपुर और कोकर से होकर स्वर्णरेखा में मिल जाने वाली सतीगड़हा नदी पूरे करमटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स व लालपुर क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए वरदान थी। अब इस नदी का नामोनिशान मिट गया है। इसके बहाव क्षेत्र में आलीशान मार्केटिंग कांप्लेक्स, अपार्टमेंट और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गईं हैं। नगर निगम प्रशासन ने इस नदी को नाला करार दिया है। एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान नगर निगम ने उच्च न्यायालय को बताया गया है कि यह मात्र एक नाला है जबकि 1932 का नक्शा बताता है कि सतीगढ़वा नदी का अस्तित्व वर्षों से रहा है।

भूसुर नदी : भूसुर नदी एचईसी के इलाके से निकल कर डीपीएस बाइपास, सेल, शुक्ला कॉलोनी हिनू और डोरंडा होते हुए घाघरा से आगे स्वर्णरेखा नदी में मिल जाती है। डोरंडा और मणिटोला को भी यह नदी अलग-अलग करती है। इस नदी में पानी हर-हराकर आता था, इसलिए लोग इसे भूसुर के नाम से कम, हड़हड़वा नदी के नाम से ज्यादा जानते थे। यह नदी कहीं-कहीं ढाई सौ फीट चौड़ी थी, अतिक्रमण से पांच फीट तक सिमट गई है।

अरगोड़ा नदी : कुछ ऐसी ही स्थिति अरगोड़ा नदी की है। यह नदी अरगोड़ा-कटहल मोड़ मार्ग पर बहती थी। यह नदी हरमू की सहायक नदी थी। बहाव क्षेत्र पर अवैध कब्जों से अरगोड़ा नदी विलुप्त हो चुकी है।

रांची के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक परिदृश्य में यहां की नदियों का बड़ा प्रभाव रहा है। विडम्बना है कि शहर की नदियां भी एक-एक कर अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। स्वर्णरेखा, जुमार, हरमू और पोटपोटो जैसी नदियां अतिक्रमण के कारण सिकुड़ रही हैं। इन नदियों के बहाव क्षेत्र को तलाशना भी असंभव है। क्योंकि इन्हीं स्थानों पर शहर के सबसे पाश इलाके विकसित हो चुके हैं। कई नदियां तो पूरी तरह से सूख गयी हैं और अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। नदियों को दूसरा बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गन्दगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अविरलता ही नदी का गुण होता है। यह गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटना होगा। नालों को वापस नदी बनाना होगा। नदियों का पुनर्जीवन और संरक्षण बेहद जरूरी है। हमें यह याद रखना होगा नदियों का अस्तित्व खत्म हुआ तो सभ्यताएं भी खत्म होती गईं।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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गोथिक शैली में बना है झारखण्ड का पहला चर्च

रांची के मुख्य मार्गGEL Church पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है. स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है. गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर की भव्य इमारत देखने लायक़ है.  इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है. इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे. इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ. 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की. ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है. ईसाई धर्मावलंबियों को  यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है.

चर्च शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है ‘प्रभु का’.  चर्च के अतिरिक्त कीलिसिया शब्द भी चलता है. यह यूनानी बाइबिल के एक्लेसिया शब्द का विकृत रूप है, बाइबिल में इसका अर्थ है किसी स्थान विशेष अथवा विश्व भर के ईसाईयों का समुदाय. बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा. ईसाई मिशनरियों का झारखंड  पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है. ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं. भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च. गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जमर्नी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था. इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनायी थी. उन्होंने पैस्टर और उनके मिशनरी साथियों ऐमिलो स्कॉच, अगस्त ब्रॉट और थियोडर जैक को वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था. लेकिन तत्कालीन कारणों से चारों मिशनरी यहाँ आ गये. इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था.  रांची के गोस्सनर कंपाउंड में कैंप करने के बाद चारों मिशनरियों ने धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया. छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी.

वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च. 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ. इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया. जीईएल चर्च छोटानागपुर असम के पूर्वज विश्वासियों ने 10 जुलाई 1919 को ऑटोनोमी के नाम पर जीईएल चर्च और मसीही समाज की जिम्मेवारी ली. पूर्वजों ने यह घोषणा तब की, जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया. तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया.

जेईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही  अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है. चर्च द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं. घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है. झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है. ‘घरबंधु’  पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही. पाक्षिक ‘घरबंधु’, अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है. घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं. जेइएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है. इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे.

जीइएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है. यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है. इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है. मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ. वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया. बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है. धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई. अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है.  जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है. देश के 12 राज्यों में जीइएल चर्च की 1896 शाखायें है. जीइएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है.

जीइएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल)  व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार  1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी. 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी. संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे. 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे. छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही.

ईसाई  मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ. यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था. लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे. यहां के आदिवासियों की अज्ञानता और गरीबी दूर करने की कोशिश की. इसके लिए उनकी भाषा, संस्कृत और परंपरा को अपनाया. रांची शहर के चारों ओर इनके सेवा कार्य क्षेत्रों का विस्तार होता गया. मिशनरियों ने प्राथमिकता के साथ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प लिया. शिक्षा और स्वास्थ्य की समर्पित सेवा लोगों के बीच दी. तब आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी. जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था. बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे. आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे.  आदिवासियों को मिशनरियों में शोषण से मुक्ति का मार्ग नजर आने लगा़. इससे आदिवासी समुदाय का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा ईसाईयत की ओर आकृष्ट हुआ.

ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस चर्च ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के  समय इस चर्च पर भी हमला हुआ था. इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से गोले दागे गए थे, किन्तु कोई विशेष क्षति नहीं हुई.  हमले के निशान आज भी चर्च भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं. क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था. विषम परिस्थिति से बचने के लिए चर्च के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी. उस वक़्त चर्च के हारेलोहर साहब ने अपनी  बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था.

 

✍ हिमकर श्याम

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शिखर की ओर अग्रसर हिंदी ग़ज़ल

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पुस्तक चर्चा

पुस्तक का नाम : बाद-ए-सबा (साझा ग़ज़ल संग्रह)

प्रकाशन वर्ष : 2017,  पृष्ठ  : 158
प्रकाशक  : मंगलम प्रकाशन,इलाहबाद  

 मूल्य  : 150.   संपादक : निर्मल नदीम

हाल ही में “बाद-ए-सबा”,साझा ग़ज़ल संग्रह, पढ़ने का शरफ़ मुझे हासिल हुआ। इस किताब की प्रति मुझे बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब के ज़रिये प्राप्त हुई। इस पुस्तक में 15 शायरों की 10-10 ग़ज़लें हैं। मंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित यह पुस्तक जनाब निर्मल नदीम साहब के संपादन में छपी है। निर्मल नदीम साहब सम्पादक होने के साथ साथ खुद एक अच्छे शायर और प्रकाशक भी हैं।
इसमें जहाँ रिवायती लबो-लहज़े में डूबी हुई शानदार ग़ज़लें नज़र आयीं वहीँ जदीद शायरी से लबरेज़ ग़ज़लें भी पढ़ने को मिलीं। ग़ज़लों का चयन अच्छा है मगर टाइपिंग मिस्टेक इतनी ज़ियादा है की बयान करना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि प्रूफ ठीक से चेक नहीं हुआ बल्कि यूँ कहें कि शायद चेक ही नहीं हुआ।

किताब खोलते ही बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब की ग़ज़ल से दिल खुश हो गया। मिसाल के तौर पर मतला और एक शेर आप भी देखिये :-
जिस्म से जान को रिहा कर दे।
या मुहब्बत मुझे अता कर दे।
आ गया हूँ तेरे निशाने पर ,
तीर नज़रों के अब रिहा कर दे। …….. पृष्ठ-1
अब्बास साहब को पहली बार हज़ल का निम्न शेर कहते देखा मैंने, हालाँकि शेर उम्दा हुआ है :-
मुसीबत को जब से संभाला है मैंने,
ससुर जी के चेहरे पे आयी ख़ुशी है। …. पृष्ठ-3

सादगी और सलासत से लबरेज़ जनाब अभिषेक कुमार सिंह के अशआर भी क़ाबिले-ज़िक्र है,मसलन :-
मर्ज़ का ही नहीं जब पता दोस्तो।
कोई कैसे करे तब दवा दोस्तो। …. पृष्ठ -13

निर्मल नदीम साहब की ग़ज़ल में तग़ज़्ज़ुल देखते ही बनता है,जैसे :-
फ़क़ीरी में जो अपनी ज़िन्दगी शाहाना रखते हैं।
जहाँ वाले उन्हीं का नाम तो दीवाना रखते हैं। … पृष्ठ-99

नितिन नायाब के मतले का निम्न शेर बड़ी खूबी से से तस्दीक़ करता है कि मुहब्बत में खुदा बसता है :-
नमाज़ियों को है मालूम मस्जिदों का पता।
बस एक इश्क़ है सबकी इबादतों का पता। पृष्ठ-101

आशावादी दृष्टिकोण रखता हुआ प्रमोद तिवारी हंस का ये शेर भी क़ाबिले-एहतराम है:-
हौसला पास गर नहीं होता।
चूमता मैं शिखर नहीं होता। …. पृष्ट-121

गिरधारी सिंह गहलोत जी का ये शेर भी खूब हुआ है हालाँकि इसमें ऐबे-तनाफ़ुर है ;-
किसी पत्थर से सर टकरा रहा हूँ।
क़सम देकर किसे समझा रहा हूँ। …. पृष्ठ-36

हिमकर श्याम जी का शेर भी क़ाबिले-ग़ौर है और अपने आप में निराला है :-
उँगलियाँ जो उठाता है सब की तरफ ,
रूबरू उसके भी आइना कीजिये। …. पृष्ठ-47

जनाब मोहसिन असर अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि:-
बहुत ही नाज़ तेरी रहमतों पे है मौला,
नहीं है कोई भी शिकवा हमें मुक़द्दर से। …. पृष्ठ-75

अच्छे दिनों का इंतज़ार करते हुए थक कर चूर हो चुके सिवा संदीप अपनी पीड़ा कुछ यूँ बयान करते हैं ;-
छलोगे और अब सरकार कितना,
फ़क़त अच्छे दिनों की बात कब तक। …. पृष्ठ-143

इनके अतिरिक्त नितिन नायाब, मनोज राठौर मनुज, निर्मला कपिला,प्रदीप कुमार,संजीव क़ुरालीया, संजय मौर्य आदि की भी खूबसूरत ग़ज़लें इस संकलन में हैं। पुस्तक का मुख पृष्ठ खूबसूरत है। हिंदी की ग़ज़ल आहिस्ता आहिस्ता शिखर की ओर तेज़ी से जा रही है, यह कहना फख्र की बात है। सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई।

575274_365024393552716_689915819_n ✍   कुँवर कुसुमेश

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पुरातात्विक धरोहरों को पहचानने और बचाने की पहल

