Category: विविधा

यादों के उजाले

सुना है ‘बद्र’ साहब महफिलों की जान होते थेbashir badr

बहुत दिन से वो पत्थर हैं, न हंसते हैं न रोते हैं

डॉ. बशीर बद्र की मौजूदा हालत को यह शेर बखूबी बयाँ करता है। अवाम के महबूब शायर की कलम खामोश है। लंबे अरसे से शायर खुद तन्हा और बीमार है। अब वह शेर सुनाते नहीं, सुन लेते हैं। व्हीलचेयर पर बैठे बद्र साहब के सामने जब कोई उनका ही लिखा शेर बोलता है तो कुछ को पहचान लेते हैं, कुछ शेरों से अनजान रहते हैं। यादों के उजालों को साथ रखने की बात कहने वाले शायर को कुछ भी याद नहीं। शायरी से उन्हें अब ही बेहद प्यार है। भले ही याददाश्त उनका साथ छोड़ गई है, लेकिन कोई शेर पढ़ते ही उनके चेहरे पर ख़ुशी आ जाती है। फिलहाल भोपाल के ईदगाह हिल्स में मौजूद घर में बशीर साहब अपनी बेगम राहत बद्र और बेटे तैयब के साथ रहते हैं। तैयब आईआईटी मद्रास से पास आउट हैं और अपने पिता की देखभाल के लिए फिलहाल भोपाल में रहते हैं।

आधुनिक ग़ज़ल का पर्याय बन चुके बशीर बद्र आज के बेहद लोकप्रिय और सम्मानित शायर हैं। जब समकालीन ग़ज़ल की बात चलती है तो बशीर बद्र का नाम अनायास जुबान पर आ जात है। बशीर बद्र की सुख़नगोई का हर कोई मुरीद है। उनके कलाम जितने सीधे तरीके से लिखे जाते हैं उतनी ही आसानी से वो दिल को छू भी जाते हैं। उनके कालजयी शेर आम लोगों के बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। अयोध्या में 15 फरवरी 1935 को पैदा हुए बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की। कहा जाता है कि उन्होंने 7 बरस की उम्र से ही शेरो-शायरी शुरू कर दी थी। उन्हें 1999 में पद्मश्री और उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। उनकी कविताएं और शेर अंग्रेजी और फ्रेंच में भी अनुवाद किए गए हैं।  परवरदिगार उनको अच्छी सेहत और लंबी उम्र अता करे।

ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएंगे
रोयेंगे बहुत लेकिन आंसू नहीं आयेंगे

✍ हिमकर श्याम

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ग़ज़ल के दीवानों को ग़ज़ल के दीवाने की सौग़ात

neerajगज़ल अपने दीवानों की वजह से ज़िंदा है। ग़ज़ल के प्रति गज़ब की दीवानगी रखने वाले और मुझे अनुजवत स्नेह देनेवाले नीरज गोस्वामी का नाम ब्लॉग जगत के सबसे लोकप्रिय शायरों में शुमार है. उनकी नई  किताब ’51 किताबें ग़ज़लों की’ पिछले दिनों मिली. इस पुस्तक में उन्होंने 51 नए, पुराने ग़ज़लकारों के ग़ज़ल संग्रहों की समीक्षा की है. इससे पहले उनकी किताब ‘101 किताबें ग़ज़लों की’ आयी थी. इन किताबों के माध्यम से उन्होंने समकालीन ग़ज़ल संग्रहों व इन के शायरों पर खुल कर चर्चा की है. संकलित किताबों के शायरों के साहित्यिक व व्यक्तिगत जीवन के विषय में भी रोचक जानकारियाँ दी गईं हैं. इन किताबों की समीक्षा इतनी खूबसूरती से की गई है कि पाठकों के दिल में किताब पढ़ने की ख़्वाहिश जाग जाती है. ग़ज़लों का बेहतरीन संग्रह और साहित्य/ब्लॉग जगत के 152 ग़ज़लकारों को एक साथ प्रस्तुत करनेवाला दोनों किताब अनूठा और संग्रहणीय है. लेखक ख़ुद सधे हुए ग़ज़लकार हैं. इनके अशआर चमत्कृत करनेवाले होते हैं. ग़ज़ल के दीवाने का ग़ज़ल के दीवानों को यह किताब समर्पित है.

ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य में जो सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है, उसके पीछे ऐसे ही दीवानों की दीवानगी शामिल रही है. पिछले कई सालों से अनवरत शायरी के लिए वह काम कर रहे हैं जिसका कोई सानी नहीं है. हालाँकि वह कहते हैं कि लेखन वह स्वान्तः सुखाय के लिए करते हैं, लेकिन वह ग़ज़ल प्रेमियों पर बड़ा उपकार कर रहे हैं. इनकी लेखन शैली पाठकों को बहुत पसंद आएगी, यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ. पिछले तीन दशकों से ग़ज़ल ने बड़ी मजबूती से हिंदी साहित्य में अपने पैर जमाये हैं. इस दौरान कई बेहतरीन ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए. इनमें कई ग़ज़लकार ऐसे भी हैं जो कम चर्चित होते हुए भी उम्दा लिख रहे हैं. संकलन में उनके संग्रहों का भी जिक्र किया गया है. अपने ब्लॉग पर 2008 में लेखक ने ‘किताबों की दुनिया’ नाम से श्रृंखला शुरू की थी, जो अब  किताबों के रूप में पाठकों के समक्ष है. हर सोमवार को नियमित रूप से वह किसी शायर की एक किताब पर बेहतरीन समीक्षा करते हुए सके चुनिन्दा अंश अपने ब्लॉग पर साझा करते हैं. इस श्रृखला के तहत अब तक 166 किताबों की चर्चा की जा चुकी है. ‘101 किताबें ग़ज़लों की’ का प्रकाशन जनवरी, 2016 में किया गया था, इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आठ महीने के भीतर ही इसका दूसरा संकलन छापना पड़ा. सितम्बर, 2016 में दूसरा संकलन बाज़ार में आया. 51 किताबें ग़ज़लों की और 101 किताबें ग़ज़लों की को शिवना प्रकाशन, सीहोर ने प्रकाशित किया है. दोनों किताबों के माध्यम से पाठकों को बेहतरीन ग़ज़ल संग्रहों को देखने-समझने को मिलेगा. दोनों किताबों के लिए नीरज भैया को बहुत बहुत मुबारकबाद. साथ ही उनका शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेजी.

51 किताबें ग़ज़लों की (पुस्तक चर्चा)
प्रथम संस्करण: 2018 (हार्ड बाउंड)
पेज- 256, मूल्य- 300 रुपये
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टेण्ड, सीहोर (म.प्र.)- 466001
मो- 9806162184

मेल- shivna.prakashan@gmail.com

✍ हिमकर श्याम

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144 साल के इतिहास का गवाह संत पॉल चर्च

st paul churchरांची के बहू बाजार स्थित 144 वर्ष पुराना संत पॉल कैथेड्रल चर्च आज भी अपने इतिहास की गौरवगाथा बयां करता है. स्थापत्य कला के लिहाज से जितना अद्भुत यह चर्च है, इसका इतिहास भी उतना ही अद्भुत है. पहले यहां एक झोपड़ी थी, जिसमें आराधना होती थी. फरवरी 1870 में पक्का आराधनालय बनाने का निर्णय लिया गया. जनरल रॉलेट के द्वारा चर्च की रूपरेखा तैयार की गयी थी. चर्च की नींव छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर आयुक्त ईटी डॉलटन द्वारा 1 सितंबर 1870 ई में रखी गयी. तीन साल में चर्च बन कर तैयार हुआ. शनिवार, 9 मार्च 1873 को नवनिर्मित महागिरजाघर का विधिवत संस्कार एवं उद्घाटन हुआ.  इस कैथेड्रल चर्च का नामकरण संत पॉल के नाम पर किया गया है. हर रविवार को यहां हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा में प्रार्थना होती है. विश्वासियों को यहाँ आकर एक सुकून की अनुभूति होती है.

