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शिखर की ओर अग्रसर हिंदी ग़ज़ल

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पुस्तक चर्चा

पुस्तक का नाम : बाद-ए-सबा (साझा ग़ज़ल संग्रह)

प्रकाशन वर्ष : 2017,  पृष्ठ  : 158
प्रकाशक  : मंगलम प्रकाशन,इलाहबाद  

 मूल्य  : 150.   संपादक : निर्मल नदीम

हाल ही में “बाद-ए-सबा”,साझा ग़ज़ल संग्रह, पढ़ने का शरफ़ मुझे हासिल हुआ। इस किताब की प्रति मुझे बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब के ज़रिये प्राप्त हुई। इस पुस्तक में 15 शायरों की 10-10 ग़ज़लें हैं। मंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित यह पुस्तक जनाब निर्मल नदीम साहब के संपादन में छपी है। निर्मल नदीम साहब सम्पादक होने के साथ साथ खुद एक अच्छे शायर और प्रकाशक भी हैं।
इसमें जहाँ रिवायती लबो-लहज़े में डूबी हुई शानदार ग़ज़लें नज़र आयीं वहीँ जदीद शायरी से लबरेज़ ग़ज़लें भी पढ़ने को मिलीं। ग़ज़लों का चयन अच्छा है मगर टाइपिंग मिस्टेक इतनी ज़ियादा है की बयान करना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि प्रूफ ठीक से चेक नहीं हुआ बल्कि यूँ कहें कि शायद चेक ही नहीं हुआ।

किताब खोलते ही बेहतरीन शायर जनाब अब्बास सुल्तानपुरी साहब की ग़ज़ल से दिल खुश हो गया। मिसाल के तौर पर मतला और एक शेर आप भी देखिये :-
जिस्म से जान को रिहा कर दे।
या मुहब्बत मुझे अता कर दे।
आ गया हूँ तेरे निशाने पर ,
तीर नज़रों के अब रिहा कर दे। …….. पृष्ठ-1
अब्बास साहब को पहली बार हज़ल का निम्न शेर कहते देखा मैंने, हालाँकि शेर उम्दा हुआ है :-
मुसीबत को जब से संभाला है मैंने,
ससुर जी के चेहरे पे आयी ख़ुशी है। …. पृष्ठ-3

सादगी और सलासत से लबरेज़ जनाब अभिषेक कुमार सिंह के अशआर भी क़ाबिले-ज़िक्र है,मसलन :-
मर्ज़ का ही नहीं जब पता दोस्तो।
कोई कैसे करे तब दवा दोस्तो। …. पृष्ठ -13

निर्मल नदीम साहब की ग़ज़ल में तग़ज़्ज़ुल देखते ही बनता है,जैसे :-
फ़क़ीरी में जो अपनी ज़िन्दगी शाहाना रखते हैं।
जहाँ वाले उन्हीं का नाम तो दीवाना रखते हैं। … पृष्ठ-99

नितिन नायाब के मतले का निम्न शेर बड़ी खूबी से से तस्दीक़ करता है कि मुहब्बत में खुदा बसता है :-
नमाज़ियों को है मालूम मस्जिदों का पता।
बस एक इश्क़ है सबकी इबादतों का पता। पृष्ठ-101

आशावादी दृष्टिकोण रखता हुआ प्रमोद तिवारी हंस का ये शेर भी क़ाबिले-एहतराम है:-
हौसला पास गर नहीं होता।
चूमता मैं शिखर नहीं होता। …. पृष्ट-121

गिरधारी सिंह गहलोत जी का ये शेर भी खूब हुआ है हालाँकि इसमें ऐबे-तनाफ़ुर है ;-
किसी पत्थर से सर टकरा रहा हूँ।
क़सम देकर किसे समझा रहा हूँ। …. पृष्ठ-36

हिमकर श्याम जी का शेर भी क़ाबिले-ग़ौर है और अपने आप में निराला है :-
उँगलियाँ जो उठाता है सब की तरफ ,
रूबरू उसके भी आइना कीजिये। …. पृष्ठ-47

जनाब मोहसिन असर अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि:-
बहुत ही नाज़ तेरी रहमतों पे है मौला,
नहीं है कोई भी शिकवा हमें मुक़द्दर से। …. पृष्ठ-75

अच्छे दिनों का इंतज़ार करते हुए थक कर चूर हो चुके सिवा संदीप अपनी पीड़ा कुछ यूँ बयान करते हैं ;-
छलोगे और अब सरकार कितना,
फ़क़त अच्छे दिनों की बात कब तक। …. पृष्ठ-143

इनके अतिरिक्त नितिन नायाब, मनोज राठौर मनुज, निर्मला कपिला,प्रदीप कुमार,संजीव क़ुरालीया, संजय मौर्य आदि की भी खूबसूरत ग़ज़लें इस संकलन में हैं। पुस्तक का मुख पृष्ठ खूबसूरत है। हिंदी की ग़ज़ल आहिस्ता आहिस्ता शिखर की ओर तेज़ी से जा रही है, यह कहना फख्र की बात है। सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई।

575274_365024393552716_689915819_n ✍   कुँवर कुसुमेश

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पुरातात्विक धरोहरों को पहचानने और बचाने की पहल

 

झारखण्ड की छवि नकारात्मक प्रदेश की रही है जबकि यह आश्चर्यों से भरा प्रदेश है, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है. एक ओर यहाँ सुरम्य घाटियां, झरने, नदियाँ  और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएँ हैं. रत्नगर्भा धरती है, वहीं दूसरी ओर प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियाँ  हैं. हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है. भारतीय भूभाग में मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में हुआ. पूरे झारखंड में इस तरहimg-20170110-wa0089 बिखरे ऐतिहासिक अवशेषों, सांस्कृतिक साक्ष्यों और स्थापत्य कला की दृष्टि से उल्लेखनीय कृतियों से यहाँ के अतीत और लोकजीवन के विविध पक्षों को जाना जा सकता है. पुरातात्विक दृष्टि से झारखंड अत्यंत समृद्ध है. समय-समय पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा यहाँ जो अन्वेषण कार्य हुए उसमें पूर्व, मध्य एवं उत्तर पाषाण कालीन एवं नव पाषाण कालीन प्रस्तर के औजार काफी बड़ी संख्या में मिले हैं. यहाँ पत्थर और अन्य उपकरण, सभ्यताओं के प्रारंभिक वर्षों से 3000 से अधिक वर्ष पहले के हैं. प्राच्य पाषाण कालीन प्रस्तर आयुध इस तथ्य को प्रगट करते कि आदि मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे. प्राचीन सभ्यता में हड़प्पा की मौजूदगी का भी प्रमाण है. प्रदेश में अनेक छोटे-बड़े प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक पुरातात्विक अवशेष हैं जो यहाँ की स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रागैतिहासिक गुफाओं में मिले भित्ति चित्र जनजातियों के चित्रकलाओं से मिलती-जुलती हैं. भारत के सबसे पुराने गुफा चित्रों को बनानेवाले को झारखंड के शबर जनजाति के रूप में जाना जाता है.

