राज्यसभा चुनाव में खरीद-फ़रोख्त !

jarkhandसत्ता ही लोकतंत्र है। संसदीय लोकतंत्र का मतलब ही सत्ता समीकरण हो गया है। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी, क्या क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दल, सब एक से नज़र आते हैं। कोई भी किसी से कम नहीं। बीजेपी वही सब कर रही है जिसके लिए कांग्रेस बदनाम रही है, ऐसा लगता है कि बीजेपी का पूरी तरह से कांग्रेसीकरण हो गया है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री रघुबर दास पर आरोप लगाया कि वे राज्य की दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में विधायकों की खरीद-फरोख्त में शामिल थे। मरांडी ने कुछ वीडियो और आडियो टेप जारी करते हुए रघुबर दास पर यह आरोप लगाया है। सच्चाई क्या है यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा लेकिन सीडी ने मामले को फिर से उछाल दिया है। राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ उससे चुनाव के तौर-तरीके, राजनीतिक मर्यादा-आचरण, विधायकों की दलीय प्रतिबद्धता पर सवाल तो पहले से ही उठ रहे हैं। राज्यसभा चुनाव का लेकर झारखंड पहले से बदनाम रहा है।

राज्य में 11 जून को राज्यसभा के लिए हुए मतदान में 81 सदस्यीय निवार्चित विधानसभा में कुल मतदान 79 हुआ था और इसमें भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी और महेश पोद्दार चुनाव जीत गये थे, जबकि झामुमो के बसंत सोरेन को पूरे विपक्ष के समर्थन के बावजूद भी हार का सामना करना पड़ा है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में वोटिंग से पहले पैसे, बाहुबल और तिकड़म का जमकर इस्तेमाल किया था। चुनाव में क्रास वोटिंग भी हुई थी। चुनाव से ठीक पहले विपक्ष के तीन विधायकों के खिलाफ अरेस्ट वॉरंट जारी किया गया था ताकि उन्हें वोटिंग में शरीक होने से से रोका जा सके। इसमें उसे सफलता भी मिली।

झारखंड में, राज्यसभा के चुनाव में यही सब होता आ रहा है। शायद ही कोई ऐसा चुनाव हो जो साफ सुथरे ढंग से और शुचिता के साथ हुआ हो। गौरतलब है कि 2012 में चुनाव आयोग ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए दो करोड़ रुपये से अधिक की नकदी जब्त होने के मद्देनजर झारखंड राज्यसभा चुनावों को रद्द कर दिया था और कहा था कि वहां चुनाव प्रक्रिया को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा है। चूंकि पहले से होता रहा है और सब यही करते हैं, ऐसा कह कर ग़लत को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि झारखंड में राजनीति के नाम पर षडयंत्र, कुचक्र और तिकड़मबाजी होती है।

राज्यसभा चुनाव में थैलियों का खेल भी नया नहीं है। संसद के इस ‘उच्च सदन’ के लिए राज्य, पार्टी, प्रतिष्ठा, परम्परा की परवाह नहीं की जाती। राज्यसभा की सीट हथियाने की खातिर राजनीतिक पार्टियाँ किसी हद तक जा सकती हैं। इसके लिए नेता विवेकशून्य हो जाते हैं, सारी मर्यादा भूल जाते हैं। सारे आदर्श पीछे छूट जाते है। नेताओं के लिए राजनीति जनकल्याण का माध्यम न होकर अर्थ साधना एवं भोग का माध्यम बन गई है। पिछले कुछेक वर्षों में यह प्रवृत्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। वैसे भी आज के नेताओं का मूल्यों और मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है। आम आदमी की बात, विकास की बात, रोजी-रोटी और बुनियादी जरूरतों की बात कोई नहीं करता।

राजनीति में अच्छे पद पाने के आकांक्षी पार्टी की विचारधारा और वफादारी पर समय व्यर्थ करने की अपेक्षा थैली का इन्तिजाम करने में जुटे रहते हैं। सत्ता की राजनीति में सिद्धांतों और आदर्शों की जरूरत नहीं। अच्छे, ईमानदार और समर्पित नेता-कार्यकर्ताओं की अब कोई पूछ नहीं होती। पहले देश में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव एक नियमित कार्यक्रम के तहत होने वाला सरकारी आयोजन सा होता था जिसमें सभी कुछ पहले से तय होता था और इन चुनावों में राजनीतिक पैंतरेबाजी की गुंजाइश नहीं होती थी।

राजनीति जब नकारो के हाथों में चली जाती है तो व्यवस्था का विघटन शुरू हो जाता है। गैरजवाबदेह और निरंकुश व्यवस्था स्थापित हो जाती है। राजनीति की मौजूदा शैली से लोकतांत्रिक व्यवस्था  चरमराने लगी है। राज्यसभा का न तो राज्यों से कोई सीधा संबंध रह गया है और न ही जनता से भी। राज्यसभा नेताओं के जेब का खिलौना बन गयी है, इसीलिए भ्रष्टाचार की सारी तरकीबें राज्यसभा के चुनाव में अपनायी जाती हैं।  झारखंड के अलावा राज्यसभा चुनावों को लेकर कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और हरियाणा में जो नौटंकी हुई, उसने नेताओं की छवि तो विकृत की ही, चुनाव आयोग को भी संदेह के घेरे में ला खड़ा किया।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

 

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