Category: विरासत

जय जय जगन्नाथ

jagannath mandir 1भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है।  धुर्वा में 250 फीट की ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस भव्य नयनाभिराम मंदिर की ऊंचाई करीब सौ फीट है। बड़कागढ़ के ठाकुर महाराजा रामशाह के पुत्र ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने 25 दिसंबर, 1691 में इसका निर्माण करवाया था। मंदिर की वास्तुशिल्पीय बनावट पुरी के जगन्नाथ मंदिर से मिलती-जुलती है। मुख्य मंदिर से आधे किमी की दूरी पर मौसीबाड़ी का निर्माण किया गया है। चारों तरफ हरियाली और मंदिर तक जाने के लिए बना  पथ श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।  भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रतिदिन पूजा-आराधना होती है। मंदिर में आचार-व्यवहार पूजा पद्धति वैष्णव, बौद्ध, शैव और जैन धर्मावलम्बियों द्वारा प्रभावित है। मंदिर परिसर में हर दिन कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव होता रहता है।

भगवान जगन्नाथ के मंदिर निर्माण की कहानी काफी रोचक है। ऐनीनाथ राजा रामशाह की बड़ी रानी मुक्ता देवी के पुत्र थे। नागवंशी परम्परा के अनुसार पिता के निधन के बाद राजा बने। राजा ऐनीनाथ शाहदेव चाहते थे कि उनकी प्रजा यहीं की भूमि पर भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन करे इसलिए राजा पैदल चलकर पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर गये। वहाँ कुछ समय बिताया। एक दिन स्वप्न में खुद भगवान जगन्नाथ ने  दर्शन दिया और रांची में भगवान जगन्नाथ के मंदिर की स्थापना करने को कहा। वापस रांची लौटने के बाद उन्होंने धुर्वा स्थित ऊंचे पहाड़ पर इस मंदिर की स्थापना की। मंदिर का निर्माण सुर्खी-चूना की सहायता से प्रस्तर के खण्डों द्वारा किया गया है तथा कार्निश एवं शिखर के निर्माण में पतली ईंट का भी प्रयोग किया गया था।

वर्ष 1992 में हुआ था जीर्णोद्धार : 6 अगस्त, 1990 को मंदिर पिछला हिस्सा ढह गया था, जिसका पुनर्निर्माण कर फरवरी, 1992 में मंदिर को भव्य रूप दिया गया। बिहार सरकार और श्रद्धालुओं के सहयोग से इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। कलिंग शैली पर इस विशाल मंदिर का पुनर्निर्माण करीब एक करोड़ की लागत से हुआ है। इस मंदिर में प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। एक ओर जहां अन्य मंदिरों में मूर्तियां मिट्टी या पत्थर की बनी होती है, वहीं यहां भगवान की मूर्तियां काष्ठ (लकड़ी) से बनी हैं। इन विशाल प्रतिमाओं के आस-पास धातु से बनी बंशीधर की मूर्तियाँ भी हैं, जो मराठाओं से यहाँ के नागवंशी राजाओं ने विजय चिह्न के रूप में प्राप्त किये थे। यहाँ मंदिर की दीवारों में बनाये गये भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्तियाँ बहुत  खूबसूरत और आकर्षक हैं। जगन्नाथ मंदिर न्यास समिति की देखरेख में 1987 में एक विशाल छज्जे का निर्माण किया गया था,  जहाँ अब एक विशाल भवन बन गया है। इस मंदिर में पूजा से लेकर भोग चढ़ाने का विधि-विधान पुरी जगन्नाथ मंदिर जैसा ही है। गर्भ गृह के आगे भोग गृह है। भोग गृह के पहले गरुड़ मंदिर हैं, जहा बीच में गरुड़जी विराजमान हैं। गरुड़ मंदिर के आगे चौकीदार मंदिर है। ये चारों मंदिर एक साथ बने हुए हैं। 1869-1872 के सर्वे में जगन्नाथ स्वामी के सम्मान में मूल भुसुर गांव का एक भाग अलग कर जगन्नाथपुर के नाम से दूसरे गांव की स्थापना की गयी। मूल भुसुर गांव के दूसरे भाग को मंदिर निर्माता ठाकुर ऐनीनाथ के सम्मान में आनी गांव के रूप में स्थापित किया गया। वर्तमान में जगन्नाथपुर और आनी गांव में ही रथ यात्रा मेला लगता है। रथ यात्रा के दौरान यहां का नजारा  विहंगम होता है। एचईसी के निर्माण के बाद इस क्षेत्र का भूगोल तेजी से बदलने लगा और फिर आसपास भी विस्थापितों की बस्ती बसने लगी और मंदिर-मेले की जमीन सिकुड़ती गई। फिर भी, मेले की भव्यता में कोई कमी नहीं आयी है।

