पानी : समाज, सरकार और संकल्प

आज नये साल का पहला दिन है,  कोई संकल्प लेने का दिन है। क्यों न इस साल की शुरुआत हम पानी पर  चिन्तimg-20161226-wa0082न के साथ करें और इसे बचाने का संकल्प लें। साथ ही नदी-तालाबों को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प भी लें। जल संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सभ्यता काल से ही जल प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जल जीवन का पर्याय है, जल के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिकी विज्ञान लेखक,लोरान आइजली ने कहा था कि ‘हमारी पृथ्वी पर अगर कोई जादू है,तो वह जल है।’ नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं लेकिन हम नदियों को इसके बदले कुछ लौटाते नहीं हैं। तमाम जल समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है और हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है, जिससे प्रदूषण और जल-संकट की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है, परंतु दुर्भाग्य से इसका अल्पांश ही पीने लायक है। पीने योग्य मीठा जल मात्र 3 प्रतिशत है, शेष भाग खारा जल है। यह जरूरी है कि भविष्य के लिए जलस्रोतों के बेहतर प्रबंधन के एकजुट होकर प्रयास किया जाये।

आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। 2030 तक पूरी दुनिया में जरूरत के अनुपात में 40 प्रतिशत पानी कम हो जायेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत में जल भण्डार वाले इलाकों समेत कई राज्यों में भूजल का स्तर बहुत नीचे पहुँच चुका है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान समेत कुछ अन्य राज्यों में भूजल का सर्वाधिक दोहन हो रहा है। उत्तर-पश्चिमी , पश्चिमी और प्रायद्विपीय इलाकों की स्थिति भयावह होती जा रही है। 54 फीसदी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही है। शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित ढेरों समस्याओं को जानने-समझने  के बावजूद हम जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हैं । नदियाँ, तालाबें एवं झीलें अमूल्य धरोहरें हैं।  इन्हें बचा कर रखना हमारा दायित्व भी है। पानी के मामले में संतोषजनक समृद्धि चाहिए तो हमें अपने नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर विशेष ध्यान देना होगा।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र रफ्तार,बढ़ता प्रदूषण तथा जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। नदियों के किनारों पर व्यवसायिक गतिविधियाँ बढ़ जाने से नदियों के जीवतंत्र को क्षति पहुँची है। गंगा के किनारे हज़ारों फैक्ट्रियां हैं जो न केवल इसके जल के अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं, बल्कि उसमें भारी मात्रा में प्रदूषित कचरा भी छोड़तीं हैं।  गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना अरबों लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है जो गंगा में बहा दिया जाता है। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से इस पतित पावनी नदी के अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है। गंगा किनारे 118 शहर बसे हैं, जिनसे रोज करीब 364 करोड़ लीटर घरेलू मैला और 764 उद्योगों से होने वाला प्रदूषण गंगा में मिलता है। सैकड़ों टन पूजा सामग्री गंगा में फेंकी जाती है। यमुना, दामोदर, गोमती और महानन्दा का हाल भी इससे अलग नहीं है। नदियों की अपनी पारंपरिक गति और दिशा को इस तरह प्रभावित किया जायेगा, तो जाहिर है कि इससे जल-संकट की स्थिति बढ़ती ही जायेगी। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,एवं जल के अन्य स्रोत सूखते होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है।

भारतीय उपमहाद्वीप में बहने वाली प्रमुख नदियों में से लगभग 15 प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, महानदी, तुंगभद्रा इत्यादि न जाने कितने वर्षों से भारत की पावन भूमि को सिंचित करती चली आ रही हैं। ये नदियाँ वाकई भारत एवं भारतीय लोगों की जीवन-रेखा सदृश्य हैं। इनमें गंगा मात्र नदी नहीं हैं, वह संस्कार और संस्कृति भी है। गंगा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गंगा को जीवन देना आसान काम नहीं है। जल की बर्बादी रोकने के लिए रिवर और सिवर को अलग-अलग करना होगा।  कूड़े-कचरे के कारण किसी समय स्वच्छ जल से भरी नदियों की स्थिति दयनीय हो गई है। इस संबंध में सरकार भी गंभीर नहीं है। सरकार को इस दिशा में विशेष योजना बनाकर कार्य करना होगा। जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है।

