इस जय और पराजय के निहितार्थ

lalu_nitishबिहार में फिर एक बार नीतीश की सरकार बनेगी। राज्य में महागठबंधन को महाविजय हासिल हुई और दिल्ली के बाद भाजपा नीत गठबंधन को सबसे बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। महागठबंधन में शामिल तीनों दलों का प्रदर्शन शानदार रहा। नीतीश का फेस और लालू का बेस महागठबंधन की जीत का कारण बना। नीतीश-लालू की जोड़ी, मोदी-शाह की जोड़ी पर भारी पड़ी। बिहार के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगाहें थी। यह नतीजे देश की भावी राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे। बिहार ने यह साबित कर दिया की राजनीति में अपराजेय कोई नहीं।

बिहार में सारे एग्जिट पोल और पूर्वानुमान गलत साबित हुए। राज्य की जनता ने काँटे की टक्कर बात को नकारते हुए साफ-साफ फैसला महागठबंधन के पक्ष में सुनाया। एक दशक से बिहार की सत्ता पर आसीन रहने के बावजूद नीतीश के ख़िलाफ सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दी। मुख्यमंत्री के रूप में उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य और सुशासन से किसी को इंकार नहीं था, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो। मुख्यमंत्री के रूप में वह जनता की पहली पसंद अंत तक बने रहे। वहीं एनडीए यह भरोसा दिलाने में नाकाम रहा कि वह नीतीश से बेहतर मुख्यमंत्री दे सकता है। उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी लहर पर भरोसा था। मोदी के चेहरे को ही आगे रख कर चुनावी रणनीति बनायी गयी। यहीं सबसे बड़ी चूक साबित हुई।

चुनाव तारीखों का ऐलान होने के बाद नरेंद्र मोदी ने राज्य में 26 चुनावी सभाएं की। पूर्व के चार परिवर्तन रैलियों  को मिला देने से इनकी संख्या 30 हो जाती है। पार्टी रैलियों में जुटी भीड़ को वोट में नहीं बदल सकी। मोदी ने जिन 26 शहरों में प्रचार किया था उनमें से 12 सीटें बीजेपी हार गई है। वोटरों का मिजाज भाँप पाने में पार्टी पूरी तरह से विफल रही। मोदी का जादू पार्टी और गठबंधन के काम नहीं आ सका। चुनाव प्रचार में नीतीश-लालू की रणनीति का तोड़ बीजेपी नहीं निकाल पाई। पार्टी के रणनीतिकार यह भूल गए कि लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में नीतीश-लालू की दोस्ती का प्रयोग सफल हुआ था। हर मोर्चे पर नीतीश-लालू की जोड़ी,  मोदी-शाह की जोड़ी से आगे दिखी। पूरे चुनाव के दौरान महागठबंधन के तीनों दलों ने जिस एकता का दर्शाया वैसी एकता एनडीए में नज़र नहीं आई। आपसी मतभेद और भितरघात से एनडीए को काफ़ी नुकसान पहुँचा।

भाजपा के नकारात्मक प्रचार का फायदा महागठबंधन को मिला। डीएनए, जंगलराज, आरक्षण, गोमांस, थ्री इडियट्स, शैतान, तन्त्र-मन्त्र, महागठबंधन की जीत पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे जैसे बयानों का उलटा असर हुआ। एनडीए के हर वार पर महागठबंधन ने जोरदार तरीके से पलटवार किया। प्रधानमंत्री ने मुजफ्फरपुर की रैली में नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाया तो नीतीश ने इसे बिहार के स्वाभिमान से जोड़ दिया। मोहन भागवत की आरक्षण वाली टिप्पणी ने लालू को एक अच्छा हथियार दे दिया। लालू पिछड़ों और यादवों को गोलबंद करने में कामयाब रहे और भाजपा बैकफुट पर आ गई। भाजपा के मंत्रियों और नेताओं द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य मुद्दों पर बयानबाजी का चुनाव परिणामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ता गया राजनीतिक मर्यादाएँ तार-तार होती गयीं। जिस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा था उसे देख-सुन आम मतदाता हैरान थे।

