Category: राजनीति

इस जीत के मायने

यूपी और उतराखंड के चुनाव नतीजे से यह साफelection हो गया कि 2019 में भाजपा की वापसी तय है. मोदी की लोकप्रियता घटने की बजाए बढ़ी है. नतीजों से भाजपा खुदअचंभित है वहीं विपक्षियों में अब भय दिखने लगा है. गोवा में कम सीटें मिलने के बाद भी भाजपा की सरकार बन गई और मणिपुर में पार्टी को सरकार बनाने का न्योता मिला है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बहुमत तक पहुंचते-पहुंचते रह गयी थी. जाहिर है यहां सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का खेल करना था. इस खेल में भी भाजपा बाजी मार गई और कांग्रेस जीत कर भी हार गई. भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन होती जा रही है. यह स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन इस वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है. विपक्ष कमजोर हो तो सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है. मोदी को रोकने के लिए विपक्ष को गोलबंद होना पड़ेगा, पर उसके पहले प्रभावी मुद्दों और प्रभावी नेतृत्व को तलाशना होगा.

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बने पौने तीन साल हो गए हैं. इन सालों में विपक्षी दल एकता की कोई धुरी नहीं खोज पाए हैं. विपक्ष में एकजुटता की बजाय बिखराव आया है. विपक्ष का बिखराव मोदी को ताकत दे रहा है. लोकसभा चुनावों में अब करीब दो साल बचे हैं. कांग्रेस की वापसी के कोई संकेत नहीं हैं. उल्टे वो देशभर में अपनी बची-खुची जमीन भी खोती जा रही है. नतीजों ने राहुल के नेतृत्व की राजनीतिक परिपक्वता और पार्टी से बाहर स्वीकार्यता, दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है. हालाँकि कांग्रेस को पंजाब में जीत हासिल हुई, लेकिन इस जीत का सारा श्रेय कैप्टन अमरेंदर सिंह की लोकप्रियता और मेहनत को जाता है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता अरुण जेटली को तब हराया था जब पूरा देश नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार था. यूपी-उतराखंड जितने,  गोवा में सरकार बनाने और कम सीटों के बावजूद मणिपुर में सरकार बनाने का न्योता  मिलने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों का 15 राज्यों में शासन हो जाएगा. गोवा विधानसभा चुनावों के नतीजों में कांग्रेस के 17 विधायक हैं जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 13 है. गोवा में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा है. नतीजो के बाद जो स्कोर 3-2 से 4-1  का हो गया है.

कांग्रेस के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा होता जा रहा है. कांग्रेस की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. संगठन का अभाव और नेतृत्व की कमजोरी कांग्रेस संगठन को खोखला कर रहा है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ के उनके निर्णय पर कांग्रेस संगठन के भीतर विचार-विमर्श तक नहीं किया गया था. पार्टी में विचारधारा की कोई लड़ाई लड़ने की क्षमता तो बहुत पहले खत्म हो गई थी, अब नेतृत्व का संकट भी पैदा हो गया है. राहुल गांधी का नेतृत्व कोई उम्मीद या उत्साह नहीं जगा पा रहा है. राहुल गांधी वोट दिला सकते हैं,  इसका भरोसा उनकी पार्टी के ही लोगों को नहीं है तो दूसरे दलों को कैसे होगा?  कांग्रेस ने गांधी परिवार से खुद को इस तरह बांध रखा है कि वह नेता के लिए उससे आगे नहीं देख पाती. कांग्रेस को राहुल गांधी की क्षमताओं, उनकी संभावनाओं और सीमाओं पर वस्तुपरक ढंग से विचार करना चाहिए. कांग्रेस को नए सिरे से गढ़ना जरूरी है. कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है, तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा. कोई नये नेता को नेतृत्व सौंपना होगा. जमीनी स्तर पर काम करना होगा.

ये चुनाव नोटबंदी के बाद हुए. कांग्रेस ने नोटबंदी से लोगों को हुई मुश्किलों को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी, मगर असफल रही. बेशक नोटबंदी ऐसा फैसला था, जिससे लगभग हर शख्स प्रभावित हुआ. इसके बावजूद जनादेश भाजपा के पक्ष में गया. नोटबंदी से भले लोगों को तकलीफ थी लेकिन नाराज़गी नहीं थी. गौरतलब है कि महाराष्ट्र निकाय चुनाव और ओड़िशा में पंचायत चुनाव, दोनों नोटबंदी के बाद हुए. भाजपा को  इन दोनों  चुनावों में भी सफलता मिली थी. नोटबंदी के रूप में विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला था, जिसे उसने एकजुटता और मत भिन्नता के आभाव में गंवा दिया.

हर चुनाव अपने-आप में खास होता है, मगर इन पांच राज्यों पर इसलिए नजर थी, क्योंकि साल 2019 के लोकसभा चुनाव का रास्ता यहीं से आकार लेगा, खासकर उत्तर प्रदेश से. इस सूबे में सभी पार्टियों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ था. पार्टियों की साख के साथ-साथ यहां छवि की लड़ाई भी लड़ी गई थी. उत्तर प्रदेश का महत्व सिर्फ इसीलिए नहीं है कि यह देश का सबसे बड़ी आबादी वाला सूबा है या यहां सबसे ज्यादा 403 विधानसभा सीटें हैं. केंद्रीय राजनीति की दशा-दिशा का रुख यहीं से तय होता रहा है. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर बाकी के चार राज्यों के मुकाबले यहां के नतीजों का असर केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा पड़ेगा. इस जीत का सबसे पहला असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा. साथ ही राज्यसभा में भाजपा मजबूत होगी.

पांच राज्यों के चुनाव भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी के लिए काफी मायने रखता है. उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड या फिर गोवा भाजपा मोदी के नाम से ही चुनाव में उतरी थी. इन राज्यों में पार्टी ने कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दिया था. यूपी में मोदी ने पार्टी के कोर वोट में बड़ा बदलाव किया है. भाजपा अपने साथ सवर्णों और व्यापारी वर्ग की पार्टी के साथ पिछड़ी जाति और दलित जोड़े हैं. तीन तलाक के मुद्दे से मुस्लिम महिलाओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ. श्मशान-कब्रिस्तान और कसाब के जरिये भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण की बयार बहाने की कोशिश की और अपनी कोशिशों में कामयाब भी हुई. मणिपुर के नतीजों की बात करें तो यहाँ भाजपा के मत में 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि गोवा में बहुमत नहीं मिलना भाजपा के लिए झटका है.

2014 लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं चेतीं और यूपी उनके हाथ से निकल गया. नतीजों ने समाजवादियों का, पिछड़ी और दलित राजनीति का एक साथ ही सफाया कर दिया. समाजवादी और बहुजन समाजवादी दोनों ही खास जातियों के पक्षधर रहे हैं. समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा. जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं प्रो.रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए. मुलायम सिंह के नाम पर समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा था. अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष तो बन गये लेकिन पिछड़े और गरीब तबके का भरोसा जितने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा.  यूपी में मायावती का वोट बैंक भी खिसका है. वह दलितों और ब्राह्मणों को साधने में विफल रहीं.  बसपा की मुखिया मायावती को नये तरीके से खुद को तैयार करना होगा तथा दलित और मुसलमान मतदाताओं के गठजोड़ पर अपने फोकस के बारे में पुनर्विचार करना होगा. 27 साल सूबे की सत्ता से बाहर रहने के बावजूद मात्र सात सीटें ही हासिल कर पाई. कांग्रेस का यह अब तक सबसे खराब प्रदर्शन है. लोकसभा चुनाव में मोदी और बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में असफल रहे. कांग्रेस द्वारा उठाया गया गरीब-अमीर का मुद्दा भी नहीं चला. राहुल यह बात उठाते रहे कि मोदी गरीबों के नहीं पूंजीपतियों के समर्थक है, लेकिन लोगो ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. वहीं भाजपा ने गांव-गरीब, किसान और विकास को मुद्दा बना कर मतदाताओं को आकर्षित किया. साथ ही साम्प्रदायिकता को हवा देकर वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही.

