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जंग-ए-आज़ादी के गुमनाम सिपाही

जंग ए आज़ादीजंग-ए-आज़ादी के मशहूर नायकों को तो सब जानते हैं, मगर उन हजारों गुमनाम सिपाहियों को बहुत कम लोग जानते हैं जिन्होंने देश के लिए सबकुछ न्योछावर कर दिया।  इन गुमनाम सिपाहियों में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका त्याग, जिनकी आहूति उन नामों से अधिक मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण रही है, जिन्हें इतिहास से स्थान मिलता है।  झारखंड में भी अनेक गुमनाम सिपाहियों को इतिहास के पन्नों पर वह जगह नहीं मिल पायी, जिनके वे हकदार थे। उन गुमनाम सिपाहियों ने झारखंड के कोने-कोने में अलग-अलग रूपों में आज़ादी की जंग लड़ी। जिसमें हजारों सिपाही शहीद हुए, न जाने कितनों को बंदी बना लिया गया। इतिहास लेखन में उन गुमनाम सिपाहियों के साथ घोर अन्याय किया गया है।

55 कैदियों को भेजा गया था अंडमान जेल : झारखंड में 1857 के महाविद्रोह से आज़ादी की जंग के दौरान कालापानी की सजा भुगतने वालों में सैकड़ों क्रांतिकारी शामिल हैं। इनमें ज्यादातर क्रांतिकारी गुमनाम ही रहे और इतिहास में स्थान नहीं पा सके। इनमें कंचन सिंह, सूरज मांझी, सोना मांझी, चुनमुन, विसो सिंह, हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती प्रमुख हैं। बंगाल प्रेसिडेंसी के विभिन्न जेलों में से कुल 55  कैदियों को अलीमुर जेल से अंडमान जेल भेजा गया था। इसमें बिहार-झारखंड के 32 कैदी शामिल थे। इन पर विद्रोह, डकैती, लूट और हत्या के आरोप थे।

सूरज मांझी पर अंग्रेजों ने भाषण के माध्यम से उत्तेजना फैलाने का आरोप लगाया था। 13 नवंबर 1857 को उन्हें कालापानी की सजा दी गयी। सोना मांझी पर भी इसी तरह का आरोप था। 13 अप्रैल 1858 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। कालापानी की सजा देने के बाद उन्हें 14 अक्तूबर 1858 को अंडमान जेल पहुंचाया गया। कंचन सिंह बड़ामहल के जमींदार थे। रामगढ़ बटालियन के विद्रोह के दौरान उन्होंने विद्रोहियों का साथ दिया था। चुनमुन हजारीबाग के रहनेवाले थे। उनपर विद्रोहियों को मदद करने का आरोप था।

वीर पहाड़िया सिपाही : झारखंड के वीर सिपाही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ 17 वीं शताब्दी से ही लड़ते चले आ रहे थे लेकिन उनके नाम और वीरता को इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं किया गया। इन क्रांतिकारियों को उनके गाँव-पंचायत के लोग भी नहीं जानते। सरकारी दस्तावेजों में भी अधिकांश का नाम दर्ज नहीं है। सूबे की सरकारों ने तो उन्हें भूला ही दिया।  झारखंड की धरती पर 1766 का पहाड़िया विद्रोह रमना अल्हाड़ी के नेतृत्व में शुरू हुआ था। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरा झारखंड सुलह उठा। रमना अल्हाड़ी के प्रमुख सैन्य अधिकारी थे करिया पुजहर। रमना की हत्या के बाद उन्होंने भूमिगत होकर पहाड़ियों को संगठित किया और अपने लड़ाकू साथियों का नेतृत्व किया। चेंगरू सांवरिया और पांचगे डोम्बा पहाड़िया के साथ मिलकर 1772 में राजमहल के उधवा नाला के निकट अंग्रेजों को पराजित कर रमना अल्हाड़ी की हत्या का बदला लिया। रमना अल्हाड़ी ने विद्रोह की जो चिंगारी सुलगाई थी वह आनेवाले 200 वर्षों तक जलती रही। पटना स्थित अभिलेखागार में संताल परगना के पर्चे, पुस्तकें व स्वतंत्रता सेनानियों की जो डायरियाँ उपलब्ध हैं उनमें संताल के इन गुमनाम सिपाहियों  और शहीदों का जिक्र मिलता है।  इनमें रमना अल्हाड़ी, करिया पुजहर, सरदार चेंगरू सांवरिया, पांचगे डोम्बा पहाड़िया, जबरा पहाड़िया गुरू धरमा पहाड़िया, भगीरथ सरदार, अर्जुन गृही समेत कई सिपाहियों के नाम दर्ज हैं। पहाड़िया योद्धा दूसरे महायुद्ध में सुभाषचन्द्र बोस के साथ भी थे।