रांची के लोगों ने दिए थे 4 हजार रूपये : चर्च का निर्माण 26 हजार रुपए में हुआ था. आर्थर हेजोर्ग ने इस कैथेड्रल चर्च के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. रांची के लोगों ने चर्च के लिए 4 हजार रूपये दिए थे. जनरल एडवर्ड टी डॉल्टन, बिशप रॉबर्ट मीलमैन और भारत सरकार की ओर से भी आर्थिक सहयोग मिला था. डॉलटन ने 3000 और मीलमैन ने 2000 रूपये दिए थे. चर्च के निर्माण की तिथि, कुल अनुमानित लागत तथा दानदाताओं की एक सूची बोतल में बंद कर चर्च के नींव में डाल दी गई थी. 10 मार्च , 1873 ई. को बिशप मीलमैन के द्वारा पांच भारतीय पुरोहितों की नियुक्ति की गयी. मीलमैन कोलकाता के बिशप तथा भारत, श्रीलंका और वर्मा के एंग्लीकन मेट्रोपोलिटन थे. छोटानागपुर को डायसिस के रूप में संगठित करने में उनका अहम योगदान था. चर्च के प्रथम बिशप जेसी हिटली और प्रथम भारतीय पुरोहित रेव्ह. विलियम लूथर डेविड सिंह थे. 1980 तक छोटानागपुर में भारतीय पुरोहितों के साथ इस चर्च की सदस्यता लगभग 10600 लोगों की हो गयी.

ख़ूबसूरत स्थापत्य : यह ऐतिहासिक चर्च स्थापत्य कला का एक ख़ूबसूरत नमूना है जो पतले सीधे खड़े खम्भे, मेहराब और सम्भार के सहारे सुसज्जित है. इसकी ऊँचाई 120 फीट है. शीर्ष पर 10 फीट ऊँचा, 2 फीट मोटा पत्थर का स्तम्भ बैठाया गया है. शीर्ष पर ही एक 5 फीट की छड़ है, जिसपर तीन फीट का तीर है जो क्रूस के रूप में वायु की दिशा के अनुरूप घूमता रहता है. छत लकड़ी की है, खिड़कियाँ कांच की हैं. प्रवेश द्वार से अंदर आने पर दाहिने ओर बपतिस्मा कुंड संगमरमर पत्थर से निर्मित है. बच्चों का बपतिस्मा चर्च के अन्दर ही होता है. चर्च में एक सभागृह और संगमरमर पत्थर से बनी वेदी है. वेदी के ऊपरी भाग को आर्क का आकार दिया गया है. वेदी में स्थापित कैथेड्रल चर्च की विशेषता का प्रतीक है. कैथेड्रल लैटिन शब्द कैथेड्रा से निकला है, जिसका अर्थ है बिशप का सिंहासन. यह छोटानागपुर का मुख्य ड़ायसिस है. बिशप इनका प्रमुख होता है. वेदी से नीचे पुरहोहितों के लिए कुर्सियां रखी गईं हैं. चर्च के अंदरूनी हिस्से में यूरोपीय शैली की पेंटिंग्स लगी हैं, जिसमें ईसा मसीह के जीवन की झलकियों के सजीव चित्र उकेरे गये हैं. चर्च के अंदर एक घेरा बना है, जहां विश्वासी वेदी के सामने घुटना टेकते हैं. पहले यह पीतल का था. 1980 में पीतल का घेरा चोरी होने के बाद उस स्थान पर स्टील का घेरा लगा दिया गया. चर्च परिसर में लोहे की एक खूबसूरत नाव बनी हुई है. यह उन मिशनरियों की याद में बनाया गया है, जो 18 वीं सदी में भारत आए थे. चर्च की इमारत के अंदर बिशप दिलवर हंस और बिशप जेड जे तेरोम की कब्रें हैं. चूंकि बिशप का जीवन मानवता की सेवा के साथ प्रभु की आराधना में गुजरता है, इसलिए उनका पार्थिव शरीर का दफन संस्कार कैथेड्रल में करने की परंपरा है.

रानी पाइप ऑर्गन : इस गिरिजाघर में दो हजार साल पहले का यूनानी वाद्य यंत्र भी है, जिसे 1860 में लाया गया था. इसे रानी पाइप ऑर्गन कहा जाता है. ऑर्गन में लगी पाइप बांसुरी की तरह ही है. 56-56 की संख्या में की-बोर्ड हैं. इससे 11 तरह की धुनें निकलती हैं. इसे बजाने में हाथ-पैर दोनों का उपयोग होता है. पाइप आर्गन चर्च की शान है, पहचान है. इसे उपासना वेदी के दाहिने ओर रखा गया है. चर्च में दो घंटियाँ हैं. एक बड़ी है, दूसरी छोटी. इन्हें क्रमशः अनुष्ठान से आधे घण्टे पूर्व और अनुष्ठान के शुरू होने पर बजाया जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि जब जनसंख्या कम थी, इतने मकान नहीं थे तो इस पाइप ऑर्गन की मधुर धुन और चर्च की घंटी आसपास के इलाकों में सुनी जा सकती थी.

