सिमट रही नदियों की धारा

Harmuदुनियाभर की सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। रांची भी स्वर्णरेखा, हरमू, करम, जुमार, पोटपोटो समेत अन्य नदियों के किनारे बसी। यहाँ की पहाड़ियों में गाती, बलखाती,  इठलाती नदियों का प्रवाह कभी देखने लायक होता था। छोटे-छोटे पहाड़ों और घुमावदार रास्तों में इनका सौंदर्य बढ़ जाता था। ये नदियां हमारी जीवनशैली का अहम हिस्सा थीं। समाज का इन नदियों से रागात्मक रिश्ता था। नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ कृषि, सिंचाई  एवं अन्य कार्यों की जल आपूर्ति हेतु भी विशेष महत्व था। धीरे-धीरे नदी के प्रति श्रद्धा भावना का लोप हुआ और इसके उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ती चली गयी। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा सबसे ज्यादा नदियों को ही भुगतना पड़ा है। रांची शहर के इतिहास को अपने हृदय में समेटे नदियों का अस्तित्व खतरे में है। नदियां सिकुड़ रही हैं, इनका प्रवाह मर रहा है। दशकों से चल रहे सफाई अभियान को देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। नदियों की व्यथा पर शहर मौन है।

बढ़ते शहरीकरण और लोगों की उदासीनता के कारण पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान रांची और आसपास के क्षेत्रों में बहने वाली दर्जनों छोटी नदियां सूख गईं और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। इन नदियों में प्रदूषण का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। प्राकृतिक रचना और जलवायु की भिन्नता के कारण रांची समेत झारखंड की नदियों का स्वरूप उत्तर की मैदानी नदियों से भिन्न है। यहां की नदियों की एक विशेषता है कि कठोर चट्टान वाले प्रदेश से गुजरने के कारण वे गहरी घाटी और जलप्रपात का निर्माण करती हैं। यहाँ की अधिकांश नदियां बरसाती हैं।

स्वर्णरेखा : रांची के नगड़ी गांव से निकलकर स्वर्णरेखा पिस्का गांव की उत्तरी सीमा तथा टिकराटोली की दक्षिणी सीमा बनाती हुई दक्षिण-पूर्व की ओर अपनी यात्रा आरम्भ करती है। फिर यह कुदलुम, बालालौंग और नचियातु गांवों की दक्षिणी सीमा बनाती हुई रातू को छोड़ कर नामकुम प्रखंड पार कर रांची और हजारीबाग की सीमा बनाती है तथा दक्षिणी ओर मुड़कर सिल्ली, सोनहातू की सीमा बंगाल से अलग करती हुई पूर्वी सिंहभूम जिले में प्रवेश करती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले में घाटशिला के बाद इसकी घाटी काफी चौड़ी एवं निम्न हो जाती है। यहां के बाद यह समुद्रतल से मात्र 100 से 75 मीटर ऊंची रह जाती है। सिंहभूम में बहती हुई यह उत्तर पश्चिम से मिदनापुर जिले में प्रविष्ट होती है। इस जिले के पश्चिमी भूभाग के जंगलों में बहती हुई बालेश्वर जिले में पहुँचती है और फिर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी की कुल लंबाई 474 किलोमीटर है और लगभग 28928 वर्ग किलोमीटर का जल निकास इसके द्वारा होता है। इस नदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में मिलने तक किसी की सहायक नदी नहीं बनती। पठारी भाग की चट्टानों वाले प्रदेश से प्रवाहित होने के कारण स्वर्णरेखा नदी तथा इसकी सहायक नदियाँ गहरी घाटियों तथा जल प्रपात का निर्माण करती हैं। स्वर्णरेखा हुंडरू जलप्रपात का निर्माण करती है, जबकि इसकी सहायक राढ़ू नदी में जोन्हा और कांची नदी में दशम जलप्रपात का निर्माण होता है। ये सभी जलप्रपात एक ही भ्रंश रेखा पर स्थित है। राढू होरहाप से निकल कर सिल्ली से दक्षिण तोरांग रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में मिलती है। स्वर्ण रेखा और उसकी सहायक नदी करकरी की रेत में सोने के कण पाये  जाते हैं। किन्तु इसकी मात्रा अधिक न होने के कारण व्यवसायी उपयोग नहीं किया जाता है। करकरी एक छोटी नदी है जिसकी लंबाई केवल 37 किमी है। वर्तमान में यह नाले का रूप ले चुकी है।

