पुरातात्विक धरोहरों को पहचानने और बचाने की पहल

 

झारखण्ड की छवि नकारात्मक प्रदेश की रही है जबकि यह आश्चर्यों से भरा प्रदेश है, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है. एक ओर यहाँ सुरम्य घाटियां, झरने, नदियाँ  और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएँ हैं. रत्नगर्भा धरती है, वहीं दूसरी ओर प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियाँ  हैं. हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है. भारतीय भूभाग में मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में हुआ. पूरे झारखंड में इस तरहimg-20170110-wa0089 बिखरे ऐतिहासिक अवशेषों, सांस्कृतिक साक्ष्यों और स्थापत्य कला की दृष्टि से उल्लेखनीय कृतियों से यहाँ के अतीत और लोकजीवन के विविध पक्षों को जाना जा सकता है. पुरातात्विक दृष्टि से झारखंड अत्यंत समृद्ध है. समय-समय पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा यहाँ जो अन्वेषण कार्य हुए उसमें पूर्व, मध्य एवं उत्तर पाषाण कालीन एवं नव पाषाण कालीन प्रस्तर के औजार काफी बड़ी संख्या में मिले हैं. यहाँ पत्थर और अन्य उपकरण, सभ्यताओं के प्रारंभिक वर्षों से 3000 से अधिक वर्ष पहले के हैं. प्राच्य पाषाण कालीन प्रस्तर आयुध इस तथ्य को प्रगट करते कि आदि मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे. प्राचीन सभ्यता में हड़प्पा की मौजूदगी का भी प्रमाण है. प्रदेश में अनेक छोटे-बड़े प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक पुरातात्विक अवशेष हैं जो यहाँ की स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रागैतिहासिक गुफाओं में मिले भित्ति चित्र जनजातियों के चित्रकलाओं से मिलती-जुलती हैं. भारत के सबसे पुराने गुफा चित्रों को बनानेवाले को झारखंड के शबर जनजाति के रूप में जाना जाता है.

हजारीबाग से लगभग 42 किलोमीटर दूर इस्को के पास पहाड़ी गुफाओं में प्राचीनतम शैल चित्र पाये गये हैं जो बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत बनाये गये हैं. स्थानीय लोग इस्को के इस गुफा को राजा-रानी के कोहबर के रूप में जानते हैं. सिन्धु घाटी के समय के बर्तनों पर जिस तरह की आकृतियां बनी हैं उनसे मिलती-जुलती आकृतियां चाय-चंपा के शिल्पों में पायी गई हैं. संतालों के मौलिक इतिहास के संकेत करम विनती में मिलते हैं. इसमें चाय-चंपा के किले और उसमें बने शैलचित्रों की सुन्दरता का जिक्र है. सिन्धु लिपि, हजारों वर्षों से संताल परगना के आदिवासी समाज के बीच अज्ञातवास कर रही हैं. स्वयं संतालों को भी इसकी जानकारी नहीं है. सिंधुलिपि के भित्ति चित्रों, मुहरों में अंकित संकेत तथा शिलाओं पर उकेरे चित्रादि संताल आदिवासी समाज के पूजानुष्ठानों में भूमि पर खींची जानेवाली आकृतियों से मिलती-जुलती हैं. बिहार प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी निर्मल कुमार वर्मा ने दो दशक पूर्व सिन्धु लिपि पढ़ लिए जाने की बात सार्वजनिक कर हलचल मचा दी थी. 1992 में श्री वर्मा के असमय निधन के कारण इतिहास के गर्भ में छिपा यह रहस्य, रहस्य बनकर ही रह गया. यदि श्री वर्मा आज जीवित होते तो निश्चिय ही दुनिया के इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन आ जाता. शायद इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता. विडंबना है कि श्री वर्मा के शोध की गंभीरता पर राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी ध्यान नहीं दिया. अगाध पुरातात्विक संभावनाओं वाले झारखंड राज्य के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए व्यापक व गहन सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन जरूरी है. अब तक जो हुआ है, उससे झारखंड के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास क्रम को जान पाना संभव नहीं है. इतिहास के काल की कई कड़ियां अभी भी गुम हैं.

भारतीय पुरातत्व में असुर शब्द का प्रयोग झारखंड के रांची, गुमला और लोहरदगा  जिलों के कई स्थलों की ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रयुक्त होता है. आज भी लोहरदगा, चैनपुर, आदि इलाकों में असुर नामक जनजाति रहती है. वह लोहा गलानेवाली और लोहे के सामान तैयार करने वाली जाति के रूप में मशहूर है. उस जाति के पुरखे यहाँ बसते थे, उन स्थानों से ईंट से निर्मित प्राचीन भवन, अस्थि कलश, प्राचीन पोखर आदि प्राप्त हुए हैं. के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं. झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. असुर असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी.

