जीने की राह

jeene ki raahजन्म और मृत्यु के बीच की जो यात्रा है वही जीवन है। इस यात्रा में कभी धूप मिलती है तो कभी छांव। कभी सुख मिलता है तो कभी दुख। इन सबके बीच आदमी को अपनी तयशुदा यात्रा पूरी करनी पड़ती है। आप जीवन को किस तरह जीते हैं यह पूरी तरह से आप पर निर्भर है। परिस्थितियों का रोना रोते हुए हताश होकर बैठ जाते हैं या फिर अपनी सामर्थ्य और सीमा के बल पर लक्ष्य की पूर्ति में जुटे रहते हैं। सुख और दुख शाश्वत है। जीवन में इनका आना अनिवार्य है। कोई भी इससे बच नहीं पाता। जीवन से मुक्ति का उपाय उससे भागना नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करना है। प्रतिकूल परिस्थितियों में घबराना नहीं चाहिए क्योंकि उससे कष्ट दुगुना हो जाता है। प्रतिकूल समय को अपने साहस के बल पर काटनेवाले को ही जीवन में सफलता मिलती है। जीवन को किसी भी तरह जीया जा सकता है। यह आपको तय करना है कि आप अपनी जिन्दगी किस प्रकार जीते हैं। क्योंकि ये आपका जीवन है, जिसे जीना हर हाल में है।

हमारी शांति-अशांति सभी हमारी अंतनिर्हित वासनाओं के ही प्रतिफल हैं। हम जो कुछ भी हैं, उसके लिए हम खुद जिम्मेवार हैं। मनुष्य में ऐसी शक्ति है जो किसी भी अन्य जीव या प्राणी में नहीं। वह शक्ति है आत्मदृष्टि, जो उसे अपने से बाहर स्वयं अपने को देखने के लिए सक्षम बनाती है। यह आत्मदृष्टि ही मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करती है। दार्शनिकों ने मनुष्य को भटका हुआ देवता कहा है। सारी प्रगति, विकास या उत्थान की एकमात्र कसौटी मनुष्यत्व ही है। ग्रीस के एक तत्वविज्ञानी ने कहा है कि मनुष्य ही मनुष्यत्व की कसौटी है। नकारात्मक भावों के कारण हम अक्षम बनने लगते हैं। हमारी किस्मत को हमसे कोई छीन नहीं सकता है। समय से पहले किसी को कुछ भी नहीं मिल सकता। चीजें अपनी गति से चलती रहती हैं। मंजिल पाना आसान नहीं है तो बहुत कठिन भी नहीं। पत्थर पर उन्नीस बार चोट करने से वह नहीं टूटता और बीसवीं चोट में वह टूट जाता है तो फिर यह नहीं समझना चाहिए कि उन्नीस चोटें व्यर्थ चली गयी बल्कि यह समझना चाहिए कि बीसवीं चोट की सफलता की तैयारी उन्नीस चोटें कर रही थीं। जीवन के संघर्ष में सफलता पाने के लिए उत्साह का होना जरूरी है। सफलता उसी को मिलती है जो उत्साह से परिपूर्ण होता है। सफलता और असफलता परिस्थिति और सामर्थ्य पर निर्भर है। सफलता में देर हो लेकिन वह ठीक दिशा में होनी चाहिए। आपको ऐसी हिम्मत रखनी चाहिए कि आप खुद को शिखर पर चढ़ा ले जायेंगे।