स्वर्णरेखा अपने उद्गम शहर में ही अतिक्रमण और गंदगी की मार झेल रही है। कचरा, नालों के पानी से नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। तुपुदाना औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और मिलों के गंदा पानी गिरने से नदी का पानी काला हो गया है। नामकुम के पास स्थित स्वर्णरेखा घाट तो और भी बदतर है। स्वर्णरेखा नदी की चौड़ाई सरकारी दस्तावेज में 24.46मीटर है, लेकिन यह नदी हटिया और नामकुम में पांच मीटर से भी कम रह गयी है।

स्वर्णरेखा उद्गम स्थल : रांची से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नगड़ी में एक जलकुंड है, जिसे  स्वर्ण रेखा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यह स्थल रानीचुआँ के नाम से प्रसिद्ध है। चुआँ पानी के उद्गम स्थल या स्रोत को कहा जाता है। करीब 100 वर्ष पहले तक यह जलकुंड लकड़ी के पीपे से बहता था। इसी पीपे में सोने की एक हथेली थी, जिसमें पांच उंगलियों के निशान थे। इसी से इसका नाम स्वर्णरेखा हुआ। एक किंवदन्ती है कि नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्ण कणों में बदल गये जो आज भी प्रवाहमान है । इस सम्बन्ध में भूवैज्ञानिकों का मानना है कि स्वर्णरेखा तमाम चट्टानों से होकर गुजरती है। इसी दौरान घर्षण की वजह से सोने के कण इसमें घुल जाते हैं।

रानीचुआँ : रानीचुआँ नगड़ी के पाण्डू गांव में है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहां गुजारा था। यह क्षेत्र उस समय घने जंगलों से आच्छादित था, पांडवों को यहां छिपने का उपयुक्त स्थान मिला। अज्ञातवास के दौरान उन्हें जल की आवश्यकता पड़ी तो अर्जुन ने बाण मारकर जमीन से पानी निकाला। कालान्तर में यह चुआँ बना। इस चुआँ से जल प्रवाहित होता गया, जो आगे चल कर स्वर्णरेखा नदी बन गयी। मान्यता है कि इसी चुआँ पर द्रौपदी सूर्य देव को अर्घ्य दिया करती थी। कहा जाता हैं कि महाभारत में जो एकचक्रा नगरी की बात कही गई है वो यही नगड़ी है। अज्ञातवास के क्रम में पांडव नाग राजाओं से मिले थे। नाग राजा उस समय गंधर्वों के आक्रमण से काफी परेशान थे, तब नाग राजाओं ने अर्जुन के समक्ष अपनी प्राण रक्षा की गुहार लगाई थी। अर्जुन ने गंधर्वों को परास्त कर नागवंशियों के साम्राज्य की रक्षा की थी। नाग राजाओं के निवेदन पर नाग राजकुमारी का विवाह अर्जुन से सम्पन्न हुआ, जिससे एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। इसकी चर्चा महाभारत के प्रसंगों में मिलती है। पाण्डवों के नाम पर ही इस बस्ती का नाम पाण्डू गांव रखा गया। एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार पहले यह एक राजा का महल था। उस महल के अंदर ही एक सुरंग थी जिसका निकास इस जलकुंड में था, जिसमें रानी स्नान करती थी। इस कारण इस जगह का नाम रानीचुआँ पड़ा। रानीचुआँ और उसके अगल-बगल का क्षेत्र कोयल और कारो नदी का भी उद्गम स्थल है।

गंगा धारा : पाण्डू गाँव के निकट ही हरही गाँव है, जिसे भीम का ससुराल भी कहा जाता है।  इस गाँव में गंगा धारा है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि यह पतित पावनी गंगा का अंश है। इस जल का श्रोत कहां है, यह कोई नहीं जानता। यह जल धारा तालाब के बगल में स्थित एक प्राचीन शिवलिंग में गिरती है  जहां एक मंदिर का निर्माण कराया गया है।

