Category: साहित्य

ताज़गी बिखेरती ‘बाद-ए-सबा’

17098431_10208288221030005_4268078898485174789_nमंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित साझा ग़ज़ल संग्रह बाद-ए-सबा सामूहिक रचनाकर्म और सामूहिक प्रकाशन के रूप में एक और नया प्रयोग है.  इस संग्रह में 15 रचनाकारों की ग़ज़लें शामिल हैं. नये-पुराने ग़ज़लकारों ने मिलकर ज़िंदगी के अनेक रंगों को अपनी ग़ज़लों में पिरोया है, जो पठनीय होने के साथ-साथ शिल्प के लिहाज से मुकम्मल हैं. उम्मीद के साथ कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा की ग़ज़लें पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होंगी. प्रस्तुत है डॉ मकीन कोंचवी का तब्सिरा :-

बाद-ए-सबा यूँ तो मुकम्मल शुमारा है मगर अगर इसके हर पहलू पर नज़रे सानी न की गयी तो ये बड़ी नाइंसाफी होगी इस सफर में जहाँ एक तरफ दिलख़ुश तारीफ भी आएगी तो वही सच बयानी के कुछ कड़वे फल भी होंगे जिन्हें माज़रत के साथ पेश करने की जसारत करने की कोशिश है. बाद-ए-सबा का सबसे नायाब कारनामा मेरी नज़र में ये है कि इसके सफर में जहाँ सिबा संदीप सिवा, प्रदीप कुमार, अभिषेक सिंह,  मनोज मनुज, बाबा बेनाम जैसे ताज़ा खिले हुए फूलो से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है, वही अब्बास सुल्तानपुरी, नितिन नायाब, संजीव कुरालिया जैसे मझे हुए फनकार भी ग़ज़ल की राहों में अपनी खुशबु बिखेरते नज़र आते है. पाठक ग़ज़ल की तपती ज़मीन पर जैसे ही गामज़न होते है तो उसे अमरीक अदब, निर्मल नदीम, गिरधारी सिंह गहलोत, निर्मला कपिला जी के साथ-साथ हिमकर श्याम और प्रमोद हंस जैसे ग़ज़ल के कद्दावर दरख्तों की खुशनुमा छाँव अपनी आगोश में समेटने लगती है और बाद-ए-सबा का कारवां अपने जाहो जलाल के साथ जलवाग़र होकर कामयाबी की मंज़िलो की तरफ गामज़न होता रहता है.  उम्मीद करता हूँ ग़ज़ल का ये तिफ्ल एक रोज़ अज़ीमुश्शान शाहकार बनकर सायकीनो के दिलो पर राज़ करेगा.

अगर इस शुमारे की मुकम्मल बात की जाये तो बेसाख्ता कहना होगा कि ये रिसाला चंद छोटी- मोटी खामियों के बाबजूद अपनी छाप आवाम के जहनो पे अक्स करने में कामयाब होगा ऐसा मेरा मानना है . अपने तफसीरी सफर के आखरी हिस्से में इंशालल्लाह इन्ही कमियों और खामियों की तरफ निशानदेही करने की कोशिश करूंगा ताकि बाद-ए-सबा के आनेवाले शुमारो में इनसे बचा जा सके और ये मजमुई तौर पर और भी रौनक आमेज़ होकर मन्ज़रे आम पर आये उम्मीद करता हूँ की मेरे इस काम को सम्पादक निर्मल नदीम भी तस्लीम करते हुए  मेरा साथ देंगे.

यक़ीनन ये शुमारा लोगो के दिलो पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होगा मग़र इसके साथ ही अगर इसकी खामियों की जानिब नज़रे सानी न की गयी तो तफ्सरी हक़ से ना इंसाफ होगी. बेशक़ निर्मल साहब न अपने काम को बखूबी अंजाम देने की ईमानदार कोशिश की है जिस के लिए मै उन्हें दिल से मुबारकबाद बाद पेश करता हूँ मग़र जाने अनजाने कुछ खामियाँ भी रह गयी है जिनकी जानिब निशानदेही करना वाजिब जान पड़ता है. अगर इस शुमारे में किसी बड़े शायर का मकाला शामिल होता तो इसमें चार चाँद लग जाते इसकी अदबी एहमियत में इज़ाफ़ा होता जो की नही है. इसी तरह किसी भी शुमारे में शायर का तार्रुफ़ उसके क़लाम से पहले होना चाहिए ताकि पढ़नेवाला उससे रू-ब-रू हो कर एक रिश्ता कायम करके पढे शुमारे का आखिर में सबका तार्रुफ़ एक साथ देने की कोई तुक समझ से परे है बाद में इसे पढना शायद ही किसी को गवारा हो.

