Category: विविधा

जय जय जगन्नाथ

jagannath mandir 1भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है।  धुर्वा में 250 फीट की ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस भव्य नयनाभिराम मंदिर की ऊंचाई करीब सौ फीट है। बड़कागढ़ के ठाकुर महाराजा रामशाह के पुत्र ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने 25 दिसंबर, 1691 में इसका निर्माण करवाया था। मंदिर की वास्तुशिल्पीय बनावट पुरी के जगन्नाथ मंदिर से मिलती-जुलती है। मुख्य मंदिर से आधे किमी की दूरी पर मौसीबाड़ी का निर्माण किया गया है। चारों तरफ हरियाली और मंदिर तक जाने के लिए बना  पथ श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।  भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रतिदिन पूजा-आराधना होती है। मंदिर में आचार-व्यवहार पूजा पद्धति वैष्णव, बौद्ध, शैव और जैन धर्मावलम्बियों द्वारा प्रभावित है। मंदिर परिसर में हर दिन कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव होता रहता है।

भगवान जगन्नाथ के मंदिर निर्माण की कहानी काफी रोचक है। ऐनीनाथ राजा रामशाह की बड़ी रानी मुक्ता देवी के पुत्र थे। नागवंशी परम्परा के अनुसार पिता के निधन के बाद राजा बने। राजा ऐनीनाथ शाहदेव चाहते थे कि उनकी प्रजा यहीं की भूमि पर भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन करे इसलिए राजा पैदल चलकर पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर गये। वहाँ कुछ समय बिताया। एक दिन स्वप्न में खुद भगवान जगन्नाथ ने  दर्शन दिया और रांची में भगवान जगन्नाथ के मंदिर की स्थापना करने को कहा। वापस रांची लौटने के बाद उन्होंने धुर्वा स्थित ऊंचे पहाड़ पर इस मंदिर की स्थापना की। मंदिर का निर्माण सुर्खी-चूना की सहायता से प्रस्तर के खण्डों द्वारा किया गया है तथा कार्निश एवं शिखर के निर्माण में पतली ईंट का भी प्रयोग किया गया था।

वर्ष 1992 में हुआ था जीर्णोद्धार : 6 अगस्त, 1990 को मंदिर पिछला हिस्सा ढह गया था, जिसका पुनर्निर्माण कर फरवरी, 1992 में मंदिर को भव्य रूप दिया गया। बिहार सरकार और श्रद्धालुओं के सहयोग से इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। कलिंग शैली पर इस विशाल मंदिर का पुनर्निर्माण करीब एक करोड़ की लागत से हुआ है। इस मंदिर में प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। एक ओर जहां अन्य मंदिरों में मूर्तियां मिट्टी या पत्थर की बनी होती है, वहीं यहां भगवान की मूर्तियां काष्ठ (लकड़ी) से बनी हैं। इन विशाल प्रतिमाओं के आस-पास धातु से बनी बंशीधर की मूर्तियाँ भी हैं, जो मराठाओं से यहाँ के नागवंशी राजाओं ने विजय चिह्न के रूप में प्राप्त किये थे। यहाँ मंदिर की दीवारों में बनाये गये भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्तियाँ बहुत  खूबसूरत और आकर्षक हैं। जगन्नाथ मंदिर न्यास समिति की देखरेख में 1987 में एक विशाल छज्जे का निर्माण किया गया था,  जहाँ अब एक विशाल भवन बन गया है। इस मंदिर में पूजा से लेकर भोग चढ़ाने का विधि-विधान पुरी जगन्नाथ मंदिर जैसा ही है। गर्भ गृह के आगे भोग गृह है। भोग गृह के पहले गरुड़ मंदिर हैं, जहा बीच में गरुड़जी विराजमान हैं। गरुड़ मंदिर के आगे चौकीदार मंदिर है। ये चारों मंदिर एक साथ बने हुए हैं। 1869-1872 के सर्वे में जगन्नाथ स्वामी के सम्मान में मूल भुसुर गांव का एक भाग अलग कर जगन्नाथपुर के नाम से दूसरे गांव की स्थापना की गयी। मूल भुसुर गांव के दूसरे भाग को मंदिर निर्माता ठाकुर ऐनीनाथ के सम्मान में आनी गांव के रूप में स्थापित किया गया। वर्तमान में जगन्नाथपुर और आनी गांव में ही रथ यात्रा मेला लगता है। रथ यात्रा के दौरान यहां का नजारा  विहंगम होता है। एचईसी के निर्माण के बाद इस क्षेत्र का भूगोल तेजी से बदलने लगा और फिर आसपास भी विस्थापितों की बस्ती बसने लगी और मंदिर-मेले की जमीन सिकुड़ती गई। फिर भी, मेले की भव्यता में कोई कमी नहीं आयी है।

327 साल पुरानी है रथयात्रा की परम्परा : रथयात्रा झारखंड का सबसे बड़ा ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व का पर्व है।  रथयात्रा का इतिहास भी नागवंशी राजाओं से ही जुड़ा है।  रथयात्रा का शुभारम्भ वर्ष 1691 में हुआ था तभी से ही यहां रथयात्रा की यह परंपरा चली आ रही है।  रथयात्रा में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। यहां आनेवाले श्रद्धालुओं में झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के ग्रामीणों की संख्या ज्यादा होती है।रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनrath melaमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं। रथयात्रा के पीछे मान्यता है कि सभी श्रद्धालु मंदिर में प्रभु का दर्शन नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से जन साधारण को दर्शन देने के लिए भगवान रथ पर दर्शन यात्रा पर निकलते हैं। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है।  हर वर्ष नया सराय का रहनेवाले लोहार परिवार ही रथयात्रा के लिए भगवान के रथ को तैयार करता है। रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या काँटा, किसी भी धातु को नहीं लगाया जाता। रथ की मरम्मत रथयात्रा के एक महीने पहले से ही शुरू कर दी जाती है। इस वर्ष रथ निर्माण का काम महावीर लोहार को सौंपा गया है। भगवान जगन्नाथ के रथ को 1691 से ही इनके पूर्वज रथ की मरम्मत करते आये हैं। मंदिर के लिए बना ट्रस्ट सम्पूर्ण रथ यात्रा तथा मेले का कार्य देखता है।