हजारीबाग से लगभग 42 किलोमीटर दूर इस्को के पास पहाड़ी गुफाओं में प्राचीनतम शैल चित्र पाये गये हैं जो बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बनाये गये हैं. स्थानीय लोग इस्को के इस गुफा को राजा-रानी के कोहबर के रूप में जानते हैं. सिन्धु घाटी के समय के बर्तनों पर जिस तरह की आकृतियां बनी हैं उनसे मिलती-जुलती आकृतियां चाय-चंपा के शिल्पों में पायी गई हैं. संतालों के मौलिक इतिहास के संकेत करम विनती में मिलते हैं. इसमें चाय-चंपा के किले और उसमें बने शैलचित्रों की सुन्दरता का जिक्र है. सिन्धु लिपि, हजारों वर्षों से संताल परगना के आदिवासी समाज के बीच अज्ञातवास कर रही हैं. स्वयं संतालों को भी इसकी जानकारी नहीं है. सिंधुलिपि के भित्ति चित्रों, मुहरों में अंकित संकेत तथा शिलाओं पर उकेरे चित्रादि संताल आदिवासी समाज के पूजानुष्ठानों में भूमि पर खींची जानेवाली आकृतियों से मिलती-जुलती हैं. बिहार प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी निर्मल कुमार वर्मा ने दो दशक पूर्व सिन्धु लिपि पढ़ लिए जाने की बात सार्वजनिक कर हलचल मचा दी थी. 1992 में श्री वर्मा के असमय निधन के कारण इतिहास के गर्भ में छिपा यह रहस्य, रहस्य बनकर ही रह गया. यदि श्री वर्मा आज जीवित होते तो निश्चिय ही दुनिया के इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन आ जाता. शायद इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता. विडंबना है कि श्री वर्मा के शोध की गंभीरता पर राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी ध्यान नहीं दिया. अगाध पुरातात्विक संभावनाओं वाले झारखंड राज्य के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए व्यापक व गहन सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन जरूरी है. अब तक जो हुआ है, उससे झारखंड के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास क्रम को जान पाना संभव नहीं है. इतिहास के काल की कई कड़ियां अभी भी गुम हैं.

भारतीय पुरातत्व में असुर शब्द का प्रयोग झारखंड के रांची, गुमला और लोहरदगा  जिलों के कई स्थलों की ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रयुक्त होता है. आज भी लोहरदगा, चैनपुर, आदि इलाकों में असुर नामक जनजाति रहती है. वह लोहा गलानेवाली और लोहे के सामान तैयार करने वाली जाति के रूप में मशहूर है. उस जाति के पुरखे यहाँ बसते थे, उन स्थानों से ईंट से निर्मित प्राचीन भवन, अस्थि कलश, प्राचीन पोखर आदि प्राप्त हुए हैं. के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं. झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. असुर असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी.

प्रारम्भिक पत्थरों के औजारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में सम्भवतः अर्धमानवों का निवास था. वे गुफाओं में रहते थे; उस काल के देवघर, बोकारो, राँची आदि क्षेत्र में पुरापाषाण कालीन औजारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि पुरापाषाणकालीन संस्कृति का आश्रय इस झारखण्ड में भी था. इसके बाद की झारखण्ड सम्बन्धी ऐतिहासिक जानकारी संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों और मध्यकालीन फारसी के इतिहास ग्रंथों में मिलती है. इन सब सूत्रों से झारखण्ड के इतिहास की जानकारी विस्तार से अथवा संक्षिप्त तौर पर मिलती है. देवघर के बैद्यनाथ धाम और तपोवन, दुमका के वासुकी नाथ और राजमहल के राजेश्वरीनाथ जैसे शिवतीर्थों का वर्णन पुराणों में मिलता है. वास्तव में झारखण्ड का इतिहास पुराण युग से बहुत पुराना है. महाभारत के ‘दिग्विजय पर्व’ में इस क्षेत्र को ‘पुंडरीक देश’ कहा गया है. इसी ग्रंथ में इसे ‘पशुभूमि’ भी कहा गया है. अबुल फजल कृत अकबरनामा में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘झारखण्ड’ कहा गया. शम्स-ए-शिराज अफीफ, सल्लिमुल्ला तथा गुलाम हुसैन आदि लेखकों ने अपने ग्रंथ में ‘झारखण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है. कबीरदास के एक पद में झारखण्ड का जिक्र हैः

कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी कासी!

झारखण्ड में आय विराजे वृंदावन की वासी!!

झारखण्ड राज्य वनों से आच्छादित है तथा इस राज्य में अपेक्षाकृत अनुसूचित जनजाति के लोगों का निवास अधिक है. इन लोगों की परंपरा, संस्कृति, कला, लोकगीत, बर्तन, विवाह गीत को भी सहेजने की जरूरत है. झारखंड की धरोहर, इसकी संस्कृति को जानना-समझना बेहद जरूरी है. झारखंड की विरासत को जनमानस के मध्य जागरूकता बनाये रखने के लिए पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद व युवा कार्य विभाग, इंडियन आर्कियोलॉजी सोसाइटी और हेरिटेज झारखण्ड संस्था के संयुक्त तत्वावधान में छह से आठ जनवरी तक रांची में राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के पुरातत्वविदों के अलावा अमेरिका, इंगलैंड और इरान से भी पुरातत्व विशेषज्ञ भी शामिल हुए.

