इस जीत के मायने

यूपी और उतराखंड के चुनाव नतीजे से यह साफelection हो गया कि 2019 में भाजपा की वापसी तय है. मोदी की लोकप्रियता घटने की बजाए बढ़ी है. नतीजों से भाजपा खुदअचंभित है वहीं विपक्षियों में अब भय दिखने लगा है. गोवा में कम सीटें मिलने के बाद भी भाजपा की सरकार बन गई और मणिपुर में पार्टी को सरकार बनाने का न्योता मिला है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बहुमत तक पहुंचते-पहुंचते रह गयी थी. जाहिर है यहां सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का खेल करना था. इस खेल में भी भाजपा बाजी मार गई और कांग्रेस जीत कर भी हार गई. भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन होती जा रही है. यह स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन इस वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है. विपक्ष कमजोर हो तो सत्ता पक्ष निरंकुश हो जाता है. मोदी को रोकने के लिए विपक्ष को गोलबंद होना पड़ेगा, पर उसके पहले प्रभावी मुद्दों और प्रभावी नेतृत्व को तलाशना होगा.

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बने पौने तीन साल हो गए हैं. इन सालों में विपक्षी दल एकता की कोई धुरी नहीं खोज पाए हैं. विपक्ष में एकजुटता की बजाय बिखराव आया है. विपक्ष का बिखराव मोदी को ताकत दे रहा है. लोकसभा चुनावों में अब करीब दो साल बचे हैं. कांग्रेस की वापसी के कोई संकेत नहीं हैं. उल्टे वो देशभर में अपनी बची-खुची जमीन भी खोती जा रही है. नतीजों ने राहुल के नेतृत्व की राजनीतिक परिपक्वता और पार्टी से बाहर स्वीकार्यता, दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है. हालाँकि कांग्रेस को पंजाब में जीत हासिल हुई, लेकिन इस जीत का सारा श्रेय कैप्टन अमरेंदर सिंह की लोकप्रियता और मेहनत को जाता है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता अरुण जेटली को तब हराया था जब पूरा देश नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार था. यूपी-उतराखंड जितने,  गोवा में सरकार बनाने और कम सीटों के बावजूद मणिपुर में सरकार बनाने का न्योता  मिलने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों का 15 राज्यों में शासन हो जाएगा. गोवा विधानसभा चुनावों के नतीजों में कांग्रेस के 17 विधायक हैं जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 13 है. गोवा में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा है. नतीजो के बाद जो स्कोर 3-2 से 4-1  का हो गया है.

कांग्रेस के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा होता जा रहा है. कांग्रेस की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. संगठन का अभाव और नेतृत्व की कमजोरी कांग्रेस संगठन को खोखला कर रहा है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ के उनके निर्णय पर कांग्रेस संगठन के भीतर विचार-विमर्श तक नहीं किया गया था. पार्टी में विचारधारा की कोई लड़ाई लड़ने की क्षमता तो बहुत पहले खत्म हो गई थी, अब नेतृत्व का संकट भी पैदा हो गया है. राहुल गांधी का नेतृत्व कोई उम्मीद या उत्साह नहीं जगा पा रहा है. राहुल गांधी वोट दिला सकते हैं,  इसका भरोसा उनकी पार्टी के ही लोगों को नहीं है तो दूसरे दलों को कैसे होगा?  कांग्रेस ने गांधी परिवार से खुद को इस तरह बांध रखा है कि वह नेता के लिए उससे आगे नहीं देख पाती. कांग्रेस को राहुल गांधी की क्षमताओं, उनकी संभावनाओं और सीमाओं पर वस्तुपरक ढंग से विचार करना चाहिए. कांग्रेस को नए सिरे से गढ़ना जरूरी है. कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है, तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा. कोई नये नेता को नेतृत्व सौंपना होगा. जमीनी स्तर पर काम करना होगा.

ये चुनाव नोटबंदी के बाद हुए. कांग्रेस ने नोटबंदी से लोगों को हुई मुश्किलों को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी, मगर असफल रही. बेशक नोटबंदी ऐसा फैसला था, जिससे लगभग हर शख्स प्रभावित हुआ. इसके बावजूद जनादेश भाजपा के पक्ष में गया. नोटबंदी से भले लोगों को तकलीफ थी लेकिन नाराज़गी नहीं थी. गौरतलब है कि महाराष्ट्र निकाय चुनाव और ओड़िशा में पंचायत चुनाव, दोनों नोटबंदी के बाद हुए. भाजपा को  इन दोनों  चुनावों में भी सफलता मिली थी. नोटबंदी के रूप में विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला था, जिसे उसने एकजुटता और मत भिन्नता के आभाव में गंवा दिया.