सामुदायिक पर्व : वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व है। आस्था के साथ-साथ सम्मिलित विश्वास का प्रतीक भी है। रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता है। पहले हर जाति और धर्म के लोग मिल-जुलकर रथयात्रा का आयोजन करते थे। भगवान जगन्नाथ को जहां घांसी जाति के लोग फूल मुहैया कराते थे, वहीं उरांव घंटी प्रदान करते थे। राजवर जाति द्वारा विग्रहों को रथ पर सजाया जाता था। मिट्टी के बर्तन कुम्हार देते थे। बढ़ई और लोहार रथ का निर्माण करते थे तो करंज का तेल पाहन देते थे। मंदिर की पहरेदारी मुस्लिम किया करते थे। भक्तों में रथ से बंधी रस्सी को छूने की होड़ रहती है। आधा किलोमीटर का रथयात्रा का सफर डेढ़ घंटे में पूरा होता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी को खिंचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। रथयात्रा से जुडी एक मान्यता है कि पुरी में जब राजा इंद्रद्युम्न  ने भगवान के विग्रहों की स्थापना की थी। उस समय रानी गुंडिचा ने प्रभु से आराधना की थी कि कुछ समय के लिए वह भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ उनके यहां वास करें। भगवान ने रानी गुंडिचा को स्वपन में दर्शन दिए और वचन दिया कि वे आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जनसाधारण को दर्शन देते हुए उनके यहां आकर विश्राम करेंगे और नौ दिनों के बाद एकादशी के दिन रथ से मंदिर लौट जाएंगे।

जगन्नाथ मेला : झारखंड के श्रावणी मेला के बाद रांची के धुर्वा में लगने वाला जगन्नाथ मेला राज्य का सबसे बड़ा मेला है। इस रथ यात्रा मेले की खासियत यह है कि इसमें बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों के लोग भी शामिल होते हैं। झारखंड के अलावा पड़ोसी राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, यूपी से यहां आने वाले दुकानदार अपनी दुकानें लगाते हैं। सैकड़ों स्टाल लगते हैं। बर्तन, मिठाई, लोहे का सामान, तलवार, कटार, लकड़ी का सामान आदि की बिक्री यहां खूब होती है। पारंपरिक हथियार तीर-धनुष की भी यहां खरीदारी होती है। झूले से लेकर अन्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं। ये लोग जय जगन्नाथ के जयकारे के साथ घुरती रथयात्रा के बाद विदा हो जाते हैं।

गुलजार रहेगा मेला क्षेत्र : आज ऐतिहासिक रथ यात्रा निकलेगी। जयघोष के बीच भगवान चांदी का मुकुट धारण किए प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथारुढ़ होकर मौसीबाड़ी जाएंगे। वे वहां नौ दिन रहेंगे। इन नौ दिनों तक मंदिर परिसर में मेला लगेगा। 23 जुलाई को घुरती रथ मेला होगा। मौसीबाड़ी से हजारों भक्त रथ खींचते हुए भगवान को मुख्य मंदिर पहुंचाएंगे। आज से लेकर  23 जुलाई तक मेला क्षेत्र गुलजार रहेगा।

 

✍ हिमकर श्याम

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सिमट रही नदियों की धारा

Harmuदुनियाभर की सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। रांची भी स्वर्णरेखा, हरमू, करम, जुमार, पोटपोटो समेत अन्य नदियों के किनारे बसी। यहाँ की पहाड़ियों में गाती, बलखाती,  इठलाती नदियों का प्रवाह कभी देखने लायक होता था। छोटे-छोटे पहाड़ों और घुमावदार रास्तों में इनका सौंदर्य बढ़ जाता था। ये नदियां हमारी जीवनशैली का अहम हिस्सा थीं। समाज का इन नदियों से रागात्मक रिश्ता था। नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ कृषि, सिंचाई  एवं अन्य कार्यों की जल आपूर्ति हेतु भी विशेष महत्व था। धीरे-धीरे नदी के प्रति श्रद्धा भावना का लोप हुआ और इसके उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ती चली गयी। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा सबसे ज्यादा नदियों को ही भुगतना पड़ा है। रांची शहर के इतिहास को अपने हृदय में समेटे नदियों का अस्तित्व खतरे में है। नदियां सिकुड़ रही हैं, इनका प्रवाह मर रहा है। दशकों से चल रहे सफाई अभियान को देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। नदियों की व्यथा पर शहर मौन है।

बढ़ते शहरीकरण और लोगों की उदासीनता के कारण पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान रांची और आसपास के क्षेत्रों में बहने वाली दर्जनों छोटी नदियां सूख गईं और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। इन नदियों में प्रदूषण का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। प्राकृतिक रचना और जलवायु की भिन्नता के कारण रांची समेत झारखंड की नदियों का स्वरूप उत्तर की मैदानी नदियों से भिन्न है। यहां की नदियों की एक विशेषता है कि कठोर चट्टान वाले प्रदेश से गुजरने के कारण वे गहरी घाटी और जलप्रपात का निर्माण करती हैं। यहाँ की अधिकांश नदियां बरसाती हैं।