संगोष्ठी समारोह में पर्यटन, कला-संस्कृति, खेद-कूद एवं युवा विभाग मंत्री अमर कुमार बाउरी ने कहा कि झारखंड में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ के बारे में लोगों को मालूम नहीं. उन पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानना उनकी खोज करना आवश्यक है. इतिहास को जानकर ही हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं. झारखंड में ऐसे भी ऐतिहासिक स्थल पाये गये जो कि रामायण, महाभारत एवं मुगलकाल के इतिहास की कहानी कहते हैं. उस काल के स्थल आज भी विद्यमान हैं. इस मौके पर हेरीटेज झारखंड संस्था के अध्यक्ष एच एस पांडेय ने कहा कि पुरातत्व हमारे लिये एक दर्पण की तरह है. झारखंड में अंग, बंग, शुंग सबकी संस्कृति के तत्व बिखरे पड़े हैं उन पर समग्र अध्ययन होनी चाहिये. पुरातत्व वह माध्यम है जो उन तत्वों एवं तथ्यों का संग्रह करता है और हमारे इतिहास को सुरक्षित करता है. अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश पांडेय ने कहा कि विवि में पुरातत्व विभाग नियमित होगा और इस दिशा में ठोस काम किया जाएगा. उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही कला संकाय भी खुलेगा. वहीं हेरिटेज झारखंड के सचिव डॉ एचपी सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य ही था कि लोगों को पता चले कि पुरातत्व भी एक विषय है. इसे मुख्यधारा में लाया जाए. हम अपनी धरोहरों को जाने-पहचाने और संरक्षित करने की दिशा में काम करें. उन्होंने कहा कि हेरिटेज झारखंड के माध्यम से पुरातत्व के प्रति लोगों में अलख जगाते रहेंगे और नए लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा.

मौके पर दो पुस्तकों पुरातत्व एवं एब्सटैक्ट का विमोचन भी किया गया. संगोष्ठी में इण्डियन ऑर्कियोलोजिकल सोसायटी के अध्यक्ष केएन दीक्षित, सोसायटी फॉर प्री-हिस्ट्री एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज के प्रतिनिधि डॉ पीपी जोगलेकर, इण्डियन हिस्ट्री एण्ड कल्चर सोसायटी के प्रतिनिधि प्रो डीपी तिवारी ने भी  अपने विचार रखे. तीन दिनी राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी में देश-विदेश के करीब 150 पुराविदों ने शिरकत की.

पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों में इतिहास की कड़ियाँ झारखंड से जुड़ती रही हैं. यहाँ का समृद्ध, सभ्य अस्तित्व, मानव समाज और उनके सांस्कृतिक तरीके, गुफाओं में जीवित रहने के तरीके, स्मारक, चट्टानी कला में आश्रयों (पेट्रोग्राफ) के रहस्य जानना जरूरी है. पुरातात्विक महत्व के स्थलों व वस्तुओं को सहेजने और उसे सुरक्षित रखने में आम लोगों की सहभागिता भी आवश्यक है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ जितनी भी कवायद कर लें, बिना आमजन के सहयोग से यह कार्य संभव नहीं है. हमें भविष्य को संवारने के लिए अतीत को याद रखना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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पानी : समाज, सरकार और संकल्प

आज नये साल का पहला दिन है,  कोई संकल्प लेने का दिन है। क्यों न इस साल की शुरुआत हम पानी पर  चिन्तimg-20161226-wa0082न के साथ करें और इसे बचाने का संकल्प लें। साथ ही नदी-तालाबों को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प भी लें। जल संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सभ्यता काल से ही जल प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जल जीवन का पर्याय है, जल के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिकी विज्ञान लेखक,लोरान आइजली ने कहा था कि ‘हमारी पृथ्वी पर अगर कोई जादू है,तो वह जल है।’ नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं लेकिन हम नदियों को इसके बदले कुछ लौटाते नहीं हैं। तमाम जल समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है और हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है, जिससे प्रदूषण और जल-संकट की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है, परंतु दुर्भाग्य से इसका अल्पांश ही पीने लायक है। पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के एकजुट होकर प्रयास किया जाये।

आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। 2030 तक पूरी दुनिया में जरूरत के अनुपात में 40 प्रतिशत पानी कम हो जायेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत में जल भण्डार वाले इलाकों समेत कई राज्यों में भूजल का स्तर बहुत नीचे पहुँच चुका है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान समेत कुछ अन्य राज्यों में भूजल का सर्वाधिक दोहन हो रहा है। उत्तर-पश्चिमी , पश्चिमी और प्रायद्विपीय इलाकों की स्थिति भयावह होती जा रही है। 54 फीसदी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है। शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित ढेरों समस्याओं को जानने-समझने  के बावजूद हम जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हैं । नदियाँ, तालाबें एवं झीलें अमूल्य धरोहरें हैं।  इन्हें बचा कर रखना हमारा दायित्व भी है। पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर विशेष ध्यान देना होगा।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र रफ्तार,बढ़ता प्रदूषण तथा जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। नदियों के किनारों पर व्यवसायिक गतिविधियाँ बढ़ जाने से नदियों के जीवतंत्र को क्षति पहुँची है। गंगा के किनारे हज़ारों फैक्ट्रियां हैं जो न केवल इसके जल के अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं, बल्कि उसमें भारी मात्रा में प्रदूषित कचरा भी छोड़तीं हैं।  गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना अरबों लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है जो गंगा में बहा दिया जाता है। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से इस पतित पावनी नदी के अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा किनारे 118 शहर बसे हैं, जिनसे रोज करीब 364 करोड़ लीटर घरेलू मैला और 764 उद्योगों से होने वाला प्रदूषण गंगा में मिलता है। सैकड़ों टन पूजा सामग्री गंगा में फेंकी जाती है। यमुना, दामोदर, गोमती और महानन्दा का हाल भी इससे अलग नहीं है। नदियों की अपनी पारंपरिक गति और दिशा को इस तरह प्रभावित किया जायेगा, तो जाहिर है कि इससे जल-संकट की स्थिति बढ़ती ही जायेगी। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,एवं जल के अन्य स्रोत सूखते होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है।

