Category: पत्रकारिता

गाँधी की पत्रकारिता

mahatma-gandhiअहिंसा के पथ-प्रदर्शक, सत्यनिष्ठ समाज सुधारक, महात्मा और राष्ट्रपिता के रूप में विश्व विख्यात गाँधी सबसे पहले कुशल पत्रकार थे। गाँधी की  नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रीयता और जनजागरण था। वह जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता में रखने के प्रबल पक्षधर थे। पत्रकारिता उनके लिए व्यवसाय नहीं, बल्कि जनमत को प्रभावित करने का एक लक्ष्योन्मुखी प्रभावी माध्यम था। महात्मा गाँधी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से ही की थी। गाँधी ने पत्रकारिता में स्वतंत्र लेखन के माध्यम से प्रवेश किया था। बाद में साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया। बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर स्वराजपूर्व के गाँधी युग तक पत्रकारिता का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस युग की पत्रकारिता पर गाँधी जी की विशेष छाप रही। गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रम और अस्योग आन्दोलन के प्रचार के लिए देश भर में कई पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ।

महात्मा गाँधी में सहज पत्रकार के गुण थे। पत्रकारिता उनके रग-रग में समाई हुई थी, जिसे उन्होंने मिशन के रूप में अपनाया था। स्वयं गाँधी के शब्दों में ‘मैंने पत्रकारिता को केवल पत्रकारिता के प्रयोग के लिए नहीं बल्कि उसे जीवन में अपना जो मिशन बनाया है उसके साधन के रूप में अपनाया है। सन 1888 में क़ानून की पढ़ाई के लिए जब गाँधी लंदन पहुँचे उस वक़्त उनकी आयु मात्र 19 वर्ष थी। उन्होंने ‘टेलिग्राफ़’ और ‘डेली न्यूज़’ जैसे अख़बारों में लिखना शुरू किया। दक्षिण अफ़्रीका में प्रवास के दौरान उन्होंने भारतीयों के साथ होनेवाले भेदभावों और अत्याचारों के बारे में भारत से प्रकाशित ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ‘हिंदू’, ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’, ‘स्टेट्समैन’ आदि पत्रों के लिए अनेक लेख लिखे व इंटरव्यू भेजे। ये वही दौर था जब अफ़ीका में अश्वेत लोगों के खिलाफ ज़ुल्म की कहानियां पूरी दुनिया सुन रही थी। गाँधी ने ऐसे में अपनी वकालत के ज़रिये उन्हे उनका हक़ दिलाने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया में एक बार, वहां के एक कोर्ट परिसर में गाँधी को पगड़ी पहनने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उन्हे केस की कार्रवाई बिना पगड़ी के करनी होगी। गाँधी ने पगड़ी उतार दी, केस लड़ा लेकिन वो इस मुद्दे को आगे ले जाने का मन बना चुके थे। अगले ही दिन गाँधी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को खत लिखकर इस मामले पर अपना विरोध जताया। विरोध के तौर पर लिखी उनकी चिट्टी को अख़बार में जस का तस प्रकाशित किया गया। यहीं से शुरू हुआ था गाँधी की पत्रकारिता का सफ़र।

