Category: फ़िल्म

अनारकली के बहाने मर्दवादी सोच पर प्रहार

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महज संजोग है कि मार्च महीने के अंतिम हफ्ते में जब विश्व महिला सशक्तिकरण का जोश और जश्न उतार पर होगा तब मर्दवादी सोच के खिलाफ एक स्त्री के उठ खड़े होने की हुंकार बड़े पर्दे पर सुनाई देगी. 24 मार्च को रिलीज होनेवाली ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ ऐसी फिल्म है जिसमें एक नारी का आत्मसम्मान ध्वनित है. फ़िल्म के केंद्र में नायिका हैं और निशाने पर है मर्दवादी सोच. एक स्त्री के संघर्ष और सम्मान की लड़ाई को बेबाकी के साथ इसमें दर्शाया गया है. ‘अनारकली ऑफ आरा’ छोटे शहरों की उन महिलाओं की कहानी है जो गाने-बजाने के धंधे में हैं और लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं ये इस फिल्म का पीक पाइंट है. अनारकली अपना घर चलाने के लिए गाने-नाचने का काम करती है. एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में सब बुरा होने लग जाता है,  जब कहानी में एक पावरफुल व्यक्ति की एंट्री होती है. VC (संजय मिश्रा) अनारकली से छेड़छाड़ करता है, जो अनारकली को नागवार लगता है. अनारकली VC बने संजय मिश्रा के गाल पर तमाचा जड़ देती है. यह तमाचा ही उसके लिए मुसीबत का सबब बन जाता है, उसे बदनाम कर दिया जाता है. फिर वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई लड़ती है और न्याय पाने के लिए भर दम कोशिश करती है. यह तमाचा प्रतीकात्मक भी है. खलनायक के बहाने यह तमाचा मर्दवादी सोच और समाज के गाल पर जड़ने की कोशिश है.

‘अनारकली ऑफ़ आरा’ मर्दवादी समाज पर गहरी चोट करती है. फ़िल्म में बड़े सहज तरीके से दिखाया गया है कि गा-नाच कर अपनी आजीविका चलनेवालों को किस तरह समाज की संकुचित सोच का सामना करना पड़ता है. आज भी नाचने-गाने वालों के चरित्र को संदिग्ध नज़र से देखा जाता है. ऐसी स्त्रियों के चरित्र हनन से लेकर उनका मनोबल तोड़ने तक की भरपूर कोशिशें की जाती हैं. पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता, राजनीतिक ताकत के नशे में चूर और शर्म होती संस्कृति इन घटनाओं की वजहों में शामिल हैं. अनारकली देसी गायिकाओं के जीवन की कठिनाइयों को दिखाती है. थियेटर, नौटंकी और नाचने-गाने के पेशे से जुड़ी अधिकतर स्त्रियाँ गरीब और निचले तबके से आती हैं. अधिकांशतः अनारकलियां छोटे-छोटे मंचों पर परफॉर्म करती हैं, लेकिन उनके नाम पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटती है. उनको काफी शोहरत हासिल होती है. हर उम्र के लोग इनके गानों पर दीवानों की तरह झूमते हैं. उनके पास भले ही बॉलीवुड जैसी शोहरत नहीं है, लेकिन लाखों दीवाने हैं. इनके गानों में जो दोहरा अर्थ होता है,  इनके हाव-भाव में जो शरारत भरी अदायें होतीं हैं, उस पर लोग फिदा होते हैं. जब भी ये शो करती हैं तो मंच से लेकर पंडाल के चारों तरफ लोग झूमते नज़र आते हैं, उनपर पैसे लुटाते हैं. पर इस चमक-धमक के पीछे की हकीकत बहुत भयावह और शर्मनाक है.