रानी ने ली संताली विद्रोह की कमान : 1779 में चुआड़ का दूसरा विद्रोह हुआ, जिसकी वागडोर चुआड़ की रानी शिरोमणि के हाथ मे थी। रानी ने 124 गांवों को संगठित किया। जमींदारों के घरों पर हमले किये। मिदनापुर में अंग्रेजी सेना और रानी की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें काफी अंग्रेज सैनिक मारे गये। मिदनापुर में ही रानी को कैद कर लिया गया, फिर धोखे से मार दिया गया। उधर पोराहट के राजा अर्जुन सिंह के नेतृत्व में सिंहभूम के हजारों ‘हो’ वीर, गोनो हो, डबरु मानकी, खरी तांति आदि ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था। 15 फरवरी, 1858 को अर्जुन सिंह को धोखे से गिरफ्तार किया गया।

पुरुलिया तक फैली आग : 1856 में हजारीबाग के संतालों का एक भीषण विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह के नेता लुबिया मांझी और बैरू  मांझी थे। इनमें कई ऐसे संताल थे जो 1855 के विद्रोह में भी शामिल थे। तब संतालों ने हजारीबाग, खड़गडीहा, बेरमो के आसपास विद्रोह कर दिया था। उस संताल विद्रोह के नेता थे रुपु मांझी, अर्जुन मांझी। यह विद्रोह गोला, चितरपुर, पेटरवार और पुरुलिया तक फैल गया था। अंग्रेजों ने रुपु मांझी के घर को फूंक दिया था। हूल विद्रोह के समय वीरभूम जिले के कातना गांव लूटने के आरोप में कुरान मांझी, विसु मांझी, रूसो मांझी, मोहन मांझी, बागुद मांझी, कालू मांझी, कांचन मांझी, धुनाय मांझी, सिंगराय मांझी और लुकुन मांझी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था।

चतरा में हुआ निर्णायक युद्ध : 1857 की क्रांति का सबसे बड़ा और निर्णायक युद्ध चतरा में हुआ था। 1760 से 1834  तक चतरा छोटानागपुर का प्रशासनिक मुख्यालय था। 1857 में चतरा में ही छोटानागपुर में फांसी का पहला स्थान बना। 3 अक्टूबर 1857 को चतरा में 150 सैनिक मारे गये थे। 4 अक्टूबर को सूबेदार जयमंगल पांडेय और नादिर अली खां को फांसी दी गयी। 77 क्रांतिकारियों को एक ही गड्ढे में दफन कर दिया था, जबकि 77 क्रांतिकारियों को आम के पेड़ों पर लटकाकर फांसी दी गयी थी। जयमंगल पांडेय व नादिल अली साह के बारे में कुछ जानकारी तो लोगों को मिल जाती है, लेकिन उनके साथ शहीद करीब 150 अन्य क्रांतिकारियों के बारे में कोई जानकारी  उपलब्ध नहीं है। इसी तरह 20 अक्टूबर 1857 को रांची में 20 क्रांतिकारियों और 24 अक्टूबर 1857 को 23 क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी। चतरा युद्ध की विजय ने ही हजारीबाग जिले में आंदोलन को कुचल दिया।

पलामू का राजहरा गांव : पलामू का राजहरा गांव का नाम भी इतिहास के पन्नों से गायब है। 1857 की क्रांति में विद्रोहियों द्वारा बंगाल कोल फैक्ट्री राजहरा में आग लगा देने और उनकी मशीनों को क्षतिग्रस्त कर देने के बाद अंग्रेजों ने इलाके के 500 लोगों को बरगद के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गयी थी। इस बड़ी घटना का जिक्र अधिकांश इतिहासकारों ने नहीं किया है। सिर्फ बंगाल गजट में इस घटना का जिक्र है। पलामू के इतिहास के लेखक हवलदारी राम गुप्त ने भी अपनी पुस्तक में इस बात का जिक्र किया है।