327 साल पुरानी है रथयात्रा की परम्परा : रथयात्रा झारखंड का सबसे बड़ा ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व का पर्व है।  रथयात्रा का इतिहास भी नागवंशी राजाओं से ही जुड़ा है।  रथयात्रा का शुभारम्भ वर्ष 1691 में हुआ था तभी से ही यहां रथयात्रा की यह परंपरा चली आ रही है।  रथयात्रा में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। यहां आनेवाले श्रद्धालुओं में झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के ग्रामीणों की संख्या ज्यादा होती है।रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनrath melaमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं। रथयात्रा के पीछे मान्यता है कि सभी श्रद्धालु मंदिर में प्रभु का दर्शन नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से जन साधारण को दर्शन देने के लिए भगवान रथ पर दर्शन यात्रा पर निकलते हैं। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है।  हर वर्ष नया सराय का रहनेवाले लोहार परिवार ही रथयात्रा के लिए भगवान के रथ को तैयार करता है। रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या काँटा, किसी भी धातु को नहीं लगाया जाता। रथ की मरम्मत रथयात्रा के एक महीने पहले से ही शुरू कर दी जाती है। इस वर्ष रथ निर्माण का काम महावीर लोहार को सौंपा गया है। भगवान जगन्नाथ के रथ को 1691 से ही इनके पूर्वज रथ की मरम्मत करते आये हैं। मंदिर के लिए बना ट्रस्ट सम्पूर्ण रथ यात्रा तथा मेले का कार्य देखता है।

सामुदायिक पर्व : वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व है। आस्था के साथ-साथ सम्मिलित विश्वास का प्रतीक भी है। रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता है। पहले हर जाति और धर्म के लोग मिल-जुलकर रथयात्रा का आयोजन करते थे। भगवान जगन्नाथ को जहां घांसी जाति के लोग फूल मुहैया कराते थे, वहीं उरांव घंटी प्रदान करते थे। राजवर जाति द्वारा विग्रहों को रथ पर सजाया जाता था। मिट्टी के बर्तन कुम्हार देते थे। बढ़ई और लोहार रथ का निर्माण करते थे तो करंज का तेल पाहन देते थे। मंदिर की पहरेदारी मुस्लिम किया करते थे। भक्तों में रथ से बंधी रस्सी को छूने की होड़ रहती है। आधा किलोमीटर का रथयात्रा का सफर डेढ़ घंटे में पूरा होता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी को खिंचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। रथयात्रा से जुडी एक मान्यता है कि पुरी में जब राजा इंद्रद्युम्न  ने भगवान के विग्रहों की स्थापना की थी। उस समय रानी गुंडिचा ने प्रभु से आराधना की थी कि कुछ समय के लिए वह भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ उनके यहां वास करें। भगवान ने रानी गुंडिचा को स्वपन में दर्शन दिए और वचन दिया कि वे आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जनसाधारण को दर्शन देते हुए उनके यहां आकर विश्राम करेंगे और नौ दिनों के बाद एकादशी के दिन रथ से मंदिर लौट जाएंगे।

जगन्नाथ मेला : झारखंड के श्रावणी मेला के बाद रांची के धुर्वा में लगने वाला जगन्नाथ मेला राज्य का सबसे बड़ा मेला है। इस रथ यात्रा मेले की खासियत यह है कि इसमें बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों के लोग भी शामिल होते हैं। झारखंड के अलावा पड़ोसी राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, यूपी से यहां आने वाले दुकानदार अपनी दुकानें लगाते हैं। सैकड़ों स्टाल लगते हैं। बर्तन, मिठाई, लोहे का सामान, तलवार, कटार, लकड़ी का सामान आदि की बिक्री यहां खूब होती है। पारंपरिक हथियार तीर-धनुष की भी यहां खरीदारी होती है। झूले से लेकर अन्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं। ये लोग जय जगन्नाथ के जयकारे के साथ घुरती रथयात्रा के बाद विदा हो जाते हैं।