दक्षिणी कोयल : नगड़ी के उद्गम स्थल से निकलकर रातू और बेड़ो प्रखंड की सीमा बनाती हुई कोयल नदी बेड़ो की बारीडीह, कुंदी, रानी खटंगा गांवों की पूर्वी सीमा से होती हुई मांडर में प्रवेश करती है तथा कुडू होते हुए लोहरदगा में प्रवेश करती है। लोहरदगा से आठ किमी उत्तर-पूर्व में यह दक्षिण दिशा की ओर मुड़ जाती है और लोहरदगा, गुमला जिला होते हुए सिंहभूम में प्रवेश करती है। अंत मे यह उड़ीसा में प्रवेश करती है, जहां से आगे चलकर गंगपुर के पास शंख नदी में मिल जाती है। इसके आगे यह ब्राह्मणी नदी कहलाती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। देव माड़ी, खटतानाला, बड़कीनाला, अनरिया, डोका, शंख, सपही, कड़नू, नंदनी, कंस, हरसा, फुलझरो, कारो, कोयना, टोरपा आदि इसकी सहायक नदियां हैं।

हरमू नदी : हरमू स्वर्णरेखा की सहायक नदी है। ललगुटवा उद्गम स्थल से चुटिया के आगे 21 महादेव मंदिर के पास स्वर्णरेखा व हरमू नदी का मिलन होता है। हरमू नदी का उद्गम लेटराइट मिट्टी से है। हरमू नदी बहुत बड़े क्षेत्र से होकर बहती थी। इसके चलते उन जगहों का तापमान पहले कम रहता था तथा भूमिगत जल भी रिचार्ज होता रहता था। हरमू मुहल्ले का नाम इसी नदी के नाम पर रखा गया है। इस नदी की सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें बताती हैं कि वर्ष 2004 के पहले यह नदी विस्तृत और चौड़े पाट से होकर बहती थी। 10.40 किलोमीटर की दूरी में बहने वाली इस नदी की चौड़ाई 25 मीटर से घट कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम हो गयी है। हरमू नदी का अतिक्रमण पहले तो किनारे बसे लोगों ने किया, रही सही कसर जमीन दलालों ने पूरी कर दी। महज आधा किलोमीटर क्षेत्र में नदी के सीने पर अनेक मकान बना दिये गये। आबादी बढ़ने के साथ ही नदी के आसपास के मोहल्लों से निकलने वाला गंदा पानी और गंदगी दोनों ही इस नदी में गिराये जाने लगे, जिसकी वजह से यह नदी पूरी तरह दूषित हो गई। रांची नगर-निगम की ओर से हरमू नदी को पुनर्जीवित करने और इसके सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं।

21 शिवलिंगों का अभिषेक  : राँची के स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर स्थित प्राचीन इक्कीसो महादेव का अस्तित्व भी खतरे में है। चट्टानों में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की आकृति नदी के अम्लीय प्रभाव से मिटते जा रहे हैं। 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने अपने महल के करीब 21 चट्टानों में शिवलिंग का निर्माण कराया था। राजपरिवार की दिनचर्या इन 21 शिवलिंगों में जलाभिषेक के साथ ही शुरू होती थी। 21 शिवलिंग एक सांस्कृतिक उन्नत समाज को दर्शाता है। 21 महादेव की खास महत्ता है। हर कार्तिक पूर्णिमा को क्षेत्र के श्रद्धालु स्वर्णरेखा में डुबकी लगाते हैं और 21 शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं।

कहानी हो गई करम नदी : करम नदी सेंट्रल रांची के 2250 वर्गफीट क्षेत्रफल में बहती थी। करम नदी के नाम पर ही करमटोली इलाके का नामकरण हुआ है। टोपोग्राफी के अनुसार करम टोली तालाब से डिस्टिलरी तालाब को जोड़ने वाली करम नदी सबसे निचली जमीनी भू-स्तर है। करम टोली और  मोरहाबादी इलाके का अतिरिक्त पानी करम नदी से होकर डिस्टिलरी तालाब होते हुए स्वर्णरेखा नदी में मिलता था। करम नदी के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी ऊपर था। हरिहर सिंह रोड में जलजमाव की स्थिति करम नदी के अतिक्रमण के कारण हो रही है। सेटेलाइट चित्र से पता चलता है कि कुछ वर्ष पहले तक इस नदी का अस्तित्व था। करम नदी का उल्लेख 1961 में लिखी गई कल्चरल कन्फिग्रेशन ऑफ रांची में नामक पुस्तक में भी है। यह पुस्तक एचईसी की स्थापना के बाद रांची में हुए सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद लिखी गई थी। इसी पुस्तक में पोटपोटो नदी का भी जिक्र है।