स्वर्णरेखा : रांची के नगड़ी गांव से निकलकर स्वर्णरेखा पिस्का गांव की उत्तरी सीमा तथा टिकराटोली की दक्षिणी सीमा बनाती हुई दक्षिण-पूर्व की ओर अपनी यात्रा आरम्भ करती है। फिर यह कुदलुम, बालालौंग और नचियातु गांवों की दक्षिणी सीमा बनाती हुई रातू को छोड़ कर नामकुम प्रखंड पार कर रांची और हजारीबाग की सीमा बनाती है तथा दक्षिणी ओर मुड़कर सिल्ली, सोनहातू की सीमा बंगाल से अलग करती हुई पूर्वी सिंहभूम जिले में प्रवेश करती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले में घाटशिला के बाद इसकी घाटी काफी चौड़ी एवं निम्न हो जाती है। यहां के बाद यह समुद्रतल से मात्र 100 से 75 मीटर ऊंची रह जाती है। सिंहभूम में बहती हुई यह उत्तर पश्चिम से मिदनापुर जिले में प्रविष्ट होती है। इस जिले के पश्चिमी भूभाग के जंगलों में बहती हुई बालेश्वर जिले में पहुँचती है और फिर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी की कुल लंबाई 474 किलोमीटर है और लगभग 28928 वर्ग किलोमीटर का जल निकास इसके द्वारा होता है। इस नदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में मिलने तक किसी की सहायक नदी नहीं बनती। पठारी भाग की चट्टानों वाले प्रदेश से प्रवाहित होने के कारण स्वर्णरेखा नदी तथा इसकी सहायक नदियाँ गहरी घाटियों तथा जल प्रपात का निर्माण करती हैं। स्वर्णरेखा हुंडरू जलप्रपात का निर्माण करती है, जबकि इसकी सहायक राढ़ू नदी में जोन्हा और कांची नदी में दशम जलप्रपात का निर्माण होता है। ये सभी जलप्रपात एक ही भ्रंश रेखा पर स्थित है। राढू होरहाप से निकल कर सिल्ली से दक्षिण तोरांग रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में मिलती है। स्वर्ण रेखा और उसकी सहायक नदी करकरी की रेत में सोने के कण पाये  जाते हैं। किन्तु इसकी मात्रा अधिक न होने के कारण व्यवसायी उपयोग नहीं किया जाता है। करकरी एक छोटी नदी है जिसकी लंबाई केवल 37 किमी है। वर्तमान में यह नाले का रूप ले चुकी है।

स्वर्णरेखा अपने उद्गम शहर में ही अतिक्रमण और गंदगी की मार झेल रही है। कचरा, नालों के पानी से नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। तुपुदाना औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और मिलों के गंदा पानी गिरने से नदी का पानी काला हो गया है। नामकुम के पास स्थित स्वर्णरेखा घाट तो और भी बदतर है। स्वर्णरेखा नदी की चौड़ाई सरकारी दस्तावेज में 24.46मीटर है, लेकिन यह नदी हटिया और नामकुम में पांच मीटर से भी कम रह गयी है।

स्वर्णरेखा उद्गम स्थल : रांची से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नगड़ी में एक जलकुंड है, जिसे  स्वर्ण रेखा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यह स्थल रानीचुआँ के नाम से प्रसिद्ध है। चुआँ पानी के उद्गम स्थल या स्रोत को कहा जाता है। करीब 100 वर्ष पहले तक यह जलकुंड लकड़ी के पीपे से बहता था। इसी पीपे में सोने की एक हथेली थी, जिसमें पांच उंगलियों के निशान थे। इसी से इसका नाम स्वर्णरेखा हुआ। एक किंवदन्ती है कि नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्ण कणों में बदल गये जो आज भी प्रवाहमान है । इस सम्बन्ध में भूवैज्ञानिकों का मानना है कि स्वर्णरेखा तमाम चट्टानों से होकर गुजरती है। इसी दौरान घर्षण की वजह से सोने के कण इसमें घुल जाते हैं।

रानीचुआँ : रानीचुआँ नगड़ी के पाण्डू गांव में है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहां गुजारा था। यह क्षेत्र उस समय घने जंगलों से आच्छादित था, पांडवों को यहां छिपने का उपयुक्त स्थान मिला। अज्ञातवास के दौरान उन्हें जल की आवश्यकता पड़ी तो अर्जुन ने बाण मारकर जमीन से पानी निकाला। कालान्तर में यह चुआँ बना। इस चुआँ से जल प्रवाहित होता गया, जो आगे चल कर स्वर्णरेखा नदी बन गयी। मान्यता है कि इसी चुआँ पर द्रौपदी सूर्य देव को अर्घ्य दिया करती थी। कहा जाता हैं कि महाभारत में जो एकचक्रा नगरी की बात कही गई है वो यही नगड़ी है। अज्ञातवास के क्रम में पांडव नाग राजाओं से मिले थे। नाग राजा उस समय गंधर्वों के आक्रमण से काफी परेशान थे, तब नाग राजाओं ने अर्जुन के समक्ष अपनी प्राण रक्षा की गुहार लगाई थी। अर्जुन ने गंधर्वों को परास्त कर नागवंशियों के साम्राज्य की रक्षा की थी। नाग राजाओं के निवेदन पर नाग राजकुमारी का विवाह अर्जुन से सम्पन्न हुआ, जिससे एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। इसकी चर्चा महाभारत के प्रसंगों में मिलती है। पाण्डवों के नाम पर ही इस बस्ती का नाम पाण्डू गांव रखा गया। एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार पहले यह एक राजा का महल था। उस महल के अंदर ही एक सुरंग थी जिसका निकास इस जलकुंड में था, जिसमें रानी स्नान करती थी। इस कारण इस जगह का नाम रानीचुआँ पड़ा। रानीचुआँ और उसके अगल-बगल का क्षेत्र कोयल और कारो नदी का भी उद्गम स्थल है।

गंगा धारा : पाण्डू गाँव के निकट ही हरही गाँव है, जिसे भीम का ससुराल भी कहा जाता है।  इस गाँव में गंगा धारा है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि यह पतित पावनी गंगा का अंश है। इस जल का श्रोत कहां है, यह कोई नहीं जानता। यह जल धारा तालाब के बगल में स्थित एक प्राचीन शिवलिंग में गिरती है  जहां एक मंदिर का निर्माण कराया गया है।