जहाँ तक शेरी ऐतवार से देखने का सवाल है तो कुछ खामियां यहां भी नज़र आती है जिन पर ध्यान दिया जा सकता था मिसाल के तौर पर एक ही शेर दो ग़ज़लों मे उला ओर सानी बदल कर आ गया है,

आ गया हूँ तेरे निशाने पर, तीर नज़रो के अब रिहा कर दे

ये शेर ग़ज़ल संख्या एक  और दो में है. इससे बचा जा सकता था. इसी तरह खुद नदीम साहब की 9 वीं ग़ज़ल का सानी 2 बार आ गया है जिससे ग़ज़ल 11 मिसरों की बन गयी इससे बचा जा सकता था एक बड़े शायर की एक ग़ज़ल के मकते का सानी दुरुस्त नही है. अगर प्रिंटिंग मिस्टेक की खामियों की बात है तो ये कही कही पर ही है जिन्हें बर्दाश्त किया जा सकता है. आखिर में इस शुमारे के ताल्लुक से ये कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा के लोग अपनी पहली कोशिश में न सिर्फ कामयाब बल्कि पूरी आब-ताब से रोशन हुए है. ये शुमारा अपने मकसद में मुकम्मल तौर पर सफल है और लोगों के ज़हन में जगह बनाने की सलाहियत रखता है उम्मीद है तमाम लोगों के क़लाम से लुफ़्न्दोज़ होने का मौका मिलेगा. एक शेर से अपनी बात खत्म करता हूँ :

इत्तिहादी पल सभी टूटे पड़े, अब नया कोई बनाता भी नही

17974178_1273272556061041_229407182_n

✍ डॉ मकीन कोंचवी

 

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

Advertisements

मीडिया और हिंदी

hindi_diwasभारत में अनेक समृद्ध भाषाएँ हैं. इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है. हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया. क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है. हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है. देश में प्रायः सभी जगह हिंदी व्यापक स्तर पर बोली और समझी जा रही है. दक्षिण भारत हो या पूर्वोत्तर भारत हर जगह हिंदी का सहज व्यवहार हो रहा है. भाषाओं के लम्बे इतिहास में ऐसी बहुरूपी भाषा का अस्तित्व और कहीं नहीं मिलता. हिंदी बोलनेवाले लोगों की संख्या 50 करोड़ है. जनसंख्या की दृष्टि से  हिंदी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा है. यदि हिंदी समझनेवालों की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाये तो यह दूसरे नम्बर पर आ जाएगी. दुनिया में शायद ही किसी भाषा का इतना तीव्र विकास और व्यापक फैलाव हुआ होगा. हिंदी को पल्लवित-पुष्पित करने में मीडिया की महती भूमिका रही है.