जल पुरुष राजेंद्र सिंह के अनुसार केंद्र की नई सरकार ने गंगा नदी के पुनर्जीवन की योजना बनाई है, लेकिन हमारी समझ है कि इसके पूर्व गंगा एक्शन प्लान इसलिए सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसमें आम लोगों की भागीदारी नहीं थी। लोगों को लगा कि की यह तो सरकार का काम है, जबकि 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग, प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियां साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं। लोग, नदियों को इस स्थिति में रखने को प्राथमिक जिम्मेदारी मानते थे। गंगा तो मां मानी जाती है। लोगों में फिर से यही सोच विकसित करनी होगी। नदियों के किनारे बसे गांव का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर उतर आए, तो नदियों भविष्य बेहतर हो सकता है। राजेंद्र सिंह रविवार को पटना में ख्यात पर्यावरणविद गांधीवादी अनुपम मिश्र को समर्पित अक्षधा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘पानी : समाज और सरकार’ विषयक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस संगोष्ठी में सिर्फ एक ही बात की गूंज थी कि कैसे स्कूलों सामुदायिक संगठनों व आम नागरिकों के बीच जल साक्षरता बढाकर इन्हें जागरूक किया जाय। राजेंद्र सिंह ने केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा से कहा कि अगर वाकई आगे की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है, तो देश में जल साक्षरता शुरू करानी होगी। बच्चों को बचपन से ही स्कूलों में पानी की महत्ता, इसके संरक्षण के बारे में पूरा-पूरा बताना होगा। चूंकि अब इस मोर्चे पर दूसरा उपाय बच नहीं गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने इससे पूरी सहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने भारतीय जीवन, संस्कृति में नदियों की अहमियत को बताया। उन्होंने कहा कि नदियों के बारे में समाज को भी अपनी ड्यूटी समझना जरूरी है।

अनुपम मिश्र जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद थे। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर  में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ है। इसी तरह  उतराखंड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। पानी पर एक अरसे से काम कर रहे मेरे पत्रकार मित्र पंकज मालवीय का मानना है कि नदियों को उसके मूल नैसर्गिक रूप में वापस लाया जाना बेहद जरूरी है।  बिना जन-भागीदारी के गंगा और दूसरी नदियों को गंदा होने से नहीं रोका जा सकता। गंगा समेत अन्य नदियों को बचाने के लिए जरूरी है कि बाँधों, गादों और प्रदूषण से इन्हें मुक्त कराना होगा।

गंगा की सफाई के अब तक सारे प्रयास असफ़ल हुए हैं। कानून और नियम तो बनाये गए , लेकिन उनको लागू करने में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। नमामि गंगे योजना के नाम से गंगा जी को स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाई गई योजना कोई पहली योजना नहीं है। गंगा प्राधिकरण की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि गंगा नदी को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाया जा सके। परंतु केवल इस पावन उद्देश्य हेतु सैकड़ों करोड़ का बजट आबंटित कर देने से  कुछ भी हासिल होने वाला नहीं।  गंगा की स्वच्छता का कोई भी अभियान इसके किनारे रहने वाले लोगों को उससे जोड़े बिना मुमकिन नहीं है। जब तक इस विषय पर लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

तेजी से शहरों का विकास हो रहा है। अंधाधुंध विकास. पेड़ों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। तालाबों को पाटकर शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं। शहर का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है। नदी तटों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता दोनों का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। पानी के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव है। इसमें विशेष तौर से निर्धनतम समुदाय, उनमें भी महिलाओं में जागरूकता की अत्यधिक कमी देखने को मिलती है। यह अभियान तभी सफल होगा, जब जन-भागीदारी हो। हम सभी का योगदान हो, इसके लिए पहले पानी के संकट की भयावहता को समझना होगा। पानी पर बात करने को सभी तैयार रहते हैं, किन्तु पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का संरक्षण संभव नहीं है। किनारों पर अवस्थित गाँवों में रहने वाले लोग संकल्प लेना होगा कि वे नदियों के जल को प्रदूषित नहीं करेंगे।  जल प्रकृति का एक अनिवार्य घटक है। जल से ही जीवन है। इस अनमोल प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु सभी को संगठित होकर अपना अमूल्य योगदान देना चाहिए। आधुनिक शिक्षा पद्धति में पानी के सन्दर्भ में जितनी अल्प जानकारी  उपलब्ध है वह यहां की नई पीढ़ी की पानी के प्रति समझ बनाने के लिए अपर्याप्त है। आइए इस वर्ष हम एक-एक बूंद पानी बचाने का हम संकल्प लें।

✍ हिमकर श्याम

काव्य रचनाओ के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

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