गुलजार रहेगा मेला क्षेत्र : आज ऐतिहासिक रथ यात्रा निकलेगी। जयघोष के बीच भगवान चांदी का मुकुट धारण किए प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथारुढ़ होकर मौसीबाड़ी जाएंगे। वे वहां नौ दिन रहेंगे। इन नौ दिनों तक मंदिर परिसर में मेला लगेगा। 23 जुलाई को घुरती रथ मेला होगा। मौसीबाड़ी से हजारों भक्त रथ खींचते हुए भगवान को मुख्य मंदिर पहुंचाएंगे। आज से लेकर  23 जुलाई तक मेला क्षेत्र गुलजार रहेगा।

 

✍ हिमकर श्याम

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144 साल के इतिहास का गवाह संत पॉल चर्च

st paul churchरांची के बहू बाजार स्थित 144 वर्ष पुराना संत पॉल कैथेड्रल चर्च आज भी अपने इतिहास की गौरवगाथा बयां करता है. स्थापत्य कला के लिहाज से जितना अद्भुत यह चर्च है, इसका इतिहास भी उतना ही अद्भुत है. पहले यहां एक झोपड़ी थी, जिसमें आराधना होती थी. फरवरी 1870 में पक्का आराधनालय बनाने का निर्णय लिया गया. जनरल रॉलेट के द्वारा चर्च की रूपरेखा तैयार की गयी थी. चर्च की नींव छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर आयुक्त ईटी डॉलटन द्वारा 1 सितंबर 1870 ई में रखी गयी. तीन साल में चर्च बन कर तैयार हुआ. शनिवार, 9 मार्च 1873 को नवनिर्मित महागिरजाघर का विधिवत संस्कार एवं उद्घाटन हुआ.  इस कैथेड्रल चर्च का नामकरण संत पॉल के नाम पर किया गया है. हर रविवार को यहां हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा में प्रार्थना होती है. विश्वासियों को यहाँ आकर एक सुकून की अनुभूति होती है.

रांची के लोगों ने दिए थे 4 हजार रूपये : चर्च का निर्माण 26 हजार रुपए में हुआ था. आर्थर हेजोर्ग ने इस कैथेड्रल चर्च के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. रांची के लोगों ने चर्च के लिए 4 हजार रूपये दिए थे. जनरल एडवर्ड टी डॉल्टन, बिशप रॉबर्ट मीलमैन और भारत सरकार की ओर से भी आर्थिक सहयोग मिला था. डॉलटन ने 3000 और मीलमैन ने 2000 रूपये दिए थे. चर्च के निर्माण की तिथि, कुल अनुमानित लागत तथा दानदाताओं की एक सूची बोतल में बंद कर चर्च के नींव में डाल दी गई थी. 10 मार्च , 1873 ई. को बिशप मीलमैन के द्वारा पांच भारतीय पुरोहितों की नियुक्ति की गयी. मीलमैन कोलकाता के बिशप तथा भारत, श्रीलंका और वर्मा के एंग्लीकन मेट्रोपोलिटन थे. छोटानागपुर को डायसिस के रूप में संगठित करने में उनका अहम योगदान था. चर्च के प्रथम बिशप जेसी हिटली और प्रथम भारतीय पुरोहित रेव्ह. विलियम लूथर डेविड सिंह थे. 1980 तक छोटानागपुर में भारतीय पुरोहितों के साथ इस चर्च की सदस्यता लगभग 10600 लोगों की हो गयी.