हिंदी जैसी सरल और उदार भाषा शायद ही कोई हो. हिंदी सबको अपनाती रही है, सबका यथोचित स्वागत करती रही है. किसी भी भाषा के शब्द को अपने अंदर समाहित करने में गुरेज नहीं किया. अंग्रेजी, अरबी, फारसी, तुर्की, फ्रांसीसी, पोर्चुगीज आदि विदेशी शब्द हिंदी की शब्दकोश में मिल जायेंगे. जो भी इसके समीप आया सबको गले से लगाया. भौगोलिक विस्तार के अनेक जनपदों और उनके व्यवहृत अठारह बोलियों   (पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत खड़ी बोली, बाँगरू, ब्रजभाषा, कन्नौजी, पूर्वी हिंदी में अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बिहारी में मैथिली, मगही, भोजपुरी, राजस्थानी में मेवाती-अहीरवादी, मालवी, जयपुरी-हाड़ौती, मारवाड़ी- मेवाड़ी तथा पहाड़ी में पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी, पूर्वी पहाड़ी) के वैविध्य को, जिनमें से कई व्याकरणिक दृष्टि से एक-दूसरे की विरोधी विशेषताओं से युक्त कही जा सकती है, हिंदी भाषा बड़े सहज भाव से धारण करती है. हिंदी के स्वरूप के सम्बन्ध में इसलिए वैचारिक द्वैत की भावना ग्रियर्सन में जगह-जगह दिखती है. ‘भाषा सर्वेक्षण’ के भूमिका में वे लिखते हैं ‘इस प्रकार कहा जा सकता है और सामान्य रूप से लोगों का विश्वास भी यही है कि गंगा के समस्त काँठे में, बंगाल और पंजाब के बीच. उपजी अनेक स्थानीय बोलियों सहित, केवल एकमात्र प्रचलित भाषा हिंदी ही है.’ इन सारी बोलियों के समूह और संश्लेष को पहले भी हिंदी, हिंदवी, हिंदई कहा जाता था, और आज भी हिंदी कहा जाता है. बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान में पंजाब से लेकर सिंध तक हिंदी की बोली समझी जाती थी. लाहौर हिंदी का गढ़ था. वहाँ हिंदी के कई बड़े प्रकाशन भी थे. बंटवारे के बाद हिंदी की अनदेखी की गई, लेकिन हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी चैनलों के मनोरंजक कार्यक्रमों, धारावाहिकों के कारण वहाँ हिंदी का प्रभाव फिर बढ़ रहा है. नेपाल और बंगलादेश में भी हिंदी का प्रभाव है. 50 देशों में हिंदी पढाई जा रही है. 500 से ज्यादा संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई होती है. अमेरिका से लेकर चीन तक कई विश्व-विद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है. ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, युगांडा, गुयाना, फिजी, नीदरलैंड, सिंगापुर, त्रिनिदाद, टोबैगो और खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी हैं. दुबई जैसे शहरों में हिंदी बोलचाल की भाषा बन गयी है.

निर्विवाद तथ्य है कि खड़ी बोली ही आज की हिंदी है. भारत के हिंदी मीडिया की भाषा भी यही है, पत्र- पत्रिकाओं की भी और टेलीविजन और फिल्मों की भी. हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है. साहित्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की उदात्त भावना लेकर चला है तो पत्रकारिता भी इसी प्रकार के मानव कल्याण के उद्देश्य को लेकर अवतरित हुई है. वस्तुतः साहित्य जीवन की कलात्मक अभिव्यक्ति है. पत्रकारिता भी सत्यम, शिवम सुंदरम की ओर जन मानस को उन्मुख करती है. यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो पत्रकारिता उस समाज की प्रतिकृति है. हिंदी साहित्य के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालें तो हम पाएंगे कि पत्र पत्रिकाओं की साहित्य के विकास में अहम भूमिका रही है. वास्तव में भाषा के प्रचार प्रसार में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा है.

हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है. राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा. भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया. समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किये और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की. राममोहन राय ने कई पत्र शुरू किये. जिसमें महत्वपूर्ण हैं- साल 1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’. बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है. इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे. इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई. 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है. 1873 ई. में भारतेन्दु ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ की स्थापना की. एक वर्ष बाद यह पत्र  ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ नाम से प्रसिद्ध हुआ. वैसे भारतेन्दु का ‘कविवचन सुधा’ पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया था. परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ से ही हुआ. भारतेन्दु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्मा, बालकृष्ण भट्ट, दुर्गाप्रसाद मिश्र, पंडित सदानंद मिश्र, पंडित वंशीधर, बदरीनारायण, देवकीनंदन त्रिपाठी, राधाचरण गोस्वामी, पंडित गौरीदत्त, राज रामपाल सिंह, प्रतापनारायण मिश्र, अंबिकादत्त व्यास,  बाबू रामकृष्ण वर्मा, पं. रामगुलाम अवस्थी, योगेशचंद्र वसु, पं. कुंदनलाल और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास. 1895 ई. में ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. इस पत्रिका से गंभीर साहित्य समीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं. 1900 ई. में ‘सरस्वती’ और ‘सुदर्शन’ के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है. इन वर्षों में हिंदी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई. प्रारंभिक पत्र शिक्षा-प्रसार और धर्म प्रचार तक सीमित थे. भारतेन्दु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं.

सन् 1880 से लेकर, सदी के अंत तक लखनऊ, प्रयाग, मिर्जापुर, वृंदावन, मुंबई, कोलकाता जैसे दूरदराज क्षेत्रों से पत्र निकलते रहे. सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण है. 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है. वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई. उसी वर्ष छत्तीसगढ़ प्रदेश के बिलासपुर-रायपुर से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन शुरू होता है. ‘सरस्वती’ के ख्यात संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के संपादक पंडित माधवराव सप्रे थे.