विश्व में ऐसे कितने ही लेखक हैं, जिन्होंने यद्यपि किसी पत्र का सम्पादन नहीं किया किंतु लोग उन्हें पत्रकार मान सकते हैं। समाज को समय की कसौटी पर कसनेवाला कोई भी हो, वह पत्रकार कहलाने के योग्य है। गाँधी में जनता की नब्ज़ पहचानने की अद्भुत क्षमता थी और वह उनकी भावनाओं को समझने में देर न लगाते थे। दक्षिण अफ़्रीका के अनुभवों ने और सत्याग्रह के उनके प्रयोगों ने उन्हें ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र के सम्पादन की प्रेरणा दी। 4 जून 1903 को चार भाषाओं में इसका प्रकाशन शुरू किया गया, जिसके एक ही अंक में हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और तमिल भाषा में छह कॉलम प्रकाशित होते थे। अफ़्रीका तथा अन्य देशों में बसे प्रवासी भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करने तथा सामाजिक-राजनैतिक चेतना जागृत करने में यह पत्रिका बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। महात्मा गाँधी दस वर्षों तक इससे जुड़े रहे। ‘इंडियन ओपिनियन’ का उद्देश्य था दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को स्वतंत्र जीवन का महत्व समझाना। इसी के द्वारा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार भी प्रारंभ किया। 1906 में जोहानेसबर्ग की जेल में उन्हें बंद कर दिया गया तो वहीं से उन्होंने अपना संपादन कार्य जारी रखा। महात्मा गाँधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया। ‘इन्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए देशवासियों के हित में आवाज उठायी। यह गाँधी की सत्यनिष्ठ और निर्भीक पत्रकारिता का असर ही था कि अफ्रीका जैसे देश में रंगभेद जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद चार अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस अखबार का प्रकाशन होता रहा। महात्मा गाँधी के अनुसार : मेरा ख़्याल है कि कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अख़बार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती। अगर मैंने अख़बार निकालकर दक्षिण अफ़्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ़्रीका में क्या कुछ हो रहा है, इसे इंडियन ओपिनियन के सहारे अवगत न रखा होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता। इस तरह मुझे भरोसा हो गया कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अख़बार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन हैं।

दक्षिण अफ़्रीका में जब भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई में सफलता प्राप्त हो गई तो वह भारत लौटे। भारत आने के बाद सन 1914 में पत्र-प्रकाशन की योजना बनाई।  गाँधी जी के समक्ष अनेक पत्रों के सम्पादन भार ग्रहण करने के प्रस्ताव आए, किंतु उन्होंने सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। उस वक़्त के प्रसिद्ध पत्र ‘बाम्बे क्रॉनिकल’ के सम्पादक पद को भी अस्वीकार कर दिया था। 7 अप्रैल 1919 को बम्बई से ‘सत्याग्रही’ नाम से एक पृष्ठ का बुलेटिन निकालना शुरू किया जो मुख्यतः अंग्रेज़ी और हिंदी में निकलता था। इसके पहले ही अंक में उन्होंने रोलेट एक्ट का तीव्र विरोध किया और इसे तब तक प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया जब तक कि रोलेट ऐक्ट वापस नहीं ले लिया जाता। गाँधी जैसा महान पत्रकार एवं सम्पादक कदाचित इस देश में पैदा नहीं हुआ। जन समस्याएँ ढूँढना और उन समस्याओं को सहज सुलझाने की क़ाबिलियत रखते थे। गाँधी के ‘यंग़ इंडिया’,  ‘हरिजन’ और ‘हरिजन सेवक’ में प्रकाशित होनेवाले लेखों ने जन जागरण का काम किया। समस्या और घटना चाहे उड़ीसा की हो या तमिलनाडु की, आंध्र प्रदेश की हो या मलय देश की, उत्तर प्रदेश की हो या मध्यप्रदेश की गाँधी उन समस्याओं और घटनाओं को न सिर्फ़ अपने साप्ताहिक पत्र में उल्लेख थे बल्कि उनपर अपना मत भी देते थे। कई बार उनके मत लोक जीवन के परंपरागत मत से मेल नहीं खाते थे, फिर भी अपने उस मत को व्यक्त करने का ख़तरा उठाते थे।