अनारकली जैसी स्त्रियां रोज अपमानित होती हैं. उनके गानों पर थिरकने वाला समाज उनको शक भरी नजरों से देखता है. लोग उन्हें भले कुछ भी कहते हों, किन्तु वे खुद को कलाकार मानती हैं. नाच-गाना उनका शौक है और पेट भरने का आधार भी,  लेकिन लोग उनकी जिंदगी को समझ नहीं पाते और स्थितियां विपरीत हो जाती हैं. भीड़ के बीच नाच- गाकर जीवनयापन करनेवाली इन अनारकलियों से छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं, लेकिन इनमें से चंद ही इन ज्यादतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं जिसकी कहानी इस फिल्‍म में दिखायी गयी है. अनारकली बेशक द्विअर्थी गाना गाती है लेकिन वह रसूखदारों के लिए उपलब्ध नहीं होती.  अनारकली के हाथों अपमानित हो कर फ़िल्म का खलनायक उसे देह व्यापार के झूठे इल्जाम में फंसा देता है. नेताओं के इशारे पर नाचनेवाली पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है. स्थानीय मीडिया भी उसे वेश्या बना देती है. पर अनारकली हार नहीं मानती, हिम्मत नही हारती, हताश नहीं होती. वह कहती है- सबको लगता है हम गानेवाले लोग हैं तो कोईओ आसानी से बजा भी देगा, पर अब ऐसा नहीं होगा. फिर वह आर-पार की की लड़ाई का फैसला करती है और कहती है कि आज आर-पार होगा या हम आरा की अनारकली नहीं, समझे.

उदारीकरण के बाद दुनिया एक बाज़ार में बदल गई और धीरे-धीरे परम्पराओं और सामाजिक मूल्यों का भी बाज़ारीकरण हो गया. जब दुनिया बदली तो गीत- संगीत उससे कैसे अछूता रह सकता था. लोक गीतों एवं नृत्यों पर अश्लील- द्विअर्थी गीत-नृत्य हावी हो गए हैं. जब लोग यही सुनना और देखना चाहते हैं तो छोटे कलाकार करें भी तो क्या करें, उन्हें भी तो अपना घर-परिवार चलाना होता है. सामाजिक रूप से नाचने गाने को सदा हेय दृष्टि से देखा गया है. यह बात महिला-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू थी. वक़्त के साथ समाज का नजरिया बदला पर महिला कलाकारों के प्रति लोगों की सोच में कुछ खास बदलाव नहीं आया. देश में लैंगिक असमानता समाप्त करने की तमाम कोशिशें मर्दवादी समाज में आकर दम तोड़ देती हैं. स्त्री को नसीहतें देने वाले लोग असल में मर्दवादी सोच से ग्रस्त होते हैं. उन्हें लगता है कि समाज की सभी मर्यादाएं उनके हिसाब से ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसी मानसिकता वाले लोग हर वक़्त महिला हिंसा की एक नई कहानी लिखते हैं. किसी महिला के साथ अभद्रता से पेश आकर खुद के मर्द होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं. इस मानसिकता को अनारकली ऑफ़ आरा के एक दृश्य में खूबसूरती से फिल्माया गया है जिसमे खलनायक बने संजय मिश्रा निर्देश दे रहे हैं कि कांड बनाओ पर कमांड रखो.

अनारकली फ़िल्म नहीं एक गहन सामयिक विचार है जो मर्दवादी समाज में एक स्त्री के संघर्ष को नये मायने देता है. कोई स्त्री आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ ज़िन्दगी जीना चाहती है तो इसमें क्या गलत है. आदर्श, संस्कार, मूल्य, नैतिकता और सारी मर्यादाएँ महिलाओं के जिम्मे ही क्यों आती हैं, ऐसे कई सवाल हैं जो आज भी अनुतरित हैं, यह फ़िल्म वास्तव में बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देगी. पत्रकार से निर्देशक बने अविनाश की पैनी नज़र और स्वरा भास्कर, संजय मिश्रा और पंकज त्रिपाठी जैसे उम्‍दा कलाकारों का दमदार अभिनय अनारकली ऑफ आरा में अद्भुत संवेदनशीलता भर देता हैं. अविनाश ने फिल्म के हर डिपार्टमेंट को चुस्त रखा है. उन्होंने इस फिल्म की कहानी, संवाद और दो गाने भी लिखे हैं. फ़िल्म के गाने और संगीत लाज़वाब हैं. संगीत रोहित शर्मा का है. रोहित ने बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम और शिप ऑफ थीसियस में भी संगीत दिया था. प्रोमो देखकर कहीं से यह नहीं लगता कि यह उनकी पहली फ़िल्म है. अगर आप गंभीर फ़िल्मों के शौकीन हैं तो ये फ़िल्म जरूर देखें, आपको बहुत पसंद आएगी.

हिमकर श्याम

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