पत्रकारिता का यह काल बहुमुखी सांस्कृतिक नवजागरण का यह समुन्नत काल है. इसमें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक लेखन की परंपरा का श्रीगणेश होता है. इस दौर में साहित्यिक लेखन और पत्रकारिता के सरोकारों को अलग नहीं किया जा सकता. सांस्कृतिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक सरोकार और दमन का प्रतिकार इन चार पहियों के रथ पर हिंदी पत्रकारिता अग्रसर हुईं. माधवराव सप्रे ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को ‘हिंद केसरी’ के रूप में छापना शुरू किया. समाचार सुधावर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण,बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चाँद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए देशभक्ति के जज्बे को जगाया और क्रांति का आह्नान किया.

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है. राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबा साहब अम्बेडकर, यशपाल जैसे आला दर्जे के नेता सीधे-सीधे तौर पर पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे और नियमित लिख रहे थे. जिसका असर देश के दूर-सुदूर गांवों में रहने वाले देशवासियों पर पड़ रहा था. सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही. कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रवक्ता की भूमिका निभायी. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रेमचंद, निराला, बनारसीदास चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शिवपूजन सहाय आदि की उपस्थिति ‘जागरण’, ‘हंस’, ‘माधुरी’, ‘अभ्युदय’, ‘मतवाला’, ‘विशाल भारत’ आदि के रूप में दर्ज है.

‘उदन्त मार्तण्ड’ के सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है. पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है. साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बन गया. अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आजादी के बाद आया. 1947 में देश को आजादी मिली. लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ. औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई. जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ. हिंदी पत्रों ने जहाँ एक ओर बहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त्र किया वहीं राष्ट्रभाषा को सर्वाधिक उपयोगी बनाने का सफल प्रयास किया. पत्रकारिता की शुरुआत एक मिशन के रूप में हुई थी. स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि यहां के पत्रों एवं पत्रकारों ने ही तैयार की थी. आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता देशभक्ति और समग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ जुड़ी रही. इसमे देशभक्ति के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है. स्वाधीनता से पहले देश के लिए संघर्ष का समय था. इस संघर्ष में जितना योगदान राजनेताओं का था उससे तनिक भी कम पत्रों एवं पत्रकारों का नहीं था. स्वतंत्रता पूर्व का पत्रकारिता का इतिहास तो स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य हिस्सा ही है. तब पत्रकारिता घोर संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए प्रयत्नशील थी.

90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, प्रभात खबर आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए. जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया. साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई. हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है. साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है. इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. पिछले कुछ सालों में हिंदी मीडिया ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है. प्रिंट मीडिया को ही लें, आइआरएस रिपोर्ट देखें तो उसमें ऊपर के पांच अखबार हिंदी के हैं. हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं का प्रसार लगातार बढ़ रहा है. इलेक्ट्रानिक मीडिया में हिन्दी न्यूज चैनलों की भरमार है. भारत में 182 से ज्यादा हिंदी न्यूज चैनल हैं. नई तकनीक और प्रौद्योगिकी ने अखबारों की ताकत और ऊर्जा का व्यापक विस्तार किया है.

किसी भी देश के विकास का संबंध भाषा से है. इसमें कोई संदेह नहीं कि आजकल राजभाषा हिंदी अपनी सीमाओं से बाहर आ चुकी है. यह विकास, बाजार और मीडिया की भाषा भी बन रही है. पूरे भारत और भारत के बाहर हिंदी के द्रुत प्रचार-प्रसार और विकास का श्रेय मनोरंजन चैनल, समाचार चैनल, खेल चैनल और कई धार्मिक चैनल को दिया जा सकता है. अगर किसी भी देशी-विदेशी कम्पनी को अपना उत्पाद बाजार में उतारना होता है तो उसकी पहली नजर हिंदी क्षेत्र पर पड़ती है क्योंकि उपभोक्ता शक्ति का वृहत्तम अंश हिंदी क्षेत्र में ही निहित है इसलिए उसका विज्ञापन कर्म हिंदी में ही होता है. दुनिया की एक बड़ी आबादी तक पहुंचने के लिए हिंदी की जरूरत पड़ेगी ही. हिंदी अखबारों, हिंदी पत्रिकाओं, हिंदी चैनलों, हिंदी रेडियो और हिंदी फिल्मों की जरूरत पड़ेगी ही. हिंदी माध्यमों का विकास होगा तो निस्संदेह हिंदी का भी विकास होगा.  बाजार और मीडिया का विस्तार होगा तो हिंदी भी फैलेगी और जब तक बाजार और मीडिया है तब तक हिंदी मौजूद रहेगी. बाजार और मीडिया ने हिंदी जाननेवालों को बाकी दुनिया से जुड़ने के नये विकल्प खोल दिये हैं. फिल्म, टी.वी., विज्ञापन और समाचार हर जगह हिंदी का वर्चस्व है.

वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है. हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है. इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया. हिंदी में संप्रेषण की ताकत है. हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई. चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई. गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है. इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं. सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है. 21 फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं. हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है. डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है. हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है. वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है. आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है. इस वजह से बाजार आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं. हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है.

[मित्रों, नमस्कार! आज आज का  यह दिन  मेरे  लिए  बहुत  ख़ास  है। इसके  ख़ास  होने  की  तीन वजहें  हैं पहली, आज  हिंदी (मातृभाषा) दिवस है। दूसरी वजह, आज मेरी माँ का जन्मदिन है। तीसरी और ख़ास वजह यह कि इस ब्लॉग (दूसरी आवाज़) के एक वर्ष पूरे हो गये। सभी पाठकों, ब्लॉगर बंधुओं, मित्रों, शुभचिन्तकों, प्रशंसकों, समर्थकों और आलोचकों का हार्दिक धन्यवाद। इस एक साल के सफ़र में आप सब ने जो सहयोग,प्यार और मान  दिया है, उस के लिये मैं बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ। आपकी शुभकामनाओं, स्नेह, सहयोग और मशवरों का आकांक्षी…]

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

 

आधुनिक हिंदी के जनक थे भारतेन्दु

bhartendu-harishchandra

(जन्म दिवस पर विशेष)

साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ ‘भारतेन्दु काल’ से माना जाता है. भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी के जन्मदाता और भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे. वह बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न साहित्यकार थे. उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी की वह एक साथ कवि, नाटककार, पत्रकार एवं निबंधकार थे. उन्होंने एक उत्कृष्ट कवि, नाटककार और गद्य लेखक के रूप में अप्रतिम योगदान दिया, वहीं एक पत्रकार के रूप में समस्त देश को जागरण का नवसंदेश दिया. उनका सुधारवादी दृष्टिकोण रहा था. उनके द्वारा किये गए कार्य उन रेखाओं की भांति हो गए जिन पर भारत के अनेकों महापुरुषों ने उनके बाद भारत के भविष्य की आधार-शिलाएं रखीं.

समाज सुधार से लेकर स्वदेशी आन्दोलन तक उनकी दृष्टि गयी थी. वे देश की जनता में एक नई चेतना जगाना चाहते थे जो प्रत्येक क्षेत्र में उसे सजग रखे. उन्होंने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया. साथ ही अनेक साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं. वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने ‘तदीय समाज’ की स्थापना की थी. अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुए भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा. उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें ‘भारतेंदु’ की उपाधि प्रदान की थी, जो उनके नाम का पर्याय बन गया.

उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से भारतीय समाज ख़ास कर हिंदी जनमानस में राष्ट्रीय चेतना भरने का काम किया. अपनी पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ के माध्यम से उन्होंने लेखन की दिशा में अनेक प्रयोग किये. उनके द्वारा सम्पादित ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’, ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ और ‘बाला बोधनी’ आदि पत्रिकाओं की भूमिका भी कम महत्व नहीं रखती. ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ तथा ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ ने जहाँ देश की शिक्षित और जागरूक जनता को राष्ट्रभाषा हिंदी में अपने विचारों के प्रचार करने का खुला मंच प्रदान किया, वहीं ‘बाला बोधनी’ के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को भी इस दिशा में आगे बढाने का सराहनीय कार्य किया.