✍ हिमकर श्याम

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गोथिक शैली में बना है झारखण्ड का पहला चर्च

रांची के मुख्य मार्गGEL Church पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है. स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है. गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर की भव्य इमारत देखने लायक़ है.  इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है. इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे. इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ. 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की. ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है. ईसाई धर्मावलंबियों को  यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है.

चर्च शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है ‘प्रभु का’.  चर्च के अतिरिक्त कीलिसिया शब्द भी चलता है. यह यूनानी बाइबिल के एक्लेसिया शब्द का विकृत रूप है, बाइबिल में इसका अर्थ है किसी स्थान विशेष अथवा विश्व भर के ईसाईयों का समुदाय. बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा. ईसाई मिशनरियों का झारखंड  पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है. ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं. भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च. गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जमर्नी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था. इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनायी थी. उन्होंने पैस्टर और उनके मिशनरी साथियों ऐमिलो स्कॉच, अगस्त ब्रॉट और थियोडर जैक को वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था. लेकिन तत्कालीन कारणों से चारों मिशनरी यहाँ आ गये. इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था.  रांची के गोस्सनर कंपाउंड में कैंप करने के बाद चारों मिशनरियों ने धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया. छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी.

वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च. 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ. इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया. जीईएल चर्च छोटानागपुर असम के पूर्वज विश्वासियों ने 10 जुलाई 1919 को ऑटोनोमी के नाम पर जीईएल चर्च और मसीही समाज की जिम्मेवारी ली. पूर्वजों ने यह घोषणा तब की, जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया. तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया.

जेईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही  अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है. चर्च द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं. घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है. झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है. ‘घरबंधु’  पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही. पाक्षिक ‘घरबंधु’, अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है. घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं. जेइएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है. इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे.

जीइएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है. यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है. इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है. मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ. वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया. बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है. धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई. अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है.  जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है. देश के 12 राज्यों में जीइएल चर्च की 1896 शाखायें है. जीइएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है.

जीइएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल)  व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार  1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी. 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी. संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे. 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे. छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही.

ईसाई  मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ. यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था. लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे. यहां के आदिवासियों की अज्ञानता और गरीबी दूर करने की कोशिश की. इसके लिए उनकी भाषा, संस्कृत और परंपरा को अपनाया. रांची शहर के चारों ओर इनके सेवा कार्य क्षेत्रों का विस्तार होता गया. मिशनरियों ने प्राथमिकता के साथ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प लिया. शिक्षा और स्वास्थ्य की समर्पित सेवा लोगों के बीच दी. तब आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी. जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था. बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे. आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे.  आदिवासियों को मिशनरियों में शोषण से मुक्ति का मार्ग नजर आने लगा़. इससे आदिवासी समुदाय का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा ईसाईयत की ओर आकृष्ट हुआ.

ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस चर्च ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के  समय इस चर्च पर भी हमला हुआ था. इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से गोले दागे गए थे, किन्तु कोई विशेष क्षति नहीं हुई.  हमले के निशान आज भी चर्च भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं. क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था. विषम परिस्थिति से बचने के लिए चर्च के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी. उस वक़्त चर्च के हारेलोहर साहब ने अपनी  बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था.

 

✍ हिमकर श्याम

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आफ़त की बाढ़

इन दिनों देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति गंभीर है, जिससे लाखों लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. बाढ़ ने बुरी तरह से कहर ढाया है. दिनोदिन इसके और भयावह होने की आशंका है. बाढ़ ने हमारे आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल खोलकर रख दी है. नेपाल और पड़ोसी floodsराज्यों से  आने वाले पानी से प्रतिवर्ष तबाही होती है. साल बदलते जाते हैं, लेकिन बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम जैसे राज्यों में बाढ़ से तबाही की कहानी नहीं बदलती.  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान यह स्वीकार करता है कि विनाशकारी बाढ़ के मुख्य कारण भारी वर्षा, जलग्रहण की दयनीय दशा, अपर्याप्त जल निकासी एवं बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाये गये बांधों का टूटना है. विडंबना है कि इस संकट का स्थायी और सार्थक समाधान अब तक नहीं निकल पाया है. खबरों के अनुसार सिर्फ़ बिहार के 18 जिलों  में बाढ़ से 440 लोगों की मौत हो चुकी है. एक करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है.