समाचार पत्र न केवल समय की आवश्यकता है, बल्कि देश की रक्षा पंक्ति का बहुत बड़ा बल है। शांत और अशांत काल में लोकजीवन के आचार-विचार को नियंत्रित करनेवाला क्रांतिदूत है। धारणाओं एवं विश्वासों को सजग, श्रेष्ठ और समर्पणशील बनाये रखने के लिए एक महान दर्शन भी है, जो गाँधी की पंक्ति-पंक्ति में व्यक्त होता था। गांधी एक ओर वाइसराय को चुनौती का पत्र लिखते थे, वही दूसरी ओर धर्म-अधर्म, हिंसा-अहिंसा, हरिजनों उद्धार, खादी ग्रामोद्योग, शिक्षा, भाषा और गोरक्षा आदि के प्रसंगों की भी चर्चा करते थे। गाँधी ने पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना को प्रभावित करने का बड़ा काम किया। गाँधी द्वारा सम्पादित पत्रों में सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिध्द पत्र था हरिजन। 11 फरवरी 1933 को घनश्याम दास बिड़ला की सहायता से हरिजन का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ और गाँधी जो उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन के सिलसिले में पूना में जेल में थे, वहीं से पत्र का संचालन करते थे। महात्मा गाँधी की लगभग 50 वर्षों की पत्रकारिता जो उन्होंने इंडियन ओपिनियन, यंग इंडियन, नवजीवन और हरिजन के माध्यम से की, वह भी राजनैतिक बगावत और सामाजिक बुराइयों पर निरंतर हमला था। गाँधी -युग पत्रकारिता की समृद्धि का युग है। गाँधी युग में जो भी पत्रिकाएँ निकलीं उनमें भाषा, कलेवर, विचार के दृष्टिकोण से कई बदलाव भी आये। देश के लिए हर प्रकार की स्वाधीनता पाना ही इन पत्रों का मुख्य उद्देश्य था। इस युग में स्वतंत्रता का प्रसार हुआ। कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करनेवाले प्रमुख संगठन का रूप ग्रहण कर लिया।

गाँधी ने पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया और अपने सत्याग्रह के आंदोलन को धार देने के लिए उपयोग किया। गाँधी ने लगभग हर विषय पर लिखा और अपना दृष्टिकोण लोगों तक पहुंचाया। गाँधी ने लिखा था, “मैंने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में लिया है उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिनको में जरूरी समझता हूं और जो सत्याग्रह, अहिंसा व सत्य के अन्वेषण पर टिकी हैं।” ‘हरिजन’ द्वारा भी गाँधी ने सामाजिक एकता व बराबरी का संदेश दिया। चूँकि इन समाचार पत्रों व पत्रिकाओं का उद्देश्य स्वतंत्रता संघर्ष भी था, अँगरेजों ने गाँधीजी को बड़ा कष्ट दिया मगर गाँधी ने भी यह सिद्ध कर दिया कि वे इस मैदान में भी किसी से कम नहीं थे। सरकार के प्रेस नियंत्रण का सामना गाँधी जी को भी करना पड़ा। प्रेस की स्वतंत्रता के हिमायती गाँधी  ने सरकारी आदेशों जी अवहेलना की। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार के प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट लिखा : यदि प्रेस सलाहकार को सत्याग्रह संबंधी प्रत्येक सामग्री भेजी जाने लगी तो प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हो जायेगी। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता हमारा परम अधिकार है। अतः हम इस प्रकार के आदेशों को नहीं मान सकते। प्रेस नियंत्रणों के कारण यंग इण्डिया के प्रकाशन को असम्भव देखते हुए सन 1930 में उन्होंने लिखा- मैं पत्रकारों  और प्रकाशकों से अनुरोध करूँगा कि वे जमानत देने से इनकार कर दें और यदि उनसे जमानत मांगी गई तो इच्छानुसार प्रकाशन बंद कर दे अथवा जमानत जब्त करने के विरुद्ध शासन को चुनौती दें।  व्यवसायिक पत्रकारिता से दूर रहते हुए गाँधी ने सदा जनहित एवं मशीनरी भावना से कार्य किया। देश के कोने-कोने में घूमकर संवाददाता एक दो ख़बरे ही लाता है किंतु गाँधी समस्त राष्ट्र का बल अपनी मुठ्ठी में ले आये थे। उनकी समस्त पत्रकारिता में उनकी समस्त अभिव्यक्ति में एक महान दर्शन है।

महात्मा गाँधी की लड़ाई का एक बड़ा साधन पत्रकारिता रहा है। चाहे दक्षिण अफ्रीका में नस्ल भेद के खिलाफ संघर्ष करते वक्त ‘इंडियन ओपेनियन’ का प्रकाशन हो, चाहे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता-आंदोलन में सक्रियता के दौरान ‘यंग इंडिया’ का; या छुआछूत के खिलाफ ‘हरिजन’ का प्रकाशन हो। गाँधी  पत्रकारिता के जरिए समाज के चेतना-निर्माण का कार्य किया। गाँधी ने अपने किसी भी समाचार पत्र में कभी भी विज्ञापन स्वीकार नहीं किये। गाँधी की पत्रकारिता में उनके संघर्ष का बड़ा व्याहारिक दृष्टिकोण नजर आता है। जिस आमजन, हरिजन एवं सामाजिक समानता के प्रति गाँधी का रुझान उनके जीवन संघर्ष में दिखता है, बिल्कुल वैसा ही रुझान उनकी पत्रकारिता में भी देखा जा सकता है। गाँधी के शब्द और कर्म, चेतना और चिंतन के केंद्र में हमेशा ही अंतिम जन रहता था। वे अंतिम जन की आंख से समाज, देश-दुनिया को देखने के लिये प्रेरित भी करते थे।