भारतीय उपमहाद्वीप में बहने वाली प्रमुख नदियों में से लगभग 15 प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, महानदी, तुंगभद्रा इत्यादि न जाने कितने वर्षों से भारत की पावन भूमि को सिंचित करती चली आ रही हैं। ये नदियाँ वाकई भारत एवं भारतीय लोगों की जीवन-रेखा सदृश्य हैं। इनमें गंगा मात्र नदी नहीं हैं, वह संस्कार और संस्कृति भी है। गंगा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गंगा को जीवन देना आसान काम नहीं है। जल की बर्बादी रोकने के लिए रिवर और सिवर को अलग-अलग करना होगा।  कूड़े-कचरे के कारण किसी समय स्वच्छ जल से भरी नदियों की स्थिति दयनीय हो गई है। इस संबंध में सरकार भी गंभीर नहीं है। सरकार को इस दिशा में विशेष योजना बनाकर कार्य करना होगा। जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है।

जल पुरुष राजेंद्र सिंह के अनुसार केंद्र की नई सरकार ने गंगा नदी के पुनर्जीवन की योजना बनाई है, लेकिन हमारी समझ है कि इसके पूर्व गंगा एक्शन प्लान इसलिए सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसमें आम लोगों की भागीदारी नहीं थी। लोगों को लगा कि की यह तो सरकार का काम है, जबकि 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग, प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियां साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं। लोग, नदियों को इस स्थिति में रखने को प्राथमिक जिम्मेदारी मानते थे। गंगा तो मां मानी जाती है। लोगों में फिर से यही सोच विकसित करनी होगी। नदियों के किनारे बसे गांव का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर उतर आए, तो नदियों भविष्य बेहतर हो सकता है। राजेंद्र सिंह रविवार को पटना में ख्यात पर्यावरणविद गांधीवादी अनुपम मिश्र को समर्पित अक्षधा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘पानी : समाज और सरकार’ विषयक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस संगोष्ठी में सिर्फ एक ही बात की गूंज थी कि कैसे स्कूलों सामुदायिक संगठनों व आम नागरिकों के बीच जल साक्षरता बढाकर इन्हें जागरूक किया जाय। राजेंद्र सिंह ने केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा से कहा कि अगर वाकई आगे की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है, तो देश में जल साक्षरता शुरू करानी होगी। बच्चों को बचपन से ही स्कूलों में पानी की महत्ता, इसके संरक्षण के बारे में पूरा-पूरा बताना होगा। चूंकि अब इस मोर्चे पर दूसरा उपाय बच नहीं गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने इससे पूरी सहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने भारतीय जीवन, संस्कृति में नदियों की अहमियत को बताया। उन्होंने कहा कि नदियों के बारे में समाज को भी अपनी ड्यूटी समझना जरूरी है।

अनुपम मिश्र जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद थे। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर  में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ है। इसी तरह  उतराखंड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। पानी पर एक अरसे से काम कर रहे मेरे पत्रकार मित्र पंकज मालवीय का मानना है कि नदियों को उसके मूल नैसर्गिक रूप में वापस लाया जाना बेहद जरूरी है।  बिना जन-भागीदारी के गंगा और दूसरी नदियों को गंदा होने से नहीं रोका जा सकता। गंगा समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए जरूरी है कि बाँधों, गादों और प्रदूषण से इन्हें मुक्त कराना होगा।

गंगा की सफाई के अब तक सारे प्रयास असफ़ल हुए हैं। कानून और नियम तो बनाये गए , लेकिन उनको लागू करने में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। नमामि गंगे योजना के नाम से गंगा जी को स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाई गई योजना कोई पहली योजना नहीं है। गंगा प्राधिकरण की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि गंगा नदी को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाया जा सके। परंतु केवल इस पावन उद्देश्य हेतु सैकड़ों करोड़ का बजट आबंटित कर देने से  कुछ भी हासिल होने वाला नहीं।  गंगा की स्वच्छता का कोई भी अभियान इसके किनारे रहने वाले लोगों को उससे जोड़े बिना मुमकिन नहीं है। जब तक इस विषय पर लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

तेजी से शहरों का विकास हो रहा है। अंधाधुंध विकास. पेड़ों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। तालाबों को पाटकर शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं। शहर का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है। नदी तटों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता दोनों का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। पानी के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव है। इसमें विशेष तौर से निर्धनतम समुदाय, उनमें भी महिलाओं में जागरूकता की अत्यधिक कमी देखने को मिलती है। यह अभियान तभी सफल होगा, जब जन-भागीदारी हो। हम सभी का योगदान हो, इसके लिए पहले पानी के संकट की भयावहता को समझना होगा। पानी पर बात करने को सभी तैयार रहते हैं, किन्तु पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का संरक्षण संभव नहीं है। किनारों पर अवस्थित गाँवों में रहने वाले लोग संकल्प लेना होगा कि वे नदियों के जल को प्रदूषित नहीं करेंगे।  जल प्रकृति का एक अनिवार्य घटक है। जल से ही जीवन है। इस अनमोल प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु सभी को संगठित होकर अपना अमूल्य योगदान देना चाहिए। आधुनिक शिक्षा पद्धति में पानी के सन्दर्भ में जितनी अल्प जानकारी  उपलब्ध है वह यहां की नई पीढ़ी की पानी के प्रति समझ बनाने के लिए अपर्याप्त है। आइए इस वर्ष हम एक-एक बूंद पानी बचाने का हम संकल्प लें।

✍ हिमकर श्याम

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कतार में देश

पूरा देश कतार में है। कब तक कतार में रहेगा यह किसी को मालूम नहीं। किसी की धड़कनें कतार देख रुक रही हैं तो कोई कतार में ही दम तोड़img-20161117-wa0089 दे रहा है। अगले कई दिनों तक ऐसे ही हालात बने रहने की संभावना है। कई बार कतार इतनी लंबी हो जा रही है कि लोग अगले दिन के इंतिज़ार में कतार में ही रात बिताने को मजबूर हैं। यह स्थिति पाँच सौ और हजार के नोट रातों रात चलन से बाहर हो जाने से उत्पन्न हुई है।मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले का अर्थव्यवस्था पर, काले धन पर, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जाली नोटों के धंधे पर क्या असर पड़ेगा और कब तक पड़ेगा, यह देखना अभी बाक़ी है। फिलहाल यह दिख रहा है कि इतने बड़े फैसले से देश की आम जनता का क्या हाल होगा, इस पर न तो विचार किया गया और न ही उससे निपटने की मुक्कमल तैयारी की गई थी । नोटबंदी से समाज के एक बड़े वर्ग को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भूखे, प्यासे घन्टो कतार में खड़े होने के बाद भी खुद का पैसा नहीं मिल पा रहा है। नोटबंदी के 10वें दिन भी देश में हालात जस के तस हैं। नोट बदलवाने के लिए बैंकों और एटीएम के आगे लंबी कतारें हैं। नकदी की किल्लत का असर रोजमर्रा के लेन-देन और खरीद-बिक्री पर पड़ रहा है। अनुमानतः देश की 54 फीसदी जनता नकदी से काम चलाती है। ऐसे में आम आदमी घर में जमा थोड़े-बहुत छोटे नोटों पर ही निर्भर रह गया। जिनके पास छोटे नोट नहीं हैं उन्हें तो और भी परेशानी है।