 

झारखण्ड की छवि नकारात्मक प्रदेश की रही है जबकि यह आश्चर्यों से भरा प्रदेश है, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है. एक ओर यहाँ सुरम्य घाटियां, झरने, नदियाँ  और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएँ हैं. रत्नगर्भा धरती है, वहीं दूसरी ओर प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियाँ  हैं. हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है. भारतीय भूभाग में मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में हुआ. पूरे झारखंड में इस तरहimg-20170110-wa0089 बिखरे ऐतिहासिक अवशेषों, सांस्कृतिक साक्ष्यों और स्थापत्य कला की दृष्टि से उल्लेखनीय कृतियों से यहाँ के अतीत और लोकजीवन के विविध पक्षों को जाना जा सकता है. पुरातात्विक दृष्टि से झारखंड अत्यंत समृद्ध है. समय-समय पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा यहाँ जो अन्वेषण कार्य हुए उसमें पूर्व, मध्य एवं उत्तर पाषाण कालीन एवं नव पाषाण कालीन प्रस्तर के औजार काफी बड़ी संख्या में मिले हैं. यहाँ पत्थर और अन्य उपकरण, सभ्यताओं के प्रारंभिक वर्षों से 3000 से अधिक वर्ष पहले के हैं. प्राच्य पाषाण कालीन प्रस्तर आयुध इस तथ्य को प्रगट करते कि आदि मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे. प्राचीन सभ्यता में हड़प्पा की मौजूदगी का भी प्रमाण है. प्रदेश में अनेक छोटे-बड़े प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक पुरातात्विक अवशेष हैं जो यहाँ की स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रागैतिहासिक गुफाओं में मिले भित्ति चित्र जनजातियों के चित्रकलाओं से मिलती-जुलती हैं. भारत के सबसे पुराने गुफा चित्रों को बनानेवाले को झारखंड के शबर जनजाति के रूप में जाना जाता है.

हजारीबाग से लगभग 42 किलोमीटर दूर इस्को के पास पहाड़ी गुफाओं में प्राचीनतम शैल चित्र पाये गये हैं जो बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बनाये गये हैं. स्थानीय लोग इस्को के इस गुफा को राजा-रानी के कोहबर के रूप में जानते हैं. सिन्धु घाटी के समय के बर्तनों पर जिस तरह की आकृतियां बनी हैं उनसे मिलती-जुलती आकृतियां चाय-चंपा के शिल्पों में पायी गई हैं. संतालों के मौलिक इतिहास के संकेत करम विनती में मिलते हैं. इसमें चाय-चंपा के किले और उसमें बने शैलचित्रों की सुन्दरता का जिक्र है. सिन्धु लिपि, हजारों वर्षों से संताल परगना के आदिवासी समाज के बीच अज्ञातवास कर रही हैं. स्वयं संतालों को भी इसकी जानकारी नहीं है. सिंधुलिपि के भित्ति चित्रों, मुहरों में अंकित संकेत तथा शिलाओं पर उकेरे चित्रादि संताल आदिवासी समाज के पूजानुष्ठानों में भूमि पर खींची जानेवाली आकृतियों से मिलती-जुलती हैं. बिहार प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी निर्मल कुमार वर्मा ने दो दशक पूर्व सिन्धु लिपि पढ़ लिए जाने की बात सार्वजनिक कर हलचल मचा दी थी. 1992 में श्री वर्मा के असमय निधन के कारण इतिहास के गर्भ में छिपा यह रहस्य, रहस्य बनकर ही रह गया. यदि श्री वर्मा आज जीवित होते तो निश्चिय ही दुनिया के इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन आ जाता. शायद इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता. विडंबना है कि श्री वर्मा के शोध की गंभीरता पर राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी ध्यान नहीं दिया. अगाध पुरातात्विक संभावनाओं वाले झारखंड राज्य के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए व्यापक व गहन सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन जरूरी है. अब तक जो हुआ है, उससे झारखंड के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास क्रम को जान पाना संभव नहीं है. इतिहास के काल की कई कड़ियां अभी भी गुम हैं.

भारतीय पुरातत्व में असुर शब्द का प्रयोग झारखंड के रांची, गुमला और लोहरदगा  जिलों के कई स्थलों की ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रयुक्त होता है. आज भी लोहरदगा, चैनपुर, आदि इलाकों में असुर नामक जनजाति रहती है. वह लोहा गलानेवाली और लोहे के सामान तैयार करने वाली जाति के रूप में मशहूर है. उस जाति के पुरखे यहाँ बसते थे, उन स्थानों से ईंट से निर्मित प्राचीन भवन, अस्थि कलश, प्राचीन पोखर आदि प्राप्त हुए हैं. के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं. झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. असुर असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी.

प्रारम्भिक पत्थरों के औजारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में सम्भवतः अर्धमानवों का निवास था. वे गुफाओं में रहते थे; उस काल के देवघर, बोकारो, राँची आदि क्षेत्र में पुरापाषाण कालीन औजारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि पुरापाषाणकालीन संस्कृति का आश्रय इस झारखण्ड में भी था. इसके बाद की झारखण्ड सम्बन्धी ऐतिहासिक जानकारी संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों और मध्यकालीन फारसी के इतिहास ग्रंथों में मिलती है. इन सब सूत्रों से झारखण्ड के इतिहास की जानकारी विस्तार से अथवा संक्षिप्त तौर पर मिलती है. देवघर के बैद्यनाथ धाम और तपोवन, दुमका के वासुकी नाथ और राजमहल के राजेश्वरीनाथ जैसे शिवतीर्थों का वर्णन पुराणों में मिलता है. वास्तव में झारखण्ड का इतिहास पुराण युग से बहुत पुराना है. महाभारत के ‘दिग्विजय पर्व’ में इस क्षेत्र को ‘पुंडरीक देश’ कहा गया है. इसी ग्रंथ में इसे ‘पशुभूमि’ भी कहा गया है. अबुल फजल कृत अकबरनामा में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘झारखण्ड’ कहा गया. शम्स-ए-शिराज अफीफ, सल्लिमुल्ला तथा गुलाम हुसैन आदि लेखकों ने अपने ग्रंथ में ‘झारखण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है. कबीरदास के एक पद में झारखण्ड का जिक्र हैः

कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी कासी!