गुमनामी में गुजरी ज़िन्दगी : झुमरी तिलैया की धरती एक ऐसे दंपत्ति की गवाह रही है जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी ज़िंदगी की बाज़ी लगा दी और दशकों तक उन्हें जेल की सलाखों के पीछे यातनाएँ सहनी पड़ीं। हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती और लिली चक्रवर्ती की ज़िंदगी गुमनामी में गुज़री। हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती को ब्रितानी सरकार नें ‘अथ्राबाड़ी मेल ऐक्शन’ कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया था। वह कई साल तक देश की विभिन्न जेलों में बंद रहे। फिर उन्हें कालापानी की सज़ा सुना दी गयी और अंडमान स्थित सेलुलर जेल भेज दिया गया। पति के जेल जाते ही लिली चक्रवर्ती ने क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और 1941 में उन्हें बांग्लादेश के चटगाँव में हुए शस्त्रागार लूट कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया गया था। वह 1952 तक बांग्लादेश की बोरिशाल जेल में क़ैद रहीं। भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की पहल पर लिली चक्रवर्ती को बांग्लादेश की जेल से रिहा किया गया। उनकी सुध लेना तो दूर मौत पर शोक तक जतानेवाला कोई नहीं था। 1930 में गांधी जी के आह्वान पर स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले बोकारो जिले के हंसलता गांव के पूरबटांड़ टोलावासी स्वतंत्रता सेनानी  चुनू महतो को ऐसे ही भूला दिया गया। चुन्नू 1934 व 1942 में दो बाद जेल गये। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गोमिया थाना पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग सेंट्रल जेल भेजा। यहां इन्हें कठोर दंड दिया गया। इसके बावजूद उनमें देशप्रेम का जज्बा कम नहीं हुआ।

1857 के गुमनाम शहीद : 1857 के विद्रोह के समय छोटानागपुर क्षेत्र में शहीद जीतराम ने बेदिया टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी ने एक साथ ओरमांझी के मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था। 1858 को शहीद टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गयी। उस समय शहीद जीतराम अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे और आंदोलन को जारी रखा। अपनी छापामार युद्ध कला और संगठनात्मक क्षमता के कारण जनता ने भी जीतराम का साथ दिया और कई बार लड़ाकू साथियों की मदद से अंग्रेजों पर धावा बोला और उनकी नींद हराम कर दी। 23 अप्रैल 1858 को गगारी और खटंगा गांव के बीच मेजर मेकडोनाल्ड की फौज ने जीतनाथ बेदिया और उनके साथियों को घेर लिया। आत्मसमर्पण नहीं करने पर मेजर के आदेश पर जीतराम बेदिया को उसके घोड़े सहित गोली मार दी गयी और उनके शव व घोड़े के शव को साथ में एक गड्ढे में दफना दिया गया।  बिरसा के उलगुलान के दौरान एक बड़ी घटना घटी थी। तत्कालीन रांची जिला के गुटूहड़ निवासी मंगन मुंडा के पुत्र हतिराम मुंडा को अंग्रेजों ने जिंदा दफन कर दिया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिंदा दफन करने का शायद ही कोई दूसरा उदाहरण हो।

 

✍ हिमकर श्याम

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गाँधी की पत्रकारिता

mahatma-gandhiअहिंसा के पथ-प्रदर्शक, सत्यनिष्ठ समाज सुधारक, महात्मा और राष्ट्रपिता के रूप में विश्व विख्यात गाँधी सबसे पहले कुशल पत्रकार थे। गाँधी की  नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रीयता और जनजागरण था। वह जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता में रखने के प्रबल पक्षधर थे। पत्रकारिता उनके लिए व्यवसाय नहीं, बल्कि जनमत को प्रभावित करने का एक लक्ष्योन्मुखी प्रभावी माध्यम था। महात्मा गाँधी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से ही की थी। गाँधी ने पत्रकारिता में स्वतंत्र लेखन के माध्यम से प्रवेश किया था। बाद में साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया। बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर स्वराजपूर्व के गाँधी युग तक पत्रकारिता का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस युग की पत्रकारिता पर गाँधी जी की विशेष छाप रही। गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रम और अस्योग आन्दोलन के प्रचार के लिए देश भर में कई पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ।