जीवन सामान्य रूप से चला पाना निहायत मुश्किल हो गया है। दूध, ब्रेड से लेकर फल-सब्जी की खरीद, स्कूल की फीस और इलाज, हर जगह मुश्किलें पेश आ रही हैं। रोज कमाकर खाने बाले मजदूरों के परिवारों में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।  ग्रामीण इलाकों में किसान और मजदूर का जीवन दुश्वार हो गया है। किसानों की जुताई -बुआई प्रभावित हो रही है। मज़दूरों की रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है। लाखों शादियां सिर्फ इसलिए फीकी पड़ने जा रही हैं कि वहां न्यूनतम जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है। लोग बैंकों में पैसे रखने के बावजूद अपने सामान की खरीदारी करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। बैंक से अधिक राशि का भुगतान नहीं हो रहा है। दुकानदार चेक पेमेंट या बक़ाया पर सामान देने को तैयार नहीं हैं। हालाँकि इस बीच किसानों, शादी वाले परिवारों के सामने आ रही मुश्किलों को देखते हुए सरकार ने कुछ राहत भरी घोषणाएं की हैं। शादी वाले परिवार अब बैंकों में केवाईसी देकर 2.5 लाख रुपये निकाल सकते हैं। वहीं, खेतीबाड़ी और बुआई आदि को लेकर किसानों की सुविधा के लिए सरकार ने रुपये निकासी के नए नियम बनाए हैं। नए नियम के तहत किसान अब बैंकों से एक हफ्ते में 25000 रुपये निकाल सकते हैं।

कारोबार जगत पर नोटबंदी का नकारात्मक असर दिख रहा है। कारोबार चाहे किसी तरह का हो या प्रत्येक में मंदी का आलम छाया हुआ है। छोटे कारखाने और फैक्‍ट्रियों पर ताले लटक गए हैं। नोटबंदी का असर बाजार में इस कदर हावी है कि कारोबारियों का धंधा चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। कामगारों को मेहनताना नहीं मिल और वे काम नहीं कर रहे। लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। लेकिन पीएम कह रहे  हैं कि लोग दुश्वारियाँ सह कर भी सरकार के फैसले खुश हैं, सरकार की तारीफ कर रहे हैं। देशवासी देश के व्यापक हित में सारा कष्ट झेलने को तैयार हैं।  वहीं एफएम को रोज सफाई देनी पड़ रही है कि बस, कुछ दिन और सह लीजिए। अरुण जेटली के अनुसार देशभर में करीब दो लाख एटीएम मशीनों को सुचारू रूप से संचालित होने में तीन हफ्तों का समय लग सकता है।

बैंकों पर भी बहुत दबाव है। शाखाओं से लेकर एटीएम पर लगातार भीड़ बनी हुई है। नोट बदलने और निकासी के काम में बैंक कर्मचारी धैर्य और मुस्तैदी से डटे हुए हैं, लेकिन अधिकांश बैंकों के पास कैश खत्म हो जा रहा है। ग्रामीण शाखाओं में समस्या ज्यादा गम्भीर है, क्योंकि 93 फीसदी ग्रामीण इलाकों में बैंक ही नहीं हैं। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा बार-बार पर्याप्त नकदी की उपलब्धता का भरोसा दिये जाने के बावजूद शहरों से लेकर गांवों तक वक़्त पर करेंसी नहीं पहुंच पा रही है। लोग पैसा तो जमा कर रहे हैं लेकिन छोटी नोट उपलब्ध न होने से उन्हें पैसा नहीं मिल पा रहा है।

उधर नोटबंदी को लेकर कलकत्ता (कोलकाता) हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है। नोटबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी को लेकर सरकार रोज नए फैसले ले रही है और अगले दिन उसे बदल दे रही है। फैसलों को ऐसे रोज बदलना ठीक नहीं है। बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतार से लोग परेशान हो रहे हैं। कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि नोटबंदी के फैसले को लागू करते वक्त केंद्र सरकार ने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल नहीं किया। हर दिन वो नियम बदल रही है। नोटबंदी के बाद पहले सरकार ने कहा था कि बैंक से रोजाना 4000 रुपये तक के पुराने नोट बदले जा सकेंगे, बाद में इसे बढ़ाकर 4500 कर दिया गया. वहीं, एटीएम से रोजाना 2000 कैश निकाले जा सकते थे, जिसकी लिमिट बाद में बढ़ाकर 2500 कर दी गई थी। वहीं  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी से लोगों को दिक्कतें हो रही हैं, और इस सच्चाई से केंद्र सरकार इंकार नहीं कर सकती. चीफ जस्टिस ने कहा, स्थिति गंभीर हो रही है, और ऐसे हालात में गलियों में दंगे भी हो सकते हैं।

अगर सरकार की मानें तो काले धन और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए देश हित में उठाया गया कदम है। सरकार का कहना है कि काले धन और नकली नोटों पर ये सर्जिकल स्ट्राइक जैसा काम करेगा। कानून की नजरें बैंक और एटीएम की कतार में खड़े हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देख रही है। नोटबंदी का फैसला निस्संदेह अप्रत्याशित, कठोर और चौकनेवाला क़दम था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कालेधन की समस्या से निपटने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं। परंतु, इतने बड़े फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए जैसी तैयारी होनी चाहिए थी, वह नहीं थी। गरीब और मध्यवर्गीय आबादी खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की परेशानियों को ध्यान में नहीं रखा गया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र साभार आनंद टून )

