अपने-अपने आंबेडकर

 

देश की राजनीति में बाबा साहब आंबेडकर की स्वीकृति का ग्राफ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। प्राय: सभी पार्टियां आंबेडकर को अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर रही हैं और उन्हें अपना बताने की कोशिश कर रही हैं। पिछले कुछ वक्त से भाजपा आंबेडकर को अपना बनाने और प्रचारित करने की मुहिम चला रही है। दूसरी ओर, कांग्रेसAMBEDKAR का दावा है कि आंबेडकर उसके ज्यादा करीब थे और कांग्रेस ने उनके विचारों के अनुरूप काम करने की ज्यादा कोशिश की है। कभी सबसे बड़ी ताकत रहे दलित वोट को कांग्रेस इस बहाने फिर वापस पाने की कोशिश में है। अन्य पार्टियां भी आंबेडकर  की आड़ में अपना हित साधने की कोशिश कर रही हैं। आंबेडकर आरएसएस और वामपंथियों को भी प्रिय हो गए हैं। यह अकारण नहीं कि आज की दलित राजनीति ही नहीं, मुख्यधारा की राजनीति भी उन्हें अपना आइकॉन मानने लगी है। चुनाव आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था ने भीमराव आंबेडकर को अधिकाधिक प्रासंगिक बनाया है। आज हर दल को आंबेडकर की जरूरत है। देश में कई आंबेडकरवादी पार्टियां हैं, जो उनके विचारों को नहीं, बल्कि उन्हें एक ब्रांड के रूप में अपना रही हैं। इसलिए कि देश की कुल आबादी के चौथाई हिस्से से अधिक वोट आंबेडकर के नाम के साथ जुड़े हैं। दलित वोटों की गोलबंदी जितनी मजबूत हो रही है, आंबेडकर से सियासी दलों का मोह उतना ही बढ़ता जा रहा है। आंबेडकर के जरिए दलित वोटों पर कब्जा जमाने की इच्छा जरूर दिखाई देती है, उनकी वास्तविक विरासत और विचारों को समझने और उसे आगे ले जाने का संकल्प कहीं नहीं दिखाई देता।

आंबेडकर आधुनिक भारत के सबसे ज्यादा विचारवान और विद्वान राजनेताओं में से हैं। पिछले साढ़े छह दशक से ज्यादा समय में जिन शख्सीयतों ने देश को बदलने में सबसे अहम भूमिका निभायी है, उनमें आंबेडकर अग्रगण्य रहे हैं। आंबेडकर ने संविधान के जरिये एक मूक क्रांति की नींव रखी। यह क्रांति थी सदियों से चली आ रही दलितों की उपेक्षा, शोषण और उनकी वंचना के इतिहास को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जरिये बदलने की। आंबेडकर केवल दलितों के ही नेता नहीं थे, वरन् वह एक स्वप्नद्रष्टा राष्ट्र निर्माता भी थे। उनके राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया मुख्यधारा के नेताओं से भिन्न थी।

डॉ. आंबेडकर के जीवनकाल पर यदि दृष्टि डालें तो हम देख सकते हैं कि उनमें बेमिसाल संकल्पशक्ति, सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए किसी भी तरह के अवरोध को पार करने का गजब का शौर्य था। समाज के पिछड़े वर्ग से आने के चलते उन्हें अनेकों बार अपमान और पीड़ा का कड़वा घूंट पीना पड़ा था। लेकिन सिर्फ इसी वजह से शिक्षा हासिल करने और जन कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने के अपने उच्च उद्देश्य से वे डिगे नहीं। एक तेजस्वी वकील, विद्वान, लेखक और बेहिचक अपनी राय व्यक्त करने वाले एक स्पष्टवक्ता के रूप में उन्होंने ख्याति अर्जित की। उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए राजनीतिक सत्ता के बजाय संरचनात्मक परिवर्तन को ज्यादा महत्व दिया। आंबेडकर को अपना बनाने की इस होड़ में इसकी तरफ बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है कि इस समाज के लिए अंबेडकर का विजन और रणनीतियां क्या थी।

