ताज़गी बिखेरती ‘बाद-ए-सबा’

17098431_10208288221030005_4268078898485174789_nमंगलम प्रकाशन,इलाहाबाद से प्रकाशित साझा ग़ज़ल संग्रह बाद-ए-सबा सामूहिक रचनाकर्म और सामूहिक प्रकाशन के रूप में एक और नया प्रयोग है.  इस संग्रह में 15 रचनाकारों की ग़ज़लें शामिल हैं. नये-पुराने ग़ज़लकारों ने मिलकर ज़िंदगी के अनेक रंगों को अपनी ग़ज़लों में पिरोया है, जो पठनीय होने के साथ-साथ शिल्प के लिहाज से मुकम्मल हैं. उम्मीद के साथ कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा की ग़ज़लें पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होंगी. प्रस्तुत है डॉ मकीन कोंचवी का तब्सिरा :-

बाद-ए-सबा यूँ तो मुकम्मल शुमारा है मगर अगर इसके हर पहलू पर नज़रे सानी न की गयी तो ये बड़ी नाइंसाफी होगी इस सफर में जहाँ एक तरफ दिलख़ुश तारीफ भी आएगी तो वही सच बयानी के कुछ कड़वे फल भी होंगे जिन्हें माज़रत के साथ पेश करने की जसारत करने की कोशिश है. बाद-ए-सबा का सबसे नायाब कारनामा मेरी नज़र में ये है कि इसके सफर में जहाँ सिबा संदीप सिवा, प्रदीप कुमार, अभिषेक सिंह,  मनोज मनुज, बाबा बेनाम जैसे ताज़ा खिले हुए फूलो से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है, वही अब्बास सुल्तानपुरी, नितिन नायाब, संजीव कुरालिया जैसे मझे हुए फनकार भी ग़ज़ल की राहों में अपनी खुशबु बिखेरते नज़र आते है. पाठक ग़ज़ल की तपती ज़मीन पर जैसे ही गामज़न होते है तो उसे अमरीक अदब, निर्मल नदीम, गिरधारी सिंह गहलोत, निर्मला कपिला जी के साथ-साथ हिमकर श्याम और प्रमोद हंस जैसे ग़ज़ल के कद्दावर दरख्तों की खुशनुमा छाँव अपनी आगोश में समेटने लगती है और बाद-ए-सबा का कारवां अपने जाहो जलाल के साथ जलवाग़र होकर कामयाबी की मंज़िलो की तरफ गामज़न होता रहता है.  उम्मीद करता हूँ ग़ज़ल का ये तिफ्ल एक रोज़ अज़ीमुश्शान शाहकार बनकर सायकीनो के दिलो पर राज़ करेगा.

अगर इस शुमारे की मुकम्मल बात की जाये तो बेसाख्ता कहना होगा कि ये रिसाला चंद छोटी- मोटी खामियों के बाबजूद अपनी छाप आवाम के जहनो पे अक्स करने में कामयाब होगा ऐसा मेरा मानना है . अपने तफसीरी सफर के आखरी हिस्से में इंशालल्लाह इन्ही कमियों और खामियों की तरफ निशानदेही करने की कोशिश करूंगा ताकि बाद-ए-सबा के आनेवाले शुमारो में इनसे बचा जा सके और ये मजमुई तौर पर और भी रौनक आमेज़ होकर मन्ज़रे आम पर आये उम्मीद करता हूँ की मेरे इस काम को सम्पादक निर्मल नदीम भी तस्लीम करते हुए  मेरा साथ देंगे.

यक़ीनन ये शुमारा लोगो के दिलो पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होगा मग़र इसके साथ ही अगर इसकी खामियों की जानिब नज़रे सानी न की गयी तो तफ्सरी हक़ से ना इंसाफ होगी. बेशक़ निर्मल साहब न अपने काम को बखूबी अंजाम देने की ईमानदार कोशिश की है जिस के लिए मै उन्हें दिल से मुबारकबाद बाद पेश करता हूँ मग़र जाने अनजाने कुछ खामियाँ भी रह गयी है जिनकी जानिब निशानदेही करना वाजिब जान पड़ता है. अगर इस शुमारे में किसी बड़े शायर का मकाला शामिल होता तो इसमें चार चाँद लग जाते इसकी अदबी एहमियत में इज़ाफ़ा होता जो की नही है. इसी तरह किसी भी शुमारे में शायर का तार्रुफ़ उसके क़लाम से पहले होना चाहिए ताकि पढ़नेवाला उससे रू-ब-रू हो कर एक रिश्ता कायम करके पढे शुमारे का आखिर में सबका तार्रुफ़ एक साथ देने की कोई तुक समझ से परे है बाद में इसे पढना शायद ही किसी को गवारा हो.

जहाँ तक शेरी ऐतवार से देखने का सवाल है तो कुछ खामियां यहां भी नज़र आती है जिन पर ध्यान दिया जा सकता था मिसाल के तौर पर एक ही शेर दो ग़ज़लों मे उला ओर सानी बदल कर आ गया है,

आ गया हूँ तेरे निशाने पर, तीर नज़रो के अब रिहा कर दे

ये शेर ग़ज़ल संख्या एक  और दो में है. इससे बचा जा सकता था. इसी तरह खुद नदीम साहब की 9 वीं ग़ज़ल का सानी 2 बार आ गया है जिससे ग़ज़ल 11 मिसरों की बन गयी इससे बचा जा सकता था एक बड़े शायर की एक ग़ज़ल के मकते का सानी दुरुस्त नही है. अगर प्रिंटिंग मिस्टेक की खामियों की बात है तो ये कही कही पर ही है जिन्हें बर्दाश्त किया जा सकता है. आखिर में इस शुमारे के ताल्लुक से ये कहा जा सकता है कि बाद-ए-सबा के लोग अपनी पहली कोशिश में न सिर्फ कामयाब बल्कि पूरी आब-ताब से रोशन हुए है. ये शुमारा अपने मकसद में मुकम्मल तौर पर सफल है और लोगों के ज़हन में जगह बनाने की सलाहियत रखता है उम्मीद है तमाम लोगों के क़लाम से लुफ़्न्दोज़ होने का मौका मिलेगा. एक शेर से अपनी बात खत्म करता हूँ :

इत्तिहादी पल सभी टूटे पड़े, अब नया कोई बनाता भी नही

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✍ डॉ मकीन कोंचवी

 

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

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2 thoughts on “ताज़गी बिखेरती ‘बाद-ए-सबा’

  1. आद. मकीन भाई का बहुत-बहुत शुक्रिया इस तब्सिरे के लिए। सभी शायरों की मेहनत रंग लाई है । बाद ए सबा के इस प्रयास को सफल बनाने के लिए सब शायरो का ख़ास कर मकीन भाई का बहुत-बहुत शुक्रिया।

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