ख़ूबसूरत स्थापत्य : यह ऐतिहासिक चर्च स्थापत्य कला का एक ख़ूबसूरत नमूना है जो पतले सीधे खड़े खम्भे, मेहराब और सम्भार के सहारे सुसज्जित है. इसकी ऊँचाई 120 फीट है. शीर्ष पर 10 फीट ऊँचा, 2 फीट मोटा पत्थर का स्तम्भ बैठाया गया है. शीर्ष पर ही एक 5 फीट की छड़ है, जिसपर तीन फीट का तीर है जो क्रूस के रूप में वायु की दिशा के अनुरूप घूमता रहता है. छत लकड़ी की है, खिड़कियाँ कांच की हैं. प्रवेश द्वार से अंदर आने पर दाहिने ओर बपतिस्मा कुंड संगमरमर पत्थर से निर्मित है. बच्चों का बपतिस्मा चर्च के अन्दर ही होता है. चर्च में एक सभागृह और संगमरमर पत्थर से बनी वेदी है. वेदी के ऊपरी भाग को आर्क का आकार दिया गया है. वेदी में स्थापित कैथेड्रल चर्च की विशेषता का प्रतीक है. कैथेड्रल लैटिन शब्द कैथेड्रा से निकला है, जिसका अर्थ है बिशप का सिंहासन. यह छोटानागपुर का मुख्य ड़ायसिस है. बिशप इनका प्रमुख होता है. वेदी से नीचे पुरहोहितों के लिए कुर्सियां रखी गईं हैं. चर्च के अंदरूनी हिस्से में यूरोपीय शैली की पेंटिंग्स लगी हैं, जिसमें ईसा मसीह के जीवन की झलकियों के सजीव चित्र उकेरे गये हैं. चर्च के अंदर एक घेरा बना है, जहां विश्वासी वेदी के सामने घुटना टेकते हैं. पहले यह पीतल का था. 1980 में पीतल का घेरा चोरी होने के बाद उस स्थान पर स्टील का घेरा लगा दिया गया. चर्च परिसर में लोहे की एक खूबसूरत नाव बनी हुई है. यह उन मिशनरियों की याद में बनाया गया है, जो 18 वीं सदी में भारत आए थे. चर्च की इमारत के अंदर बिशप दिलवर हंस और बिशप जेड जे तेरोम की कब्रें हैं. चूंकि बिशप का जीवन मानवता की सेवा के साथ प्रभु की आराधना में गुजरता है, इसलिए उनका पार्थिव शरीर का दफन संस्कार कैथेड्रल में करने की परंपरा है.

रानी पाइप ऑर्गन : इस गिरिजाघर में दो हजार साल पहले का यूनानी वाद्य यंत्र भी है, जिसे 1860 में लाया गया था. इसे रानी पाइप ऑर्गन कहा जाता है. ऑर्गन में लगी पाइप बांसुरी की तरह ही है. 56-56 की संख्या में की-बोर्ड हैं. इससे 11 तरह की धुनें निकलती हैं. इसे बजाने में हाथ-पैर दोनों का उपयोग होता है. पाइप आर्गन चर्च की शान है, पहचान है. इसे उपासना वेदी के दाहिने ओर रखा गया है. चर्च में दो घंटियाँ हैं. एक बड़ी है, दूसरी छोटी. इन्हें क्रमशः अनुष्ठान से आधे घण्टे पूर्व और अनुष्ठान के शुरू होने पर बजाया जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि जब जनसंख्या कम थी, इतने मकान नहीं थे तो इस पाइप ऑर्गन की मधुर धुन और चर्च की घंटी आसपास के इलाकों में सुनी जा सकती थी.

✍ हिमकर श्याम

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गोथिक शैली में बना है झारखण्ड का पहला चर्च

रांची के मुख्य मार्गGEL Church पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है. स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है. गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर की भव्य इमारत देखने लायक़ है.  इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है. इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे. इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ. 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की. ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है. ईसाई धर्मावलंबियों को  यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है.

चर्च शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है ‘प्रभु का’.  चर्च के अतिरिक्त कीलिसिया शब्द भी चलता है. यह यूनानी बाइबिल के एक्लेसिया शब्द का विकृत रूप है, बाइबिल में इसका अर्थ है किसी स्थान विशेष अथवा विश्व भर के ईसाईयों का समुदाय. बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा. ईसाई मिशनरियों का झारखंड  पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है. ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं. भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च. गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जमर्नी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था. इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनायी थी. उन्होंने पैस्टर और उनके मिशनरी साथियों ऐमिलो स्कॉच, अगस्त ब्रॉट और थियोडर जैक को वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था. लेकिन तत्कालीन कारणों से चारों मिशनरी यहाँ आ गये. इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था.  रांची के गोस्सनर कंपाउंड में कैंप करने के बाद चारों मिशनरियों ने धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया. छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी.

वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च. 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ. इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया. जीईएल चर्च छोटानागपुर असम के पूर्वज विश्वासियों ने 10 जुलाई 1919 को ऑटोनोमी के नाम पर जीईएल चर्च और मसीही समाज की जिम्मेवारी ली. पूर्वजों ने यह घोषणा तब की, जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया. तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया.

जेईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही  अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है. चर्च द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं. घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है. झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है. ‘घरबंधु’  पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही. पाक्षिक ‘घरबंधु’, अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है. घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं. जेइएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है. इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे.

जीइएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है. यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है. इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है. मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ. वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया. बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है. धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई. अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है.  जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है. देश के 12 राज्यों में जीइएल चर्च की 1896 शाखायें है. जीइएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है.

जीइएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल)  व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार  1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी. 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी. संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे. 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे. छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही.

ईसाई  मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ. यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था. लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे. यहां के आदिवासियों की अज्ञानता और गरीबी दूर करने की कोशिश की. इसके लिए उनकी भाषा, संस्कृत और परंपरा को अपनाया. रांची शहर के चारों ओर इनके सेवा कार्य क्षेत्रों का विस्तार होता गया. मिशनरियों ने प्राथमिकता के साथ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प लिया. शिक्षा और स्वास्थ्य की समर्पित सेवा लोगों के बीच दी. तब आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी. जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था. बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे. आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे.  आदिवासियों को मिशनरियों में शोषण से मुक्ति का मार्ग नजर आने लगा़. इससे आदिवासी समुदाय का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा ईसाईयत की ओर आकृष्ट हुआ.

ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस चर्च ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के  समय इस चर्च पर भी हमला हुआ था. इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से गोले दागे गए थे, किन्तु कोई विशेष क्षति नहीं हुई.  हमले के निशान आज भी चर्च भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं. क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था. विषम परिस्थिति से बचने के लिए चर्च के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी. उस वक़्त चर्च के हारेलोहर साहब ने अपनी  बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था.

 

✍ हिमकर श्याम

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पुरातात्विक धरोहरों को पहचानने और बचाने की पहल

 

झारखण्ड की छवि नकारात्मक प्रदेश की रही है जबकि यह आश्चर्यों से भरा प्रदेश है, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है. एक ओर यहाँ सुरम्य घाटियां, झरने, नदियाँ  और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएँ हैं. रत्नगर्भा धरती है, वहीं दूसरी ओर प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियाँ  हैं. हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है. भारतीय भूभाग में मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में हुआ. पूरे झारखंड में इस तरहimg-20170110-wa0089 बिखरे ऐतिहासिक अवशेषों, सांस्कृतिक साक्ष्यों और स्थापत्य कला की दृष्टि से उल्लेखनीय कृतियों से यहाँ के अतीत और लोकजीवन के विविध पक्षों को जाना जा सकता है. पुरातात्विक दृष्टि से झारखंड अत्यंत समृद्ध है. समय-समय पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा यहाँ जो अन्वेषण कार्य हुए उसमें पूर्व, मध्य एवं उत्तर पाषाण कालीन एवं नव पाषाण कालीन प्रस्तर के औजार काफी बड़ी संख्या में मिले हैं. यहाँ पत्थर और अन्य उपकरण, सभ्यताओं के प्रारंभिक वर्षों से 3000 से अधिक वर्ष पहले के हैं. प्राच्य पाषाण कालीन प्रस्तर आयुध इस तथ्य को प्रगट करते कि आदि मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे. प्राचीन सभ्यता में हड़प्पा की मौजूदगी का भी प्रमाण है. प्रदेश में अनेक छोटे-बड़े प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक पुरातात्विक अवशेष हैं जो यहाँ की स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रागैतिहासिक गुफाओं में मिले भित्ति चित्र जनजातियों के चित्रकलाओं से मिलती-जुलती हैं. भारत के सबसे पुराने गुफा चित्रों को बनानेवाले को झारखंड के शबर जनजाति के रूप में जाना जाता है.