लालू यादव तो अपने भदेस और मसखरे वाली छवि के लिए ही जाने जाते है। अपने बेतुके बयानों और अभद्र भाषा की वजह से वह मीडिया की सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं। हमेशा से उनका यहीं अंदाज़ रहा है, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने जिस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग किया उसे सुन लोग सन्न थे। मोदी यह भूल गए कि वह पार्टी का चेहरा, प्रचारक होने के साथ ही देश के प्रधानमंत्री भी हैं और इस पद की एक गरिमा होती है। बिहार चुनाव में प्रधानमंत्री ने अपनी गरिमा बहुत गिरा दी। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश के बड़े नेता भी कड़ुवाहट, कटुता वाली भाषा और ओछी बयानबाजी में मोदी से कहीं कम नहीं दिखे। प्रधानमंत्री लालू को लेकर राजनीतिक हमले की बजाए व्यक्तिगत हमले करने लगे। इससे यादवों की गोलबंदी ज्यादा हो गई। मोदी जी ने जिस अंदाज़ में बोली लगा कर पैकेज की घोषणा की थी वह पीएम पद की गरिमा और बिहार की प्रतिष्ठा के लिहाज से ठीक नहीं था। उनका अंदाज़ ऐसा था कि मानो वह बिहार को आर्थिक पैकेज नहीं खैरात या भीख दे रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के मंत्रियों और नेताओं द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य मुद्दों पर बयानबाजी का चुनाव परिणामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। पूरे चुनाव के दौरान नीतीश ने अपनी भाषा पर संयम रखा। उनका भाषण बिहार के विकास और मोदी सरकार की कार्यकलापों की खामियाँ पर केंद्रित रहा।

नीतीश-लालू की जोड़ी ने मोदी-शाह की जोड़ी को करारी शिकस्त देते हुए दो तिहाई से ज्यादा बहुमत हासिल की। राजद और कांग्रेस ने बिहार में जबरदस्त वापसी करते हुए क्रमशः 80 और 27 सीटों पर कब्जा किया। 2010 में राजद को 22 और कांग्रेस को सिर्फ चार सीट मिले थे। महाठबंधन ने 178 सीटें अपने नाम कीं। राजद सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। वहीं भाजपा और उसके सहयोगियों को सिर्फ 58 सीटों पर जीत मिली। भाजपा को narendra modi-amit shaht2010 के विधानसभा चुनाव की तुलना में तीन दर्जन सीटों का नुकसान हुआ है। वहीं उसके सहयोगी लोजपा को दो, रालोसपा को दो और ‘हम’को एक सीट ही मिली। राज्य के 14 जिलों में एनडीए अपना खाता तक नहीं खोल पाई। पीएम मोदी समेत एनडीए के तमाम नेता और केंद्र सरकार के मंत्री महागठबंधन के समर्थन में जनता की गोलबंदी को नहीं रोक पाए। चुनाव के दौरान आरक्षण और असहिष्णुता को लेकर जो कुछ बोला गया वह मोदी लहर, शाह की रणनीति और पासवान, मांझी, कुशवाहा के गठजोड़ पर भारी पड़ा।

चुनाव में भाजपा ने बिहार में अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी। मोदी की पूरी कैबिनेट, भाजपा के दर्जनों सांसद, झारखण्ड के मुख्यमंत्री समेत पूरा कैबिनेट और आरएसएस के हजारों कार्यकर्ता बिहार के चुनावी मैदान में दिन रात सक्रिय रहे फिर भी उन्हें जबरदस्त  हार का सामना करना पड़ा। धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ के आगे साम्प्रदायिक ताक़तों की धज्जियाँ उड़ गयीं। नीतीश और लालू एक-दूसरे का वोट महागठबंधन के पक्ष में कराने में सफल रहे। कुर्मी वोट राजद को भी मिला और यादव वोटरों ने जदयू को भी वोट दिया। नीतीश-लालू की जोड़ी ने जनता को समझाने में सफल रही कि उनकी जोड़ी बिहारी है और मोदी- शाह की जोड़ी बाहरी। बिहार का भला बिहारी जोड़ी ही कर सकती है बाहरी जोड़ी नहीं।

नीतीश की छवि सभी वर्गों में स्वीकार्य हैं। इस बात को बीजेपी के नेता समझने में नाकाम रहे। चुनावी सर्वेक्षणों में उनके विरोधी मतदाताओं ने भी माना था कि नीतीश कुमार एक बेहतर मुख्यमंत्री रहे हैं। बिहारी मतदातों को लगा कि राज्य की सत्ता सँभालने के लिए नीतीश से बेहतर कोई और नहीं हो सकता। लालू के साथ गठजोड़ को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी उसे खारिज करते हुए नीतीश यह भरोसा दिलाते रहे कि उनकी सरकार सुशासन, आर्थिक विकास के साथ-साथ समावेशी विकास के अपने एजेंडे पर कायम रहेगी।