हर चुनाव अपने-आप में खास होता है, मगर इन पांच राज्यों पर इसलिए नजर थी, क्योंकि साल 2019 के लोकसभा चुनाव का रास्ता यहीं से आकार लेगा, खासकर उत्तर प्रदेश से. इस सूबे में सभी पार्टियों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ था. पार्टियों की साख के साथ-साथ यहां छवि की लड़ाई भी लड़ी गई थी. उत्तर प्रदेश का महत्व सिर्फ इसीलिए नहीं है कि यह देश का सबसे बड़ी आबादी वाला सूबा है या यहां सबसे ज्यादा 403 विधानसभा सीटें हैं. केंद्रीय राजनीति की दशा-दिशा का रुख यहीं से तय होता रहा है. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर बाकी के चार राज्यों के मुकाबले यहां के नतीजों का असर केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा पड़ेगा. इस जीत का सबसे पहला असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा. साथ ही राज्यसभा में भाजपा मजबूत होगी.

पांच राज्यों के चुनाव भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी के लिए काफी मायने रखता है. उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड या फिर गोवा भाजपा मोदी के नाम से ही चुनाव में उतरी थी. इन राज्यों में पार्टी ने कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दिया था. यूपी में मोदी ने पार्टी के कोर वोट में बड़ा बदलाव किया है. भाजपा अपने साथ सवर्णों और व्यापारी वर्ग की पार्टी के साथ पिछड़ी जाति और दलित जोड़े हैं. तीन तलाक के मुद्दे से मुस्लिम महिलाओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ. श्मशान-कब्रिस्तान और कसाब के जरिये भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण की बयार बहाने की कोशिश की और अपनी कोशिशों में कामयाब भी हुई. मणिपुर के नतीजों की बात करें तो यहाँ भाजपा के मत में 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि गोवा में बहुमत नहीं मिलना भाजपा के लिए झटका है.

2014 लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं चेतीं और यूपी उनके हाथ से निकल गया. नतीजों ने समाजवादियों का, पिछड़ी और दलित राजनीति का एक साथ ही सफाया कर दिया. समाजवादी और बहुजन समाजवादी दोनों ही खास जातियों के पक्षधर रहे हैं. समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा. जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं प्रो.रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए. मुलायम सिंह के नाम पर समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा था. अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष तो बन गये लेकिन पिछड़े और गरीब तबके का भरोसा जितने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा.  यूपी में मायावती का वोट बैंक भी खिसका है. वह दलितों और ब्राह्मणों को साधने में विफल रहीं.  बसपा की मुखिया मायावती को नये तरीके से खुद को तैयार करना होगा तथा दलित और मुसलमान मतदाताओं के गठजोड़ पर अपने फोकस के बारे में पुनर्विचार करना होगा. 27 साल सूबे की सत्ता से बाहर रहने के बावजूद मात्र सात सीटें ही हासिल कर पाई. कांग्रेस का यह अब तक सबसे खराब प्रदर्शन है. लोकसभा चुनाव में मोदी और बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में असफल रहे. कांग्रेस द्वारा उठाया गया गरीब-अमीर का मुद्दा भी नहीं चला. राहुल यह बात उठाते रहे कि मोदी गरीबों के नहीं पूंजीपतियों के समर्थक है, लेकिन लोगो ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. वहीं भाजपा ने गांव-गरीब, किसान और विकास को मुद्दा बना कर मतदाताओं को आकर्षित किया. साथ ही साम्प्रदायिकता को हवा देकर वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही.

भारतीय राजनीति एक व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमट गयी है.  मोदी का जलवा बरकरार है. यूपी में मोदी मैजिक और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग विपक्षी दलों पर हावी दिखी. यहाँ पार्टी की प्रचंड और ऐतिहासिक जीत से मोदी की छवि और मजबूत होकर उभरी है. मोदी ने यहाँ दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की थी. किसी विधानसभा चुनाव में किसी प्रधानमंत्री ने शायद ही इतनी रैलियां की हों. उत्तर प्रदेश के बरक्स बाकी के चार राज्यों के नतीजे का केंद्रीय राजनीति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़नेवाला. पंजाब में भाजपा वैसे भी दूसरे दर्जे की पार्टी  थी, यहाँ उसके खोने के लिए कुछ था भी नहीं. अगर आम आदमी पार्टी यहां कुछ कर पाती तो अरविंद केजरीवाल मोदी-विरोध की राजनीति के एक मजबूत विकल्प बन कर उभरते.

इस समय कांग्रेस सहित लगभग सभी दल हाशिए पर आए हुए हैं, भाजपा का मजबूत विकल्प बनने के लिए विपक्षी एकता की  पहल जरूरी है. भाजपा की लगातार जीत का सीधा संदेश है गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति का अंत. विपक्ष को जिंदा रहना है तो उसको बेहतर गठबंधन बनाने होंगे. लोगों के मुद्दे उठाने होंगे. अगले सात आठ महीनों में मोदी के राज्य गुजरात और हिमाचल में चुनाव होना है. विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक इस नई राजनीतिक ताकत का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

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