पोटपोटो : पोटपोटो नदी सेंट्रल रांची में बहती हुई बोड़ेया में जुमार नदी में मिलती है। यहाँ से इसका पानी रूक्का डैम में मिल जाता है। अतिक्रमण की वजह से पोटपोटो नदी एक संकरी नाली के रूप में बदल गई है। नदी तट को प्रेमनगर, चैड़ी बस्ती, चूड़ी टोला, अरसंडे से लेकर बोड़ेया तक अतिक्रमित किया जा चुका है। पोटपोटो नदी की चौड़ाई 32 से 37 मीटर के बीच थी, लेकिन अब भी यह 7.5 मीटर में सिकुड़ कर रह गयी है।

जुमार नदी : स्वर्णरेखा की सहायक इस नदी पर भी अस्तित्व और पहचान का संकट मंडरा रहा है। यह नदी 15 किमी शहरी और 15 किमी ग्रामीण इलाकों का सफर तय करती है। जुमार नदी रांची और आसपास के क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक करीब 30 मीटर चौड़ाई में बहती थी। अब यह नदी एनएच-33 के किनारे सिर्फ दस मीटर चौड़ाई में सिमट गयी है। जिस नदी में सालों भर पानी रहता था, वह अब बरसाती नदी मात्र बन कर रह गयी है। भुसूर पंचायत, चिरौंदी होते हुए यह नदी स्वर्णरेखा में मिलती है। रांची- रामगढ़ रोड स्थित जुमार पुल के पास दोनों ओर नदी का अतिक्रमण हो चुका है।

सतीगड़हा : करटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स, लालपुर और कोकर से होकर स्वर्णरेखा में मिल जाने वाली सतीगड़हा नदी पूरे करमटोली, वर्द्धमान कॉम्प्लेक्स व लालपुर क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए वरदान थी। अब इस नदी का नामोनिशान मिट गया है। इसके बहाव क्षेत्र में आलीशान मार्केटिंग कांप्लेक्स, अपार्टमेंट और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गईं हैं। नगर निगम प्रशासन ने इस नदी को नाला करार दिया है। एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान नगर निगम ने उच्च न्यायालय को बताया गया है कि यह मात्र एक नाला है जबकि 1932 का नक्शा बताता है कि सतीगढ़वा नदी का अस्तित्व वर्षों से रहा है।

भूसुर नदी : भूसुर नदी एचईसी के इलाके से निकल कर डीपीएस बाइपास, सेल, शुक्ला कॉलोनी हिनू और डोरंडा होते हुए घाघरा से आगे स्वर्णरेखा नदी में मिल जाती है। डोरंडा और मणिटोला को भी यह नदी अलग-अलग करती है। इस नदी में पानी हर-हराकर आता था, इसलिए लोग इसे भूसुर के नाम से कम, हड़हड़वा नदी के नाम से ज्यादा जानते थे। यह नदी कहीं-कहीं ढाई सौ फीट चौड़ी थी, अतिक्रमण से पांच फीट तक सिमट गई है।

अरगोड़ा नदी : कुछ ऐसी ही स्थिति अरगोड़ा नदी की है। यह नदी अरगोड़ा-कटहल मोड़ मार्ग पर बहती थी। यह नदी हरमू की सहायक नदी थी। बहाव क्षेत्र पर अवैध कब्जों से अरगोड़ा नदी विलुप्त हो चुकी है।

रांची के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक परिदृश्य में यहां की नदियों का बड़ा प्रभाव रहा है। विडम्बना है कि शहर की नदियां भी एक-एक कर अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। स्वर्णरेखा, जुमार, हरमू और पोटपोटो जैसी नदियां अतिक्रमण के कारण सिकुड़ रही हैं। इन नदियों के बहाव क्षेत्र को तलाशना भी असंभव है। क्योंकि इन्हीं स्थानों पर शहर के सबसे पाश इलाके विकसित हो चुके हैं। कई नदियां तो पूरी तरह से सूख गयी हैं और अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। नदियों को दूसरा बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गन्दगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अविरलता ही नदी का गुण होता है। यह गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटना होगा। नालों को वापस नदी बनाना होगा। नदियों का पुनर्जीवन और संरक्षण बेहद जरूरी है। हमें यह याद रखना होगा नदियों का अस्तित्व खत्म हुआ तो सभ्यताएं भी खत्म होती गईं।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

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