पश्चिम बंगाल के 14 जिले बाढ़ ग्रस्त है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के दर्जन भर जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, असम के 32 में से 25 जिले बाढ़ग्रस्त हैं. तटबंध के टूटने से गांव के गांव जलमग्न हो गये हैं. हज़ारों लोग विस्थापित हो गये हैं. लाखों एकड़ खेत पानी में डूब गए हैं और फसलें बर्बाद हो गई हैं. जगह-जगह सड़कें तालाब में बदल गई हैं. यातायात रुक गया है. न जाने कितने मवेशी बाढ़ में बह गये हैं. बाढ़ से होने वाली बर्बादी को रोकने के लिए सरकारें तटबंधों को अंतिम हल मान लेती हैं. लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे तटबंधों का विस्तार हुआ है, धारा बाधित होने से नदियां बेलगाम हुर्इं और इसी के साथ बाढ़ की समस्या भी बढ़ती गई है. जल प्रबंधन में लगातार हो रही चूक से बाढ़ का संकट बढ़ा है.

उत्तर बिहार में बहने वाली लगभग सभी नदियाँ जैसे-घाघरा, गंडक, बागमती, कमला, कोसी, महानंदा आदि नेपाल के विभिन्न भागों से आती हैं और खड़ी ढाल होने के कारण अपने बहाव के साथ अत्यधिक मात्रा में गाद लाती हैं, वह मिट्टी-गाद फरक्का जाते-जाते रुक जाता है, क्योंकि नदी का स्वाभाविक प्रवाह वहाँ रुक जाता है. फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से इसमें गाद जमा होने की दर कई गुना बढ़ गई है. गाद और मिट्टी बैराज के पास जमा होता है. यही गाद बिहार में बाढ़ का कारण बनता है. बैराज बनने के बाद कभी भी यहाँ से गाद नहीं निकाला गया. आजादी के बाद जब इस बैराज पर चर्चा हुई तब पश्चिम बंगाल सरकार के लिए काम कर रहे अभियंता प्रमुख कपिल भट्टाचार्य ने इसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट दी थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि फरक्का बैराज के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर, पटना, बरौनी, उत्तरी मुंगेर जैसे इलाके बाढ़ के पानी में डूब जाएंगे. वहीं, बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) मे सूखे की स्थिति पैदा होगी. लेकिन, तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने उनकी बात को नज़रअंदाज कर दिया.

बिहार का लगभग 73 प्रतिशत भू-भाग बाढ़ के खतरे वाला इलाका है. पूरे उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ के प्रकोप की आशंका बनी रहती है. बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष बिहार बर्बादी, अनैच्छिक विस्थापन और बड़े पैमाने पर जान-माल, पशु, फ़सल एवं इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान झेलता है. फरक्का बैराज बनने का हश्र यह हुआ कि उत्तर बिहार में गंगा किनारे दियारा इलाके में बाढ़ स्थायी हो गयी. जब यह बैराज नहीं था तो हर साल बरसात के तेज पानी की धारा के कारण 150 से 200 फीट गहराई तक प्राकृतिक  रूप से गंगा नदी की उड़ाही हो जाती थी. जब से फरक्का बैराज बना सिल्ट(गाद) की उड़ाही की यह प्रक्रिया रुक गई और नदी का तल ऊपर उठता गया. सहायक नदियाँ भी बुरी तरह प्रभावित हुईं हैं. जब नदी की गहराई कम होती है तो पानी फैलता है और कटाव तथा बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता को बढ़ाता जाता है.  नदियों पर बने बांध-बराजों के कारण नदी में गाद जमा होने, मिट्टी के टीले बनने, तटबंधों और कगारों के टूटने जैसी समस्याओं का समाधान जरूरी हो गया है. फरक्का बैराज, गंगा जल मार्ग और कोसी हाइ डैम जैसी परियोजनाओं को रोक कर नदी कि अविरल धारा को पुनः स्थापित करना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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पानी : समाज, सरकार और संकल्प