गाँधी भले ही व्यवसाय से पत्रकार न रहे हों, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी का जिस उत्तरदायित्व के साथ उपयोग किया था और जैसे संयम और अनुशासन का उन्होंने अपने संपादन में उपयोग किया था, वह आज दुर्लभ है। गाँधी शब्द की ताकत को बखूबी पहचानते थे इसलिए बड़ी सावधानी से लिखते थे। अपनी लेखनी से वह लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित करते थे। गाँधी की जैसी सरल भाषा और सहज संप्रेषणीयता पत्रकारिता में आज भी आदर्श है। महात्मा गाँधी पाठक के साथ सीधा संवाद करते थे। वह कहते थे कि पाठक नहीं तैयार करना है, पाठक को तैयार करना है। पाठक ऐसा होना चाहिए, जो केवल खबरों को पढ़ता ही न हो बल्कि बार-बार पढ़ता हो। वह इतनी बार पढ़ता हो कि उसे याद हो जाए। महात्मा गाँधी की पत्रकारिता में आत्मा बसती थी, आज की पत्रकारिता में स्थायी भाव नहीं है। यदि गाँधी राष्ट्रपिता न होते तो शायद इस शताब्दी के महानतम भारतीय पत्रकार एवं संपादक होते।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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मीडिया और हिंदी

hindi_diwasभारत में अनेक समृद्ध भाषाएँ हैं. इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है. हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया. क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है. हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है. देश में प्रायः सभी जगह हिंदी व्यापक स्तर पर बोली और समझी जा रही है. दक्षिण भारत हो या पूर्वोत्तर भारत हर जगह हिंदी का सहज व्यवहार हो रहा है. भाषाओं के लम्बे इतिहास में ऐसी बहुरूपी भाषा का अस्तित्व और कहीं नहीं मिलता. हिंदी बोलनेवाले लोगों की संख्या 50 करोड़ है. जनसंख्या की दृष्टि से  हिंदी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा है. यदि हिंदी समझनेवालों की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाये तो यह दूसरे नम्बर पर आ जाएगी. दुनिया में शायद ही किसी भाषा का इतना तीव्र विकास और व्यापक फैलाव हुआ होगा. हिंदी को पल्लवित-पुष्पित करने में मीडिया की महती भूमिका रही है.