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उम्र से परे एक सितारा

लीजेंड के amitabh-bachchanमायने क्या हैं? यह समझना हो तो अमिताभ की शख्सियत को समझिए. व्यक्तित्व की खूबियां ही किसी साधारण इंसान को लीजेंड बना देती हैं. अमिताभ बेमिसाल हैं. उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी खूबियां हैं जो उनको औरों से अलग करती है. अनुशासन, धैर्य, ऊर्जा और अदम्य उत्साह उनकी खूबियां हैं. सादगी, सहजता और संवेदनशीलता जैसे गुण उनको महान बनाते हैं.अमिताभ का जीवन उनके नाम की सार्थकता सिद्ध करता है. जो आभामंडल अमिताभ का है वह शायद ही किसी और अभिनेता का हो. समय और दौर के अनुरूप  अमिताभ खुद को ढालते रहे हैं. वह आज भी उतने ही ऊर्जावान हैं जितना पहले हुआ करते थे. उनका जादू आज भी बरकरार है. अमिताभ उम्र से परे हैं. 74 की उम्र में भी वह सबके चहेते हैं. उनके जलवे आज भी बरकरार हैं.  हालिया फिल्मों में ‘पीकू’ और ‘पिंक’ ने क्रिटिक्स के साथ-साथ दर्शकों की भी खूब तारीफें बटोरीं.

 मुंबई के जूहू बीच से कुछ दूरी पर ही अमिताभ का बंगला जलसा स्थित है. घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा रहता है और मौका मिलते ही अमिताभ घर से निकल कर अपने फैंस का अभिवादन करते हैं. मुंबई घूमने आए पर्यटकों के लिए बिग बी का घर देखना अनिवार्य है. 47 वर्षों से हिंदी फ़िल्म जगत में सक्रिय अमिताभ कई हिट और यादगार फ़िल्में दे चुके हैं. इस दौरान उन्होने कई दौर देखे जो चुनौतीपूर्ण थे. उनकी सफलता को तो सब देखते हैं, लेकिन इस सफलता के पीछे छिपा हुआ संघर्ष नजर नहीं आता. फिल्मों में आने के पहले भी अमिताभ ने संघर्ष किया और फिल्मों में आने के बाद भी. उन्होंने जो फिल्में की वे बुरी तरह फ्लॉप हो गईं. वॉयस नैरेटर के तौर पर पहली फिल्म ‘भुवन शोम’ थी लेकिन अभिनेता के तौर पर उनके करियर की शुरुआत फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से हुई. ‘जंजीर’ के हिट होने के पहले तक उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. जंजीर’ उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. इसके बाद उन्होंने लगातार हिट फिल्मों की झड़ी तो लगाई ही, इसके साथ ही साथ वे हर दर्शक वर्ग में लोकप्रिय हो गए और फिल्म इंडस्ट्री के शहंशाह बन गए.

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर उन्हें 3 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है. इसके अलावा 14 बार उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल चुका है. फिल्मों के साथ साथ वे गायक, निर्माता और टीवी प्रस्तोता भी रहे है. जिस अमिताभ बच्‍चन के आवाज की पूरी दुनिया कायल है, एक समय था जब उनकी आवाज उनके करियर में रोड़ा बन रही थी और उन्‍हें नकार दिया गया था लेकिन बाद में उनकी आवाज ही उनकी ताकत बनी. करियर के इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी वो बेहद विनम्र और शान्त हैं. यही खास बात है जो उनकी शख्सियत को और भी निखार देता है.

1982 में फिल्म कुली के सेट पर अमिताभ को पेट में गंभीर चोट लगी थी. डॉक्टरों ने बिग बी की सर्जरी की, मगर सेहत में सुधार नहीं हुआ, और वो मरणासन्न स्थिति में पहुंच गए. इलाज के दौरान बिग बी को खून की सख्त ज़रूरत पड़ी. उन्हें खून देने के लिए उनके चाहने वालों का तांता लग गया. 200 लोगों ने खून दिया. 60 बोतल खून चढ़ा. उस समय देशभर में अमिताभ की सेहत के लिए मंदिरों में दुआएं मांगी जाती रहीं. अस्पताल के बाहर फैंस की लंबी-लंबी लाइन लगी रहती थी. उनके फैंस ने हवन, पूजा जैसे तमाम उपाय किए. ऑपरेशन सफल रहा. वह स्वस्थ भी हुए और पुनः काम पर भी लौटे. यह सब फैंस की दुआओं और उनके हौसले और हिम्मत की बदौलत सम्भव हो पाया.

अमिताभ वह ध्रुव तारा है जो सत्तर के दशक से देश के सिनेमा पर चमक रहा है. पहले एंग्री यंग मैन था, अब वाइज ओल्ड मैन. उम्र के मुताबिक अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार बदले, अपना अंदाज बदला. इसीलिए उन्हें सदी का महानायक कहा जाता है. अमिताभ वक़्त के साथ-साथ स्‍वयं को बदलते रहे. मैडम तुसाद संग्रहालय में बनी मोम की मूर्ति बिग बी के लोकप्रियता को देश और विदेश में दर्शाती है. अमिताभ पहले ऐसे एशियाई हैं जिनकी मूर्ति तुसाद संग्रहालय में बनी है. अमिताभ का नाम बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी जानते हैं. अमिताभ के फैंस 70 के दशक से ही चले आ रहे हैं. सोशल मीडिया अब लोकप्रियता मापने का भी बैरोमीटर है. इस पैमाने पर भी वह सर्वश्रेष्ठ हैं. सोशल मीडिया पर भी वह लंबे समय से सक्रिय हैं. बिग अड्डा से शुरू हुआ सफर ट्विटर और टमब्‍लर तक पहुंच चुका है. अमिताभ फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का जमकर इस्‍तेमाल करते हैं और यही कारण है कि दोनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके फैंस की संख्‍या लाखों-करोड़ों में है. वे अपने प्रंशसको को कभी नहीं निराश करते हैं और पल-पल की घटनाओं को वे इन माध्‍यमों के जरिए शेयर करते हैं. अपने प्रशंसकों से दिलचस्प चर्चाएं करते हैं. अपने निजी सुख-दुख की बातें भी शेयर करते हैं. अमिताभ बच्‍चन ऐसे सेलिब्रिटी हैं, जो अपने ट्विट के साथ क्रामांक भी दर्ज करते हैं.