आज नये साल का पहला दिन है,  कोई संकल्प लेने का दिन है। क्यों न इस साल की शुरुआत हम पानी पर  चिन्तimg-20161226-wa0082न के साथ करें और इसे बचाने का संकल्प लें। साथ ही नदी-तालाबों को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प भी लें। जल संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सभ्यता काल से ही जल प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जल जीवन का पर्याय है, जल के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिकी विज्ञान लेखक,लोरान आइजली ने कहा था कि ‘हमारी पृथ्वी पर अगर कोई जादू है,तो वह जल है।’ नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं लेकिन हम नदियों को इसके बदले कुछ लौटाते नहीं हैं। तमाम जल समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है और हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है, जिससे प्रदूषण और जल-संकट की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है, परंतु दुर्भाग्य से इसका अल्पांश ही पीने लायक है। पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के एकजुट होकर प्रयास किया जाये।

आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। 2030 तक पूरी दुनिया में जरूरत के अनुपात में 40 प्रतिशत पानी कम हो जायेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत में जल भण्डार वाले इलाकों समेत कई राज्यों में भूजल का स्तर बहुत नीचे पहुँच चुका है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान समेत कुछ अन्य राज्यों में भूजल का सर्वाधिक दोहन हो रहा है। उत्तर-पश्चिमी , पश्चिमी और प्रायद्विपीय इलाकों की स्थिति भयावह होती जा रही है। 54 फीसदी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है। शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित ढेरों समस्याओं को जानने-समझने  के बावजूद हम जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हैं । नदियाँ, तालाबें एवं झीलें अमूल्य धरोहरें हैं।  इन्हें बचा कर रखना हमारा दायित्व भी है। पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर विशेष ध्यान देना होगा।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र रफ्तार,बढ़ता प्रदूषण तथा जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। नदियों के किनारों पर व्यवसायिक गतिविधियाँ बढ़ जाने से नदियों के जीवतंत्र को क्षति पहुँची है। गंगा के किनारे हज़ारों फैक्ट्रियां हैं जो न केवल इसके जल के अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं, बल्कि उसमें भारी मात्रा में प्रदूषित कचरा भी छोड़तीं हैं।  गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना अरबों लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है जो गंगा में बहा दिया जाता है। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से इस पतित पावनी नदी के अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा किनारे 118 शहर बसे हैं, जिनसे रोज करीब 364 करोड़ लीटर घरेलू मैला और 764 उद्योगों से होने वाला प्रदूषण गंगा में मिलता है। सैकड़ों टन पूजा सामग्री गंगा में फेंकी जाती है। यमुना, दामोदर, गोमती और महानन्दा का हाल भी इससे अलग नहीं है। नदियों की अपनी पारंपरिक गति और दिशा को इस तरह प्रभावित किया जायेगा, तो जाहिर है कि इससे जल-संकट की स्थिति बढ़ती ही जायेगी। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,एवं जल के अन्य स्रोत सूखते होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है।

भारतीय उपमहाद्वीप में बहने वाली प्रमुख नदियों में से लगभग 15 प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, महानदी, तुंगभद्रा इत्यादि न जाने कितने वर्षों से भारत की पावन भूमि को सिंचित करती चली आ रही हैं। ये नदियाँ वाकई भारत एवं भारतीय लोगों की जीवन-रेखा सदृश्य हैं। इनमें गंगा मात्र नदी नहीं हैं, वह संस्कार और संस्कृति भी है। गंगा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गंगा को जीवन देना आसान काम नहीं है। जल की बर्बादी रोकने के लिए रिवर और सिवर को अलग-अलग करना होगा।  कूड़े-कचरे के कारण किसी समय स्वच्छ जल से भरी नदियों की स्थिति दयनीय हो गई है। इस संबंध में सरकार भी गंभीर नहीं है। सरकार को इस दिशा में विशेष योजना बनाकर कार्य करना होगा। जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है।