हिंदी जैसी सरल और उदार भाषा शायद ही कोई हो. हिंदी सबको अपनाती रही है, सबका यथोचित स्वागत करती रही है. किसी भी भाषा के शब्द को अपने अंदर समाहित करने में गुरेज नहीं किया. अंग्रेजी, अरबी, फारसी, तुर्की, फ्रांसीसी, पोर्चुगीज आदि विदेशी शब्द हिंदी की शब्दकोश में मिल जायेंगे. जो भी इसके समीप आया सबको गले से लगाया. भौगोलिक विस्तार के अनेक जनपदों और उनके व्यवहृत अठारह बोलियों   (पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत खड़ी बोली, बाँगरू, ब्रजभाषा, कन्नौजी, पूर्वी हिंदी में अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बिहारी में मैथिली, मगही, भोजपुरी, राजस्थानी में मेवाती-अहीरवादी, मालवी, जयपुरी-हाड़ौती, मारवाड़ी- मेवाड़ी तथा पहाड़ी में पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी, पूर्वी पहाड़ी) के वैविध्य को, जिनमें से कई व्याकरणिक दृष्टि से एक-दूसरे की विरोधी विशेषताओं से युक्त कही जा सकती है, हिंदी भाषा बड़े सहज भाव से धारण करती है. हिंदी के स्वरूप के सम्बन्ध में इसलिए वैचारिक द्वैत की भावना ग्रियर्सन में जगह-जगह दिखती है. ‘भाषा सर्वेक्षण’ के भूमिका में वे लिखते हैं ‘इस प्रकार कहा जा सकता है और सामान्य रूप से लोगों का विश्वास भी यही है कि गंगा के समस्त काँठे में, बंगाल और पंजाब के बीच. उपजी अनेक स्थानीय बोलियों सहित, केवल एकमात्र प्रचलित भाषा हिंदी ही है.’ इन सारी बोलियों के समूह और संश्लेष को पहले भी हिंदी, हिंदवी, हिंदई कहा जाता था, और आज भी हिंदी कहा जाता है. बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान में पंजाब से लेकर सिंध तक हिंदी की बोली समझी जाती थी. लाहौर हिंदी का गढ़ था. वहाँ हिंदी के कई बड़े प्रकाशन भी थे. बंटवारे के बाद हिंदी की अनदेखी की गई, लेकिन हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी चैनलों के मनोरंजक कार्यक्रमों, धारावाहिकों के कारण वहाँ हिंदी का प्रभाव फिर बढ़ रहा है. नेपाल और बंगलादेश में भी हिंदी का प्रभाव है. 50 देशों में हिंदी पढाई जा रही है. 500 से ज्यादा संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई होती है. अमेरिका से लेकर चीन तक कई विश्व-विद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है. ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, युगांडा, गुयाना, फिजी, नीदरलैंड, सिंगापुर, त्रिनिदाद, टोबैगो और खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी हैं. दुबई जैसे शहरों में हिंदी बोलचाल की भाषा बन गयी है.

निर्विवाद तथ्य है कि खड़ी बोली ही आज की हिंदी है. भारत के हिंदी मीडिया की भाषा भी यही है, पत्र- पत्रिकाओं की भी और टेलीविजन और फिल्मों की भी. हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है. साहित्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की उदात्त भावना लेकर चला है तो पत्रकारिता भी इसी प्रकार के मानव कल्याण के उद्देश्य को लेकर अवतरित हुई है. वस्तुतः साहित्य जीवन की कलात्मक अभिव्यक्ति है. पत्रकारिता भी सत्यम, शिवम सुंदरम की ओर जन मानस को उन्मुख करती है. यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो पत्रकारिता उस समाज की प्रतिकृति है. हिंदी साहित्य के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालें तो हम पाएंगे कि पत्र पत्रिकाओं की साहित्य के विकास में अहम भूमिका रही है. वास्तव में भाषा के प्रचार प्रसार में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा है.

हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है. राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा. भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया. समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किये और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की. राममोहन राय ने कई पत्र शुरू किये. जिसमें महत्वपूर्ण हैं- साल 1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’. बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है. इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे. इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई. 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है. 1873 ई. में भारतेन्दु ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ की स्थापना की. एक वर्ष बाद यह पत्र  ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ नाम से प्रसिद्ध हुआ. वैसे भारतेन्दु का ‘कविवचन सुधा’ पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया था. परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ से ही हुआ. भारतेन्दु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्मा, बालकृष्ण भट्ट, दुर्गाप्रसाद मिश्र, पंडित सदानंद मिश्र, पंडित वंशीधर, बदरीनारायण, देवकीनंदन त्रिपाठी, राधाचरण गोस्वामी, पंडित गौरीदत्त, राज रामपाल सिंह, प्रतापनारायण मिश्र, अंबिकादत्त व्यास,  बाबू रामकृष्ण वर्मा, पं. रामगुलाम अवस्थी, योगेशचंद्र वसु, पं. कुंदनलाल और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास. 1895 ई. में ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. इस पत्रिका से गंभीर साहित्य समीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं. 1900 ई. में ‘सरस्वती’ और ‘सुदर्शन’ के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है. इन वर्षों में हिंदी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई. प्रारंभिक पत्र शिक्षा-प्रसार और धर्म प्रचार तक सीमित थे. भारतेन्दु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं.