दक्षिणी कोयल : नगड़ी के उद्गम स्थल से निकलकर रातू और बेड़ो प्रखंड की सीमा बनाती हुई कोयल नदी बेड़ो की बारीडीह, कुंदी, रानी खटंगा गांवों की पूर्वी सीमा से होती हुई मांडर में प्रवेश करती है तथा कुडू होते हुए लोहरदगा में प्रवेश करती है। लोहरदगा से आठ किमी उत्तर-पूर्व में यह दक्षिण दिशा की ओर मुड़ जाती है और लोहरदगा, गुमला जिला होते हुए सिंहभूम में प्रवेश करती है। अंत मे यह उड़ीसा में प्रवेश करती है, जहां से आगे चलकर गंगपुर के पास शंख नदी में मिल जाती है। इसके आगे यह ब्राह्मणी नदी कहलाती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। देव माड़ी, खटतानाला, बड़कीनाला, अनरिया, डोका, शंख, सपही, कड़नू, नंदनी, कंस, हरसा, फुलझरो, कारो, कोयना, टोरपा आदि इसकी सहायक नदियां हैं।

हरमू नदी : हरमू स्वर्णरेखा की सहायक नदी है। ललगुटवा उद्गम स्थल से चुटिया के आगे 21 महादेव मंदिर के पास स्वर्णरेखा व हरमू नदी का मिलन होता है। हरमू नदी का उद्गम लेटराइट मिट्टी से है। हरमू नदी बहुत बड़े क्षेत्र से होकर बहती थी। इसके चलते उन जगहों का तापमान पहले कम रहता था तथा भूमिगत जल भी रिचार्ज होता रहता था। हरमू मुहल्ले का नाम इसी नदी के नाम पर रखा गया है। इस नदी की सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें बताती हैं कि वर्ष 2004 के पहले यह नदी विस्तृत और चौड़े पाट से होकर बहती थी। 10.40 किलोमीटर की दूरी में बहने वाली इस नदी की चौड़ाई 25 मीटर से घट कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम हो गयी है। हरमू नदी का अतिक्रमण पहले तो किनारे बसे लोगों ने किया, रही सही कसर जमीन दलालों ने पूरी कर दी। महज आधा किलोमीटर क्षेत्र में नदी के सीने पर अनेक मकान बना दिये गये। आबादी बढ़ने के साथ ही नदी के आसपास के मोहल्लों से निकलने वाला गंदा पानी और गंदगी दोनों ही इस नदी में गिराये जाने लगे, जिसकी वजह से यह नदी पूरी तरह दूषित हो गई। रांची नगर-निगम की ओर से हरमू नदी को पुनर्जीवित करने और इसके सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं।

21 शिवलिंगों का अभिषेक  : राँची के स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर स्थित प्राचीन इक्कीसो महादेव का अस्तित्व भी खतरे में है। चट्टानों में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की आकृति नदी के अम्लीय प्रभाव से मिटते जा रहे हैं। 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने अपने महल के करीब 21 चट्टानों में शिवलिंग का निर्माण कराया था। राजपरिवार की दिनचर्या इन 21 शिवलिंगों में जलाभिषेक के साथ ही शुरू होती थी। 21 शिवलिंग एक सांस्कृतिक उन्नत समाज को दर्शाता है। 21 महादेव की खास महत्ता है। हर कार्तिक पूर्णिमा को क्षेत्र के श्रद्धालु स्वर्णरेखा में डुबकी लगाते हैं और 21 शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं।

कहानी हो गई करम नदी : करम नदी सेंट्रल रांची के 2250 वर्गफीट क्षेत्रफल में बहती थी। करम नदी के नाम पर ही करमटोली इलाके का नामकरण हुआ है। टोपोग्राफी के अनुसार करम टोली तालाब से डिस्टिलरी तालाब को जोड़ने वाली करम नदी सबसे निचली जमीनी भू-स्तर है। करम टोली और  मोरहाबादी इलाके का अतिरिक्त पानी करम नदी से होकर डिस्टिलरी तालाब होते हुए स्वर्णरेखा नदी में मिलता था। करम नदी के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी ऊपर था। हरिहर सिंह रोड में जलजमाव की स्थिति करम नदी के अतिक्रमण के कारण हो रही है। सेटेलाइट चित्र से पता चलता है कि कुछ वर्ष पहले तक इस नदी का अस्तित्व था। करम नदी का उल्लेख 1961 में लिखी गई कल्चरल कन्फिग्रेशन ऑफ रांची में नामक पुस्तक में भी है। यह पुस्तक एचईसी की स्थापना के बाद रांची में हुए सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद लिखी गई थी। इसी पुस्तक में पोटपोटो नदी का भी जिक्र है।

पोटपोटो : पोटपोटो नदी सेंट्रल रांची में बहती हुई बोड़ेया में जुमार नदी में मिलती है। यहाँ से इसका पानी रूक्का डैम में मिल जाता है। अतिक्रमण की वजह से पोटपोटो नदी एक संकरी नाली के रूप में बदल गई है। नदी तट को प्रेमनगर, चैड़ी बस्ती, चूड़ी टोला, अरसंडे से लेकर बोड़ेया तक अतिक्रमित किया जा चुका है। पोटपोटो नदी की चौड़ाई 32 से 37 मीटर के बीच थी, लेकिन अब भी यह 7.5 मीटर में सिकुड़ कर रह गयी है।

जुमार नदी : स्वर्णरेखा की सहायक इस नदी पर भी अस्तित्व और पहचान का संकट मंडरा रहा है। यह नदी 15 किमी शहरी और 15 किमी ग्रामीण इलाकों का सफर तय करती है। जुमार नदी रांची और आसपास के क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक करीब 30 मीटर चौड़ाई में बहती थी। अब यह नदी एनएच-33 के किनारे सिर्फ दस मीटर चौड़ाई में सिमट गयी है। जिस नदी में सालों भर पानी रहता था, वह अब बरसाती नदी मात्र बन कर रह गयी है। भुसूर पंचायत, चिरौंदी होते हुए यह नदी स्वर्णरेखा में मिलती है। रांची- रामगढ़ रोड स्थित जुमार पुल के पास दोनों ओर नदी का अतिक्रमण हो चुका है।