उन्नीसवीं शताब्दी कि आरंभ में भारत के नवशिक्षित बौद्धिकों में एक नई चेतना का उदय हुआ था. इस चेतना को अपने देश में कहीं पुनर्जागरण और कहीं नवजागरण कहा जाता है. नवजागरण के लिए पुनरूत्थान, पुनर्जागरण, प्रबोधन, समाज सुधार आदि अनेक शब्द प्रचलित हैं. निस्स्न्देह इनमें से प्रत्येक शब्द के साथ एक निश्चित अर्थ, एक निश्चित प्रत्यय जुड़ा हुआ है. चेतना की लहर देर-सवेर कमोवेश भारत के सभी प्रदेशों में फैली. देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए जहाँ भारत माता के कुछ सपूतों ने जंग छेड़ी हुई थी,  वहीं कुछ लोग गुलाम होने के कारणों को जानकर उन्हें हटाने में जुटे हुए थे. भारतेन्दु उनमें से एक थे. उनके विचार में साहित्य की उन्नति देश और समाज की उन्नति देश और समाज की उन्नति से जुड़ी है. सामाजिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण सूत्र था ‘नारि नर सम होहिं’. यह बात रुढ़िवादियों को वैसे ही पसंद नहीं थी जैसे भारत के भारत के निज स्वत्व प्राप्त करने की बात अंग्रेजों को. भारतेन्दु दोनों के ही कोपभाजन हुए. नवजागरण काल के इस प्रणेता को आज का भारत कभी नहीं भुला सकता. वे एक व्यक्ति नहीं विचार थे. कर्म नहीं क्रांति में विश्वास रखते थे.

भारतेन्दु का मानना था कि अंग्रेजी राज ख़त्म होने पर ही देश की वास्तविक उन्नति संभव होगी. भारतेन्दु ने अंग्रेजी राज में भारत के आर्थिक ह्रास का जो विश्लेषण किया था, उससे स्वदेशी आन्दोलन की आवश्यकता प्रमाणित होती थी. उन्होंने ऐसी सभा बनाई जिसके सदस्य स्वदेशी वस्तुओ का ही व्यवहार करते थे. स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार से उद्योगीकरण में सहायता मिलेगी, यह बात वह अच्छी तरह से जानते थे. भारतेन्दु को विश्वास था कि जिस प्रकार अमेरिका उपनिवेषित होकर स्वाधीन हुआ वैसे ही भारत भी स्वाधीनता लाभ कर सकता है. भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिंदी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है. इसी भाषा में उन्होंने अपने संपूर्ण गद्य साहित्य की रचना की.  देश सेवा और साहित्य सेवा के साथ-साथ वह समाज सेवा भी करते रहे. दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे. धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु ऋणी बन गए और अल्पायु में ही उनका देहांत हो गया.

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

 

प्रयोगधर्मी रचनाकारों के ‘कलरव’ से गूंजा ‘साझा नभ का कोना’

कलरव
                    हाइकु शताब्दी वर्ष मनाने का निर्णय

माध्यम कोई भी अच्छा या बुरा नहीं होता। वह अच्छा या बुरा उसके उपयोग करने वालों से बनता है। अदबी दुनिया के लोगों को तब बहुत हैरत हुई जब आभासी दुनिया यानि फेसबुक पर लिखने वाले कुछ लोगों ने मिलकर हाइकु दिवस पर दो किताब एक साथ पाठकों के सामने रख दी। इस वाकिये का गवाह बना नई दिल्ली का हिंदी भवन। मौका था ग्यारहवाँ हाइकु दिवस समारोह का। हाइकु दिवस पर हिंदी भवन में साझा तानका-सेदोका संग्रह ‘कलरव’ का विमोचन किया गया। ‘कलरव’ में 15 रचनाकारों की काव्य रचनाएँ शामिल हैं। ‘कलरव’ के साथ 26 प्रतिभागियों का हाइकु संग्रह ‘साझा नभ का कोना’ का भी विमोचन हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ ज्ञान की देवी माँ शारदे के सामने दीप प्रज्ज्वलित कर हुआ। सरवस्ती वंदना के बाद अतिथियों का स्वागत किया गया। दोनों पुस्तकों का लोकार्पण मुख्य अतिथि कमलेश भट्ट कमल, डॉ जगदीश व्योम द्वारा किया गया। समारोह की अध्यक्षता डॉ उनिता सच्चिदानन्द जी ने की। मंच पर वर्ण पिरामिड के खोजकर्ता सुरेश पाल वर्मा जसाला एवं सुजाता शिवेन भी उपस्थित थे।  हाइकु दिवस समारोह प्रो. सत्यभूषण वर्मा की स्मृतियों को समर्पित था। कार्यक्रम का संचालन सुश्री प्रीति दक्ष तथा मनीष मिश्रा मणि ने किया। विमोचन के बाद कवियों ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर डॉ जगदीश व्योम एवं कमलेश भट्ट कमल ने ‘हाइकु कैसे लिखें जायें’ पर विस्तार से बताया।