प्रारम्भिक पत्थरों के औजारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में सम्भवतः अर्धमानवों का निवास था. वे गुफाओं में रहते थे; उस काल के देवघर, बोकारो, राँची आदि क्षेत्र में पुरापाषाण कालीन औजारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि पुरापाषाणकालीन संस्कृति का आश्रय इस झारखण्ड में भी था. इसके बाद की झारखण्ड सम्बन्धी ऐतिहासिक जानकारी संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों और मध्यकालीन फारसी के इतिहास ग्रंथों में मिलती है. इन सब सूत्रों से झारखण्ड के इतिहास की जानकारी विस्तार से अथवा संक्षिप्त तौर पर मिलती है. देवघर के बैद्यनाथ धाम और तपोवन, दुमका के वासुकी नाथ और राजमहल के राजेश्वरीनाथ जैसे शिवतीर्थों का वर्णन पुराणों में मिलता है. वास्तव में झारखण्ड का इतिहास पुराण युग से बहुत पुराना है. महाभारत के ‘दिग्विजय पर्व’ में इस क्षेत्र को ‘पुंडरीक देश’ कहा गया है. इसी ग्रंथ में इसे ‘पशुभूमि’ भी कहा गया है. अबुल फजल कृत अकबरनामा में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘झारखण्ड’ कहा गया. शम्स-ए-शिराज अफीफ, सल्लिमुल्ला तथा गुलाम हुसैन आदि लेखकों ने अपने ग्रंथ में ‘झारखण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है. कबीरदास के एक पद में झारखण्ड का जिक्र हैः

कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी कासी!

झारखण्ड में आय विराजे वृंदावन की वासी!!

झारखण्ड राज्य वनों से आच्छादित है तथा इस राज्य में अपेक्षाकृत अनुसूचित जनजाति के लोगों का निवास अधिक है. इन लोगों की परंपरा, संस्कृति, कला, लोकगीत, बर्तन, विवाह गीत को भी सहेजने की जरूरत है. झारखंड की धरोहर, इसकी संस्कृति को जानना-समझना बेहद जरूरी है. झारखंड की विरासत को जनमानस के मध्य जागरूकता बनाये रखने के लिए पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद व युवा कार्य विभाग, इंडियन आर्कियोलॉजी सोसाइटी और हेरिटेज झारखण्ड संस्था के संयुक्त तत्वावधान में छह से आठ जनवरी तक रांची में राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के पुरातत्वविदों के अलावा अमेरिका, इंगलैंड और इरान से भी पुरातत्व विशेषज्ञ भी शामिल हुए.

संगोष्ठी समारोह में पर्यटन, कला-संस्कृति, खेद-कूद एवं युवा विभाग मंत्री अमर कुमार बाउरी ने कहा कि झारखंड में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ के बारे में लोगों को मालूम नहीं. उन पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानना उनकी खोज करना आवश्यक है. इतिहास को जानकर ही हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं. झारखंड में ऐसे भी ऐतिहासिक स्थल पाये गये जो कि रामायण, महाभारत एवं मुगलकाल के इतिहास की कहानी कहते हैं. उस काल के स्थल आज भी विद्यमान हैं. इस मौके पर हेरीटेज झारखंड संस्था के अध्यक्ष एच एस पांडेय ने कहा कि पुरातत्व हमारे लिये एक दर्पण की तरह है. झारखंड में अंग, बंग, शुंग सबकी संस्कृति के तत्व बिखरे पड़े हैं उन पर समग्र अध्ययन होनी चाहिये. पुरातत्व वह माध्यम है जो उन तत्वों एवं तथ्यों का संग्रह करता है और हमारे इतिहास को सुरक्षित करता है. अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश पांडेय ने कहा कि विवि में पुरातत्व विभाग नियमित होगा और इस दिशा में ठोस काम किया जाएगा. उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही कला संकाय भी खुलेगा. वहीं हेरिटेज झारखंड के सचिव डॉ एचपी सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य ही था कि लोगों को पता चले कि पुरातत्व भी एक विषय है. इसे मुख्यधारा में लाया जाए. हम अपनी धरोहरों को जाने-पहचाने और संरक्षित करने की दिशा में काम करें. उन्होंने कहा कि हेरिटेज झारखंड के माध्यम से पुरातत्व के प्रति लोगों में अलख जगाते रहेंगे और नए लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा.

मौके पर दो पुस्तकों पुरातत्व एवं एब्सटैक्ट का विमोचन भी किया गया. संगोष्ठी में इण्डियन ऑर्कियोलोजिकल सोसायटी के अध्यक्ष केएन दीक्षित, सोसायटी फॉर प्री-हिस्ट्री एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज के प्रतिनिधि डॉ पीपी जोगलेकर, इण्डियन हिस्ट्री एण्ड कल्चर सोसायटी के प्रतिनिधि प्रो डीपी तिवारी ने भी  अपने विचार रखे. तीन दिनी राष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी में देश-विदेश के करीब 150 पुराविदों ने शिरकत की.

पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा समय-समय पर किये गये शोधों में इतिहास की कड़ियाँ झारखंड से जुड़ती रही हैं. यहाँ का समृद्ध, सभ्य अस्तित्व, मानव समाज और उनके सांस्कृतिक तरीके, गुफाओं में जीवित रहने के तरीके, स्मारक, चट्टानी कला में आश्रयों (पेट्रोग्राफ) के रहस्य जानना जरूरी है. पुरातात्विक महत्व के स्थलों व वस्तुओं को सहेजने और उसे सुरक्षित रखने में आम लोगों की सहभागिता भी आवश्यक है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ जितनी भी कवायद कर लें, बिना आमजन के सहयोग से यह कार्य संभव नहीं है. हमें भविष्य को संवारने के लिए अतीत को याद रखना होगा.

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

 

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