बिहार की चुनावी लड़ाई गुजरात बनाम बिहार मॉडल के बीच थी। बिहार मॉडल समावेशी विकास को तरजीह देता है और गुजरात मॉडल कॉर्पोरेट जगत के फायदे की बात सोचता है। विकास में समाज के सभी वर्गों की समानतापूर्ण भागीदारी के सवाल को ज्यादा समय तक नजरअंदाज करके नहीं रखा जा सकता है। नीतीश कुमार राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। एक कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ वह सोशल इंजीनियरिंग भी बखूबी जानते हैं। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि बिहार में यदि राजनीति करनी है तो सिर्फ विकास से काम नहीं चलेगा। इसके लिए वोट बैंक की बाजीगरी भी आनी चाहिए। नीतीश कुमार ने विकास और सामाजिक न्याय को शासन का मूलमंत्र बनाया। उन्होंने विकास योजनाओं में वोट बैंक का भी ध्यान रखा। चाहे वह अत्यंत पिछड़ी जाति हो, महादलित हो, पसमांदा मुसलमान हो, सबको विकास में भागीदार बनाने की कोशिश की। मुस्लिम-यादव और कोइरी-कुर्मी के वोट और कांग्रेस के कुछ परम्परागत वोटों के अलावा दलित-महादलित वोट भी महागठबंधन को मिले। चुनाव पूर्व जातिगत सूची में बदलाव का फायदा भी महागठबंधन को मिला।

यूपीए के 10 सालों के शासन से आजिज़ और क्षुब्ध जनता ने मोदी पर भरोसा जताया था। भाजपा और उसके सहयोगियों ने विकास और सुशासन के वादे के दम पर व्यापक जन समर्थन जुटाया। सबका साथ, सबका विकास के नारे और अच्छे दिनों का सपना दिखा कर मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने में कामयाब हुए। यह नारा और सपना करोड़ों मतदाताओं की आकांक्षाओं से जुड़ गया। लोग मोदी की आक्रमक शैली और गुजरात मॉडल के मुरीद हो गए। अधिकांश समुदायों में प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी ही अपरिहार्य पसंद थे। खासतौर से युवा मतदाताओं को भाजपा से जोड़ने में मोदी प्रभाव बेहद अहम रहा। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर भाजपा को पूर्ण बहुमत के पार ले गई और फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और झारखंड की भी सत्ता दिलाई। शासन के डेढ़ सालों से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी मोदी कुछ खास करिश्मा नहीं दिखा पाए। मोदी सरकार आर्थिक सुधारों की दिशा में कोई ऐसी पहल नहीं कर सकी है, जिससे उसके प्रति जनता का भरोसा और मजबूत हो। भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की कोशिशों का देशव्यापी विरोध हुआ। विदेश यात्राओं की बात छोड़ दें तो मोदी सरकार की कार्यशाली पूर्वर्ती यूपीए सरकार से ज्यादा अलग नहीं दिखी। इस दौरान महंगाई, साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता बेलगाम हो गयी। असहिष्णुता पर साहित्यकारों, कलाकारों और विद्वानों ने आवाज़ उठाई तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उनकी मंशा पर सवाल उठाये जाने लगे। प्याज और दाल के बढ़े दामों के बाद देश में सरसों के तेल के दाम बढ़ गए। खुद सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले एक साल में तेल के दाम 40 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। मंहगाई कम करने के नाम पर सत्तासीन हुई मोदी सरकार के एक फैसले से कुछ महत्वपूर्ण जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो गयी। इसमें कैंसर, मधुमेह, रेबीज, रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आनेवाली आवश्यक दवाएं भी शामिल हैं। ये दवाएं आम आदमी की पंहुच से बाहर हो गई है। मोदी के अमेरिका दौरे से पूर्व दवाओं की कीमतों के नियामक, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने108 दवाओं को नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया। इससे अमेरिकी सहित तमाम दवाई निर्माता कम्पनियों को भारी मुनाफा हो रहा है। अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी कंपनियों के साथ मुलाकात को इस फैसले से जोड़कर देखा गया।