कल्पना का रूख हमेशा ऊपर की ओर होना चाहिए। सामर्थ्य रहते हुए भी हमारा आचरण इससे उल्टा होता है। हम जितने ऊपर जा सकते हैं उतने भी न जाकर खुद को नीचे गिरा लेते हैं। हमें जो शक्ति प्राप्त है उसे अपनी हीन भावना से नष्ट कर लेते हैं। व्यक्ति की महानता उसे उपलब्ध साधनों या परिस्थितियों में नहीं बल्कि उसके मनोबल में सन्निहित है। मनोबल से जीवन की प्रत्येक दिशा में उन्नति एवं संपन्नता के द्वार खुल जाते हैं। संसार के महापुरूषों के जीवन पर नजर डालने से पता चलता हैं कि परिस्थितियों, साधनों एवं योग्यता की दृष्टि से वे आरंभ में बहुत पिछड़े हुए थे। उनका जन्म, उनकी जाति या सांसारिक स्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी एक औसत दर्जे के मनुष्य की होती है। उनमें एक ही विशेषता थी वह थी मनोबल की प्रखरता। इसी के बल पर उन्होंने इतने बड़े कार्य संपन्न कर डाले जिसे देखकर हैरत होती है। इच्छाशक्ति के द्वारा ही मनुष्य कोई कार्य करता है या कोई कार्य नहीं करता। जीव का बहुत बड़ा लक्षण है उसकी इच्छाशक्ति। नेपोलियन का कहना था कि असंभव शब्द मूर्खों के कोष में है। आल्प्स पर्वत जैसे दुर्गम अवरोध को उसने जब पार करने की ठानी, तो यह प्रश्न सामने आया कि अब तक कोई उसे पार नहीं कर सका है, सभी महत्वाकांक्षी उसी अवरोध में उलझकर अपनी हस्ती गंवा बैठे तो उसके लिए कैसे संभव हो सकता था की दूसरे छोर तक पहुंच सके। उसके संकल्प ने आश्वासन दिया कि आल्प्स को नेपोलियन के लिए मार्ग देना पड़ेगा। ऐसा हुआ भी।

दृढ़इच्छा शक्ति से नामुमकिन काम भी आसान हो जाता है। हौसला बुलंद हो तो बाधाओं के पहाड़ को भी झुकना पड़ता है। इसके लिए जरूरत है कि आप अपनी संकल्प शक्ति का विकास करें और अपनी कल्पना को विशाल बनायें। माउंटेन मैन के नाम से विख्यात गया के दशरथ मांझी ने गेहलौर पहाड़ी काटकर रास्ता बनाया था। केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर इन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों परिश्रम के बादए दशरथ के बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किमी से 15 किलोमीटर कर दिया।जब उन्होने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने उन्हें पागल कहा लेकिन इसने उनके  निश्चय को और मजबूत किया। गया के ही महादलित सुग्रीव ने अकेले अपने दम पर 130 फुट लंबा और 50 फुट चौड़ा तालाब खोद डाला।गया के अतरी प्रखंड के ही रामजु मांझी ने पहाड़ काटकर 500 फुट लंबा रास्ता बनाकर नया इतिहास रच डाला है। उम्र के सत्तरवें पड़ाव पर आमतौर आदमी जोखिम भरे कार्यों से परहेज करने लगता है लेकिन रामजु मांझी ने हिम्मत नहीं हारी।

दक्षिण कन्नड़ जिला का 60 वर्ष के किसान महालिंगा नाईक कभी स्कूल नहीं गये। उनकी शिक्षा दीक्षा और समझ खेतों में रहते हुए ही विकसित हुई। अडयानडका में पहाड़ी पर दो एकड़ की जमीन पर पानी का जो काम उन्होंने किया है, उसमें कठिन श्रम के साथ-साथ दूरदृष्टि और पर्यावरण का दर्शन साफ झलकता है। उन्होंने पहाड़ की छाती चीरकर पानी निकाल दिया। यह जमीन पहाड़ी पर थी और मुश्किल यह कि ढलान पर थी। एक तो पानी नहीं था और पानी आये भी तो रूकने की कोई गुंजाईश नहीं थी। फसल के लिए इस जमीन पर पानी रोकना बहुत जरूरी था। पानी रूके इसके लिए पानी का होना जरूरी था। तभी उन्हें पानी की सुरंग का ख्याल आया। बस यही एक रास्ता था कि सुरंग के रास्ते पानी को यहां तक लाया जाए। पानी की सुरंग बनाने के लिए बहुत श्रम और समय चाहिए था। इस काम में अकेले ही जुट गये। गांववाले कहते थे महालिंगा व्यर्थ की मेहनत कर रहा है। एक के बाद असफलताओं ने उन्हें निराश नहीं किया। पांचवी बार वे पानी लाने में सफल हो गये। उनकी इस मेहनत और जीवट का परिणाम है कि आज वे 300 पेड़ सुपारी और 40 पेड़ नारियल के मालिक है। उस जमीन को उन्होंने हरा-भरा किया जो उन्हें सत्तर के दशक में मिली थी। समय लगाए श्रम लगा लेकिन परिणाम न केवल उनके लिए सुखद है बल्कि पूरे समाज के लिए भी प्रेरणा है। पांचवी सुरंग की सफलता के बाद उन्होंने एक और सुरंग बनाई जिससे मिलनेवाले पानी का उपयोग घर-बार के काम के लिए होता है।