भारतीय राजनीति एक व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमट गयी है.  मोदी का जलवा बरकरार है. यूपी में मोदी मैजिक और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग विपक्षी दलों पर हावी दिखी. यहाँ पार्टी की प्रचंड और ऐतिहासिक जीत से मोदी की छवि और मजबूत होकर उभरी है. मोदी ने यहाँ दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की थी. किसी विधानसभा चुनाव में किसी प्रधानमंत्री ने शायद ही इतनी रैलियां की हों. उत्तर प्रदेश के बरक्स बाकी के चार राज्यों के नतीजे का केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़नेवाला. पंजाब में भाजपा वैसे भी दूसरे दर्जे की पार्टी  थी, यहाँ उसके खोने के लिए कुछ था भी नहीं. अगर आम आदमी पार्टी यहां कुछ कर पाती तो अरविंद केजरीवाल मोदी-विरोध की राजनीति के एक मजबूत विकल्प बन कर उभरते.

इस समय कांग्रेस सहित लगभग सभी दल हाशिए पर आए हुए हैं, भाजपा का मजबूत विकल्प बनने के लिए विपक्षी एकता की  पहल जरूरी है. भाजपा की लगातार जीत का सीधा संदेश है गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति का अंत. विपक्ष को जिंदा रहना है तो उसको बेहतर गठबंधन बनाने होंगे. लोगों के मुद्दे उठाने होंगे. अगले सात आठ महीनों में मोदी के राज्य गुजरात और हिमाचल में चुनाव होना है. विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक इस नई राजनीतिक ताकत का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

✍ हिमकर श्याम

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राज्यसभा चुनाव में खरीद-फ़रोख्त !

jarkhandसत्ता ही लोकतंत्र है। संसदीय लोकतंत्र का मतलब ही सत्ता समीकरण हो गया है। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी, क्या क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दल, सब एक से नज़र आते हैं। कोई भी किसी से कम नहीं। बीजेपी वही सब कर रही है जिसके लिए कांग्रेस बदनाम रही है, ऐसा लगता है कि बीजेपी का पूरी तरह से कांग्रेसीकरण हो गया है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री रघुबर दास पर आरोप लगाया कि वे राज्य की दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में विधायकों की खरीद-फरोख्त में शामिल थे। मरांडी ने कुछ वीडियो और आडियो टेप जारी करते हुए रघुबर दास पर यह आरोप लगाया है। सच्चाई क्या है यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा लेकिन सीडी ने मामले को फिर से उछाल दिया है। राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ उससे चुनाव के तौर-तरीके, राजनीतिक मर्यादा-आचरण, विधायकों की दलीय प्रतिबद्धता पर सवाल तो पहले से ही उठ रहे हैं। राज्यसभा चुनाव का लेकर झारखंड पहले से बदनाम रहा है।

राज्य में 11 जून को राज्यसभा के लिए हुए मतदान में 81 सदस्यीय निवार्चित विधानसभा में कुल मतदान 79 हुआ था और इसमें भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी और महेश पोद्दार चुनाव जीत गये थे, जबकि झामुमो के बसंत सोरेन को पूरे विपक्ष के समर्थन के बावजूद भी हार का सामना करना पड़ा है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में वोटिंग से पहले पैसे, बाहुबल और तिकड़म का जमकर इस्तेमाल किया था। चुनाव में क्रास वोटिंग भी हुई थी। चुनाव से ठीक पहले विपक्ष के तीन विधायकों के खिलाफ अरेस्ट वॉरंट जारी किया गया था ताकि उन्हें वोटिंग में शरीक होने से से रोका जा सके। इसमें उसे सफलता भी मिली।

झारखंड में, राज्यसभा के चुनाव में यही सब होता आ रहा है। शायद ही कोई ऐसा चुनाव हो जो साफ सुथरे ढंग से और शुचिता के साथ हुआ हो। गौरतलब है कि 2012 में चुनाव आयोग ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए दो करोड़ रुपये से अधिक की नकदी जब्त होने के मद्देनजर झारखंड राज्यसभा चुनावों को रद्द कर दिया था और कहा था कि वहां चुनाव प्रक्रिया को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा है। चूंकि पहले से होता रहा है और सब यही करते हैं, ऐसा कह कर ग़लत को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि झारखंड में राजनीति के नाम पर षडयंत्र, कुचक्र और तिकड़मबाजी होती है।

राज्यसभा चुनाव में थैलियों का खेल भी नया नहीं है। संसद के इस ‘उच्च सदन’ के लिए राज्य, पार्टी, प्रतिष्ठा, परम्परा की परवाह नहीं की जाती। राज्यसभा की सीट हथियाने की खातिर राजनीतिक पार्टियाँ किसी हद तक जा सकती हैं। इसके लिए नेता विवेकशून्य हो जाते हैं, सारी मर्यादा भूल जाते हैं। सारे आदर्श पीछे छूट जाते है। नेताओं के लिए राजनीति जनकल्याण का माध्यम न होकर अर्थ साधना एवं भोग का माध्यम बन गई है। पिछले कुछेक वर्षों में यह प्रवृत्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। वैसे भी आज के नेताओं का मूल्यों और मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है। आम आदमी की बात, विकास की बात, रोजी-रोटी और बुनियादी जरूरतों की बात कोई नहीं करता।

राजनीति में अच्छे पद पाने के आकांक्षी पार्टी की विचारधारा और वफादारी पर समय व्यर्थ करने की अपेक्षा थैली का इन्तिजाम करने में जुटे रहते हैं। सत्ता की राजनीति में सिद्धांतों और आदर्शों की जरूरत नहीं। अच्छे, ईमानदार और समर्पित नेता-कार्यकर्ताओं की अब कोई पूछ नहीं होती। पहले देश में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव एक नियमित कार्यक्रम के तहत होने वाला सरकारी आयोजन सा होता था जिसमें सभी कुछ पहले से तय होता था और इन चुनावों में राजनीतिक पैंतरेबाजी की गुंजाइश नहीं होती थी।

राजनीति जब नकारो के हाथों में चली जाती है तो व्यवस्था का विघटन शुरू हो जाता है। गैरजवाबदेह और निरंकुश व्यवस्था स्थापित हो जाती है। राजनीति की मौजूदा शैली से लोकतांत्रिक व्यवस्था  चरमराने लगी है। राज्यसभा का न तो राज्यों से कोई सीधा संबंध रह गया है और न ही जनता से भी। राज्यसभा नेताओं के जेब का खिलौना बन गयी है, इसीलिए भ्रष्टाचार की सारी तरकीबें राज्यसभा के चुनाव में अपनायी जाती हैं।  झारखंड के अलावा राज्यसभा चुनावों को लेकर कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और हरियाणा में जो नौटंकी हुई, उसने नेताओं की छवि तो विकृत की ही, चुनाव आयोग को भी संदेह के घेरे में ला खड़ा किया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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स्वामी के बिगड़े बोल