जल पुरुष राजेंद्र सिंह के अनुसार केंद्र की नई सरकार ने गंगा नदी के पुनर्जीवन की योजना बनाई है, लेकिन हमारी समझ है कि इसके पूर्व गंगा एक्शन प्लान इसलिए सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसमें आम लोगों की भागीदारी नहीं थी। लोगों को लगा कि की यह तो सरकार का काम है, जबकि 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग, प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियां साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं। लोग, नदियों को इस स्थिति में रखने को प्राथमिक जिम्मेदारी मानते थे। गंगा तो मां मानी जाती है। लोगों में फिर से यही सोच विकसित करनी होगी। नदियों के किनारे बसे गांव का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर उतर आए, तो नदियों भविष्य बेहतर हो सकता है। राजेंद्र सिंह रविवार को पटना में ख्यात पर्यावरणविद गांधीवादी अनुपम मिश्र को समर्पित अक्षधा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘पानी : समाज और सरकार’ विषयक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस संगोष्ठी में सिर्फ एक ही बात की गूंज थी कि कैसे स्कूलों सामुदायिक संगठनों व आम नागरिकों के बीच जल साक्षरता बढाकर इन्हें जागरूक किया जाय। राजेंद्र सिंह ने केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा से कहा कि अगर वाकई आगे की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है, तो देश में जल साक्षरता शुरू करानी होगी। बच्चों को बचपन से ही स्कूलों में पानी की महत्ता, इसके संरक्षण के बारे में पूरा-पूरा बताना होगा। चूंकि अब इस मोर्चे पर दूसरा उपाय बच नहीं गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने इससे पूरी सहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने भारतीय जीवन, संस्कृति में नदियों की अहमियत को बताया। उन्होंने कहा कि नदियों के बारे में समाज को भी अपनी ड्यूटी समझना जरूरी है।

अनुपम मिश्र जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद थे। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर  में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ है। इसी तरह  उतराखंड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। पानी पर एक अरसे से काम कर रहे मेरे पत्रकार मित्र पंकज मालवीय का मानना है कि नदियों को उसके मूल नैसर्गिक रूप में वापस लाया जाना बेहद जरूरी है।  बिना जन-भागीदारी के गंगा और दूसरी नदियों को गंदा होने से नहीं रोका जा सकता। गंगा समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए जरूरी है कि बाँधों, गादों और प्रदूषण से इन्हें मुक्त कराना होगा।

गंगा की सफाई के अब तक सारे प्रयास असफ़ल हुए हैं। कानून और नियम तो बनाये गए , लेकिन उनको लागू करने में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। नमामि गंगे योजना के नाम से गंगा जी को स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाई गई योजना कोई पहली योजना नहीं है। गंगा प्राधिकरण की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि गंगा नदी को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाया जा सके। परंतु केवल इस पावन उद्देश्य हेतु सैकड़ों करोड़ का बजट आबंटित कर देने से  कुछ भी हासिल होने वाला नहीं।  गंगा की स्वच्छता का कोई भी अभियान इसके किनारे रहने वाले लोगों को उससे जोड़े बिना मुमकिन नहीं है। जब तक इस विषय पर लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

तेजी से शहरों का विकास हो रहा है। अंधाधुंध विकास. पेड़ों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। तालाबों को पाटकर शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं। शहर का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है। नदी तटों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता दोनों का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। पानी के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव है। इसमें विशेष तौर से निर्धनतम समुदाय, उनमें भी महिलाओं में जागरूकता की अत्यधिक कमी देखने को मिलती है। यह अभियान तभी सफल होगा, जब जन-भागीदारी हो। हम सभी का योगदान हो, इसके लिए पहले पानी के संकट की भयावहता को समझना होगा। पानी पर बात करने को सभी तैयार रहते हैं, किन्तु पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का संरक्षण संभव नहीं है। किनारों पर अवस्थित गाँवों में रहने वाले लोग संकल्प लेना होगा कि वे नदियों के जल को प्रदूषित नहीं करेंगे।  जल प्रकृति का एक अनिवार्य घटक है। जल से ही जीवन है। इस अनमोल प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु सभी को संगठित होकर अपना अमूल्य योगदान देना चाहिए। आधुनिक शिक्षा पद्धति में पानी के सन्दर्भ में जितनी अल्प जानकारी  उपलब्ध है वह यहां की नई पीढ़ी की पानी के प्रति समझ बनाने के लिए अपर्याप्त है। आइए इस वर्ष हम एक-एक बूंद पानी बचाने का हम संकल्प लें।

✍ हिमकर श्याम

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आधुनिक हिंदी के जनक थे भारतेन्दु

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(जन्म दिवस पर विशेष)

साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ ‘भारतेन्दु काल’ से माना जाता है. भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी के जन्मदाता और भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे. वह बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न साहित्यकार थे. उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी की वह एक साथ कवि, नाटककार, पत्रकार एवं निबंधकार थे. उन्होंने एक उत्कृष्ट कवि, नाटककार और गद्य लेखक के रूप में अप्रतिम योगदान दिया, वहीं एक पत्रकार के रूप में समस्त देश को जागरण का नवसंदेश दिया. उनका सुधारवादी दृष्टिकोण रहा था. उनके द्वारा किये गए कार्य उन रेखाओं की भांति हो गए जिन पर भारत के अनेकों महापुरुषों ने उनके बाद भारत के भविष्य की आधार-शिलाएं रखीं.