यह उनके व्यक्तित्व का जादू ही है कि वह लोगों को खुद से जोड़ लेते हैं. हर कोई उनका कायल हो जाता है. हर प्रशंसक को यही लगता है कि शोहरतों की ऊंचाईयों पर चमकने वाला यह सितारा उनका अपना है. उनके बीच का है. काम के प्रति उनका समर्पण देखने और सीखने लायक है. अमिताभ ने अपने प्रशंसकों को बहुत कुछ दिया है. हम तो उनके जन्मदिन पर ढेर सारी दुआएँ और शुभकामनाएँ ही दे सकते हैं.

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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समय के साथ बदली हिन्दी पत्रकारिता

Udant-martandहिन्दी पत्रकारिता का विस्तार और विकास अभिभूत करनेवाला है। 30 मई, 1826 को पं0 युगुल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था। उदन्त मार्तण्ड इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक पैसे पं युगुल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। उस दौर में किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि हिन्दी पत्रकारिता इतना लम्बा सफर तय करेगी। 190 वर्षों में हिन्दी अखबारों एवं हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी तेजी आई है।  नई तकनीक और प्रौद्योगिकी ने अखबारों की ताकत और ऊर्जा का व्यापक विस्तार किया है। समय के साथ-साथ हिन्दी पत्रकारिता की प्रकृति, स्वरूप और व्यवहार में व्यापक बदलाव आया है। बदलाव के इस दौर में पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है, जो चिंता का विषय है। बीते कुछ वर्षों में के दौरान हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां बढ़ी हैं, वहीँ मुक्त बाजार का कुप्रभाव भी इस पर देखने को मिला है। गुणवत्ता व विश्वसनीयता का संकट भी सामने खड़ा है।

उदारीकरण के बाद जिस तरह नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ, पत्रकारिता भी उससे अछूती नहीं रह पायी। पत्रकारिता में आये बदलाव के कारण पत्रकारिता की मिशनरी भावना पर बाजारबाद हावी हो गया। पत्रकारिता एक मिशन न होकर व्यवसाय में तब्दील गई। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने इस क्षेत्र में कदम रख दिया है। जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। इस कारण से पत्रकारिता अपने मूलभूत सि़द्धांतों का उल्लंघन करने लगी है और उसने उत्तेजना, सनसनी और खुलेपन को पूरी तरह से अपना लिया है। वर्तमान दौर की पत्रकारिता में तथ्यपरक्ता, यथार्थवादिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता, सत्यनिष्ठा और संतुलन का अभाव दिखता है। संपादकीय विभाग की भूमिका  गौण हो गई है और उसका स्थान मार्केटिंग विभाग ने ले लिया है। अखबारों को ख़बरों का गंभीर माध्यम बनाने के बजाय इन्हें लोक लुभावन बनाया जा रहा है। यहां भी जो बिकता है वहीं दिखता है वाली कहावत चरितार्थ होने लगी है। पैकेज पत्रकारिता के उद्भव के साथ ही अखबारों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिहृ लगने लगा है।

पत्रकारिता लोकभावना की अभिव्यक्ति एवं नैतिकता की पीठिका है। भारत में पत्रकारिता की शुरूआत एक मिशन के रूप में हुई थी। स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि यहां के पत्रों एवं पत्रकारों ने ही तैयार की थी। आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता देशभक्ति और समग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ जुड़ी रही। इसमे देशभक्ति के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है। स्वाधीनता से पहले देश के लिए संघर्ष का समय था। इस संघर्ष में जितना योगदान राजनेताओं का था उससे तनिक भी कम पत्रों एवं पत्रकारों का नहीं था। स्वतंत्रता पूर्व का पत्रकारिता का इतिहास तो स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य हिस्सा ही है। तब पत्रकारिता घोर संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए प्रयत्नशील थी। व्यावसायिक विस्तार के साथ ही वह साख के संकट से गुजरने लगी है। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ सीमाएं भी होतीं हैं। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूँजी उसकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। साख ही पत्रकारिता का प्राण है लेकिन इसकी रक्षा तभी संभव है जब पूर्णरूप से निष्पक्ष समाचारों का प्रकाशन हो। पत्रकारिता कर यह दायित्व है कि वह सही और संतुलित खबरें पाठकों तक पहुंचाए।

यह बड़े अफ़सोस की बात है कि मुख्यधारा की मीडिया में भारत का वास्तविक चेहरा दिखलाई नहीं देता है। ख़बरों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है। मीडिया को वही दिखता है जो उसके द्वारा तैयार बाजार पसंद करता है। जब तक प्रिंट की पत्रकारिता थी, पत्रकारिता में कुछ हद तक मिशनरी भावना बची हुई थी। पत्रकारिता के क्षेत्र में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के आगमन से मिशन पूरी तरह से प्रोफेशन में बदल गया। मुख्यधारा की पत्रकारिता से मोहभंग की स्थिति है और विकल्पों की तलाश शुरू हुई हो गयी है। वैकल्पिक मीडिया के रूप में अलग-अलग प्रयोग किये जाने लगे हैं। वेब पत्रकारिता और सोशल मीडिया का विस्तार ने पत्रकारिता को नया रूप दिया है। नागरिक आधारित पत्रकारिता के विभिन्न मंचों की सुगबुगाहट बढ़ रही है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में चुनौती तो हमेशा रही है लेकिन आज की पत्रकारिता पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण है। जहाँ तक आंचलिक पत्रकारिता का सवाल है यह सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। जनसरोकारों से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता देना आवश्यक और चुनौतीपूर्ण है, इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करनेवाला ही सही मायने में पत्रकार है। अपनी कला, संस्कृति, परम्परा और मान्यता को बचाना हिंदी पत्रों और पत्रकारों का उत्तरदायित्व है।

मीडिया पर बढ़ते बाजारवाद और उपभोक्तावाद के कारण ही आम आदमी हाशिए पर है। आमलोगों की समस्याओं और जरूरतों के लिए मीडिया में जगह और सहानुभूति नहीं दिखलाई देती है। हर जगह पाठकों को हासिल करने की भीषण स्पर्धा दिखाई देती है। पत्रकारिता में ऐसे लोग आ गए हैं जिनका लक्ष्य सीधे सीधे पैसा कमाना और पावर पाना है, उस पर एक सतर्क नजर रखने की भी जरूरत है। अब समय आ गया है कि पत्रकारिता की जवाबदेही तय की जाये और उसमें पारदर्शिता लायी जाये। साख बेचकर और पाठकों का विश्वास खोकर पत्रकारिता को बहुत दिनों तक जिंदा नहीं रखा जा सकता है।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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शब्द ही सबकुछ है

शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के इसी निराकार रूप को सादर नमन्। यह कहावत अब पुरानी पड़ गयी है कि हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे कोईshabd औरत होती है। आज हर सफल व्यक्ति के पीछे शब्द होता है। यानि, मनुष्य की सफलता का राज शब्द में निहित है। शब्द के बिना भाषा की और भाषा के बिना मनुष्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। शब्द पर रीझनेवाले लोग पुराने दौर में ही नहीं आज भी अपना योगदान दे रहे हैं। शब्द की महिमा अपरम्पार है। शब्दों में चिकनापन, भारीपन, मीठापन, कड़वापन, लचीलापन जैसे गुण पाये जाते हैं। समय के साथ इसके गुण-धर्म में परिवर्तन होते रहते हैं। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शब्द विभिन्न रूप धारण करते हैं। आज शब्दों की भीड़ में कोई शब्द दुखी नजर आता है तो कोई सुखी। शब्दों के इसी भीड़ में से कोई शब्द एक दूसरे को धकियाता, लतियाता आगे बढ़ जाता है और बेचारा कमजोर शब्द अपने अस्तित्व के लंगड़ेपन को कोसता हुआ अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रह जाता है।

जो शब्द के धनी होते हैं वे जेब से भी धनी होंगे इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। शब्दों के सहारे बड़े-बड़े काम आसानी से हो जाया करते हैं। इतना ही नहीं आज हमारे नेताओं को जब कुछ नहीं सूझता तो वे शब्द के सहारे देश का विकास करते हैं। वैसे भी लोकतंत्र शब्द तंत्र पर ही टिका हुआ है अर्थात् लोकतंत्र की नींव में शब्द ही है। शब्दों के मायाजाल में फंसाकर हमारे नेतागण वोट पाकर थोक के भाव में विधायक और सांसद बनते हैं फिर उन्हें खरीदकर बहुमत की साबित की जाती है। शब्द सरकारें बनाती भी हैं और गिराती भी हैं। सरकार बदल जाती है, मगर शब्द वहीं रहते हैं।

शब्दों की बढ़ती हुई मांग से प्रभावित होकर हमारे मुहल्ले में एक होनहार ने शब्दों का एक स्टॉल खोल रखा है। यहां हर वर्ग के दैनिक उपयोग के शब्द आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं। इस स्टॉल पर अक्सर भीड़ रहा करती है। पास ही एक लड़का चिल्लाता हुआ मिल जाता है- ”आइए मेहरबान, कद्रदान यह शब्दों की दुकान है। यह आपकी अपनी दुकान है। यहां हर प्रकार के शब्द सस्ते और उचित मूल्य पर प्राप्त किए जा सकते हैं।” ”शब्दों की आवश्कता हर किसी को पड़ सकती है चाहे वह बुद्धिजीवी हो, बाबा हो, लीडर हो या पुलिस महकमे का कोई आदमी या फिर हमारे पथ-प्रदर्शक तो आइए एक बार हमें अवश्य आजमाइये। आपकी संतुष्टि ही हमारी खुशी है।” यहां लीडरों के लिए नए-नए आश्वासनों, वायदों का अच्छा खासा स्टॉक है (इन्हीं आश्वासनों के बल पर ही तो वे अपनी कुर्सी पर टिके रहते हैं।) बुद्धिजीवियों में शब्दों का इधर
अकाल पड़ गया है (भ्रष्टाचार शब्द के अलावा इन्हें दूसरा कोई शब्द सूझता ही नहीं है) इस शब्द रूपी अकाल को दूर करने
के लिए भी इस स्टॉल में खासी मेहनत की गई है। राहत साम्रगी अर्थात् नए-नए शब्द बाहरी मुल्क से मंगाए गए है जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पुलिस महकमे पर यह स्टॉल कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। यह तो सर्वविदित है कि इस महकमे के लिए सबसे जरूरी शब्द यदि कुछ है तो वह है गाली और यहां एक गाली के साथ दस गाली फ्री देने की योजना बनायी गयी है। योजना सीमित समय के लिए है। हमारे यहां ऐसी-ऐसी गालियां है, जिसे सुन कोठे की वेश्या भी शरमा जाए। गालियों से थानेदार की और थानेदार से थाने की शोभा बढ़ती है तो आइए और यहां से गालियां ले जाइए और अपने थाने की शोभा बढ़ाइये।

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि शब्दों का स्टॉल भला चल सकता है मगर यह चल ही नहीं रहा बल्कि दौड़ पड़ा है। कल तक जो मुहल्ले वाले के बीच नाकाबिल, निकम्मा समझा जाता था वहीं उनके आंखों का तारा बना हुआ है। सैकड़ों की भीड़ उसके आगे-पीछे घूमती रहती है इस उम्मीद में की शायद वह उन्हें भी कुछ ऐसा शब्द दे दे जिससे उनके सितारे भी बुलंद हो जाएं। इस दुनिया में कुछ भी बिक सकता है बशर्ते कि उसे बेचने की कला
हमारे पास हो। सच ही कहा गया है ”खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान।” यह होनहार शब्द बेच कर आज ऐश कर रहा है।

आम आदमी और शब्द के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। आज आम आदमी शब्दहीन हो गया है। शब्दों के तलाश में भटकता हुआ आम आदमी बड़ी उम्मीद के साथ उस स्टॉल पर पहुंचता है और कहता है- ”भाई मेरे लिए भी कोई शब्द है क्या तुम्हारे पास ? ”यह सुनकर वह खामोश हो जाता है। वह दुकान से बाहर निकल कर कहता है ”भाई यही तो एक वर्ग है जिसके शब्द मेरे पास नहीं है, इसी की तलाश में तो मैं भी हूं, तुम्हे मिल जाए तो मुझे भी खबर करना। तुम्हारे जैसे न जाने कितने भाई रोज मेरे इस स्टॉल से लौट जाते हैं। यह सुन कर उस आदमी की आंखों में पानी भर आता है। शब्द के बिना क्या जीना? आम आदमी के लिए शब्द नहीं है, खास आदमी के लिए शब्द ही शब्द हैं। इस हालत का बखान करने के लिए आपके पास शब्द है क्या?

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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