‘कलरव’ का प्रकाशन लखनऊ के OnlineGatha-The Endless ने और ‘साझा नभ का कोना’ का प्रकाशन इलाहबाद के रत्नाकर प्रकाशन ने किया है। दोनों संग्रहों के लिए ख़ास शब्दों का चयन किया गया था, रचनाकारों को उन्हीं शब्दों पर अपनी रचना लिखनी थी। जहाँ ‘कलरव’ के लिए कजरी, कलरव, कला, कलोल, कान्त, कांता, कान्ति, काम्य, क्लिन्न, कुठार, कुंठ, कुण्ड, कुन्तल, कुररी, कुहक, केलि, कुञ्ज, कोपल, कौमुदी, कौतुक और कौशेय शब्दों  का चयन किया गया था वहीं ‘साझा नभ का कोना’ के रचनाकारों को नभ, प्रार्थना, क़लम, निशीथ, चिहुंका मौन, धूप-छाँव, अँजुरी, स्वेद, उड़ान, ओस, कल्पना, कर्म, दहेज, मन पखेरू, अतिथि, माँ, दया, स्वप्न, शून्य, बीज, प्रतीक्षा, शृंगार, तृषा आदि शब्दों पर लिखना था।

इस कार्यक्रम की सबसे ख़ास बात यह रही कि इस के सभी प्रतिभागी फेसबुक के आभासी मंच से निकलकर पहली बार वास्तविकता के धरातल पर एक-दूसरे से रूबरू हुए। फेसबुक पर एक जैसी सोच रखनेवाले लोग मिले, एक समूह बनाया, संग्रह की योजना बनायी और उसे मूर्त रूप दिया। इन दोनों की किताबों में देश भर से हाइकु लिखने वाले 30 लेखकों के कृतियों को स्थान दिया गया है। एक में हाइकु तो दूसरे में तानका और सेदोका। दोनों संग्रह का स

hindi bhawan
अथ से इति -वर्ण स्तम्भ निकलने की तैयारी

म्पादन पटना की विभा रानी श्रीवास्तव ने किया है। विभा श्रीवास्तव ने अपने सम्पादकीय अनुभव सबके साथ बाँटे। उन्होंने बताया कि अब 51 लोगों के साझा संग्रह की ‘अथ से इति – वर्ण स्तम्भ’ निकालने की योजना है, जिसकी तैयारी चल रही है। इस संग्रह में सारी रचनाएँ वर्ण पिरामिड शैली में होंगी। वर्ण पिरामिड काव्य की नव विधा है। प्रथम पंक्ति में -एक , द्वितीय में -दो , तृतीया में- तीन, चतुर्थ में -चार, पंचम में -पांच, षष्ठम में- छः, और सप्तम में -सात वर्ण होते हैं। इसमें केवल पूर्ण वर्ण गिने जाते हैं। अर्द्ध -वर्ण नहीं गिने जाते। यह केवल सात पंक्तियों की ही रचना है इसीलिए सूक्ष्म में अधिकतम कहना होता है। किन्ही दो पंक्तियों में तुकांत मिल जाये तो रचना और निखर जाती है।

 