डॉ. अम्बेडकर और सामाजिक न्याय की अवधारणा

डॉ. आंबेडकर सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। आंबेडकर जिस सामाजिक न्याय की अवधारणा का प्रतिपादन करते है वे नस्ल भेद, लिंग भेद और क्षेत्रीयता के भेद से मुक्त है। संविधान निर्माण में उनके इस सिद्धांत की भूमिका स्पष्ट देखी जा सकती है। सामाजिक न्याय की अवधारणा एक बहुत ही व्यापक शब्द है। सामाजिक न्याय की अवधारणा का मुख्य अभिप्राय यह है कि नागरिक नागरिक के बीच सामाजिक स्थिति में कोई भेद न हो। सभी को विकास के समान अवसर उपलब्ध हों। धार्मिक और सामाजिक शोषण के विरुद्ध उनकी जो सामाजिक न्याय की अवधारणा थी, हमेशा उसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी। क्योंकि धर्म, जाति के आधार पर समाज में फैला भेदभाव कभी खत्म नहीं होनेवाला है। उनका पूरा आंदोलन इस भेदभाव को ही लेकर था और इसीलिए उन्होंने 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किया था। पूना पैक्ट में था कि जिन जातियों के साथ भेदभाव किया गया, उन्हें सामाजिक न्याय मिलना चाहिए। इसी आधार पर मंडल कमीशन ने भी सामाजिक न्याय की मांग की थी। इसी आधार पर दलितों के सामाजिक न्याय की बात की जा रही है।

आंबेडकर एक ओर दलितों की मुक्ति और सामाजिक समानता चाहते थे, वहीं दूसरी ओर वे यह भी चाहते थे कि भारत एक मजबूत, शक्तिशाली एवं महान् राष्ट्र बने। उन्होंने इन दोनों दिशाओं के कार्य किया, किन्तु अगर इन दोनों में कभी भी प्राथमिकता का सवाल पैदा हुआ, तो उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के पहले दलितोंद्धार, मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय की स्थापना संबंधी कार्य को वरीयता देने पर जोर दिया। उनकी यह स्पष्ट मान्यता थी कि यदि कभी उनके हित और अनुसूचित जातियों के हित को प्राथमिकता देंगे, और यदि देश के हित और दलित वर्ग के हित में प्राथमिकता की बात आये या टकराव हो तो वे दलित वर्ग के हित को प्राथमिकता देंगे।

बाबा साहब ने कहा था कि वर्गहीन समाज गढ़ने से पहले समाज को जातिविहीन करना होगा। समाजवाद के बिना दलित-मेहनती इंसानों की आर्थिक मुक्ति संभव नहीं। उन्होंने व्यक्ति और समाज के परिप्रेक्ष्य में यह सिद्ध किया कि समाज में सभी मनुष्य समान हैं। सभी को समानता के साथ जीने का अधिकार है इसलिए न्याय और समता के आधार पर भारतीय समाज की पुनर्रचना की जानी चाहिए। इसके लिए उन्होंने वर्ण-व्यवस्था का पूर्ण रूप से उन्मूलन आवश्यक माना। आंबेडकर के अनुसार, ईश्वर की सृष्टि में सभी मानव समान है और सभी उस परमपिता की सन्तान हैं फिर भी एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का शोषण करना उनकी दृष्टि में अन्याय था। आंबेडकर ने ऐसे अप्रजातांत्रिक समाज के प्रति विद्रोह ही नहीं किया अपितु इसके विरूद्ध सबल जनमत बनाने में भी लग गये। वे चाहते थे कि समाज का वह शोषित, पीड़ित और दलित वर्ग इस शोषण के दल-दल से बाहर निकले और उस वर्ग को भी सामाजिक न्याय तथा सामाजिक प्रतिष्ठा तथा मानवीय अधिकार मिले। इस यथार्थवादी एवं मानवतावादी सोच ने आंबेडकर को वर्ण-व्यवस्था पर नये सिरे से विचार करने के लिए विवश किया। उन्होंने समाज के शोषित वर्ग को ‘अछूत’ कहे जाने पर आपत्ति ही नहीं की, अपितु उसे पुनः परिभाषित भी किया।

सामाजिक न्याय भारतीय संविधान की आधारशिला है। यद्यपि सामाजिक न्याय को संविधान में कहीं परिभाषित नहीं किया गया है। फिर भी भारतीय संविधान का प्रमुख स्वर और अनुभूति सामाजिक न्याय ही है। यहां समाज और न्याय के प्रति लचीला रूख अपनाते हुए न्यायिक व्यवस्था को मुक्त रखा गया है ताकि सामाजिक परिस्थितियों, आयोजनों, संस्कृति समय तथा लक्ष्य के अनुरूप इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जा सकें। सामाजिक न्याय से अभिप्राय है मानव-मानव के बीच में जाति, वर्ग, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, संस्कृति, क्षेत्र, प्रजाति के आधार पर भेद-भाव नहीं किया जाना और प्रत्येक नागरिकों को उन्नति के समुचित अवसर सुलभ किया जाना। किसी भी समाज या देश के विकास के लिए सामाजिक न्याय एक अनिवार्य शर्त एवं बुनियादी जरूरत है।