भाजपा सांसद सुब्रमण्‍यम स्‍वामी को विवाद खड़ा करना और सुर्ख़ियों में बने रहना खूब आता है। इस काम में उन्हें महारत हासिल है। कांग्रेस के ख़िलाफ़ हमलावार रहे स्‍वामी अब अपनी ही पार्टी और सरकार के लिए परेशानी का सबब गए हैं। पार्टी आलाकमाswami2न स्वामी के बयानों से नाराज है, लेकिन इस बात को लेकर पार्टी दुविधा में है कि क्या कार्रवाई करे? पहले तो पार्टी स्वामी के बयानों पर पल्ला झाड़ती रही। फिर विवाद गहराता देख पीएम मोदी को कहना पड़ा कि किसी को भी पार्टी लाइन नहीं तोड़नी चाहिए।  यह ठीक-ठीक जान पाना मुश्किल है कि इस तरह की बयानबाजी के पीछे आखिर उनकी मंशा क्या है? वह किसके इशारे या शह पर ऐसा कर रहे हैं। स्वामी की बातों में आलोचना कम व्यक्तिगत खुन्नस ज्यादा दिखती है। भाजपा ने जब स्वामी को पार्टी में शामिल करने का मन बनाया था तब अरुण जेटली ने खुलकर विरोध किया था। जेटली, स्वामी को राज्य सभा में भेजने के पार्टी के फैसले से भी नाखुश थे। राजनीतिक हलको में यह चर्चा है कि स्वामी एक तीर के साथ दो शिकार कर रहे हैं। एक तरफ वो वित्त मंत्री अरुण जेटली से अपना पुराना हिसाब चुका रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ उनकी नजर आरबीआई के गवर्नर पद पर है। जिसपर वह अपने किसी पसंदीदा को बैठाना चाहते हैं। चर्चा है कि स्वामी आईआईएम बैंगलुरू के प्रोफ़ेसर आर वैद्यनाथन को आरबीआई का अगला गवर्नर बनवाना चाहते हैं।

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने वित्त मंत्रालय के खिलाफ़ मोर्चा सा खोल दिया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम उनके निशाने पर हैं। स्वामी ने सुब्रमण्यन अमेरिकी फार्मा कंपनियों का एजेंट बताते हुए आरोप लगाया है कि उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में   भारत के ख़िलाफ़ काम किया है। इतना ही नहीं वित्त मंत्री जेटली ने अरविंद का बचाव किया तो स्वामी ने जेटली पर भी निशाना साधने से भी नहीं चूके। आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास भी स्वामी के लपेटे में है। स्वामी का कहना है कि दास एक जमीन के सौदे में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की मदद की थी। स्‍वामी ने एक तरह से धमकी देते हुए कहा है कि उनके पास 27 ऐसे अफसरों की लिस्‍ट है जो केन्‍द्र सरकार में वरिष्‍ठ पदों पर हैं। स्वामी के लगातार हमलों के बाद ब्यूरोक्रेटस में खलबली मची हुई है।

कुछ दिनों पूर्व ही रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कार्यकाल न बढ़ाये जाने को लेकर स्वामी ने पीएम को लिखी थी। चिट्ठी में दावा किया था कि राजन का ग्रीन कार्ड दिखाता है कि वह मानसिक रूप से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं और ब्याज दर कम नहीं करने के उनके फैसले से उन्होंने जान बूझ कर  अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। उनके बयानों से आहत राजन ने  कार्यकाल ख़त्म होने के बाद शिकागो यूनिवर्सिटी लौटने की घोषणा की है। आगामी चार सितंबर को राजन का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। स्वामी इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं।

सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बीच दो वर्षों से तनातनी चल रही है। नीतियों को लेकर असहमति होना और व्यक्तिगत आरोप लगाना दोनों दो बातें हैं। ज्ञात हो कि रघुराम राजन ने दिल्ली के एक स्कूल से पढ़ाई की थी और फिर अमरीकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के बाद वह यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और आजकाल अवकाश पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर हैं। उनकी काबिलियत और मंशा पर शक नहीं किया जा सकता है।  2013 में राजन अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में गवर्नर बने थे। तब उन्होंने गिरते रुपए और घटते विदेशी मुद्रा भंडार को संभाला। अनियंत्रित हो गई महंगाई दर पर काबू पाने में सहायक बने। रघुराम राजन की तरह ही सुब्रमण्यम भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के विश्व प्रसिद्ध विशेषज्ञों में गिने जाते हैं।

वित्त मंत्रालय पर हमला के व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ज्यादा दिखाई देती है। मोदी के कैबिनेट में अगले कुछ हफ्तों में बदलाव होना है और उसमें स्वामी अपने लिए जगह चाहते हैं। इस बदलाव का आधार हाल ही में मोदी सरकार द्वारा कराये गए रेट योर गवर्नमेंट सर्वे को बनाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार को दो साल हो चुके हैं। इस मौके पर सरकार ने MyGov portal पर दो साल के कामकाज पर जनता से राय ली। इसमें जेटली के प्रदर्शन को खराब बताया गया है। इस सर्वे के अनुसार उनके मंत्रालय को बेहद ही कम रेटिंग मिली है। स्वामी को लगता है कि उनके जैसा अर्थशास्त्री वित्त मंत्रालय में होना चाहिए। अतीत में स्वामी ने वित्तमंत्री पद के लिए खुद को उचित बताया था।

स्वामी बीजेपी के लिए तब फायदेमंद रहे जब उन्होंने नैशनल हेरल्ड और अगुस्ट वेस्टलैंड जैसे मामलों से गांधी परिवार को घेरा। यह भाजपा की रणनीति के मुताबिक थी। बदले में उन्हें राजयसभा की सदस्यता मिली। राज्यसभा में पहुंचते ही स्वामी
ने अगस्ता वेस्टलैंड का मामला उठाकर हंगामा मचा दिया। स्वामी को अप्रैल के महीने में राज्यसभा के लिए भाजपा द्वारा नामांकित किया गया था। कहा जा रहा है कि उन्हें राज्य सभा में लाने के पीछे दो कारण थे- कांग्रेस और सोनिया गांधी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना और राज्य सभा में वित्त मंत्री और सदन के नेता  अरुण जेटली के पर काटना।

नेशनल हेरल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालत तक लाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी अपने सार्वजनिक जीवन में कई वजहों से चर्चा में रहे हैं। अपनी बेलगाम बयानबाजी के लिए अधिक जाने जाते हैं। हर वक़्त किसी न किसी पर निशाना साधते रहना उनकी आदत में शामिल है। नेहरू हों, अटल हों, सोनिया-राहुल या फिर जयललिता सभी स्वामी के निशाने पर रहे हैं। स्वामी ने 1999 में वाजपेयी सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की मुलाक़ात भी कराई थी। हाल ही में उन्होंने दिल्ली के उपराज्यपाल पर भी निशाना साधा था।

स्वामी बयानों की वजह से हमेशा सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। कभी यौन शोषण के मामले में जेल में बंद आसाराम बापू का समर्थन करने,  कभी राम मंदिर निर्माण को लेकर तो कभी जेएनयू पर दिए गए टिप्पणी को लेकर। जेएनयू पर अपने विवादित बयान में स्वामी ने कहा था कि जेएनयू का नाम नेहरू के नाम पर नही नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम पर होना चाहिए क्योंकि नेहरू ‘थर्ड क्लास’ आदमी थे और नेताजी पढ़े-लिखे आदमी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा था कि जेनयू में नक्सली, जेहादी और एलटीटीई वाले रहते हैं। जेएनयू के छात्र ही नहीं, प्रोफेसर्स भी नक्सली हैं। उस समय स्वामी के नाम की चर्चा जेएनयू के वीसी बनाये जाने की अटकलें लगाई जा रही थी। उन्होंने एक बार सार्वजनिक मंच पर अपने विवादित बयान में कहा था कि मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे। मस्जिद को लेकर भी बयान दिया था कि मस्जिद धार्मिक स्थल नहीं होते उन्हें कभी भी गिराया जा सकता है। उनके इन बयानों पर भी काफी हंगामा मचा था।

सुब्रमण्यम स्वामी  पर भाजपा लगाम नहीं लगा सकती है। यह उसकी मज़बूरी भी है। स्वामी संघ के चेहते हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है भाजपा और सरकार दोनों की नकेल संघ के हाथों में है। इस वजह से उनको नाराज और नज़रअंदाज़ करने से पार्टी बचती है। स्वामी और मोदी की दोस्ती पुरानी है। मोदी भी कभी आरएसएस के प्रचारक हुआ करते थे। आरएसएस के भीतर एक कहावत है कि जो एक बार स्वयंसेवक बन गया,  वह हमेशा के लिए स्वयंसेवक बन जाता है।

स्‍वामी के अलावा, पार्टी के भाजपा के बड़बोले नेता जिस तरह के बयान दे रहे हैं वह पार्टी और सरकार के हित में नहीं है। चाहे वो योगी आदित्‍यनाथ का राम मंदिर पर दिया गया विवादित बयान हो या हर दूसरे दिन आग उगलने वाले सांसद साक्षी महाराज, भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो भड़काऊ भाषण देकर पार्टी की छवि खराब करते हैं। लेकिन स्‍वामी ने सीधे केन्‍द्र सरकार के विवेक पर चोट की है। पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा भी अपने सदस्यों को संयम बरतने की सलाह का उन पर कोई असर नहीं हो रहा। अब मोदी ने नसीहत देते हुए कहा है कि इस तरह की बयानबाजी से कभी देश का भला नहीं होगा। प्रधानमंत्री की बातों का स्वामी और बाक़ी नेताओं-सांसदों पर कितना असर होगा यह आनेवाला वक़्त ही बतायेगा।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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झारखण्डी कौन है ?