सरलता ही सफल जीवन का रहस्य है। जीवन के लिए परम आवश्यक गुण सहजता और सरलता है। हमारे जीवन में नकारात्मक life1 भावों की गांठें बन गयी हैं। माया,- मोह, ईष्या-लोभ, राग-द्वेष, निराशा-हताशा ये सब ही हमारी भावनाओं की गांठें हैं। इन गांठों की वजह से जीवन की सहजता और सरलता समाप्त हो गयी है। इन गांठों के कारण ही हमारे जीवन में दुःख है, क्लेश है, अशांति है। मानसिक शांति का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। धन, यश, संपन्न्ता के बावजूद शांति नहीं हैं। नचिकेता ने जब यम से पूछा कि मनुष्य अमृत-पुत्र होते हुए भी अमृत से वंचित क्यों रहता है। इसपर यम नचिकेता का समझाते हुए कहते हैं कि यह अमृत प्राप्त हो सकता हैं यदि हम हृदय की गांठें गला दें। मनुष्य माया के दायरे में बंधा रहता है। वह जो चाहता है वह हो नहीं पाता। मुश्किलों से बचकर निकलना चाहता है लेकिन निकल नहीं पाता। मनुष्य जब अपने नैतिक मूल्यों का नाश करता है तो खुद मनुष्य का नाश हो जाता है।

वेदांत में बतलाया गया है कि हर व्यक्ति की एक स्वतंत्र दुनिया है औैर वह उसके मन के द्वारा सृजित की गयी है। उसकी भावना, निष्ठा, रूचि एवं आकांक्षा के अनुरूप ही उसे सारा विश्व दिखलाई देता है। यह दृष्टिकोण बदल जाए तो मनुष्य का जीवन भी उसी आधार पर परिवर्तित हो जाता है। जो हम सोचते हैं, सो करते है और वहीं भुगतते हैं। मन ही हमारा मार्गदर्शक है, वह जिधर चलता है शरीर उधर ही जाता है। जीवन के उत्थान और पतन का केंद्र मन है। मन को कामधेनु भी कहा गया है। वही कामना भी करता है और उसकी पूर्ति का साधन भी जुटा लेता है। जैसा मनोरथ करें वैसे ही साधन जुट जाएं और उसी पथ पर प्रगति होने लगे। जीवन की उन्नति के लिए मन का सधा होना आवश्यक है। यदि वह अव्यवस्थित, असंयमित है तो सफलता नहीं मिल सकती। जिसका मन बेकाबू है उसका जीवन असफल एवं दुखमय ही रहता है। मन साधने से स्वार्थ और परमार्थ दोनों सध सकते है। यदि मन को साध लिया जाए तो निर्वाह के आवश्यक साधनों की कमी कभी नहीं पड़ सकती। हम अपनी परिस्थितियों की सृष्टि आप करते हैं और उसी में सुख-दुख का अनुभव करते हैं। यदि कोई कार्य सुव्यवस्थित तरीके से हो तो आसानी से हो जाता है। अनियंत्रित और अनियोजित तरीके से किया गया काम ही बोझ लगने लगता है। किसी भी काम में चित्त की एकाग्रता बहुत आवश्यक है। चित्त की एकाग्रता का अर्थ है चित्त की चंचलता पर अंकुश। एकाग्रता ही सफलता का  मार्ग प्रशस्त करती है। चित्त एकाग्र रहेगा तो सामर्थ्य की कभी कमी नहीं पड़ेगी। सफल व्यक्ति चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो उसकी सफलता का सूत्र उसकी एकाग्रता है। एकाग्रता दो प्रकार की होती है सहज एवं अर्जित की हुई।