झारखण्ड में आय विराजे वृंदावन की वासी!!

झारखण्ड राज्य वनों से आच्छादित है तथा इस राज्य में अपेक्षाकृत अनुसूचित जनजाति के लोगों का निवास अधिक है. इन लोगों की परंपरा, संस्कृति, कला, लोकगीत, बर्तन, विवाह गीत को भी सहेजने की जरूरत है. झारखंड की धरोहर, इसकी संस्कृति को जानना-समझना बेहद जरूरी है. झारखंड की विरासत को जनमानस के मध्य जागरूकता बनाये रखने के लिए पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद व युवा कार्य विभाग, इंडियन आर्कियोलॉजी सोसाइटी और हेरिटेज झारखण्ड संस्था के संयुक्त तत्वावधान में छह से आठ जनवरी तक रांची में राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के पुरातत्वविदों के अलावा अमेरिका, इंगलैंड और इरान से भी पुरातत्व विशेषज्ञ भी शामिल हुए.

संगोष्ठी समारोह में पर्यटन, कला-संस्कृति, खेद-कूद एवं युवा विभाग मंत्री अमर कुमार बाउरी ने कहा कि झारखंड में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ के बारे में लोगों को मालूम नहीं. उन पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानना उनकी खोज करना आवश्यक है. इतिहास को जानकर ही हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं. झारखंड में ऐसे भी ऐतिहासिक स्थल पाये गये जो कि रामायण, महाभारत एवं मुगलकाल के इतिहास की कहानी कहते हैं. उस काल के स्थल आज भी विद्यमान हैं. इस मौके पर हेरीटेज झारखंड संस्था के अध्यक्ष एच एस पांडेय ने कहा कि पुरातत्व हमारे लिये एक दर्पण की तरह है. झारखंड में अंग, बंग, शुंग सबकी संस्कृति के तत्व बिखरे पड़े हैं उन पर समग्र अध्ययन होनी चाहिये. पुरातत्व वह माध्यम है जो उन तत्वों एवं तथ्यों का संग्रह करता है और हमारे इतिहास को सुरक्षित करता है. अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश पांडेय ने कहा कि विवि में पुरातत्व विभाग नियमित होगा और इस दिशा में ठोस काम किया जाएगा. उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही कला संकाय भी खुलेगा. वहीं हेरिटेज झारखंड के सचिव डॉ एचपी सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य ही था कि लोगों को पता चले कि पुरातत्व भी एक विषय है. इसे मुख्यधारा में लाया जाए. हम अपनी धरोहरों को जाने-पहचाने और संरक्षित करने की दिशा में काम करें. उन्होंने कहा कि हेरिटेज झारखंड के माध्यम से पुरातत्व के प्रति लोगों में अलख जगाते रहेंगे और नए लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा.

मौके पर दो पुस्तकों पुरातत्व एवं एब्सटैक्ट का विमोचन भी किया गया. संगोष्ठी में इण्डियन ऑर्कियोलोजिकल सोसायटी के अध्यक्ष केएन दीक्षित, सोसायटी फॉर प्री-हिस्ट्री एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज के प्रतिनिधि डॉ पीपी जोगलेकर, इण्डियन हिस्ट्री एण्ड कल्चर सोसायटी के प्रतिनिधि प्रो डीपी तिवारी ने भी  अपने विचार रखे. तीन दिनी राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी में देश-विदेश के करीब 150 पुराविदों ने शिरकत की.

पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों में इतिहास की कड़ियाँ झारखंड से जुड़ती रही हैं. यहाँ का समृद्ध, सभ्य अस्तित्व, मानव समाज और उनके सांस्कृतिक तरीके, गुफाओं में जीवित रहने के तरीके, स्मारक, चट्टानी कला में आश्रयों (पेट्रोग्राफ) के रहस्य जानना जरूरी है. पुरातात्विक महत्व के स्थलों व वस्तुओं को सहेजने और उसे सुरक्षित रखने में आम लोगों की सहभागिता भी आवश्यक है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ जितनी भी कवायद कर लें, बिना आमजन के सहयोग से यह कार्य संभव नहीं है. हमें भविष्य को संवारने के लिए अतीत को याद रखना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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पानी : समाज, सरकार और संकल्प

आज नये साल का पहला दिन है,  कोई संकल्प लेने का दिन है। क्यों न इस साल की शुरुआत हम पानी पर  चिन्तimg-20161226-wa0082न के साथ करें और इसे बचाने का संकल्प लें। साथ ही नदी-तालाबों को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प भी लें। जल संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सभ्यता काल से ही जल प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जल जीवन का पर्याय है, जल के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिकी विज्ञान लेखक,लोरान आइजली ने कहा था कि ‘हमारी पृथ्वी पर अगर कोई जादू है,तो वह जल है।’ नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं लेकिन हम नदियों को इसके बदले कुछ लौटाते नहीं हैं। तमाम जल समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है और हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है, जिससे प्रदूषण और जल-संकट की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है, परंतु दुर्भाग्य से इसका अल्पांश ही पीने लायक है। पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के एकजुट होकर प्रयास किया जाये।

आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। 2030 तक पूरी दुनिया में जरूरत के अनुपात में 40 प्रतिशत पानी कम हो जायेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत में जल भण्डार वाले इलाकों समेत कई राज्यों में भूजल का स्तर बहुत नीचे पहुँच चुका है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान समेत कुछ अन्य राज्यों में भूजल का सर्वाधिक दोहन हो रहा है। उत्तर-पश्चिमी , पश्चिमी और प्रायद्विपीय इलाकों की स्थिति भयावह होती जा रही है। 54 फीसदी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है। शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित ढेरों समस्याओं को जानने-समझने  के बावजूद हम जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हैं । नदियाँ, तालाबें एवं झीलें अमूल्य धरोहरें हैं।  इन्हें बचा कर रखना हमारा दायित्व भी है। पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर विशेष ध्यान देना होगा।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र रफ्तार,बढ़ता प्रदूषण तथा जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। नदियों के किनारों पर व्यवसायिक गतिविधियाँ बढ़ जाने से नदियों के जीवतंत्र को क्षति पहुँची है। गंगा के किनारे हज़ारों फैक्ट्रियां हैं जो न केवल इसके जल के अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं, बल्कि उसमें भारी मात्रा में प्रदूषित कचरा भी छोड़तीं हैं।  गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना अरबों लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है जो गंगा में बहा दिया जाता है। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से इस पतित पावनी नदी के अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा किनारे 118 शहर बसे हैं, जिनसे रोज करीब 364 करोड़ लीटर घरेलू मैला और 764 उद्योगों से होने वाला प्रदूषण गंगा में मिलता है। सैकड़ों टन पूजा सामग्री गंगा में फेंकी जाती है। यमुना, दामोदर, गोमती और महानन्दा का हाल भी इससे अलग नहीं है। नदियों की अपनी पारंपरिक गति और दिशा को इस तरह प्रभावित किया जायेगा, तो जाहिर है कि इससे जल-संकट की स्थिति बढ़ती ही जायेगी। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,एवं जल के अन्य स्रोत सूखते होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है।

भारतीय उपमहाद्वीप में बहने वाली प्रमुख नदियों में से लगभग 15 प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, महानदी, तुंगभद्रा इत्यादि न जाने कितने वर्षों से भारत की पावन भूमि को सिंचित करती चली आ रही हैं। ये नदियाँ वाकई भारत एवं भारतीय लोगों की जीवन-रेखा सदृश्य हैं। इनमें गंगा मात्र नदी नहीं हैं, वह संस्कार और संस्कृति भी है। गंगा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गंगा को जीवन देना आसान काम नहीं है। जल की बर्बादी रोकने के लिए रिवर और सिवर को अलग-अलग करना होगा।  कूड़े-कचरे के कारण किसी समय स्वच्छ जल से भरी नदियों की स्थिति दयनीय हो गई है। इस संबंध में सरकार भी गंभीर नहीं है। सरकार को इस दिशा में विशेष योजना बनाकर कार्य करना होगा। जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है।

जल पुरुष राजेंद्र सिंह के अनुसार केंद्र की नई सरकार ने गंगा नदी के पुनर्जीवन की योजना बनाई है, लेकिन हमारी समझ है कि इसके पूर्व गंगा एक्शन प्लान इसलिए सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसमें आम लोगों की भागीदारी नहीं थी। लोगों को लगा कि की यह तो सरकार का काम है, जबकि 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग, प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियां साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं। लोग, नदियों को इस स्थिति में रखने को प्राथमिक जिम्मेदारी मानते थे। गंगा तो मां मानी जाती है। लोगों में फिर से यही सोच विकसित करनी होगी। नदियों के किनारे बसे गांव का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर उतर आए, तो नदियों भविष्य बेहतर हो सकता है। राजेंद्र सिंह रविवार को पटना में ख्यात पर्यावरणविद गांधीवादी अनुपम मिश्र को समर्पित अक्षधा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘पानी : समाज और सरकार’ विषयक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस संगोष्ठी में सिर्फ एक ही बात की गूंज थी कि कैसे स्कूलों सामुदायिक संगठनों व आम नागरिकों के बीच जल साक्षरता बढाकर इन्हें जागरूक किया जाय। राजेंद्र सिंह ने केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा से कहा कि अगर वाकई आगे की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है, तो देश में जल साक्षरता शुरू करानी होगी। बच्चों को बचपन से ही स्कूलों में पानी की महत्ता, इसके संरक्षण के बारे में पूरा-पूरा बताना होगा। चूंकि अब इस मोर्चे पर दूसरा उपाय बच नहीं गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने इससे पूरी सहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने भारतीय जीवन, संस्कृति में नदियों की अहमियत को बताया। उन्होंने कहा कि नदियों के बारे में समाज को भी अपनी ड्यूटी समझना जरूरी है।

अनुपम मिश्र जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद थे। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर  में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ है। इसी तरह  उतराखंड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। पानी पर एक अरसे से काम कर रहे मेरे पत्रकार मित्र पंकज मालवीय का मानना है कि नदियों को उसके मूल नैसर्गिक रूप में वापस लाया जाना बेहद जरूरी है।  बिना जन-भागीदारी के गंगा और दूसरी नदियों को गंदा होने से नहीं रोका जा सकता। गंगा समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए जरूरी है कि बाँधों, गादों और प्रदूषण से इन्हें मुक्त कराना होगा।