आख़िरकार झारखण्ड में स्थानीयता नीति लागू हो गयी। राज्य बनने के 15 वर्षों बाद स्थानीय नीति घोषित की गई है। रघुवर सरकार का यह बड़ा फैसला है। स्थानीयता नीति के तहत विगत 30 jarkhandवर्षों से झारखण्ड में निवास करने वाले, झारखण्ड में जन्म लेने वाले या झारखण्ड में मैट्रिक तक की परीक्षा पूरी करने वाले लोग स्वतः स्थानीय माने जायेंगे। भूमिहीनों के लिए भाषा, संस्कृति को ही आधार माना जाएगा। सरकार ने इस नीति के तहत जिला स्तर के तृतीय व चतुर्थ वर्ग के पदों को स्थानीय निवासियों से ही भरने का संकल्प लिया है। हालांकि सरकार के इस फैसले पर विरोध के स्वर उठने लगे हैं। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, झारखण्ड विकास मोर्चा सरीखे राजनीतिक संगठनों ने रघुवर सरकार की स्थानीय नीति की आलोचना की है। विरोधी दाल के लोग इस पर सड़क पर उतरने की बात कर रहे हैं। झारखण्ड अलग राज्य के गठन के बाद से ही स्थानीयता के मुद्दे पर राजनीति होती रही है। कोई भी राजनीतिक पार्टी स्थानीयता को मुद्दा बनाने में पीछे नहीं रही।

राज्य गठन के 15 सालों के दौरान और  छह-छह मुख्यमंत्रियों के शासनकाल गुजर जाने के बाद भी स्थानीयता का प्रश्न हल नहीं हुआ था। कोई भी झारखण्ड नामधारी राजनीतिक दल इस मुद्दे को समाप्त नहीं करना चाहता है, ताकि वोट की राजनीति चलती रहे। झारखंड के आदिवासियों, मूलवासियों के हितों से ज्यादा चिंता इन नेताओं को अपने जनाधार की है। स्थानीयता का मसला ही वह मैदान है, जहां क्षेत्रीय दल भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मात दे सकते हैं। हेमंत सोरेन स्थानीयता के मसले पर अतिवादी होते प्रतीत हो रहे हैं। वह स्थानीयता के लिए खतियानी आधार की वकालत कर रहे हैं। जबकि झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन भी कई दफा झारखंड में जन्मे और पले-बढ़े को झारखंडी मानने की बात करते रहे हैं।

सत्ता से हटने के बाद से ही हेमंत सोरेन अपनी पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों में बाहरी-भीतरी का राग अलाप रहे हैं। हेमंत सोरेन ने सरकार की स्थानीयता नीति के विरोध को अपना पहला एजेंडा बनाया है, उन्हें पहले खुद से पूछना चाहिए कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते इस दिशा में क्या किया। झामुमो की यहां सत्ता में अरसे तक भागीदारी रही। अर्जुन मुंडा की सरकार में स्थानीयता को भी मुद्दा बनाया गया, स्थानीयता के सवाल को आगे करते हुए झामुमो ने समर्थन वापस लिया। हेमंत सोरेन की सरकार बनी, लेकिन नीति नहीं बन सकी। झामुमो के नेतृत्व में संप्रग सरकार भी चली लेकिन उस दौरान स्थानीयता नीति पर गम्भीरता से विचार नहीं किया गया।

झामुमो ने स्थानीयता नीति को अपने आप में असमंजस से भरा और राज्य गठन की मूल भावना के विपरीत बताया है। झामुमो के मुताबिक राज्य सरकार द्वारा जो निर्णय लिया गया है उसमें खतियान को भी आधार माना गया है। 30 वर्ष पहले से रहनेवाले निवासियों को भी स्थानीय माना गया है, जो अपने आप में विरोधाभासी है। तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग के नियोजन में स्थानीय लोगों की प्राथमिकता की बात स्वीकार कर उसकी अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है जिससे एक बार फिर बाहरी लोगों की स्वार्थपूर्ति आसानी से हो सकेगी। झारखण्ड में बाहरी-भीतरी की राजनीति करनेवाले दल अंतिम सर्वे और भाषा एवं संस्कृति को आधार बनाना चाहते हैं, जो सही नहीं है। अंतिम सर्वे खतियान कोई ठोस आधार नहीं है। बहुत से आदिवासी, मूलवासियों के पास आज भी कोई भूखंड नहीं है और मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते हैं, इन्हें कैसे इंसाफ मिलेगा। सर्वे रिकार्डस ऑफ राइट्स वर्ष 1932 में हुआ था। 1932 के बाद ज़मीन या अस्थांतरित सम्पत्ति ख़रीदने वाले झारखण्डी कहलाने योग्य नहीं है। दरअसल सवाल स्थानीयता और बाहरी का नहीं, सवाल अपने राजनीतिक आधार को दृढ़ करने का है।

राज्य गठन के बाद से ही स्थानीय नीति घोषित करने की मांग लगातार उठ रही थी। इसे लेकर कई बार आंदोलन हुए। गौरतलब है कि मरांडी ने 2001 मे डोमिसाइल लाने की कोशिश की थी। उन्होंने स्थानीय लोगों को खुश करने की रणनीति तो बनाई थी पर राज्य में इस मुद्दे को लेकर भारी उत्पात मचा था। हंगामें में कई लोगों की जान भी गई थी। डोमिसाइल के मुद्दे से ऐसी आग लगी कि बाबूलाल मरांडी को उस पर आज तक सफाई देनी पड़ती है। मरांडी को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा था। भाजपा आलाकमान ने बाबूलाल मरांडी को हटाकर अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाकर राज्य की कमान सौंप दी थी। झारखंड के लोग आज तक उस आंदोलन को भूल नहीं सके हैं। मूलवासी, 32 का खतियान और बाहरी जैसे शब्द पहली बार उसी आंदोलन के दौरान सुनाई पड़े थे। इसके बाद से ही बाबूलाल मरांडी झारखंड में जन्मे, पले-बढ़े को वह झारखंडी मानने की बात करने लगे।

स्थानीयता का मुद्दा जितना जटिल झारखंड में है, उतना और कहीं नहीं। झारखंड सरकार के विभिन्न विभागों में काफ़ी रिक्तियों के बावजूद स्थानीय नीति तय नहीं होने के कारण नौजवानों को रोजगार के अवसर नहीं मिल सके। इन रिक्तियों के कारण राज्य का विकास प्रभावित हुआ है। स्थानीयता का मामला नियुक्तियों के समय गरमाता रहा। नियुक्ति के समय ही राजनीतिक दल हो-हल्ला मचाते रहे। स्थानीयता पर केवल बयानबाजी होती रही। स्थानीय नीति के नाम पर केवल राजनीति होती रही। नीति-नियम बनाने के समय सभी हाथ खींचते रहे। भारत के किसी भी नागरिक को भारतीय संविधान यह अधिकार देता है कि वो कहीं भी जीवन यापन कर सकता है। पूरे देश की डोमिसाइल नीति एक होती है। कोई भी कहीं भी नौकरी कर सकता है, रह सकता है।