आर्नाल्ड टायनबी ने कहा है मनुष्य की मनुष्यता का उच्छेद शस्त्रास्त्र नहीं करते, मनुष्य के भीतर की दुर्बलता करती है। यह मनुष्य के स्वभाव पर निर्भर है कि वह परिस्थितियों का सामना किस प्रकार करता है। निराशावादी आशा में भी निराशा ढ़ूंढ़ लेते हैं और आशावादी निराशा में भी आशा का संचार कर लेते हैं। आशावादी व्यक्ति नीरस वातावरण में भी आशा और उत्साह भर देता हैं। मनुष्य अपना शत्रु आप है और स्वयं अपना मित्र भी। वह अपने में शुरू होता है और अपने में नष्ट हो जाता है। यह उसके स्वभाव पर निर्भर है कि अस्त-व्यवस्तता अपनाकर अपने को दुर्गति के गर्त में धकेलता है या चुस्त-दुरूस्त रहकर प्रगति के शिखर पर निरंतर आगे बढ़ता है।

मनुष्य अतीत या भविष्य में अधिक रहता है। वर्तमान में बहुत ही कम रहता है। वह स्मृतियों की उधेड़बुन में व्यस्त रहता है। अतीत का तो हम कुछ कर नहीं सकते। यदि हम अपने वर्तमान को सुधार लें तो हमारा भविष्य अपने आप सुधर जाएगा। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि थिंक एण्ड गो रिच यानि सोचिए विघेयात्मक सोचिए एवं अभी इसी क्षण सोचिए ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ बना सके। सारे महा मानव इसी से महान बने हैं। बीज को वृक्ष बनने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है। बीज यदि बीज रहे तो विश्व को वह उपलब्ध नहीं होगा, जो वृक्ष से हो सकता है। वैसे ही खुद को विकास के शिखर तक पहुंचाने के लिए बहुत लंबी यात्रा करनी पड़ती है। यदि चेतना सुस्त रहे तो हमें वह उपलब्ध नहीं हो सकता जिसकी हम अपेक्षा करते हैं।

जीवन में सफलता प्राप्त करने एवं व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए संस्कारों का विशेष महत्व है। संस्कार अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। दोनों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता है। शबर के अनुसार संस्कार वह है जिसके संपादन से कोई व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है। संस्कार ही वह माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति एक परिष्कृत तथा पूर्ण समाज विकसित करता है। विनोबा संस्कार संचय को ही जीवन मानते हैं। एक ही रंग-रूप, नैन-नक्श और कद-काठी का होने के बावजूद एक मनुष्य संपन्नता में जीता है और एक विपन्नता में। मनुष्य की आयु बहुत लंबी नहीं है लेकिन थोड़े से आयु में ही जीवन का सुख लेने का सामर्थ्य है। जीवन का अंतिम सार मधुर निकले, अंत की घड़ी मधुर हो इस दृष्टि से ही सारी योजनाएं बनानी चाहिए। नदी स्वच्छन्दता से बहती है, परंतु उसका प्रवाह बंधा हुआ होता है। यदि वह बद्ध न हो तो उसकी मुक्तता व्यर्थ चली जायेगी। इसलिए हमें अपना व्यवहार बांध लेना चाहिए ताकि जीवन बोझ नहीं बल्कि आनन्दमय लगे।

मनुस्मृति कहती है-मनुष्य अकेला ही इस संसार में आया है और अकेला ही वह इस संसार से जाएगा। अकेला ही वह अपने कर्मों का फल चखता है और अकेला ही वह अपने द्वारा किये जानेवाले दुष्कर्मों का फल भोगता है। मनुष्य के साथ केवल उसका धर्म ही जाता है। अतः उसके लिए यही श्रेयस्कर है कि वह निरंतर धर्म का संचय करता चले ताकि मृत्यु के बाद वह उसके काम आ सके। सपनों को पूरा करने के लिए संकल्प की दरकार होती है। जो बीत गया उसका अफ़सोस नहीं। जो आ रहा है, उसका बाँहें फैला कर, दिल खोल कर स्वागत करें। हर साल उम्मीदों और संकल्पों से शुरू होता है। उम्मीदों, अपेक्षाओं के साथ मुश्किल हमेशा रहती है।

✍ हिमकर श्याम

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