हजारीबाग से लगभग 42 किलोमीटर दूर इस्को के पास पहाड़ी गुफाओं में प्राचीनतम शैल चित्र पाये गये हैं जो बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बनाये गये हैं. स्थानीय लोग इस्को के इस गुफा को राजा-रानी के कोहबर के रूप में जानते हैं. सिन्धु घाटी के समय के बर्तनों पर जिस तरह की आकृतियां बनी हैं उनसे मिलती-जुलती आकृतियां चाय-चंपा के शिल्पों में पायी गई हैं. संतालों के मौलिक इतिहास के संकेत करम विनती में मिलते हैं. इसमें चाय-चंपा के किले और उसमें बने शैलचित्रों की सुन्दरता का जिक्र है. सिन्धु लिपि, हजारों वर्षों से संताल परगना के आदिवासी समाज के बीच अज्ञातवास कर रही हैं. स्वयं संतालों को भी इसकी जानकारी नहीं है. सिंधुलिपि के भित्ति चित्रों, मुहरों में अंकित संकेत तथा शिलाओं पर उकेरे चित्रादि संताल आदिवासी समाज के पूजानुष्ठानों में भूमि पर खींची जानेवाली आकृतियों से मिलती-जुलती हैं. बिहार प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी निर्मल कुमार वर्मा ने दो दशक पूर्व सिन्धु लिपि पढ़ लिए जाने की बात सार्वजनिक कर हलचल मचा दी थी. 1992 में श्री वर्मा के असमय निधन के कारण इतिहास के गर्भ में छिपा यह रहस्य, रहस्य बनकर ही रह गया. यदि श्री वर्मा आज जीवित होते तो निश्चिय ही दुनिया के इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन आ जाता. शायद इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता. विडंबना है कि श्री वर्मा के शोध की गंभीरता पर राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी ध्यान नहीं दिया. अगाध पुरातात्विक संभावनाओं वाले झारखंड राज्य के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए व्यापक व गहन सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन जरूरी है. अब तक जो हुआ है, उससे झारखंड के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास क्रम को जान पाना संभव नहीं है. इतिहास के काल की कई कड़ियां अभी भी गुम हैं.

भारतीय पुरातत्व में असुर शब्द का प्रयोग झारखंड के रांची, गुमला और लोहरदगा  जिलों के कई स्थलों की ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रयुक्त होता है. आज भी लोहरदगा, चैनपुर, आदि इलाकों में असुर नामक जनजाति रहती है. वह लोहा गलानेवाली और लोहे के सामान तैयार करने वाली जाति के रूप में मशहूर है. उस जाति के पुरखे यहाँ बसते थे, उन स्थानों से ईंट से निर्मित प्राचीन भवन, अस्थि कलश, प्राचीन पोखर आदि प्राप्त हुए हैं. के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं. झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. असुर असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी.

प्रारम्भिक पत्थरों के औजारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में सम्भवतः अर्धमानवों का निवास था. वे गुफाओं में रहते थे; उस काल के देवघर, बोकारो, राँची आदि क्षेत्र में पुरापाषाण कालीन औजारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि पुरापाषाणकालीन संस्कृति का आश्रय इस झारखण्ड में भी था. इसके बाद की झारखण्ड सम्बन्धी ऐतिहासिक जानकारी संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों और मध्यकालीन फारसी के इतिहास ग्रंथों में मिलती है. इन सब सूत्रों से झारखण्ड के इतिहास की जानकारी विस्तार से अथवा संक्षिप्त तौर पर मिलती है. देवघर के बैद्यनाथ धाम और तपोवन, दुमका के वासुकी नाथ और राजमहल के राजेश्वरीनाथ जैसे शिवतीर्थों का वर्णन पुराणों में मिलता है. वास्तव में झारखण्ड का इतिहास पुराण युग से बहुत पुराना है. महाभारत के ‘दिग्विजय पर्व’ में इस क्षेत्र को ‘पुंडरीक देश’ कहा गया है. इसी ग्रंथ में इसे ‘पशुभूमि’ भी कहा गया है. अबुल फजल कृत अकबरनामा में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘झारखण्ड’ कहा गया. शम्स-ए-शिराज अफीफ, सल्लिमुल्ला तथा गुलाम हुसैन आदि लेखकों ने अपने ग्रंथ में ‘झारखण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है. कबीरदास के एक पद में झारखण्ड का जिक्र हैः

कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी कासी!