भिन्नता में एकता बहुत वांछनीय है। इसमें विभिन्न तरह के लोग एक विशेष क्षेत्र या संघ में रहने, काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहते हैं और सबकुछ साझा करते हैं। झारखण्ड में आदिवासी, मूलवासी और दिक्कू (बाहरी) हमेशा से साथ रहे हैं और साथ में पृथक राज्य के लिए संघर्ष किया है। झारखण्ड राज्य बनने के बाद राजनीतिक पार्टियाँ अपने फ़ायदे के लिए इनमें फूट डालना शुरू किया। बाहरी-भीतरी और स्थानीयता को मुद्दा गरमाने लगा। कैसी विडंबना है कि क्षेत्रवाद को राष्ट्रीयता व स्वस्थ राजनीति के लिए त्याज्य माना जाता है, लेकिन 15 सालों से झारखंड में स्थानीयता के मसले को लेकर रह-रह कर कोहराम मचता रहता है। झारखंड में राजनीतिक उठा-पटक के बीच बारी-बारी से यूपीए-एनडीए ने शासन किया। राज्य में 12 सरकारें बदल गयीं, लेकिन पहले नीति नहीं बन पायी। भाजपा, झामुमो, कांग्रेस सहित कई दल सरकार में रहे। स्थानीय नीति का विरोध जायज़ नहीं। पक्ष-विपक्ष के नेताओं की सलाह के बाद ही स्थानीयता की नीति लागू की गयी है।

लगातार पिछड़ते जा रहे इस राज्य में विकास को किसी भी पार्टी ने अपने एजेंडे में पहले स्थान पर नहीं रखा। झारखण्ड लगभग हमेशा आरक्षण, सीएनटी एक्ट, स्थानीयता, बाहरी-भीतरी की लड़ाई में उलझा रहा। जिसे भी नेतृत्व का मौका मिला उसने अपने-अपने तरीके से इस भावना को भड़काया। झारखंड के साथ गठित दोनों राज्य छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड विकास की राह पर काफी आगे निकल गए हैं। उस दौड़ में शामिल होने के लिए राजनीतिक नेतृत्व को परिपक्वता दिखानी होगी। 27 फीसदी आबादी को केन्द्र मानकर राज्य की 73 फीसदी आबादी की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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इस जय और पराजय के निहितार्थ

lalu_nitishबिहार में फिर एक बार नीतीश की सरकार बनेगी। राज्य में महागठबंधन को महाविजय हासिल हुई और दिल्ली के बाद भाजपा नीत गठबंधन को सबसे बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। महागठबंधन में शामिल तीनों दलों का प्रदर्शन शानदार रहा। नीतीश का फेस और लालू का बेस महागठबंधन की जीत का कारण बना। नीतीश-लालू की जोड़ी, मोदी-शाह की जोड़ी पर भारी पड़ी। बिहार के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगाहें थी। यह नतीजे देश की भावी राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे। बिहार ने यह साबित कर दिया की राजनीति में अपराजेय कोई नहीं।

बिहार में सारे एग्जिट पोल और पूर्वानुमान गलत साबित हुए। राज्य की जनता ने काँटे की टक्कर बात को नकारते हुए साफ-साफ फैसला महागठबंधन के पक्ष में सुनाया। एक दशक से बिहार की सत्ता पर आसीन रहने के बावजूद नीतीश के ख़िलाफ सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दी। मुख्यमंत्री के रूप में उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य और सुशासन से किसी को इंकार नहीं था, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो। मुख्यमंत्री के रूप में वह जनता की पहली पसंद अंत तक बने रहे। वहीं एनडीए यह भरोसा दिलाने में नाकाम रहा कि वह नीतीश से बेहतर मुख्यमंत्री दे सकता है। उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी लहर पर भरोसा था। मोदी के चेहरे को ही आगे रख कर चुनावी रणनीति बनायी गयी। यहीं सबसे बड़ी चूक साबित हुई।

चुनाव तारीखों का ऐलान होने के बाद नरेंद्र मोदी ने राज्य में 26 चुनावी सभाएं की। पूर्व के चार परिवर्तन रैलियों  को मिला देने से इनकी संख्या 30 हो जाती है। पार्टी रैलियों में जुटी भीड़ को वोट में नहीं बदल सकी। मोदी ने जिन 26 शहरों में प्रचार किया था उनमें से 12 सीटें बीजेपी हार गई है। वोटरों का मिजाज भाँप पाने में पार्टी पूरी तरह से विफल रही। मोदी का जादू पार्टी और गठबंधन के काम नहीं आ सका। चुनाव प्रचार में नीतीश-लालू की रणनीति का तोड़ बीजेपी नहीं निकाल पाई। पार्टी के रणनीतिकार यह भूल गए कि लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में नीतीश-लालू की दोस्ती का प्रयोग सफल हुआ था। हर मोर्चे पर नीतीश-लालू की जोड़ी,  मोदी-शाह की जोड़ी से आगे दिखी। पूरे चुनाव के दौरान महागठबंधन के तीनों दलों ने जिस एकता का दर्शाया वैसी एकता एनडीए में नज़र नहीं आई। आपसी मतभेद और भितरघात से एनडीए को काफ़ी नुकसान पहुँचा।

भाजपा के नकारात्मक प्रचार का फायदा महागठबंधन को मिला। डीएनए, जंगलराज, आरक्षण, गोमांस, थ्री इडियट्स, शैतान, तन्त्र-मन्त्र, महागठबंधन की जीत पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे जैसे बयानों का उलटा असर हुआ। एनडीए के हर वार पर महागठबंधन ने जोरदार तरीके से पलटवार किया। प्रधानमंत्री ने मुजफ्फरपुर की रैली में नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाया तो नीतीश ने इसे बिहार के स्वाभिमान से जोड़ दिया। मोहन भागवत की आरक्षण वाली टिप्पणी ने लालू को एक अच्छा हथियार दे दिया। लालू पिछड़ों और यादवों को गोलबंद करने में कामयाब रहे और भाजपा बैकफुट पर आ गई। भाजपा के मंत्रियों और नेताओं द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य मुद्दों पर बयानबाजी का चुनाव परिणामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ता गया राजनीतिक मर्यादाएँ तार-तार होती गयीं। जिस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा था उसे देख-सुन आम मतदाता हैरान थे।

लालू यादव तो अपने भदेस और मसखरे वाली छवि के लिए ही जाने जाते है। अपने बेतुके बयानों और अभद्र भाषा की वजह से वह मीडिया की सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं। हमेशा से उनका यहीं अंदाज़ रहा है, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने जिस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग किया उसे सुन लोग सन्न थे। मोदी यह भूल गए कि वह पार्टी का चेहरा, प्रचारक होने के साथ ही देश के प्रधानमंत्री भी हैं और इस पद की एक गरिमा होती है। बिहार चुनाव में प्रधानमंत्री ने अपनी गरिमा बहुत गिरा दी। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश के बड़े नेता भी कड़ुवाहट, कटुता वाली भाषा और ओछी बयानबाजी में मोदी से कहीं कम नहीं दिखे। प्रधानमंत्री लालू को लेकर राजनीतिक हमले की बजाए व्यक्तिगत हमले करने लगे। इससे यादवों की गोलबंदी ज्यादा हो गई। मोदी जी ने जिस अंदाज़ में बोली लगा कर पैकेज की घोषणा की थी वह पीएम पद की गरिमा और बिहार की प्रतिष्ठा के लिहाज से ठीक नहीं था। उनका अंदाज़ ऐसा था कि मानो वह बिहार को आर्थिक पैकेज नहीं खैरात या भीख दे रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के मंत्रियों और नेताओं द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य मुद्दों पर बयानबाजी का चुनाव परिणामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। पूरे चुनाव के दौरान नीतीश ने अपनी भाषा पर संयम रखा। उनका भाषण बिहार के विकास और मोदी सरकार की कार्यकलापों की खामियाँ पर केंद्रित रहा।