सन् 1880 से लेकर, सदी के अंत तक लखनऊ, प्रयाग, मिर्जापुर, वृंदावन, मुंबई, कोलकाता जैसे दूरदराज क्षेत्रों से पत्र निकलते रहे. सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण है. 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है. वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई. उसी वर्ष छत्तीसगढ़ प्रदेश के बिलासपुर-रायपुर से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन शुरू होता है. ‘सरस्वती’ के ख्यात संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के संपादक पंडित माधवराव सप्रे थे.

पत्रकारिता का यह काल बहुमुखी सांस्कृतिक नवजागरण का यह समुन्नत काल है. इसमें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक लेखन की परंपरा का श्रीगणेश होता है. इस दौर में साहित्यिक लेखन और पत्रकारिता के सरोकारों को अलग नहीं किया जा सकता. सांस्कृतिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक सरोकार और दमन का प्रतिकार इन चार पहियों के रथ पर हिंदी पत्रकारिता अग्रसर हुईं. माधवराव सप्रे ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को ‘हिंद केसरी’ के रूप में छापना शुरू किया. समाचार सुधावर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण,बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चाँद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए देशभक्ति के जज्बे को जगाया और क्रांति का आह्नान किया.

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है. राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबा साहब अम्बेडकर, यशपाल जैसे आला दर्जे के नेता सीधे-सीधे तौर पर पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे और नियमित लिख रहे थे. जिसका असर देश के दूर-सुदूर गांवों में रहने वाले देशवासियों पर पड़ रहा था. सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही. कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रवक्ता की भूमिका निभायी. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रेमचंद, निराला, बनारसीदास चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शिवपूजन सहाय आदि की उपस्थिति ‘जागरण’, ‘हंस’, ‘माधुरी’, ‘अभ्युदय’, ‘मतवाला’, ‘विशाल भारत’ आदि के रूप में दर्ज है.

‘उदन्त मार्तण्ड’ के सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है. पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है. साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बन गया. अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आजादी के बाद आया. 1947 में देश को आजादी मिली. लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ. औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई. जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ. हिंदी पत्रों ने जहाँ एक ओर बहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त्र किया वहीं राष्ट्रभाषा को सर्वाधिक उपयोगी बनाने का सफल प्रयास किया. पत्रकारिता की शुरुआत एक मिशन के रूप में हुई थी. स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि यहां के पत्रों एवं पत्रकारों ने ही तैयार की थी. आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता देशभक्ति और समग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ जुड़ी रही. इसमे देशभक्ति के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है. स्वाधीनता से पहले देश के लिए संघर्ष का समय था. इस संघर्ष में जितना योगदान राजनेताओं का था उससे तनिक भी कम पत्रों एवं पत्रकारों का नहीं था. स्वतंत्रता पूर्व का पत्रकारिता का इतिहास तो स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य हिस्सा ही है. तब पत्रकारिता घोर संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए प्रयत्नशील थी.

90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, प्रभात खबर आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए. जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया. साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई. हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है. साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है. इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. पिछले कुछ सालों में हिंदी मीडिया ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है. प्रिंट मीडिया को ही लें, आइआरएस रिपोर्ट देखें तो उसमें ऊपर के पांच अखबार हिंदी के हैं. हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं का प्रसार लगातार बढ़ रहा है. इलेक्ट्रानिक मीडिया में हिन्दी न्यूज चैनलों की भरमार है. भारत में 182 से ज्यादा हिंदी न्यूज चैनल हैं. नई तकनीक और प्रौद्योगिकी ने अखबारों की ताकत और ऊर्जा का व्यापक विस्तार किया है.