महात्मा गाँधी में सहज पत्रकार के गुण थे। पत्रकारिता उनके रग-रग में समाई हुई थी, जिसे उन्होंने मिशन के रूप में अपनाया था। स्वयं गाँधी के शब्दों में ‘मैंने पत्रकारिता को केवल पत्रकारिता के प्रयोग के लिए नहीं बल्कि उसे जीवन में अपना जो मिशन बनाया है उसके साधन के रूप में अपनाया है। सन 1888 में क़ानून की पढ़ाई के लिए जब गाँधी लंदन पहुँचे उस वक़्त उनकी आयु मात्र 19 वर्ष थी। उन्होंने ‘टेलिग्राफ़’ और ‘डेली न्यूज़’ जैसे अख़बारों में लिखना शुरू किया। दक्षिण अफ़्रीका में प्रवास के दौरान उन्होंने भारतीयों के साथ होनेवाले भेदभावों और अत्याचारों के बारे में भारत से प्रकाशित ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ‘हिंदू’, ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’, ‘स्टेट्समैन’ आदि पत्रों के लिए अनेक लेख लिखे व इंटरव्यू भेजे। ये वही दौर था जब अफ़ीका में अश्वेत लोगों के खिलाफ ज़ुल्म की कहानियां पूरी दुनिया सुन रही थी। गाँधी ने ऐसे में अपनी वकालत के ज़रिये उन्हे उनका हक़ दिलाने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया में एक बार, वहां के एक कोर्ट परिसर में गाँधी को पगड़ी पहनने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उन्हे केस की कार्रवाई बिना पगड़ी के करनी होगी। गाँधी ने पगड़ी उतार दी, केस लड़ा लेकिन वो इस मुद्दे को आगे ले जाने का मन बना चुके थे। अगले ही दिन गाँधी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को खत लिखकर इस मामले पर अपना विरोध जताया। विरोध के तौर पर लिखी उनकी चिट्टी को अख़बार में जस का तस प्रकाशित किया गया। यहीं से शुरू हुआ था गाँधी की पत्रकारिता का सफ़र।

विश्व में ऐसे कितने ही लेखक हैं, जिन्होंने यद्यपि किसी पत्र का सम्पादन नहीं किया किंतु लोग उन्हें पत्रकार मान सकते हैं। समाज को समय की कसौटी पर कसनेवाला कोई भी हो, वह पत्रकार कहलाने के योग्य है। गाँधी में जनता की नब्ज़ पहचानने की अद्भुत क्षमता थी और वह उनकी भावनाओं को समझने में देर न लगाते थे। दक्षिण अफ़्रीका के अनुभवों ने और सत्याग्रह के उनके प्रयोगों ने उन्हें ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र के सम्पादन की प्रेरणा दी। 4 जून 1903 को चार भाषाओं में इसका प्रकाशन शुरू किया गया, जिसके एक ही अंक में हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और तमिल भाषा में छह कॉलम प्रकाशित होते थे। अफ़्रीका तथा अन्य देशों में बसे प्रवासी भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करने तथा सामाजिक-राजनैतिक चेतना जागृत करने में यह पत्रिका बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। महात्मा गाँधी दस वर्षों तक इससे जुड़े रहे। ‘इंडियन ओपिनियन’ का उद्देश्य था दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को स्वतंत्र जीवन का महत्व समझाना। इसी के द्वारा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार भी प्रारंभ किया। 1906 में जोहानेसबर्ग की जेल में उन्हें बंद कर दिया गया तो वहीं से उन्होंने अपना संपादन कार्य जारी रखा। महात्मा गाँधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया। ‘इन्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए देशवासियों के हित में आवाज उठायी। यह गाँधी की सत्यनिष्ठ और निर्भीक पत्रकारिता का असर ही था कि अफ्रीका जैसे देश में रंगभेद जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद चार अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस अखबार का प्रकाशन होता रहा। महात्मा गाँधी के अनुसार : मेरा ख़्याल है कि कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अख़बार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती। अगर मैंने अख़बार निकालकर दक्षिण अफ़्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ़्रीका में क्या कुछ हो रहा है, इसे इंडियन ओपिनियन के सहारे अवगत न रखा होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता। इस तरह मुझे भरोसा हो गया कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अख़बार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन हैं।