नीतीश-लालू की जोड़ी ने मोदी-शाह की जोड़ी को करारी शिकस्त देते हुए दो तिहाई से ज्यादा बहुमत हासिल की। राजद और कांग्रेस ने बिहार में जबरदस्त वापसी करते हुए क्रमशः 80 और 27 सीटों पर कब्जा किया। 2010 में राजद को 22 और कांग्रेस को सिर्फ चार सीट मिले थे। महाठबंधन ने 178 सीटें अपने नाम कीं। राजद सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। वहीं भाजपा और उसके सहयोगियों को सिर्फ 58 सीटों पर जीत मिली। भाजपा को narendra modi-amit shaht2010 के विधानसभा चुनाव की तुलना में तीन दर्जन सीटों का नुकसान हुआ है। वहीं उसके सहयोगी लोजपा को दो, रालोसपा को दो और ‘हम’को एक सीट ही मिली। राज्य के 14 जिलों में एनडीए अपना खाता तक नहीं खोल पाई। पीएम मोदी समेत एनडीए के तमाम नेता और केंद्र सरकार के मंत्री महागठबंधन के समर्थन में जनता की गोलबंदी को नहीं रोक पाए। चुनाव के दौरान आरक्षण और असहिष्णुता को लेकर जो कुछ बोला गया वह मोदी लहर, शाह की रणनीति और पासवान, मांझी, कुशवाहा के गठजोड़ पर भारी पड़ा।

चुनाव में भाजपा ने बिहार में अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी। मोदी की पूरी कैबिनेट, भाजपा के दर्जनों सांसद, झारखण्ड के मुख्यमंत्री समेत पूरा कैबिनेट और आरएसएस के हजारों कार्यकर्ता बिहार के चुनावी मैदान में दिन रात सक्रिय रहे फिर भी उन्हें जबरदस्त  हार का सामना करना पड़ा। धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ के आगे साम्प्रदायिक ताक़तों की धज्जियाँ उड़ गयीं। नीतीश और लालू एक-दूसरे का वोट महागठबंधन के पक्ष में कराने में सफल रहे। कुर्मी वोट राजद को भी मिला और यादव वोटरों ने जदयू को भी वोट दिया। नीतीश-लालू की जोड़ी ने जनता को समझाने में सफल रही कि उनकी जोड़ी बिहारी है और मोदी- शाह की जोड़ी बाहरी। बिहार का भला बिहारी जोड़ी ही कर सकती है बाहरी जोड़ी नहीं।

नीतीश की छवि सभी वर्गों में स्वीकार्य हैं। इस बात को बीजेपी के नेता समझने में नाकाम रहे। चुनावी सर्वेक्षणों में उनके विरोधी मतदाताओं ने भी माना था कि नीतीश कुमार एक बेहतर मुख्यमंत्री रहे हैं। बिहारी मतदातों को लगा कि राज्य की सत्ता सँभालने के लिए नीतीश से बेहतर कोई और नहीं हो सकता। लालू के साथ गठजोड़ को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी उसे खारिज करते हुए नीतीश यह भरोसा दिलाते रहे कि उनकी सरकार सुशासन, आर्थिक विकास के साथ-साथ समावेशी विकास के अपने एजेंडे पर कायम रहेगी।

बिहार की चुनावी लड़ाई गुजरात बनाम बिहार मॉडल के बीच थी। बिहार मॉडल समावेशी विकास को तरजीह देता है और गुजरात मॉडल कॉर्पोरेट जगत के फायदे की बात सोचता है। विकास में समाज के सभी वर्गों की समानतापूर्ण भागीदारी के सवाल को ज्यादा समय तक नजरअंदाज करके नहीं रखा जा सकता है। नीतीश कुमार राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। एक कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ वह सोशल इंजीनियरिंग भी बखूबी जानते हैं। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि बिहार में यदि राजनीति करनी है तो सिर्फ विकास से काम नहीं चलेगा। इसके लिए वोट बैंक की बाजीगरी भी आनी चाहिए। नीतीश कुमार ने विकास और सामाजिक न्याय को शासन का मूलमंत्र बनाया। उन्होंने विकास योजनाओं में वोट बैंक का भी ध्यान रखा। चाहे वह अत्यंत पिछड़ी जाति हो, महादलित हो, पसमांदा मुसलमान हो, सबको विकास में भागीदार बनाने की कोशिश की। मुस्लिम-यादव और कोइरी-कुर्मी के वोट और कांग्रेस के कुछ परम्परागत वोटों के अलावा दलित-महादलित वोट भी महागठबंधन को मिले। चुनाव पूर्व जातिगत सूची में बदलाव का फायदा भी महागठबंधन को मिला।

यूपीए के 10 सालों के शासन से आजिज़ और क्षुब्ध जनता ने मोदी पर भरोसा जताया था। भाजपा और उसके सहयोगियों ने विकास और सुशासन के वादे के दम पर व्यापक जन समर्थन जुटाया। सबका साथ, सबका विकास के नारे और अच्छे दिनों का सपना दिखा कर मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने में कामयाब हुए। यह नारा और सपना करोड़ों मतदाताओं की आकांक्षाओं से जुड़ गया। लोग मोदी की आक्रमक शैली और गुजरात मॉडल के मुरीद हो गए। अधिकांश समुदायों में प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी ही अपरिहार्य पसंद थे। खासतौर से युवा मतदाताओं को भाजपा से जोड़ने में मोदी प्रभाव बेहद अहम रहा। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर भाजपा को पूर्ण बहुमत के पार ले गई और फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और झारखंड की भी सत्ता दिलाई। शासन के डेढ़ सालों से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी मोदी कुछ खास करिश्मा नहीं दिखा पाए। मोदी सरकार आर्थिक सुधारों की दिशा में कोई ऐसी पहल नहीं कर सकी है, जिससे उसके प्रति जनता का भरोसा और मजबूत हो। भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की कोशिशों का देशव्यापी विरोध हुआ। विदेश यात्राओं की बात छोड़ दें तो मोदी सरकार की कार्यशाली पूर्वर्ती यूपीए सरकार से ज्यादा अलग नहीं दिखी। इस दौरान महंगाई, साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता बेलगाम हो गयी। असहिष्णुता पर साहित्यकारों, कलाकारों और विद्वानों ने आवाज़ उठाई तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उनकी मंशा पर सवाल उठाये जाने लगे। प्याज और दाल के बढ़े दामों के बाद देश में सरसों के तेल के दाम बढ़ गए। खुद सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले एक साल में तेल के दाम 40 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। मंहगाई कम करने के नाम पर सत्तासीन हुई मोदी सरकार के एक फैसले से कुछ महत्वपूर्ण जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो गयी। इसमें कैंसर, मधुमेह, रेबीज, रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आनेवाली आवश्यक दवाएं भी शामिल हैं। ये दवाएं आम आदमी की पंहुच से बाहर हो गई है। मोदी के अमेरिका दौरे से पूर्व दवाओं की कीमतों के नियामक, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने108 दवाओं को नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया। इससे अमेरिकी सहित तमाम दवाई निर्माता कम्पनियों को भारी मुनाफा हो रहा है। अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी कंपनियों के साथ मुलाकात को इस फैसले से जोड़कर देखा गया।