गंगा की सफाई के अब तक सारे प्रयास असफ़ल हुए हैं। कानून और नियम तो बनाये गए , लेकिन उनको लागू करने में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। नमामि गंगे योजना के नाम से गंगा जी को स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाई गई योजना कोई पहली योजना नहीं है। गंगा प्राधिकरण की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि गंगा नदी को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाया जा सके। परंतु केवल इस पावन उद्देश्य हेतु सैकड़ों करोड़ का बजट आबंटित कर देने से  कुछ भी हासिल होने वाला नहीं।  गंगा की स्वच्छता का कोई भी अभियान इसके किनारे रहने वाले लोगों को उससे जोड़े बिना मुमकिन नहीं है। जब तक इस विषय पर लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

तेजी से शहरों का विकास हो रहा है। अंधाधुंध विकास. पेड़ों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। तालाबों को पाटकर शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं। शहर का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है। नदी तटों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता दोनों का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। पानी के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव है। इसमें विशेष तौर से निर्धनतम समुदाय, उनमें भी महिलाओं में जागरूकता की अत्यधिक कमी देखने को मिलती है। यह अभियान तभी सफल होगा, जब जन-भागीदारी हो। हम सभी का योगदान हो, इसके लिए पहले पानी के संकट की भयावहता को समझना होगा। पानी पर बात करने को सभी तैयार रहते हैं, किन्तु पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का संरक्षण संभव नहीं है। किनारों पर अवस्थित गाँवों में रहने वाले लोग संकल्प लेना होगा कि वे नदियों के जल को प्रदूषित नहीं करेंगे।  जल प्रकृति का एक अनिवार्य घटक है। जल से ही जीवन है। इस अनमोल प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु सभी को संगठित होकर अपना अमूल्य योगदान देना चाहिए। आधुनिक शिक्षा पद्धति में पानी के सन्दर्भ में जितनी अल्प जानकारी  उपलब्ध है वह यहां की नई पीढ़ी की पानी के प्रति समझ बनाने के लिए अपर्याप्त है। आइए इस वर्ष हम एक-एक बूंद पानी बचाने का हम संकल्प लें।

✍ हिमकर श्याम

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कतार में देश

पूरा देश कतार में है। कब तक कतार में रहेगा यह किसी को मालूम नहीं। किसी की धड़कनें कतार देख रुक रही हैं तो कोई कतार में ही दम तोड़img-20161117-wa0089 दे रहा है। अगले कई दिनों तक ऐसे ही हालात बने रहने की संभावना है। कई बार कतार इतनी लंबी हो जा रही है कि लोग अगले दिन के इंतिज़ार में कतार में ही रात बिताने को मजबूर हैं। यह स्थिति पाँच सौ और हजार के नोट रातों रात चलन से बाहर हो जाने से उत्पन्न हुई है।मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले का अर्थव्यवस्था पर, काले धन पर, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जाली नोटों के धंधे पर क्या असर पड़ेगा और कब तक पड़ेगा, यह देखना अभी बाक़ी है। फिलहाल यह दिख रहा है कि इतने बड़े फैसले से देश की आम जनता का क्या हाल होगा, इस पर न तो विचार किया गया और न ही उससे निपटने की मुक्कमल तैयारी की गई थी । नोटबंदी से समाज के एक बड़े वर्ग को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भूखे, प्यासे घन्टो कतार में खड़े होने के बाद भी खुद का पैसा नहीं मिल पा रहा है। नोटबंदी के 10वें दिन भी देश में हालात जस के तस हैं। नोट बदलवाने के लिए बैंकों और एटीएम के आगे लंबी कतारें हैं। नकदी की किल्लत का असर रोजमर्रा के लेन-देन और खरीद-बिक्री पर पड़ रहा है। अनुमानतः देश की 54 फीसदी जनता नकदी से काम चलाती है। ऐसे में आम आदमी घर में जमा थोड़े-बहुत छोटे नोटों पर ही निर्भर रह गया। जिनके पास छोटे नोट नहीं हैं उन्हें तो और भी परेशानी है।

जीवन सामान्य रूप से चला पाना निहायत मुश्किल हो गया है। दूध, ब्रेड से लेकर फल-सब्जी की खरीद, स्कूल की फीस और इलाज, हर जगह मुश्किलें पेश आ रही हैं। रोज कमाकर खाने बाले मजदूरों के परिवारों में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।  ग्रामीण इलाकों में किसान और मजदूर का जीवन दुश्वार हो गया है। किसानों की जुताई -बुआई प्रभावित हो रही है। मज़दूरों की रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है। लाखों शादियां सिर्फ इसलिए फीकी पड़ने जा रही हैं कि वहां न्यूनतम जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है। लोग बैंकों में पैसे रखने के बावजूद अपने सामान की खरीदारी करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। बैंक से अधिक राशि का भुगतान नहीं हो रहा है। दुकानदार चेक पेमेंट या बक़ाया पर सामान देने को तैयार नहीं हैं। हालाँकि इस बीच किसानों, शादी वाले परिवारों के सामने आ रही मुश्किलों को देखते हुए सरकार ने कुछ राहत भरी घोषणाएं की हैं। शादी वाले परिवार अब बैंकों में केवाईसी देकर 2.5 लाख रुपये निकाल सकते हैं। वहीं, खेतीबाड़ी और बुआई आदि को लेकर किसानों की सुविधा के लिए सरकार ने रुपये निकासी के नए नियम बनाए हैं। नए नियम के तहत किसान अब बैंकों से एक हफ्ते में 25000 रुपये निकाल सकते हैं।