दक्षिण अफ़्रीका में जब भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई में सफलता प्राप्त हो गई तो वह भारत लौटे। भारत आने के बाद सन 1914 में पत्र-प्रकाशन की योजना बनाई।  गाँधी जी के समक्ष अनेक पत्रों के सम्पादन भार ग्रहण करने के प्रस्ताव आए, किंतु उन्होंने सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। उस वक़्त के प्रसिद्ध पत्र ‘बाम्बे क्रॉनिकल’ के सम्पादक पद को भी अस्वीकार कर दिया था। 7 अप्रैल 1919 को बम्बई से ‘सत्याग्रही’ नाम से एक पृष्ठ का बुलेटिन निकालना शुरू किया जो मुख्यतः अंग्रेज़ी और हिंदी में निकलता था। इसके पहले ही अंक में उन्होंने रोलेट एक्ट का तीव्र विरोध किया और इसे तब तक प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया जब तक कि रोलेट ऐक्ट वापस नहीं ले लिया जाता। गाँधी जैसा महान पत्रकार एवं सम्पादक कदाचित इस देश में पैदा नहीं हुआ। जन समस्याएँ ढूँढना और उन समस्याओं को सहज सुलझाने की क़ाबिलियत रखते थे। गाँधी के ‘यंग़ इंडिया’,  ‘हरिजन’ और ‘हरिजन सेवक’ में प्रकाशित होनेवाले लेखों ने जन जागरण का काम किया। समस्या और घटना चाहे उड़ीसा की हो या तमिलनाडु की, आंध्र प्रदेश की हो या मलय देश की, उत्तर प्रदेश की हो या मध्यप्रदेश की गाँधी उन समस्याओं और घटनाओं को न सिर्फ़ अपने साप्ताहिक पत्र में उल्लेख थे बल्कि उनपर अपना मत भी देते थे। कई बार उनके मत लोक जीवन के परंपरागत मत से मेल नहीं खाते थे, फिर भी अपने उस मत को व्यक्त करने का ख़तरा उठाते थे।

समाचार पत्र न केवल समय की आवश्यकता है, बल्कि देश की रक्षा पंक्ति का बहुत बड़ा बल है। शांत और अशांत काल में लोकजीवन के आचार-विचार को नियंत्रित करनेवाला क्रांतिदूत है। धारणाओं एवं विश्वासों को सजग, श्रेष्ठ और समर्पणशील बनाये रखने के लिए एक महान दर्शन भी है, जो गाँधी की पंक्ति-पंक्ति में व्यक्त होता था। गांधी एक ओर वाइसराय को चुनौती का पत्र लिखते थे, वही दूसरी ओर धर्म-अधर्म, हिंसा-अहिंसा, हरिजनों उद्धार, खादी ग्रामोद्योग, शिक्षा, भाषा और गोरक्षा आदि के प्रसंगों की भी चर्चा करते थे। गाँधी ने पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना को प्रभावित करने का बड़ा काम किया। गाँधी द्वारा सम्पादित पत्रों में सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिध्द पत्र था हरिजन। 11 फरवरी 1933 को घनश्याम दास बिड़ला की सहायता से हरिजन का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ और गाँधी जो उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन के सिलसिले में पूना में जेल में थे, वहीं से पत्र का संचालन करते थे। महात्मा गाँधी की लगभग 50 वर्षों की पत्रकारिता जो उन्होंने इंडियन ओपिनियन, यंग इंडियन, नवजीवन और हरिजन के माध्यम से की, वह भी राजनैतिक बगावत और सामाजिक बुराइयों पर निरंतर हमला था। गाँधी -युग पत्रकारिता की समृद्धि का युग है। गाँधी युग में जो भी पत्रिकाएँ निकलीं उनमें भाषा, कलेवर, विचार के दृष्टिकोण से कई बदलाव भी आये। देश के लिए हर प्रकार की स्वाधीनता पाना ही इन पत्रों का मुख्य उद्देश्य था। इस युग में स्वतंत्रता का प्रसार हुआ। कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करनेवाले प्रमुख संगठन का रूप ग्रहण कर लिया।