सतीगड़हा : करटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स, लालपुर और कोकर से होकर स्वर्णरेखा में मिल जाने वाली सतीगड़हा नदी पूरे करमटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स व लालपुर क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए वरदान थी। अब इस नदी का नामोनिशान मिट गया है। इसके बहाव क्षेत्र में आलीशान मार्केटिंग कांप्लेक्स, अपार्टमेंट और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गईं हैं। नगर निगम प्रशासन ने इस नदी को नाला करार दिया है। एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान नगर निगम ने उच्च न्यायालय को बताया गया है कि यह मात्र एक नाला है जबकि 1932 का नक्शा बताता है कि सतीगढ़वा नदी का अस्तित्व वर्षों से रहा है।

भूसुर नदी : भूसुर नदी एचईसी के इलाके से निकल कर डीपीएस बाइपास, सेल, शुक्ला कॉलोनी हिनू और डोरंडा होते हुए घाघरा से आगे स्वर्णरेखा नदी में मिल जाती है। डोरंडा और मणिटोला को भी यह नदी अलग-अलग करती है। इस नदी में पानी हर-हराकर आता था, इसलिए लोग इसे भूसुर के नाम से कम, हड़हड़वा नदी के नाम से ज्यादा जानते थे। यह नदी कहीं-कहीं ढाई सौ फीट चौड़ी थी, अतिक्रमण से पांच फीट तक सिमट गई है।

अरगोड़ा नदी : कुछ ऐसी ही स्थिति अरगोड़ा नदी की है। यह नदी अरगोड़ा-कटहल मोड़ मार्ग पर बहती थी। यह नदी हरमू की सहायक नदी थी। बहाव क्षेत्र पर अवैध कब्जों से अरगोड़ा नदी विलुप्त हो चुकी है।

रांची के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक परिदृश्य में यहां की नदियों का बड़ा प्रभाव रहा है। विडम्बना है कि शहर की नदियां भी एक-एक कर अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। स्वर्णरेखा, जुमार, हरमू और पोटपोटो जैसी नदियां अतिक्रमण के कारण सिकुड़ रही हैं। इन नदियों के बहाव क्षेत्र को तलाशना भी असंभव है। क्योंकि इन्हीं स्थानों पर शहर के सबसे पाश इलाके विकसित हो चुके हैं। कई नदियां तो पूरी तरह से सूख गयी हैं और अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। नदियों को दूसरा बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गन्दगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अविरलता ही नदी का गुण होता है। यह गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटना होगा। नालों को वापस नदी बनाना होगा। नदियों का पुनर्जीवन और संरक्षण बेहद जरूरी है। हमें यह याद रखना होगा नदियों का अस्तित्व खत्म हुआ तो सभ्यताएं भी खत्म होती गईं।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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यादों के उजाले

सुना है ‘बद्र’ साहब महफिलों की जान होते थेbashir badr

बहुत दिन से वो पत्थर हैं, न हंसते हैं न रोते हैं

डॉ. बशीर बद्र की मौजूदा हालत को यह शेर बखूबी बयाँ करता है। अवाम के महबूब शायर की कलम खामोश है। लंबे अरसे से शायर खुद तन्हा और बीमार है। अब वह शेर सुनाते नहीं, सुन लेते हैं। व्हीलचेयर पर बैठे बद्र साहब के सामने जब कोई उनका ही लिखा शेर बोलता है तो कुछ को पहचान लेते हैं, कुछ शेरों से अनजान रहते हैं। यादों के उजालों को साथ रखने की बात कहने वाले शायर को कुछ भी याद नहीं। शायरी से उन्हें अब ही बेहद प्यार है। भले ही याददाश्त उनका साथ छोड़ गई है, लेकिन कोई शेर पढ़ते ही उनके चेहरे पर ख़ुशी आ जाती है। फिलहाल भोपाल के ईदगाह हिल्स में मौजूद घर में बशीर साहब अपनी बेगम राहत बद्र और बेटे तैयब के साथ रहते हैं। तैयब आईआईटी मद्रास से पास आउट हैं और अपने पिता की देखभाल के लिए फिलहाल भोपाल में रहते हैं।

आधुनिक ग़ज़ल का पर्याय बन चुके बशीर बद्र आज के बेहद लोकप्रिय और सम्मानित शायर हैं। जब समकालीन ग़ज़ल की बात चलती है तो बशीर बद्र का नाम अनायास जुबान पर आ जात है। बशीर बद्र की सुख़नगोई का हर कोई मुरीद है। उनके कलाम जितने सीधे तरीके से लिखे जाते हैं उतनी ही आसानी से वो दिल को छू भी जाते हैं। उनके कालजयी शेर आम लोगों के बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। अयोध्या में 15 फरवरी 1935 को पैदा हुए बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की। कहा जाता है कि उन्होंने 7 बरस की उम्र से ही शेरो-शायरी शुरू कर दी थी। उन्हें 1999 में पद्मश्री और उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। उनकी कविताएं और शेर अंग्रेजी और फ्रेंच में भी अनुवाद किए गए हैं।  परवरदिगार उनको अच्छी सेहत और लंबी उम्र अता करे।

ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएंगे
रोयेंगे बहुत लेकिन आंसू नहीं आयेंगे

✍ हिमकर श्याम

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ग़ज़ल के दीवानों को ग़ज़ल के दीवाने की सौग़ात

neerajगज़ल अपने दीवानों की वजह से ज़िंदा है। ग़ज़ल के प्रति गज़ब की दीवानगी रखने वाले और मुझे अनुजवत स्नेह देनेवाले नीरज गोस्वामी का नाम ब्लॉग जगत के सबसे लोकप्रिय शायरों में शुमार है. उनकी नई  किताब ’51 किताबें ग़ज़लों की’ पिछले दिनों मिली. इस पुस्तक में उन्होंने 51 नए, पुराने ग़ज़लकारों के ग़ज़ल संग्रहों की समीक्षा की है. इससे पहले उनकी किताब ‘101 किताबें ग़ज़लों की’ आयी थी. इन किताबों के माध्यम से उन्होंने समकालीन ग़ज़ल संग्रहों व इन के शायरों पर खुल कर चर्चा की है. संकलित किताबों के शायरों के साहित्यिक व व्यक्तिगत जीवन के विषय में भी रोचक जानकारियाँ दी गईं हैं. इन किताबों की समीक्षा इतनी खूबसूरती से की गई है कि पाठकों के दिल में किताब पढ़ने की ख़्वाहिश जाग जाती है. ग़ज़लों का बेहतरीन संग्रह और साहित्य/ब्लॉग जगत के 152 ग़ज़लकारों को एक साथ प्रस्तुत करनेवाला दोनों किताब अनूठा और संग्रहणीय है. लेखक ख़ुद सधे हुए ग़ज़लकार हैं. इनके अशआर चमत्कृत करनेवाले होते हैं. ग़ज़ल के दीवाने का ग़ज़ल के दीवानों को यह किताब समर्पित है.

ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य में जो सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है, उसके पीछे ऐसे ही दीवानों की दीवानगी शामिल रही है. पिछले कई सालों से अनवरत शायरी के लिए वह काम कर रहे हैं जिसका कोई सानी नहीं है. हालाँकि वह कहते हैं कि लेखन वह स्वान्तः सुखाय के लिए करते हैं, लेकिन वह ग़ज़ल प्रेमियों पर बड़ा उपकार कर रहे हैं. इनकी लेखन शैली पाठकों को बहुत पसंद आएगी, यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ. पिछले तीन दशकों से ग़ज़ल ने बड़ी मजबूती से हिंदी साहित्य में अपने पैर जमाये हैं. इस दौरान कई बेहतरीन ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए. इनमें कई ग़ज़लकार ऐसे भी हैं जो कम चर्चित होते हुए भी उम्दा लिख रहे हैं. संकलन में उनके संग्रहों का भी जिक्र किया गया है. अपने ब्लॉग पर 2008 में लेखक ने ‘किताबों की दुनिया’ नाम से श्रृंखला शुरू की थी, जो अब  किताबों के रूप में पाठकों के समक्ष है. हर सोमवार को नियमित रूप से वह किसी शायर की एक किताब पर बेहतरीन समीक्षा करते हुए सके चुनिन्दा अंश अपने ब्लॉग पर साझा करते हैं. इस श्रृखला के तहत अब तक 166 किताबों की चर्चा की जा चुकी है. ‘101 किताबें ग़ज़लों की’ का प्रकाशन जनवरी, 2016 में किया गया था, इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आठ महीने के भीतर ही इसका दूसरा संकलन छापना पड़ा. सितम्बर, 2016 में दूसरा संकलन बाज़ार में आया. 51 किताबें ग़ज़लों की और 101 किताबें ग़ज़लों की को शिवना प्रकाशन, सीहोर ने प्रकाशित किया है. दोनों किताबों के माध्यम से पाठकों को बेहतरीन ग़ज़ल संग्रहों को देखने-समझने को मिलेगा. दोनों किताबों के लिए नीरज भैया को बहुत बहुत मुबारकबाद. साथ ही उनका शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेजी.

51 किताबें ग़ज़लों की (पुस्तक चर्चा)
प्रथम संस्करण: 2018 (हार्ड बाउंड)
पेज- 256, मूल्य- 300 रुपये
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टेण्ड, सीहोर (म.प्र.)- 466001
मो- 9806162184

मेल- shivna.prakashan@gmail.com

✍ हिमकर श्याम

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144 साल के इतिहास का गवाह संत पॉल चर्च

st paul churchरांची के बहू बाजार स्थित 144 वर्ष पुराना संत पॉल कैथेड्रल चर्च आज भी अपने इतिहास की गौरवगाथा बयां करता है. स्थापत्य कला के लिहाज से जितना अद्भुत यह चर्च है, इसका इतिहास भी उतना ही अद्भुत है. पहले यहां एक झोपड़ी थी, जिसमें आराधना होती थी. फरवरी 1870 में पक्का आराधनालय बनाने का निर्णय लिया गया. जनरल रॉलेट के द्वारा चर्च की रूपरेखा तैयार की गयी थी. चर्च की नींव छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर आयुक्त ईटी डॉलटन द्वारा 1 सितंबर 1870 ई में रखी गयी. तीन साल में चर्च बन कर तैयार हुआ. शनिवार, 9 मार्च 1873 को नवनिर्मित महागिरजाघर का विधिवत संस्कार एवं उद्घाटन हुआ.  इस कैथेड्रल चर्च का नामकरण संत पॉल के नाम पर किया गया है. हर रविवार को यहां हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा में प्रार्थना होती है. विश्वासियों को यहाँ आकर एक सुकून की अनुभूति होती है.

रांची के लोगों ने दिए थे 4 हजार रूपये : चर्च का निर्माण 26 हजार रुपए में हुआ था. आर्थर हेजोर्ग ने इस कैथेड्रल चर्च के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. रांची के लोगों ने चर्च के लिए 4 हजार रूपये दिए थे. जनरल एडवर्ड टी डॉल्टन, बिशप रॉबर्ट मीलमैन और भारत सरकार की ओर से भी आर्थिक सहयोग मिला था. डॉलटन ने 3000 और मीलमैन ने 2000 रूपये दिए थे. चर्च के निर्माण की तिथि, कुल अनुमानित लागत तथा दानदाताओं की एक सूची बोतल में बंद कर चर्च के नींव में डाल दी गई थी. 10 मार्च , 1873 ई. को बिशप मीलमैन के द्वारा पांच भारतीय पुरोहितों की नियुक्ति की गयी. मीलमैन कोलकाता के बिशप तथा भारत, श्रीलंका और वर्मा के एंग्लीकन मेट्रोपोलिटन थे. छोटानागपुर को डायसिस के रूप में संगठित करने में उनका अहम योगदान था. चर्च के प्रथम बिशप जेसी हिटली और प्रथम भारतीय पुरोहित रेव्ह. विलियम लूथर डेविड सिंह थे. 1980 तक छोटानागपुर में भारतीय पुरोहितों के साथ इस चर्च की सदस्यता लगभग 10600 लोगों की हो गयी.