किसी भी देश के विकास का संबंध भाषा से है. इसमें कोई संदेह नहीं कि आजकल राजभाषा हिंदी अपनी सीमाओं से बाहर आ चुकी है. यह विकास, बाजार और मीडिया की भाषा भी बन रही है. पूरे भारत और भारत के बाहर हिंदी के द्रुत प्रचार-प्रसार और विकास का श्रेय मनोरंजन चैनल, समाचार चैनल, खेल चैनल और कई धार्मिक चैनल को दिया जा सकता है. अगर किसी भी देशी-विदेशी कम्पनी को अपना उत्पाद बाजार में उतारना होता है तो उसकी पहली नजर हिंदी क्षेत्र पर पड़ती है क्योंकि उपभोक्ता शक्ति का वृहत्तम अंश हिंदी क्षेत्र में ही निहित है इसलिए उसका विज्ञापन कर्म हिंदी में ही होता है. दुनिया की एक बड़ी आबादी तक पहुंचने के लिए हिंदी की जरूरत पड़ेगी ही. हिंदी अखबारों, हिंदी पत्रिकाओं, हिंदी चैनलों, हिंदी रेडियो और हिंदी फिल्मों की जरूरत पड़ेगी ही. हिंदी माध्यमों का विकास होगा तो निस्संदेह हिंदी का भी विकास होगा.  बाजार और मीडिया का विस्तार होगा तो हिंदी भी फैलेगी और जब तक बाजार और मीडिया है तब तक हिंदी मौजूद रहेगी. बाजार और मीडिया ने हिंदी जाननेवालों को बाकी दुनिया से जुड़ने के नये विकल्प खोल दिये हैं. फिल्म, टी.वी., विज्ञापन और समाचार हर जगह हिंदी का वर्चस्व है.

वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है. हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है. इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया. हिंदी में संप्रेषण की ताकत है. हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई. चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई. गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है. इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं. सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है. 21 फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं. हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है. डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है. हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है. वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है. आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है. इस वजह से बाजार आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं. हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है.

[मित्रों, नमस्कार! आज आज का  यह दिन  मेरे  लिए  बहुत  ख़ास  है। इसके  ख़ास  होने  की  तीन वजहें  हैं पहली, आज  हिंदी (मातृभाषा) दिवस है। दूसरी वजह, आज मेरी माँ का जन्मदिन है। तीसरी और ख़ास वजह यह कि इस ब्लॉग (दूसरी आवाज़) के एक वर्ष पूरे हो गये। सभी पाठकों, ब्लॉगर बंधुओं, मित्रों, शुभचिन्तकों, प्रशंसकों, समर्थकों और आलोचकों का हार्दिक धन्यवाद। इस एक साल के सफ़र में आप सब ने जो सहयोग,प्यार और मान  दिया है, उस के लिये मैं बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ। आपकी शुभकामनाओं, स्नेह, सहयोग और मशवरों का आकांक्षी…]

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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समय के साथ बदली हिन्दी पत्रकारिता

Udant-martandहिन्दी पत्रकारिता का विस्तार और विकास अभिभूत करनेवाला है। 30 मई, 1826 को पं0 युगुल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था। उदन्त मार्तण्ड इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक पैसे पं युगुल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। उस दौर में किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि हिन्दी पत्रकारिता इतना लम्बा सफर तय करेगी। 190 वर्षों में हिन्दी अखबारों एवं हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी तेजी आई है।  नई तकनीक और प्रौद्योगिकी ने अखबारों की ताकत और ऊर्जा का व्यापक विस्तार किया है। समय के साथ-साथ हिन्दी पत्रकारिता की प्रकृति, स्वरूप और व्यवहार में व्यापक बदलाव आया है। बदलाव के इस दौर में पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है, जो चिंता का विषय है। बीते कुछ वर्षों में के दौरान हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां बढ़ी हैं, वहीँ मुक्त बाजार का कुप्रभाव भी इस पर देखने को मिला है। गुणवत्ता व विश्वसनीयता का संकट भी सामने खड़ा है।

उदारीकरण के बाद जिस तरह नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ, पत्रकारिता भी उससे अछूती नहीं रह पायी। पत्रकारिता में आये बदलाव के कारण पत्रकारिता की मिशनरी भावना पर बाजारबाद हावी हो गया। पत्रकारिता एक मिशन न होकर व्यवसाय में तब्दील गई। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने इस क्षेत्र में कदम रख दिया है। जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। इस कारण से पत्रकारिता अपने मूलभूत सि़द्धांतों का उल्लंघन करने लगी है और उसने उत्तेजना, सनसनी और खुलेपन को पूरी तरह से अपना लिया है। वर्तमान दौर की पत्रकारिता में तथ्यपरक्ता, यथार्थवादिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता, सत्यनिष्ठा और संतुलन का अभाव दिखता है। संपादकीय विभाग की भूमिका  गौण हो गई है और उसका स्थान मार्केटिंग विभाग ने ले लिया है। अखबारों को ख़बरों का गंभीर माध्यम बनाने के बजाय इन्हें लोक लुभावन बनाया जा रहा है। यहां भी जो बिकता है वहीं दिखता है वाली कहावत चरितार्थ होने लगी है। पैकेज पत्रकारिता के उद्भव के साथ ही अखबारों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिहृ लगने लगा है।