दावों, वादों और जुमलों से पेट नहीं भरता। अच्छे दिन लाने के वादे के दम पर प्रचंड बहुमत के साथ देश की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा की सरकार देश के लोगों के लिए अच्छे दिन ला पाने कि दिशा में अब तक प्रयासरत नहीं दिखाई दे रही है। मोदी के ज्यादातर फैसले पूंजीपतियों को हित में दिखाई दे रहे हैं। सरकार न तो महंगाई पर लगाम पाई और न ही रोजगार का कोई अवसर पैदा कर सकी है। किसानों कि हालत दिन-ब-दिन खराब होती गयी। जनता का धीरे-धीरे मोदी से मोहभंग होने लगा है। हाँ इस दौरान मोदी भक्तों (प्रशंसकों) की भक्ति में कोई कमी नहीं आई है। मोदी की आलोचना करनेवाले इन भक्तों (प्रशंसकों) के निशाने पर रहे। देश में ख़ासकर सोशल मीडिया में ऐसा माहौल तैयार किया गया कि इन भक्तों के अलावा कोई भी राष्ट्रवादी नहीं है। जो मोदी भक्त (प्रशंसक) नहीं वे देशद्रोही हैं। भाजपा अगर नतीजों को गंभीरता से ले तो उसे तय करना होगा कि उसका असली एजेंडा क्या है, विकास या धर्म के नाम पर राजनीति।

दिल्ली के बाद बिहार की हार यह दर्शाता है कि मोदी लहर अब कमजोर पड़ने लगा है।  दिल्ली और बिहार की सुनामी के आगे मोदी लहर कमजोर नज़र आने लगी है। राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत होने के साथ-साथ विनम्र और सबके हितों का पक्षधर होना चाहिए। लोकसभा चुनाव की अप्रत्याशित जीत ने मोदी-शाह सहित पूरी पार्टी को अहंकारी बना दिया। उन्हें लगने लगा कि अब वे अपराजेय हो गए हैं। उन्हें कोई नहीं हरा सकता। दिल्ली की हार से भी पार्टी नहीं चेती। शाह-मोदी के बड़बोले का खामियाज़ा बिहार चुनाव में एनडीए को चुकाना पड़ा। बिहार के नतीजें मोदी लहर पर सवार भाजपा के लिए चेतने का शायद आखिरी मौका है। इस हार के बाद पार्टी के भीतर मोदी के ख़िलाफ विद्रोह शुरू हो सकता है। मोदी के कार्यशैली से वैसे भी पार्टी के पुराने और दिग्गज नेता दुःखी हैं। चुनाव के दौरान शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह सहित बिहार के कई नेता मोदी और पार्टी के ख़िलाफ बयान देते दिखाई दिए। हार से उसके सहयोगी भी मुखर होंगे। शिवसेना जो बिहार में एनडीए से अलग चुनाव लड़ रही थी ने तो नरेंद्र मोदी के सिर हार का ठीकरा फोड़ दिया है। चुनाव में नीतीश-लालू का सियासी कैरियर भी दाँव पर लगा हुआ था। बिहार में महागठबंधन की हार होती है तो सामाजिक परिवर्तन के उनके आंदोलन को जबरदस्त झटका लगता और मोदी-शाह की जोड़ी को रोक पाना अगले कुछ सालों तक नामुमकिन हो जाता।

देश की राजनीति के लिहाज से अगले दो साल बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन दो सालों में 10 राज्यों में चुनाव हैं। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु में 2016 में चुनाव होंगे और  यूपी, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड में 2017 में चुनाव होंगे। दिल्ली और बिहार की हार के बाद एनडीए के लिए इन राज्यों में मजबूती से लड़ पाना आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में ममता का मजबूत गढ़ है तो केरल में वाम दल, कांग्रेस का आधार। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के नतीजें भारत की राजनीति को एक नयी दिशा देंगे। राष्ट्रीय फलक पर इन नतीजों का असर डालना अवश्यंभावी है। इन नतीजों के बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट होने का फायदा दिखला दिया है। इधर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में अपनी नयी पारी की शुरुआत करेंगे। उन्हें राजद और कांग्रेस को लेकर आगे बढ़ना है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जंगलराज के लौटने के अंदेशे को खत्म करने के साथ-साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने की है।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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किसका होगा बिहार, किसको मिलेगी हार?

biharबिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर है। कयास लगाना मुश्किल है कि कौन विजयी बनकर सामने आएगा। वोटिंग खत्म हो गई है और अब आठ तारीख का इंतज़ार है। उसी दिन यह पता चलेगा कि बिहार  में सत्ता परिवर्तन होगा या नीतीश तीसरी बार बिहार की कमान सम्भालेंगे। नतीजों से पहले अबकी बार किसका बिहार पर आंकलन शुरू हो गया है। दोनों गठबंधन अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।  बिहार विधानसभा चुनाव में पांच  चरणों का मतदान खत्म होने के बाद आए विभिन्न चैनलों के एग्जिट पोल में भी एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ा मुक़ाबला दिख रहा है। बिहार के कुल 243 विधानसभा सीटों में बहुमत का जादुई आंकड़ा 122 सीटों का है।

चार प्रमुख चैनलों के एग्जिट पोल के अनुसार बिहार में अगली सरकार महागठबंधन की बनेगी। जबकि तीन प्रमुख चैनलों के मुताबिक़ बिहार में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है।इंडिया टीवी के एग्जिट पोल के मुताबिक बिहार में महागठबंधन की सरकार बन सकती है, हालांकि स्पष्ट बहुमत पाना मुश्किल होगा। इंडिया टीवी-सी वोटर के इस एग्जिट पोल में एनडीए 101 से 121 सीटों के बीच सिमट जाएगी। जबकि महागठबंधन को 112 से 132 के बीच सीटें मिल सकती हैं। वहीं अन्य दल 6 से 14 के बीच सीटें जीत सकते हैं। न्यूज एक्स के एग्जिट पोल की मानें तो एनडीए को अधिकतम 126 सीटें और महागठबंधन को 110 और अन्य को सात सीटें मिलेगी। जबकि एबीपी न्यूज-नीलसन के एग्जिट पोल के मुताबिक महागठबंधन 130 सीटें लाकर सरकार बनाने में सक्षम होगा, वहीं एनडीए महज 108 सीटों पर ही सिमट कर रह जाएगी। अन्य को पाँच सीट मिलने का अनुमान है। न्यूज नेशन-सीएनएक्स के एग्जिट पोल के मुताबिक महागठबंधन 120-124 सीटें ला सकता है जबकि एनडीए को 115-119 सीटें आ सकती है। इंडिया टुडे-सिसेरो के एक्सिट पोल के अनुसार एनडीए 120 सीटें, महागठबंधन को 117 और अन्य को छह सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं न्यूज 24-चाणक्या ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को 155 सीटें दी हैं और महागठबंधन को सिर्फ़ 83 सीट। अन्य को पाँच सीट मिल सकता है। टाइम्स नाऊ-सी वोटर की माने तो एनडीए 111, महागठबंधन को 122 और अन्य को 10 सीटें मिलेंगी।

तमाम एक्जिट पोल्स का अगर औसत देखा जाए तो राज्य में एनडीए और महागठबंधन में आर-पार की लड़ाई है। तमाम पोल्स के औसत के हिसाब से राज्य में महागठबंधन को 118 सीटें, बीजेपी को 117 तथा अन्य के खाते में आठ सीटें जाती दिख रही हैं। लोकसभा चुनाव और दिल्ली विधानसभा चुनावों में चाणक्या के नतीजे सबसे सटीक रहे थे। 2010 में भाजपा और जदयू साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। तब जदयू को 115, भाजपा को 91, राजद को 22, कांग्रेस को चार और अन्य को 11 सींटे मिली थी। इस बीच नए राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बने और पुराने बिगड़ गए। तब नीतीश कुमार एनडीए में थे और अब आरजेडी और कांग्रेस के साथ हैं। जेपी आंदोलन की उपज और बिहार के दो ताक़तवर नेता लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की जोड़ी के साथ आने से महागठबंधन के पक्ष में पिछड़ों की गोलबंदी हुई। एनडीए से अलग होने के बाद जदयू को लोकसभा चुनाव दो सीटें मिली थी, जबकि उन्हें कुल 16.04 फीसदी वोट मिले। लालू प्रसाद की पार्टी राजद को चार सीटें मिली और वोट मिले 20.46 फीसदी। राजद और जदयू के वोटों का मिला देने से मतों का प्रतिशत 36.5 फीसदी हो जाता है जो भाजपा को प्राप्त वोटों 29.86 प्रतिशत से बहुत ज़्यादा है। इसमें कांग्रेस को मिले  8.56 फीसदी वोट को भी जोड़ दिया जाए तो यह आँकड़ा 45 फ़ीसदी तो पहुँच जाता है।