कारोबार जगत पर नोटबंदी का नकारात्मक असर दिख रहा है। कारोबार चाहे किसी तरह का हो या प्रत्येक में मंदी का आलम छाया हुआ है। छोटे कारखाने और फैक्‍ट्रियों पर ताले लटक गए हैं। नोटबंदी का असर बाजार में इस कदर हावी है कि कारोबारियों का धंधा चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। कामगारों को मेहनताना नहीं मिल और वे काम नहीं कर रहे। लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। लेकिन पीएम कह रहे  हैं कि लोग दुश्वारियाँ सह कर भी सरकार के फैसले खुश हैं, सरकार की तारीफ कर रहे हैं। देशवासी देश के व्यापक हित में सारा कष्ट झेलने को तैयार हैं।  वहीं एफएम को रोज सफाई देनी पड़ रही है कि बस, कुछ दिन और सह लीजिए। अरुण जेटली के अनुसार देशभर में करीब दो लाख एटीएम मशीनों को सुचारू रूप से संचालित होने में तीन हफ्तों का समय लग सकता है।

बैंकों पर भी बहुत दबाव है। शाखाओं से लेकर एटीएम पर लगातार भीड़ बनी हुई है। नोट बदलने और निकासी के काम में बैंक कर्मचारी धैर्य और मुस्तैदी से डटे हुए हैं, लेकिन अधिकांश बैंकों के पास कैश खत्म हो जा रहा है। ग्रामीण शाखाओं में समस्या ज्यादा गम्भीर है, क्योंकि 93 फीसदी ग्रामीण इलाकों में बैंक ही नहीं हैं। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा बार-बार पर्याप्त नकदी की उपलब्धता का भरोसा दिये जाने के बावजूद शहरों से लेकर गांवों तक वक़्त पर करेंसी नहीं पहुंच पा रही है। लोग पैसा तो जमा कर रहे हैं लेकिन छोटी नोट उपलब्ध न होने से उन्हें पैसा नहीं मिल पा रहा है।

उधर नोटबंदी को लेकर कलकत्ता (कोलकाता) हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है। नोटबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी को लेकर सरकार रोज नए फैसले ले रही है और अगले दिन उसे बदल दे रही है। फैसलों को ऐसे रोज बदलना ठीक नहीं है। बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतार से लोग परेशान हो रहे हैं। कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि नोटबंदी के फैसले को लागू करते वक्त केंद्र सरकार ने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल नहीं किया। हर दिन वो नियम बदल रही है। नोटबंदी के बाद पहले सरकार ने कहा था कि बैंक से रोजाना 4000 रुपये तक के पुराने नोट बदले जा सकेंगे, बाद में इसे बढ़ाकर 4500 कर दिया गया. वहीं, एटीएम से रोजाना 2000 कैश निकाले जा सकते थे, जिसकी लिमिट बाद में बढ़ाकर 2500 कर दी गई थी। वहीं  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी से लोगों को दिक्कतें हो रही हैं, और इस सच्चाई से केंद्र सरकार इंकार नहीं कर सकती. चीफ जस्टिस ने कहा, स्थिति गंभीर हो रही है, और ऐसे हालात में गलियों में दंगे भी हो सकते हैं।

अगर सरकार की मानें तो काले धन और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए देश हित में उठाया गया कदम है। सरकार का कहना है कि काले धन और नकली नोटों पर ये सर्जिकल स्ट्राइक जैसा काम करेगा। कानून की नजरें बैंक और एटीएम की कतार में खड़े हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देख रही है। नोटबंदी का फैसला निस्संदेह अप्रत्याशित, कठोर और चौकनेवाला क़दम था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कालेधन की समस्या से निपटने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं। परंतु, इतने बड़े फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए जैसी तैयारी होनी चाहिए थी, वह नहीं थी। गरीब और मध्यवर्गीय आबादी खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की परेशानियों को ध्यान में नहीं रखा गया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र साभार आनंद टून )

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उम्र से परे एक सितारा

लीजेंड के amitabh-bachchanमायने क्या हैं? यह समझना हो तो अमिताभ की शख्सियत को समझिए. व्यक्तित्व की खूबियां ही किसी साधारण इंसान को लीजेंड बना देती हैं. अमिताभ बेमिसाल हैं. उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी खूबियां हैं जो उनको औरों से अलग करती है. अनुशासन, धैर्य, ऊर्जा और अदम्य उत्साह उनकी खूबियां हैं. सादगी, सहजता और संवेदनशीलता जैसे गुण उनको महान बनाते हैं.अमिताभ का जीवन उनके नाम की सार्थकता सिद्ध करता है. जो आभामंडल अमिताभ का है वह शायद ही किसी और अभिनेता का हो. समय और दौर के अनुरूप  अमिताभ खुद को ढालते रहे हैं. वह आज भी उतने ही ऊर्जावान हैं जितना पहले हुआ करते थे. उनका जादू आज भी बरकरार है. अमिताभ उम्र से परे हैं. 74 की उम्र में भी वह सबके चहेते हैं. उनके जलवे आज भी बरकरार हैं.  हालिया फिल्मों में ‘पीकू’ और ‘पिंक’ ने क्रिटिक्स के साथ-साथ दर्शकों की भी खूब तारीफें बटोरीं.