ख़ूबसूरत स्थापत्य : यह ऐतिहासिक चर्च स्थापत्य कला का एक ख़ूबसूरत नमूना है जो पतले सीधे खड़े खम्भे, मेहराब और सम्भार के सहारे सुसज्जित है. इसकी ऊँचाई 120 फीट है. शीर्ष पर 10 फीट ऊँचा, 2 फीट मोटा पत्थर का स्तम्भ बैठाया गया है. शीर्ष पर ही एक 5 फीट की छड़ है, जिसपर तीन फीट का तीर है जो क्रूस के रूप में वायु की दिशा के अनुरूप घूमता रहता है. छत लकड़ी की है, खिड़कियाँ कांच की हैं. प्रवेश द्वार से अंदर आने पर दाहिने ओर बपतिस्मा कुंड संगमरमर पत्थर से निर्मित है. बच्चों का बपतिस्मा चर्च के अन्दर ही होता है. चर्च में एक सभागृह और संगमरमर पत्थर से बनी वेदी है. वेदी के ऊपरी भाग को आर्क का आकार दिया गया है. वेदी में स्थापित कैथेड्रल चर्च की विशेषता का प्रतीक है. कैथेड्रल लैटिन शब्द कैथेड्रा से निकला है, जिसका अर्थ है बिशप का सिंहासन. यह छोटानागपुर का मुख्य ड़ायसिस है. बिशप इनका प्रमुख होता है. वेदी से नीचे पुरहोहितों के लिए कुर्सियां रखी गईं हैं. चर्च के अंदरूनी हिस्से में यूरोपीय शैली की पेंटिंग्स लगी हैं, जिसमें ईसा मसीह के जीवन की झलकियों के सजीव चित्र उकेरे गये हैं. चर्च के अंदर एक घेरा बना है, जहां विश्वासी वेदी के सामने घुटना टेकते हैं. पहले यह पीतल का था. 1980 में पीतल का घेरा चोरी होने के बाद उस स्थान पर स्टील का घेरा लगा दिया गया. चर्च परिसर में लोहे की एक खूबसूरत नाव बनी हुई है. यह उन मिशनरियों की याद में बनाया गया है, जो 18 वीं सदी में भारत आए थे. चर्च की इमारत के अंदर बिशप दिलवर हंस और बिशप जेड जे तेरोम की कब्रें हैं. चूंकि बिशप का जीवन मानवता की सेवा के साथ प्रभु की आराधना में गुजरता है, इसलिए उनका पार्थिव शरीर का दफन संस्कार कैथेड्रल में करने की परंपरा है.

रानी पाइप ऑर्गन : इस गिरिजाघर में दो हजार साल पहले का यूनानी वाद्य यंत्र भी है, जिसे 1860 में लाया गया था. इसे रानी पाइप ऑर्गन कहा जाता है. ऑर्गन में लगी पाइप बांसुरी की तरह ही है. 56-56 की संख्या में की-बोर्ड हैं. इससे 11 तरह की धुनें निकलती हैं. इसे बजाने में हाथ-पैर दोनों का उपयोग होता है. पाइप आर्गन चर्च की शान है, पहचान है. इसे उपासना वेदी के दाहिने ओर रखा गया है. चर्च में दो घंटियाँ हैं. एक बड़ी है, दूसरी छोटी. इन्हें क्रमशः अनुष्ठान से आधे घण्टे पूर्व और अनुष्ठान के शुरू होने पर बजाया जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि जब जनसंख्या कम थी, इतने मकान नहीं थे तो इस पाइप ऑर्गन की मधुर धुन और चर्च की घंटी आसपास के इलाकों में सुनी जा सकती थी.

✍ हिमकर श्याम

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गोथिक शैली में बना है झारखण्ड का पहला चर्च

रांची के मुख्य मार्गGEL Church पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है. स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है. गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर की भव्य इमारत देखने लायक़ है.  इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है. इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे. इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ. 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की. ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है. ईसाई धर्मावलंबियों को  यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है.

चर्च शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है ‘प्रभु का’.  चर्च के अतिरिक्त कीलिसिया शब्द भी चलता है. यह यूनानी बाइबिल के एक्लेसिया शब्द का विकृत रूप है, बाइबिल में इसका अर्थ है किसी स्थान विशेष अथवा विश्व भर के ईसाईयों का समुदाय. बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा. ईसाई मिशनरियों का झारखंड  पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है. ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं. भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च. गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जमर्नी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था. इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनायी थी. उन्होंने पैस्टर और उनके मिशनरी साथियों ऐमिलो स्कॉच, अगस्त ब्रॉट और थियोडर जैक को वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था. लेकिन तत्कालीन कारणों से चारों मिशनरी यहाँ आ गये. इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था.  रांची के गोस्सनर कंपाउंड में कैंप करने के बाद चारों मिशनरियों ने धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया. छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी.

वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च. 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ. इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया. जीईएल चर्च छोटानागपुर असम के पूर्वज विश्वासियों ने 10 जुलाई 1919 को ऑटोनोमी के नाम पर जीईएल चर्च और मसीही समाज की जिम्मेवारी ली. पूर्वजों ने यह घोषणा तब की, जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया. तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया.

जेईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही  अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है. चर्च द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं. घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है. झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है. ‘घरबंधु’  पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही. पाक्षिक ‘घरबंधु’, अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है. घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं. जेइएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है. इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे.

जीइएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है. यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है. इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है. मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ. वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया. बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है. धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई. अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है.  जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है. देश के 12 राज्यों में जीइएल चर्च की 1896 शाखायें है. जीइएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है.

जीइएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल)  व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार  1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी. 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी. संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे. 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे. छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही.