झारखण्ड में आय विराजे वृंदावन की वासी!!

झारखण्ड राज्य वनों से आच्छादित है तथा इस राज्य में अपेक्षाकृत अनुसूचित जनजाति के लोगों का निवास अधिक है. इन लोगों की परंपरा, संस्कृति, कला, लोकगीत, बर्तन, विवाह गीत को भी सहेजने की जरूरत है. झारखंड की धरोहर, इसकी संस्कृति को जानना-समझना बेहद जरूरी है. झारखंड की विरासत को जनमानस के मध्य जागरूकता बनाये रखने के लिए पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद व युवा कार्य विभाग, इंडियन आर्कियोलॉजी सोसाइटी और हेरिटेज झारखण्ड संस्था के संयुक्त तत्वावधान में छह से आठ जनवरी तक रांची में राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के पुरातत्वविदों के अलावा अमेरिका, इंगलैंड और इरान से भी पुरातत्व विशेषज्ञ भी शामिल हुए.

संगोष्ठी समारोह में पर्यटन, कला-संस्कृति, खेद-कूद एवं युवा विभाग मंत्री अमर कुमार बाउरी ने कहा कि झारखंड में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ के बारे में लोगों को मालूम नहीं. उन पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानना उनकी खोज करना आवश्यक है. इतिहास को जानकर ही हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं. झारखंड में ऐसे भी ऐतिहासिक स्थल पाये गये जो कि रामायण, महाभारत एवं मुगलकाल के इतिहास की कहानी कहते हैं. उस काल के स्थल आज भी विद्यमान हैं. इस मौके पर हेरीटेज झारखंड संस्था के अध्यक्ष एच एस पांडेय ने कहा कि पुरातत्व हमारे लिये एक दर्पण की तरह है. झारखंड में अंग, बंग, शुंग सबकी संस्कृति के तत्व बिखरे पड़े हैं उन पर समग्र अध्ययन होनी चाहिये. पुरातत्व वह माध्यम है जो उन तत्वों एवं तथ्यों का संग्रह करता है और हमारे इतिहास को सुरक्षित करता है. अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश पांडेय ने कहा कि विवि में पुरातत्व विभाग नियमित होगा और इस दिशा में ठोस काम किया जाएगा. उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही कला संकाय भी खुलेगा. वहीं हेरिटेज झारखंड के सचिव डॉ एचपी सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य ही था कि लोगों को पता चले कि पुरातत्व भी एक विषय है. इसे मुख्यधारा में लाया जाए. हम अपनी धरोहरों को जाने-पहचाने और संरक्षित करने की दिशा में काम करें. उन्होंने कहा कि हेरिटेज झारखंड के माध्यम से पुरातत्व के प्रति लोगों में अलख जगाते रहेंगे और नए लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा.

मौके पर दो पुस्तकों पुरातत्व एवं एब्सटैक्ट का विमोचन भी किया गया. संगोष्ठी में इण्डियन ऑर्कियोलोजिकल सोसायटी के अध्यक्ष केएन दीक्षित, सोसायटी फॉर प्री-हिस्ट्री एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज के प्रतिनिधि डॉ पीपी जोगलेकर, इण्डियन हिस्ट्री एण्ड कल्चर सोसायटी के प्रतिनिधि प्रो डीपी तिवारी ने भी  अपने विचार रखे. तीन दिनी राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी में देश-विदेश के करीब 150 पुराविदों ने शिरकत की.

पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों में इतिहास की कड़ियाँ झारखंड से जुड़ती रही हैं. यहाँ का समृद्ध, सभ्य अस्तित्व, मानव समाज और उनके सांस्कृतिक तरीके, गुफाओं में जीवित रहने के तरीके, स्मारक, चट्टानी कला में आश्रयों (पेट्रोग्राफ) के रहस्य जानना जरूरी है. पुरातात्विक महत्व के स्थलों व वस्तुओं को सहेजने और उसे सुरक्षित रखने में आम लोगों की सहभागिता भी आवश्यक है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ जितनी भी कवायद कर लें, बिना आमजन के सहयोग से यह कार्य संभव नहीं है. हमें भविष्य को संवारने के लिए अतीत को याद रखना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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