 मुंबई के जूहू बीच से कुछ दूरी पर ही अमिताभ का बंगला जलसा स्थित है. घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा रहता है और मौका मिलते ही अमिताभ घर से निकल कर अपने फैंस का अभिवादन करते हैं. मुंबई घूमने आए पर्यटकों के लिए बिग बी का घर देखना अनिवार्य है. 47 वर्षों से हिंदी फ़िल्म जगत में सक्रिय अमिताभ कई हिट और यादगार फ़िल्में दे चुके हैं. इस दौरान उन्होने कई दौर देखे जो चुनौतीपूर्ण थे. उनकी सफलता को तो सब देखते हैं, लेकिन इस सफलता के पीछे छिपा हुआ संघर्ष नजर नहीं आता. फिल्मों में आने के पहले भी अमिताभ ने संघर्ष किया और फिल्मों में आने के बाद भी. उन्होंने जो फिल्में की वे बुरी तरह फ्लॉप हो गईं. वॉयस नैरेटर के तौर पर पहली फिल्म ‘भुवन शोम’ थी लेकिन अभिनेता के तौर पर उनके करियर की शुरुआत फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से हुई. ‘जंजीर’ के हिट होने के पहले तक उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. जंजीर’ उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. इसके बाद उन्होंने लगातार हिट फिल्मों की झड़ी तो लगाई ही, इसके साथ ही साथ वे हर दर्शक वर्ग में लोकप्रिय हो गए और फिल्म इंडस्ट्री के शहंशाह बन गए.

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर उन्हें 3 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है. इसके अलावा 14 बार उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल चुका है. फिल्मों के साथ साथ वे गायक, निर्माता और टीवी प्रस्तोता भी रहे है. जिस अमिताभ बच्‍चन के आवाज की पूरी दुनिया कायल है, एक समय था जब उनकी आवाज उनके करियर में रोड़ा बन रही थी और उन्‍हें नकार दिया गया था लेकिन बाद में उनकी आवाज ही उनकी ताकत बनी. करियर के इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी वो बेहद विनम्र और शान्त हैं. यही खास बात है जो उनकी शख्सियत को और भी निखार देता है.

1982 में फिल्म कुली के सेट पर अमिताभ को पेट में गंभीर चोट लगी थी. डॉक्टरों ने बिग बी की सर्जरी की, मगर सेहत में सुधार नहीं हुआ, और वो मरणासन्न स्थिति में पहुंच गए. इलाज के दौरान बिग बी को खून की सख्त ज़रूरत पड़ी. उन्हें खून देने के लिए उनके चाहने वालों का तांता लग गया. 200 लोगों ने खून दिया. 60 बोतल खून चढ़ा. उस समय देशभर में अमिताभ की सेहत के लिए मंदिरों में दुआएं मांगी जाती रहीं. अस्पताल के बाहर फैंस की लंबी-लंबी लाइन लगी रहती थी. उनके फैंस ने हवन, पूजा जैसे तमाम उपाय किए. ऑपरेशन सफल रहा. वह स्वस्थ भी हुए और पुनः काम पर भी लौटे. यह सब फैंस की दुआओं और उनके हौसले और हिम्मत की बदौलत सम्भव हो पाया.

अमिताभ वह ध्रुव तारा है जो सत्तर के दशक से देश के सिनेमा पर चमक रहा है. पहले एंग्री यंग मैन था, अब वाइज ओल्ड मैन. उम्र के मुताबिक अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार बदले, अपना अंदाज बदला. इसीलिए उन्हें सदी का महानायक कहा जाता है. अमिताभ वक़्त के साथ-साथ स्‍वयं को बदलते रहे. मैडम तुसाद संग्रहालय में बनी मोम की मूर्ति बिग बी के लोकप्रियता को देश और विदेश में दर्शाती है. अमिताभ पहले ऐसे एशियाई हैं जिनकी मूर्ति तुसाद संग्रहालय में बनी है. अमिताभ का नाम बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी जानते हैं. अमिताभ के फैंस 70 के दशक से ही चले आ रहे हैं. सोशल मीडिया अब लोकप्रियता मापने का भी बैरोमीटर है. इस पैमाने पर भी वह सर्वश्रेष्ठ हैं. सोशल मीडिया पर भी वह लंबे समय से सक्रिय हैं. बिग अड्डा से शुरू हुआ सफर ट्विटर और टमब्‍लर तक पहुंच चुका है. अमिताभ फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का जमकर इस्‍तेमाल करते हैं और यही कारण है कि दोनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके फैंस की संख्‍या लाखों-करोड़ों में है. वे अपने प्रंशसको को कभी नहीं निराश करते हैं और पल-पल की घटनाओं को वे इन माध्‍यमों के जरिए शेयर करते हैं. अपने प्रशंसकों से दिलचस्प चर्चाएं करते हैं. अपने निजी सुख-दुख की बातें भी शेयर करते हैं. अमिताभ बच्‍चन ऐसे सेलिब्रिटी हैं, जो अपने ट्विट के साथ क्रामांक भी दर्ज करते हैं.

यह उनके व्यक्तित्व का जादू ही है कि वह लोगों को खुद से जोड़ लेते हैं. हर कोई उनका कायल हो जाता है. हर प्रशंसक को यही लगता है कि शोहरतों की ऊंचाईयों पर चमकने वाला यह सितारा उनका अपना है. उनके बीच का है. काम के प्रति उनका समर्पण देखने और सीखने लायक है. अमिताभ ने अपने प्रशंसकों को बहुत कुछ दिया है. हम तो उनके जन्मदिन पर ढेर सारी दुआएँ और शुभकामनाएँ ही दे सकते हैं.

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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