भारत में गरीबी, महंगाई और आर्थिक असमानता हद से ज्यादा है। भेदभाव भी अपनी सीमा के चरम पर है ऐसे में सामाजिक न्याय बेहद विचारणीय विषय है। भारतीय समाज बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, बहुभाषिक, बहुजातीय पैटर्न पर आधारित है। यहां सामाजिक न्याय की स्थापना एक कठिन चुनौती है। भारत में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में संतोषजनक परिणाम अब तक नहीं मिल पाया है जोकि एक चुनौती है। वर्तमान वैश्विक संदर्भ में इसकी अनिवार्यता और भी बढ़ जाती है। हालांकि भारतीय संविधान सामाजिक न्याय के क्रियान्वयन के लिए तीनो स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका को स्पष्ट निर्देश देता है परंतु कुछ नीतिगत और व्यावहारिक कारणों से इस क्षेत्र में हमारा प्रदर्शन बेहद लचर रहा है। इसके पीछे एक तरफ राजनीतिक दबाव तो दूसरी ओर संवैधानिक संस्थाओं के उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों की उदासीनता प्रमुख कारण है।

आजादी के इतने वर्षों के बाद जहां विकास अपने परवान पर है, हमारी गिनती विकासशील देशों के कतार में हो रही है, संचार के साधन, आवागमन के साधन, शिक्षा का प्रसार, रोजगार के अवसर आदि बढ़े हैं, विकास योजनाओं के माध्यम से कृषि उत्पादन आदि में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय आय में भी बढ़ोतरी हुई है किन्तु ये सभी लाभों का अंश आम जनता को नहीं मिल पाया है। गरीबी रेखा के नीच गुजर बसर करने वाले परिवारों की संख्या मे अनुकूल परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है। जहां सामाजिक न्याय को हम संविधान की आत्मा कह रहे हैं वहीं इसके विपरित समाज में आर्थिक विषमता बढ़ी है। अमीरों तथा गरीबों की बीच की खाई और अधिक चौड़ी हो गई है। भू-स्वामी किसानों का प्रतिशत घट रहा है तथा भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज हुई है। जहां विदेशों को अनाज का निर्यात होता है, वहीं अपने देश में कई लोगों भरपेट भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। एक तरफ महानगर में रोजगार की भरमार है तो अन्य राज्यों तथा शहरों में रोजगार का अभाव देखने को मिलता है। इन क्षेत्रों से लोग महानगरों की ओर पलायन कर रहे है। सामाजिक न्याय के झण्डे के नीचे नव-सामान्तवाद और पूंजीवाद फल-फूल रहे हैं।

रोटी, कपड़ा और मकान आरंभ से भारत की तीन बुनियादी आवश्यकताएं हैं जो मानव के जीने के अधिकार की रक्षा करते हैं, परंतु गरिमामय जीवन के अधिकारों की नहीं। आज के आधुनिक समाज के लिए इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा वैश्वीकृत दुनिया के लिए आज भ्रष्टाचारमुक्त समाज का अधिकार भी महत्वपूर्ण हो गया है। भारत में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में संतोषजनक परिणाम अब तक नहीं मिल पाया है जो कि एक चुनौती है। विडम्बना है कि आंबेडकर को लेकर राजनीति तो चलती चली आ रही है, लेकिन उनके विचारों को अपने आचरण में उतारने की कहीं कोई कोशिश नहीं दिखती। आंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि हर किस्म के जातिवाद से देश को मुक्त करने की कोशिशों के अलावा तब होगी, जब उनके कहे और लिखे का गंभीरता से अध्ययन और विश्लेषण किया जाएगा, न कि सुविधानुसार महिमामंडन।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

Advertisements

One thought on “अपने-अपने आंबेडकर

  1. आज टीवी पर प्रधानमंत्री मोदी की महू में आयोजित सभा देखी। मंच से मोदी समेत भाजपा के तमाम नेता बाबा सा‍हेब भीमराव अंबेडकर को हथियाने की कोशिश में लगे हुए थे। उनकी तारीफों के जम कर पुल बांधें जा रहे थे। पर अंबेडकर उदभव काल में इन लोगों ने उनके साथ क्या सुलूक किया था, पूरी दुनिया जानती है। कांग्रेस में तो महात्मा गांधी तक ने बाबा साहेब का जोर दार विरोध किया था। दलित, शोषित समाज अब इन दोनों राजनैतिक दलों के प्रोपेगंडा में फंसने वाला नहीं है। आज के दौर में दलित मुस्लिम गठजोड़ मौकापरस्त पार्टियों की चूलें हिला देने में सक्षम है। अंबेडकर समाज में जो बीच बो कर गए हैं, वह अब वृक्ष बन चुका है। जिसकी जड़ें काटना मनुवादियों की बस की बात नहीं है।

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s