समाज सुधार से लेकर स्वदेशी आन्दोलन तक उनकी दृष्टि गयी थी. वे देश की जनता में एक नई चेतना जगाना चाहते थे जो प्रत्येक क्षेत्र में उसे सजग रखे. उन्होंने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया. साथ ही अनेक साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं. वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने ‘तदीय समाज’ की स्थापना की थी. अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुए भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा. उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें ‘भारतेंदु’ की उपाधि प्रदान की थी, जो उनके नाम का पर्याय बन गया.

उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से भारतीय समाज ख़ास कर हिंदी जनमानस में राष्ट्रीय चेतना भरने का काम किया. अपनी पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ के माध्यम से उन्होंने लेखन की दिशा में अनेक प्रयोग किये. उनके द्वारा सम्पादित ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’, ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ और ‘बाला बोधनी’ आदि पत्रिकाओं की भूमिका भी कम महत्व नहीं रखती. ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ तथा ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ ने जहाँ देश की शिक्षित और जागरूक जनता को राष्ट्रभाषा हिंदी में अपने विचारों के प्रचार करने का खुला मंच प्रदान किया, वहीं ‘बाला बोधनी’ के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को भी इस दिशा में आगे बढाने का सराहनीय कार्य किया.

उन्नीसवीं शताब्दी कि आरंभ में भारत के नवशिक्षित बौद्धिकों में एक नई चेतना का उदय हुआ था. इस चेतना को अपने देश में कहीं पुनर्जागरण और कहीं नवजागरण कहा जाता है. नवजागरण के लिए पुनरूत्थान, पुनर्जागरण, प्रबोधन, समाज सुधार आदि अनेक शब्द प्रचलित हैं. निस्स्न्देह इनमें से प्रत्येक शब्द के साथ एक निश्चित अर्थ, एक निश्चित प्रत्यय जुड़ा हुआ है. चेतना की लहर देर-सवेर कमोवेश भारत के सभी प्रदेशों में फैली. देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए जहाँ भारत माता के कुछ सपूतों ने जंग छेड़ी हुई थी,  वहीं कुछ लोग गुलाम होने के कारणों को जानकर उन्हें हटाने में जुटे हुए थे. भारतेन्दु उनमें से एक थे. उनके विचार में साहित्य की उन्नति देश और समाज की उन्नति देश और समाज की उन्नति से जुड़ी है. सामाजिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण सूत्र था ‘नारि नर सम होहिं’. यह बात रुढ़िवादियों को वैसे ही पसंद नहीं थी जैसे भारत के भारत के निज स्वत्व प्राप्त करने की बात अंग्रेजों को. भारतेन्दु दोनों के ही कोपभाजन हुए. नवजागरण काल के इस प्रणेता को आज का भारत कभी नहीं भुला सकता. वे एक व्यक्ति नहीं विचार थे. कर्म नहीं क्रांति में विश्वास रखते थे.

भारतेन्दु का मानना था कि अंग्रेजी राज ख़त्म होने पर ही देश की वास्तविक उन्नति संभव होगी. भारतेन्दु ने अंग्रेजी राज में भारत के आर्थिक ह्रास का जो विश्लेषण किया था, उससे स्वदेशी आन्दोलन की आवश्यकता प्रमाणित होती थी. उन्होंने ऐसी सभा बनाई जिसके सदस्य स्वदेशी वस्तुओ का ही व्यवहार करते थे. स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार से उद्योगीकरण में सहायता मिलेगी, यह बात वह अच्छी तरह से जानते थे. भारतेन्दु को विश्वास था कि जिस प्रकार अमेरिका उपनिवेषित होकर स्वाधीन हुआ वैसे ही भारत भी स्वाधीनता लाभ कर सकता है. भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिंदी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है. इसी भाषा में उन्होंने अपने संपूर्ण गद्य साहित्य की रचना की.  देश सेवा और साहित्य सेवा के साथ-साथ वह समाज सेवा भी करते रहे. दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे. धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु ऋणी बन गए और अल्पायु में ही उनका देहांत हो गया.

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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