दावों, वादों और जुमलों से पेट नहीं भरता। अच्छे दिन लाने के वादे के दम पर प्रचंड बहुमत के साथ देश की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा की सरकार देश के लोगों के लिए अच्छे दिन ला पाने कि दिशा में अब तक प्रयासरत नहीं दिखाई दे रही है। मोदी के ज्यादातर फैसले पूंजीपतियों को हित में दिखाई दे रहे हैं। सरकार न तो महंगाई पर लगाम पाई और न ही रोजगार का कोई अवसर पैदा कर सकी है। किसानों कि हालत दिन-ब-दिन खराब होती गयी। जनता का धीरे-धीरे मोदी से मोहभंग होने लगा है। हाँ इस दौरान मोदी भक्तों (प्रशंसकों) की भक्ति में कोई कमी नहीं आई है। मोदी की आलोचना करनेवाले इन भक्तों (प्रशंसकों) के निशाने पर रहे। देश में ख़ासकर सोशल मीडिया में ऐसा माहौल तैयार किया गया कि इन भक्तों के अलावा कोई भी राष्ट्रवादी नहीं है। जो मोदी भक्त (प्रशंसक) नहीं वे देशद्रोही हैं। भाजपा अगर नतीजों को गंभीरता से ले तो उसे तय करना होगा कि उसका असली एजेंडा क्या है, विकास या धर्म के नाम पर राजनीति।

दिल्ली के बाद बिहार की हार यह दर्शाता है कि मोदी लहर अब कमजोर पड़ने लगा है।  दिल्ली और बिहार की सुनामी के आगे मोदी लहर कमजोर नज़र आने लगी है। राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत होने के साथ-साथ विनम्र और सबके हितों का पक्षधर होना चाहिए। लोकसभा चुनाव की अप्रत्याशित जीत ने मोदी-शाह सहित पूरी पार्टी को अहंकारी बना दिया। उन्हें लगने लगा कि अब वे अपराजेय हो गए हैं। उन्हें कोई नहीं हरा सकता। दिल्ली की हार से भी पार्टी नहीं चेती। शाह-मोदी के बड़बोले का खामियाज़ा बिहार चुनाव में एनडीए को चुकाना पड़ा। बिहार के नतीजें मोदी लहर पर सवार भाजपा के लिए चेतने का शायद आखिरी मौका है। इस हार के बाद पार्टी के भीतर मोदी के ख़िलाफ विद्रोह शुरू हो सकता है। मोदी के कार्यशैली से वैसे भी पार्टी के पुराने और दिग्गज नेता दुःखी हैं। चुनाव के दौरान शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह सहित बिहार के कई नेता मोदी और पार्टी के ख़िलाफ बयान देते दिखाई दिए। हार से उसके सहयोगी भी मुखर होंगे। शिवसेना जो बिहार में एनडीए से अलग चुनाव लड़ रही थी ने तो नरेंद्र मोदी के सिर हार का ठीकरा फोड़ दिया है। चुनाव में नीतीश-लालू का सियासी कैरियर भी दाँव पर लगा हुआ था। बिहार में महागठबंधन की हार होती है तो सामाजिक परिवर्तन के उनके आंदोलन को जबरदस्त झटका लगता और मोदी-शाह की जोड़ी को रोक पाना अगले कुछ सालों तक नामुमकिन हो जाता।

देश की राजनीति के लिहाज से अगले दो साल बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन दो सालों में 10 राज्यों में चुनाव हैं। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु में 2016 में चुनाव होंगे और  यूपी, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड में 2017 में चुनाव होंगे। दिल्ली और बिहार की हार के बाद एनडीए के लिए इन राज्यों में मजबूती से लड़ पाना आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में ममता का मजबूत गढ़ है तो केरल में वाम दल, कांग्रेस का आधार। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के नतीजें भारत की राजनीति को एक नयी दिशा देंगे। राष्ट्रीय फलक पर इन नतीजों का असर डालना अवश्यंभावी है। इन नतीजों के बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट होने का फायदा दिखला दिया है। इधर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में अपनी नयी पारी की शुरुआत करेंगे। उन्हें राजद और कांग्रेस को लेकर आगे बढ़ना है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जंगलराज के लौटने के अंदेशे को खत्म करने के साथ-साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने की है।

✍ हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

मेरी काव्य  रचनाओ  के लिए मुझे इस लिंक पर follow करे. धन्यवाद.

http://himkarshyam.blogspot.in/

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6 thoughts on “इस जय और पराजय के निहितार्थ

  1. बहुत सी पंक्तियाँ मेरे द्वारा इनको बोले गये लगे जो मैं हर सभा के समय बोलती थी
    एक इक पंक्ति सच्ची है
    सार्थक सामयिक लेखन

    Liked by 1 person

    1. Bahut badhiya bishlesan liye ha himkar ji. Lekin afsos is bisleshan pe apko badhaoyo ke badle sarkar ke fecebookiye charno dwara khub galiya milengi. Ha ha ha.

      Liked by 1 person

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