ईसाई  मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ. यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था. लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे. यहां के आदिवासियों की अज्ञानता और गरीबी दूर करने की कोशिश की. इसके लिए उनकी भाषा, संस्कृत और परंपरा को अपनाया. रांची शहर के चारों ओर इनके सेवा कार्य क्षेत्रों का विस्तार होता गया. मिशनरियों ने प्राथमिकता के साथ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प लिया. शिक्षा और स्वास्थ्य की समर्पित सेवा लोगों के बीच दी. तब आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी. जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था. बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे. आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे.  आदिवासियों को मिशनरियों में शोषण से मुक्ति का मार्ग नजर आने लगा़. इससे आदिवासी समुदाय का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा ईसाईयत की ओर आकृष्ट हुआ.

ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस चर्च ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के  समय इस चर्च पर भी हमला हुआ था. इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से गोले दागे गए थे, किन्तु कोई विशेष क्षति नहीं हुई.  हमले के निशान आज भी चर्च भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं. क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था. विषम परिस्थिति से बचने के लिए चर्च के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी. उस वक़्त चर्च के हारेलोहर साहब ने अपनी  बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था.

 

✍ हिमकर श्याम

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आफ़त की बाढ़

इन दिनों देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति गंभीर है, जिससे लाखों लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. बाढ़ ने बुरी तरह से कहर ढाया है. दिनोदिन इसके और भयावह होने की आशंका है. बाढ़ ने हमारे आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल खोलकर रख दी है. नेपाल और पड़ोसी floodsराज्यों से  आने वाले पानी से प्रतिवर्ष तबाही होती है. साल बदलते जाते हैं, लेकिन बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम जैसे राज्यों में बाढ़ से तबाही की कहानी नहीं बदलती.  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान यह स्वीकार करता है कि विनाशकारी बाढ़ के मुख्य कारण भारी वर्षा, जलग्रहण की दयनीय दशा, अपर्याप्त जल निकासी एवं बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाये गये बांधों का टूटना है. विडंबना है कि इस संकट का स्थायी और सार्थक समाधान अब तक नहीं निकल पाया है. खबरों के अनुसार सिर्फ़ बिहार के 18 जिलों  में बाढ़ से 440 लोगों की मौत हो चुकी है. एक करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है.

पश्चिम बंगाल के 14 जिले बाढ़ ग्रस्त है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के दर्जन भर जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, असम के 32 में से 25 जिले बाढ़ग्रस्त हैं. तटबंध के टूटने से गांव के गांव जलमग्न हो गये हैं. हज़ारों लोग विस्थापित हो गये हैं. लाखों एकड़ खेत पानी में डूब गए हैं और फसलें बर्बाद हो गई हैं. जगह-जगह सड़कें तालाब में बदल गई हैं. यातायात रुक गया है. न जाने कितने मवेशी बाढ़ में बह गये हैं. बाढ़ से होने वाली बर्बादी को रोकने के लिए सरकारें तटबंधों को अंतिम हल मान लेती हैं. लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे तटबंधों का विस्तार हुआ है, धारा बाधित होने से नदियां बेलगाम हुर्इं और इसी के साथ बाढ़ की समस्या भी बढ़ती गई है. जल प्रबंधन में लगातार हो रही चूक से बाढ़ का संकट बढ़ा है.

उत्तर बिहार में बहने वाली लगभग सभी नदियाँ जैसे-घाघरा, गंडक, बागमती, कमला, कोसी, महानंदा आदि नेपाल के विभिन्न भागों से आती हैं और खड़ी ढाल होने के कारण अपने बहाव के साथ अत्यधिक मात्रा में गाद लाती हैं, वह मिट्टी-गाद फरक्का जाते-जाते रुक जाता है, क्योंकि नदी का स्वाभाविक प्रवाह वहाँ रुक जाता है. फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से इसमें गाद जमा होने की दर कई गुना बढ़ गई है. गाद और मिट्टी बैराज के पास जमा होता है. यही गाद बिहार में बाढ़ का कारण बनता है. बैराज बनने के बाद कभी भी यहाँ से गाद नहीं निकाला गया. आजादी के बाद जब इस बैराज पर चर्चा हुई तब पश्चिम बंगाल सरकार के लिए काम कर रहे अभियंता प्रमुख कपिल भट्टाचार्य ने इसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट दी थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि फरक्का बैराज के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर, पटना, बरौनी, उत्तरी मुंगेर जैसे इलाके बाढ़ के पानी में डूब जाएंगे. वहीं, बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) मे सूखे की स्थिति पैदा होगी. लेकिन, तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने उनकी बात को नज़रअंदाज कर दिया.

बिहार का लगभग 73 प्रतिशत भू-भाग बाढ़ के खतरे वाला इलाका है. पूरे उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ के प्रकोप की आशंका बनी रहती है. बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष बिहार बर्बादी, अनैच्छिक विस्थापन और बड़े पैमाने पर जान-माल, पशु, फ़सल एवं इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान झेलता है. फरक्का बैराज बनने का हश्र यह हुआ कि उत्तर बिहार में गंगा किनारे दियारा इलाके में बाढ़ स्थायी हो गयी. जब यह बैराज नहीं था तो हर साल बरसात के तेज पानी की धारा के कारण 150 से 200 फीट गहराई तक प्राकृतिक  रूप से गंगा नदी की उड़ाही हो जाती थी. जब से फरक्का बैराज बना सिल्ट(गाद) की उड़ाही की यह प्रक्रिया रुक गई और नदी का तल ऊपर उठता गया. सहायक नदियाँ भी बुरी तरह प्रभावित हुईं हैं. जब नदी की गहराई कम होती है तो पानी फैलता है और कटाव तथा बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता को बढ़ाता जाता है.  नदियों पर बने बांध-बराजों के कारण नदी में गाद जमा होने, मिट्टी के टीले बनने, तटबंधों और कगारों के टूटने जैसी समस्याओं का समाधान जरूरी हो गया है. फरक्का बैराज, गंगा जल मार्ग और कोसी हाइ डैम जैसी परियोजनाओं को रोक कर नदी कि अविरल धारा को पुनः स्थापित करना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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