फेसबुक और ट्वीटर को लेकर आम धारणा यह है कि यह टाइम पास करने, भड़ास निकालने या व्यर्थ बहसबाजी करने का एक आभासी मंच है। गौर से देखा जाए तो आभासी दुनिया वास्तविक दुनिया का सच्चा प्रतिरूप है। आभासी और वास्तविक दुनिया में कोई फर्क नहीं हैं। शायद इस वजह से साहित्य से जुड़े लोग और लेखक फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय हो रहे हैं। फ़ेसबुक, ट्वीटर, ब्लॉग जैसे प्लेटफॉर्म व्यक्ति को अभूतपूर्व स्वाधीनता देते हैं। किसी की कोई कविता या कहानी अगर अखबार या पत्रिका में नहीं छपती है तो वो उसे अपने ब्लॉग या फेसबुक जैसे माध्यमों पर खुद छाप सकता है और उसे आसानी से अपने पाठक समुदाय तक पहुंचा सकता है। ये तकनीक का एक सकारात्मक इस्तेमाल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि संचार के साधनों की सहज उपलब्धता व सूचना के समान वितरण  की प्रक्रिया ने बहुत सारे लोगों को अपनी संवेदना व सोच को साझा करने का एक मंच फेसबुक और ब्लॉगिंग के माध्यम से उपलब्ध कराया है।  फेसबुक और ब्लॉगिंग को लेकर नामचीन साहित्यकारों और पत्रिकाओं को प्राय: यह शिकायत रहती है कि वहाँ गंभीरता नहीं व त्वरित प्रकाशन व आत्मालोचन, आत्म- अनुशासन की शिथिलता के कारण रचनाएँ  स्तरीय नहीं पाती हैं। ‘कलरव’ और ‘साझा नभ का कोना’ इस मिथ और शिकायत को ख़त्म करने में सफल रही हैं।

दोनो संग्रहों के रचनाकार फ़ेसबुक और हिन्दी ब्लॉग की इस आभासी दुनिया से निकले हैं। संपादक विभा रानी श्रीवास्तव का कहना है कि किताब छपवाने का इरादा मजबूत इसी वजह से हुआ था कि हम फेसबुक या ब्लॉग पर जो लिखते हैं वो आम पाठकों के पहुंच में नहीं है। भारत में काव्य की यह विधा यानि हाइकु रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लायी गयी और प्रोफेसर सत्यभूषण वर्मा द्वारा विस्तारित की गयी। बंगला में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने ‘जापान–यात्री’ में हाइकु की चर्चा करते हुए उदाहरण रूप में कुछ हाइकु–रचनाओं के बंगला अनुवाद भी दिए। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सन् 1916 में पहली बार हाइकु की चर्चा की थी। उस हिसाब से 2016 हाइकु शताब्दी वर्ष है। समारोह में वर्ष 2016 को हाइकु शताब्दी वर्ष के रूप में पूरे वर्ष भर मनाने का आह्वान किया गया, जिसका सर्वसम्मति से स्वागत हुआ। शताब्दी दिवस समारोह में 100 हाइकुकारों को एक किताब में सहयोगाधार पर शामिल करने तथा विमोचन पर एकत्रित होकर इसे एक यादगार उत्सव के रूप में मनाने की योजना है। इस में जो शामिल होना चाहें, विभा रानी श्रीवास्तव से इस आईडी  vrani.shrivastava@gmail.com  पर संपर्क कर सकता है।

17 अक्षरी हाइकु लेखन की जापानी विधा है। यह विश्व की सबसे संक्षिप्त कलेवर वाली काव्य शैली है। 31 अक्षरी तानका और 38 अक्षरी सेदोका हाइकु का ही वृहद रूप है। हाइकु में जहां तीन लाइन में सत्रह शब्दों को शामिल किया जाता है, जिनकी वर्ण क्रम पाँच, सात, पाँच होती है वहीं तानका में यह क्रम पाँच, सात, पाँच, सात, सात तथा सेदोका में पाँच, सात, सात, पाँच, सात और सात के क्रम में चलता है। हाइकु हिन्दी में भी लिखे जा रहे हैं और भारतीय भाषाओं में भी। कोई हाइकु को प्रकृत्ति काव्य मानता है, तो कोई इसे नीति काव्य की संज्ञा देता है। अधिकांश ने इसे प्रतीक–काव्य के रूप में ग्रहण किया है। हाइकु शुद्ध अनुभूति की‚ सूक्ष्म आवेगों की अभिव्यक्ति की कविता है। 1959 में अज्ञेय के कविता–संग्रह ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ में हाइकु के अनुवाद भी हैं और हाइकु से प्रभावित कुछ स्वतन्त्र रचनाएँ भी।

दोनों संग्रह एकांत में बैठ पढ़ने की माँग करते हैं। कम शब्दों की बाध्यता होने के बाद भी संग्रह की रचनाएँ हमारे सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करती हैं। इनमें प्रकृति का रंग भी है और कई तरह की बेचैनी भी। यह बेचैनी हाइकु रचने की और सार्थक कुछ कह पाने की भी है। इन कविताओं में अलग ढंग की परिपक्वता है जो आगे के लिए उम्मीद जगाती हैं।

✍ हिमकर श्याम

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/