exitpollबिहार के चुनावी नतीजे कई मायने में महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन के लिए बहुत कुछ दांव पर है और ये दोनों पक्षों की आगे की राजनीति तय करेगा। नरेंद्र मोदी ने बिहार के चुनाव जीतने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी। किसी विधानसभा चुनाव में किसी प्रधानमंत्री ने शायद ही इतनी रैलियां की हों। प्रधानमंत्री मोदी की पूरी कैबिनेट, भाजपा के चार दर्जन से ज्यादा सांसदों और आरएसएस के हज़ारों कार्यकर्ता बिहार के चुनावी मैदान में दिन-रात एक कर दिया था। चुनाव प्रचार से पहले ही प्रधानमंत्री ने जो चार रैलियां की थी उसमें जंगल राज और डीएनए का मुद्दा उठाकर लालू-नीतीश को घेरने की कोशिश की। डीएन वाला प्रधानमंत्री का बयान पूरे चुनाव में छाया रहा। नीतीश ने इसे बिहार के सम्मान से जोड़कर मोदी पर जवाबी हमला किया। पूरे चुनाव में लालू और नीतीश में ग़ज़ब का तालमेल दिखा। प्रचार के दौरान नीतीश कुमार विकास की बात करते दिखे तो लालू यादव जाति की।

बिहार में जातीय समीकरण जड़ों तक गहरा है। उस पर चुनावी हवाओं और लहर का कम ही असर होता है। मोदी लहर पर भरोसा होने के बावजूद चुनाव में भाजपा अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। पार्टी रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेकर चलने को मजबूर हो गयी। वहीं विकास पुरुष और सुशासन बाबू की छवि बरकरार रहने के बाद भी नीतीश को चुनाव में राजद और कांग्रेस से गठबंधन करना पड़ा। मुस्लिम-यादव वोटों की मजबूरी के चलते नीतीश ने जंगल राज के प्रतीक लालू यादव से हाथ मिलाया। जातीय समीकरण महागठबंधन के पक्ष में हैं। मतदान जातीय आधार पर हुए होंगे तो नतीजे निश्चित तौर पर महागठबंधन के पक्ष में आएंगे।

शुरुआत में चुनावी जंग नीतीश बनाम मोदी के बीच थी और मुद्दा विकास का लग रहा था। लेकिन बाद में नीतीश बैकसीट पर चले गए और लालू आगे आ गए। मुकाबला लालू बनाम मोदी के बीच हो गया। विकास का मुद्दा पीछे छूटता चला गया। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा भाषाई मर्यादा तार-तार होने लगी। बिहार के चुनावी समर में जातीय समीकरण की कितनी अहमियत है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि बक्सर की रैली में जहाँ नरेंद्र मोदी ने अपने आप को पिछड़ी जाति का बताकर जाति कार्ड खेलने की कोशिश की, वहीं जातीय गोलबंदी करने की नीयत से 27 सितंबर को लालू ने राघोपुर में कहा कि ये चुनाव बैकवार्ड और फॉरवार्ड के बीच है।

चुनाव के ठीक पहले जातियों के सूचीगत फेरबदल से महागठबंधन को फायदा पहुँचाया है। तेली जाति को पिछड़े से अतिपिछड़े श्रेणी में और मल्लाह, निषाद और नोनिया जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया था। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आरक्षण पर टिप्पणी बिहार चुनाव में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के लिए वरदान साबित हो सकती है। वहीं गोमांस का मुद्दा उठाए जाने से हिंदू मतों का ध्रुवीकरण एनडीए के पक्ष में हुआ, तो मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के पीछे लामबंद दिखे।

चुनाव के दौरान आरक्षण और अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमलों से हुए नुकसान की भरपाई भाजपा युवा मतदाताओं को अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश करती दिखी। बिहार के चुनाव में युवा मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। वे किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव हरा सकते हैं या फिर किसी दल को अपने दम पर चुनाव जिता सकते हैं। युवा वर्ग जाति और धर्म से ऊपर उठकर सोचता है। बिहार में युवा मतदाताओं की बात करें तो 6.6 करोड़ से अधिक मतदाताओं में कुल करीब 2 करोड़ मदताता 30 साल के नीचे के हैं। इन युवा मतदाताओं का रुझान भाजपा की ओर या यूँ कहे कि प्रधानमंत्री मोदी की ओर है। यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि नए मतदाताओं का रुझान एनडीए की तरफ होता है या जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस के महागठबंधन की तरफ। चुनाव में महिलाएं बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकलीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिलाओं का बड़ी संख्या में मतदान के लिए निकलना महागठबंधन के पक्ष में है लेकिन बीजेपी का दावा है कि राज्य की महिलाओं ने जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर एनडीए के लिए वोट डाला है। महिला मतदाताओं की पहली पसंद नीतीश कुमार ही हैं लेकिन यह भी सच है कि वह लालू के जंगल राज अभी तक नहीं भूला पायी हैं। राज्य  में 46 फीसदी मतदाता महिलाएं हैं जिनकी भूमिका बेहद अहम होगी।  महादलित वोट बैंक का रुझान भी नतीजों को प्रभावित करेगा। दोनों गठबंधनों ने महादलित वोट अपने पक्ष में लाने की पुरजोर कोशिश की।

इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश के कार्यकाल में बिहार की छवि बदली है। विकास के कार्य दिख भी रहे है। मुख्यमंत्री के रूप में अब भी वह जनता की पहली पसंद बने हुए हैं, लालू के साथ आने से पढ़े-लिखे मतदाता जो जाति से ऊपर उठ कर चीज़ों को देखते हैं मतदाता ऊहापोह में थे। अपने सहयोगियों के कारण निश्चय ही नीतीश की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। गठबंधन साझेदारों के बीच के विरोधाभास को देखते हुए कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शायद इसी वजह से भाजपा चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री से उनके 10 साल के काम का हिसाब मांगने से ज्यादा उनके साथी लालू प्रसाद यादव के जंगलराज की वापसी का डर दिखाने पर जोर दे रही थी। साथ ही यह भी याद दिलाती रही कि नीतीश सरकार की उपलब्धियां सिर्फ नीतीश कुमार की नहीं हैं, बल्कि 10 साल के उनके राज में सात साल पार्टी उनके साथ थी।

बिहार में चुनाव परिणामों पर किसी तरह की भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल काम है। यहां जाति, धर्म, अगड़ा-पिछड़ा, दलित, विकास ये सभी मुद्दे वोट को प्रभावित करनेवाले होते हैं। कोई भी इसे अनदेखा नहीं कर सकता। दोनों प्रमुख गठबंधन अच्छी तरह से जानते हैं कि बिहार में केवल विकास के मुद्दे पर चुनाव नहीं जीता जा सकता। जातिगत वोटों का ध्रुवीकरण यहाँ के चुनावी नतीजों को प्रभावित करता रहा है। एनडीए और महागठबंधन ने अपनी लड़ाई उसी अनुरूप लड़ी। विकास के वायदों के साथ-साथ जातीय समीकरण बिठाने का पूरा प्रयास किया। चुनाव ख़त्म हुए, अब पूरे देश को नतीजों का इंतज़ार है। बिहार चुनाव के परिणाम सिर्फ़ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के राजनीतिक भाग्य का ही फ़ैसला नहीं करेंगे बल्कि यह परिणाम भारत के भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेंगे।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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