पत्रकारिता लोकभावना की अभिव्यक्ति एवं नैतिकता की पीठिका है। भारत में पत्रकारिता की शुरूआत एक मिशन के रूप में हुई थी। स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि यहां के पत्रों एवं पत्रकारों ने ही तैयार की थी। आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता देशभक्ति और समग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ जुड़ी रही। इसमे देशभक्ति के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है। स्वाधीनता से पहले देश के लिए संघर्ष का समय था। इस संघर्ष में जितना योगदान राजनेताओं का था उससे तनिक भी कम पत्रों एवं पत्रकारों का नहीं था। स्वतंत्रता पूर्व का पत्रकारिता का इतिहास तो स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य हिस्सा ही है। तब पत्रकारिता घोर संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए प्रयत्नशील थी। व्यावसायिक विस्तार के साथ ही वह साख के संकट से गुजरने लगी है। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ सीमाएं भी होतीं हैं। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूँजी उसकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। साख ही पत्रकारिता का प्राण है लेकिन इसकी रक्षा तभी संभव है जब पूर्णरूप से निष्पक्ष समाचारों का प्रकाशन हो। पत्रकारिता कर यह दायित्व है कि वह सही और संतुलित खबरें पाठकों तक पहुंचाए।

यह बड़े अफ़सोस की बात है कि मुख्यधारा की मीडिया में भारत का वास्तविक चेहरा दिखलाई नहीं देता है। ख़बरों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है। मीडिया को वही दिखता है जो उसके द्वारा तैयार बाजार पसंद करता है। जब तक प्रिंट की पत्रकारिता थी, पत्रकारिता में कुछ हद तक मिशनरी भावना बची हुई थी। पत्रकारिता के क्षेत्र में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के आगमन से मिशन पूरी तरह से प्रोफेशन में बदल गया। मुख्यधारा की पत्रकारिता से मोहभंग की स्थिति है और विकल्पों की तलाश शुरू हुई हो गयी है। वैकल्पिक मीडिया के रूप में अलग-अलग प्रयोग किये जाने लगे हैं। वेब पत्रकारिता और सोशल मीडिया का विस्तार ने पत्रकारिता को नया रूप दिया है। नागरिक आधारित पत्रकारिता के विभिन्न मंचों की सुगबुगाहट बढ़ रही है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में चुनौती तो हमेशा रही है लेकिन आज की पत्रकारिता पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण है। जहाँ तक आंचलिक पत्रकारिता का सवाल है यह सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। जनसरोकारों से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता देना आवश्यक और चुनौतीपूर्ण है, इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करनेवाला ही सही मायने में पत्रकार है। अपनी कला, संस्कृति, परम्परा और मान्यता को बचाना हिंदी पत्रों और पत्रकारों का उत्तरदायित्व है।

मीडिया पर बढ़ते बाजारवाद और उपभोक्तावाद के कारण ही आम आदमी हाशिए पर है। आमलोगों की समस्याओं और जरूरतों के लिए मीडिया में जगह और सहानुभूति नहीं दिखलाई देती है। हर जगह पाठकों को हासिल करने की भीषण स्पर्धा दिखाई देती है। पत्रकारिता में ऐसे लोग आ गए हैं जिनका लक्ष्य सीधे सीधे पैसा कमाना और पावर पाना है, उस पर एक सतर्क नजर रखने की भी जरूरत है। अब समय आ गया है कि पत्रकारिता की जवाबदेही तय की जाये और उसमें पारदर्शिता लायी जाये। साख बेचकर और पाठकों का विश्वास खोकर पत्रकारिता को बहुत दिनों तक जिंदा नहीं रखा जा सकता है।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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