गाँधी ने पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया और अपने सत्याग्रह के आंदोलन को धार देने के लिए उपयोग किया। गाँधी ने लगभग हर विषय पर लिखा और अपना दृष्टिकोण लोगों तक पहुंचाया। गाँधी ने लिखा था, “मैंने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में लिया है उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिनको में जरूरी समझता हूं और जो सत्याग्रह, अहिंसा व सत्य के अन्वेषण पर टिकी हैं।” ‘हरिजन’ द्वारा भी गाँधी ने सामाजिक एकता व बराबरी का संदेश दिया। चूँकि इन समाचार पत्रों व पत्रिकाओं का उद्देश्य स्वतंत्रता संघर्ष भी था, अँगरेजों ने गाँधीजी को बड़ा कष्ट दिया मगर गाँधी ने भी यह सिद्ध कर दिया कि वे इस मैदान में भी किसी से कम नहीं थे। सरकार के प्रेस नियंत्रण का सामना गाँधी जी को भी करना पड़ा। प्रेस की स्वतंत्रता के हिमायती गाँधी  ने सरकारी आदेशों जी अवहेलना की। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार के प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट लिखा : यदि प्रेस सलाहकार को सत्याग्रह संबंधी प्रत्येक सामग्री भेजी जाने लगी तो प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हो जायेगी। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता हमारा परम अधिकार है। अतः हम इस प्रकार के आदेशों को नहीं मान सकते। प्रेस नियंत्रणों के कारण यंग इण्डिया के प्रकाशन को असम्भव देखते हुए सन 1930 में उन्होंने लिखा- मैं पत्रकारों  और प्रकाशकों से अनुरोध करूँगा कि वे जमानत देने से इनकार कर दें और यदि उनसे जमानत मांगी गई तो इच्छानुसार प्रकाशन बंद कर दे अथवा जमानत जब्त करने के विरुद्ध शासन को चुनौती दें।  व्यवसायिक पत्रकारिता से दूर रहते हुए गाँधी ने सदा जनहित एवं मशीनरी भावना से कार्य किया। देश के कोने-कोने में घूमकर संवाददाता एक दो ख़बरे ही लाता है किंतु गाँधी समस्त राष्ट्र का बल अपनी मुठ्ठी में ले आये थे। उनकी समस्त पत्रकारिता में उनकी समस्त अभिव्यक्ति में एक महान दर्शन है।

महात्मा गाँधी की लड़ाई का एक बड़ा साधन पत्रकारिता रहा है। चाहे दक्षिण अफ्रीका में नस्ल भेद के खिलाफ संघर्ष करते वक्त ‘इंडियन ओपेनियन’ का प्रकाशन हो, चाहे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता-आंदोलन में सक्रियता के दौरान ‘यंग इंडिया’ का; या छुआछूत के खिलाफ ‘हरिजन’ का प्रकाशन हो। गाँधी  पत्रकारिता के जरिए समाज के चेतना-निर्माण का कार्य किया। गाँधी ने अपने किसी भी समाचार पत्र में कभी भी विज्ञापन स्वीकार नहीं किये। गाँधी की पत्रकारिता में उनके संघर्ष का बड़ा व्याहारिक दृष्टिकोण नजर आता है। जिस आमजन, हरिजन एवं सामाजिक समानता के प्रति गाँधी का रुझान उनके जीवन संघर्ष में दिखता है, बिल्कुल वैसा ही रुझान उनकी पत्रकारिता में भी देखा जा सकता है। गाँधी के शब्द और कर्म, चेतना और चिंतन के केंद्र में हमेशा ही अंतिम जन रहता था। वे अंतिम जन की आंख से समाज, देश-दुनिया को देखने के लिये प्रेरित भी करते थे।

गाँधी भले ही व्यवसाय से पत्रकार न रहे हों, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी का जिस उत्तरदायित्व के साथ उपयोग किया था और जैसे संयम और अनुशासन का उन्होंने अपने संपादन में उपयोग किया था, वह आज दुर्लभ है। गाँधी शब्द की ताकत को बखूबी पहचानते थे इसलिए बड़ी सावधानी से लिखते थे। अपनी लेखनी से वह लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित करते थे। गाँधी की जैसी सरल भाषा और सहज संप्रेषणीयता पत्रकारिता में आज भी आदर्श है। महात्मा गाँधी पाठक के साथ सीधा संवाद करते थे। वह कहते थे कि पाठक नहीं तैयार करना है, पाठक को तैयार करना है। पाठक ऐसा होना चाहिए, जो केवल खबरों को पढ़ता ही न हो बल्कि बार-बार पढ़ता हो। वह इतनी बार पढ़ता हो कि उसे याद हो जाए। महात्मा गाँधी की पत्रकारिता में आत्मा बसती थी, आज की पत्रकारिता में स्थायी भाव नहीं है। यदि गाँधी राष्ट्रपिता न होते तो शायद इस शताब्दी के महानतम भारतीय पत्रकार एवं संपादक होते।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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